Friday, 27 February 2009

ताकि प्यास रहें बरक़रार

हमारी परम्परा में नाद ब्रह्म है और जब उसके साथ दर्शन हो तो बनता है वह अलौकिक होगा....उसकी अनुभूति शब्दों से परे होगी....गूंगे के गुड की तरह....यहाँ हम एक फिल्मी क़व्वाली की चर्चा कर रहें हैं....सुर-ताल के साथ शब्दों की संगत से जो बेहतर बनता है. वह सब बरसात की रात की क़व्वाली 'ना तो कारवां की तलाश है, ना तो हमसफ़र की तलाश है' में मिल जाएगा.... इसे आत्मस्थ होकर सुनने से जो अहसास होता है वह भी अलौकिक.....शायद स्वर्गिक या शायद....शब्द नहीं है....चुक गए है...इसे दर्शन में संप्रेषण की समस्या कहते है...पश्चिम में खासकर कार्ल जेस्पेर्स अनुभूतिगत आदान-प्रदान को मानव होने की खास जरुरत मानते है, लेकिन इसकी सीमाओं से हम इंकार नहीं कर सकते है...फिर जिस तीव्रता, स्तर और मात्रा में मुझे कोई अहसास हुआ है, उसका मापदंड क्या है? अहसास तो व्यक्ति-दर-व्यक्ति अलग होता जाता है, खैर फिलहाल दर्शन नहीं संगीत और अध्यात्मिक अनुभूति की बात हो रही है. मन्ना डे के आलाप के साथ शुरू हुई इस क़व्वाली में सिर्फ़ आराधक और आराध्य ही है, या दुनियावी और श्रृंगारिक दृष्टि से आशिक और माशूक....लेकिन जैसे-जैसे यह आगे बढती है आशिक और माशूक कहीं गुम हो जाते है, फिर जो बचता है वह सिर्फ़ और ब्रह्म और पिंड होता है…संसारिकता कहीं गुम हो जाती है और रूहानियत का जन्म होता है, रेडियो के ज़माने में 'ना तो कारवां की तलाश है' और 'ये इश्क इश्क है इश्क इश्क' दो अलग-अलग कम्पोजीशन के तौर पर सुनी और पहचानी थी...क्योंकि इसकी लम्बाई औसत गानों से ज्यादा है और इस माध्यम की अपनी सीमाएं....तो ना तो कारवां की तलाश है ना तो हमसफ़र की तलाश है.....फिर मंजिल तो साफ़ है, एकांतिकता की दरकार है....मेरे शौके खाना ख़राब को तेरी रहगुजर की तलाश है....रास्ते की तलाश है और वो भी अकले.....अकले होने का कोई गम नहीं, बल्कि चाहत है....वो तो सिर्फ़ प्रेम में ही सम्भव है, आखिर कबीर ने भी तो है की प्रेम गली अति साकरी या में दो ना समाही, जब में था तब हरि नाही, अब हरि है मैं नाहीं...जिस रास्ते से मैं भी नहीं गुजर सकता, उसमे कोई और कैसे साथ चल सकता है?फिर आशा का मद्धम आलाप से प्रवेश करना...मेरे नामुराद जूनून का है इलाज कोई तो मौत है....किसी भी तरह के इस दुःख से निजात की ख्वाहिश...तेरा इश्क है मेरी आरजू, तेरा इश्क है मेरी आबरू....तेरा इश्क में कैसे छोड़ दूँ मेरी उम्र भर की तलाश है....यहाँ तक तो पकी उम्र में ही पहुँचा जा सकता है, क्योंकि इस जूनून तक....दिल इश्क, जिस्म इश्क और जान इश्क है, ईमान की जो पूछो तो ईमान इश्क है.... तो फिर बचा क्या?यहाँ तक तो सब कुछ चलता है, लेकिन जैसे ही क़व्वाली का दूसरा हिस्सा 'ये इश्क इश्क है इश्क इश्क है' शुरू होता है सुफीत्व का आविर्भाव होता है और हम एक सर्वथा नई भावभूमि पर आ खड़े होते है....यहाँ कुछ भी नहीं होता 'नथिंगनेस' भी नहीं क्योंकि इसका अस्तित्व भी 'थिंग' होने के बाद की अवस्था है....यहाँ अतीत के बाद का वर्तमान है...यहाँ न काल है न काल का अहसास......सिर्फ़ नाद है....और है ब्रह्म की अनुभूति ...जमाना नहीं और अहसासे जमाना तक नहीं, यहाँ तो शमन होने लगता है कबीर वाले 'मैं' का, जो धीरे-धीरे गल रहा है...पिघल रहा है.....सहर तक सबका है अंजाम जल कर खाक हो जाना.... एक और सच मृत्यु...चाहे कोई भी हो इससे निजात नहीं है. क़व्वाली में इश्क के फलसफे के गिरह खुलने लगती है....इश्क आजाद है.....हिंदू ना मुसलमान है इश्क....आप की धर्म है और आप ही ईमान है इश्क है....एक चेतावनी.....बहुत कठिन है डगर पनघट की.....उसका जवाब.....जब-जब कृष्ण की बंसी बाजी निकली राधा सज के जान अजान कम ध्यान भुला के लोक लाज को तज के...... एक सी ताल पर जूनून रगों नें दौड़ने लगता है....सप्तक तक जाता सुर..... कहता है कि ये कायनात इश्क है और जान इश्क है....अंत में इश्क की इन्तहा....खाक को बुत और बुत को देवता करता है इश्क इन्तहा ये है कि बन्दे को खुदा करता है इश्क....फिर कबीर तू तू करती तू भई मुझमे रहीं ना मैं.....यूँ फ़िल्म में ये रोशन की कम्पोजीशन है लेकिन असल में ये उनके गुरु भाई फ़तेह अली खान की रचना है....अंत तक आते आते भावनाओं कम अतिरेक और आंसू....आख़िर दुःख और खुशी के अतिरेक के साथ भावनाओं के अतिरेक की अभिव्यक्ति भी तो ये ही करते है....आनंद के समंदर में पुरी तरह डूबे हुए....शब्द खत्म हुए....हाँ एक प्यास बनायें रखें ......घूंट घूंट पिए.....क्योंकि तृप्ति से ज्यादा आनंददायक है प्यास....जय हो के ज़माने में सुने इश्क की महिमा और बताएं......

Saturday, 7 February 2009

फिर सवालों का जंगल है..




दिमाग के घर में दीवार नहीं है.... इसलिए विचारों का पंछी कभी भी बेधड़क आता और जाता रहता है....मायूसी की बात ये है कि समय और सब्र के वो दरख्त ठुठ हो गए है जिन पर कभी अहसासों के पछियों के घोंसले हुआ करते थे....फिर भी कभी-कभी ये पंछी अपने माजी से रूबरू होने के लिए उदासी की गठरी उठाये चले आते हैं.....आज दोपहर भी वह आकर उसी ठूंठ पर अपनी उदासी की गठरी लिए आ बैठा.....सूरज तप रहा था और वह जोगी की तरह ऑंखें मूंदे तप की मुद्रा में बैठा रहा.... धूप ने उसे स्याह कर दिया था....इस स्याही ने उसकी गठरी बहुत भारी कर दी और वह उसे वहीं छोड़ कर उड़ गया....मतलब उसके अवसाद की गठरी मेरे दिमाग के घर में अब पड़ी हुई है.... वह अपना अवसाद मेरे लिए छोड़ गया है....ये अवसाद छूत की बीमारी है और इसका संक्रमण मुझे भी हो गया....किसी शायर ने क्या खूब लिखा है कि---- ना मिला कर उदास लोगों से/ हुस्न तेरा बिखर ना जाए कहीं.....तो अब ये अवसाद फिलहाल मेरा मेहमान है....यूँ ये बिन बुलाया मेहमान ही रहता है.... अक्सर किसी न किसी बहाने से आ ही जाता है ... इन दिनों फिर से अजीब से सवालों ने आ घेरा है....अपनी गठरी छोड़ कर पंछी तो उड़ गया लेकिन उसमें से अवसाद की केंचुल हमारे हाथ रह गई..... अवसाद दौड़ का हिस्सा होने की.... दौड़ते हुए कण-कण क्षरण होते देखने का....इस अनजानी, अनचाही और अपरिचित दौड़ में कई पड़ाव और मंजिलें है.... और हर पड़ाव पर पहुँच कर यूँ लगता है कि कहीं पीछे कुछ रह गया है.... हर मंजिल पर पहुँच कर एक रिक्तता हमारा इंतजार करती है...भोतिक उपलब्धि कहीं न कहीं हमें खोखला कर देती है ...महत्वाकांक्षा अपनी तरफ़ आकर्षित करती है तो जीवन की प्रयोजनहीनता का विचार अपनी और बकौल ग़ालिब --- ईमां मुझे रोके है तो खीचें है मुझे कुफ्र, काबा मेरे पीछे है कलिसा मेरे आगे.......

Thursday, 5 February 2009

सीने में जलन आँखों में तूफान सा क्यों है?

ना जाने क्या लावे सा बहता है....? एक बेचेनी.....एक छटपटाहट..... सुबह शाम एक उलझन .....लगातार एक जलन.... जीवन के रूटीन हो जाने के बाद की एकरसता ......सपनों को भोग लेने के बाद की नीरसता.... यदि सपनें टूटते है तो कम-से-कम उसकी किरचें तो होती है...लेकिन सपने पुरे होने के बाद....होता है खालीपन.....जीवन में क्या सच है....कमी या पूरापन....फिर पूरापन क्या है? आज जो पुरा लग रहा है क्या वो कल भी इतना ही पुरा लगेगा....या कल फिर से नई दौड़ होगी..? कभी-कभी यूँ लगता है कि जीवन में एक दर्द .....एक कमी...एक अभाव जरुरी है....कोई आकर्षण तो हो.... खुशी के बाद जो एक रीतापन होता है वह कमी के बाद नहीं होता है.... तकलीफ तो हमेशा कुछ होने का अहसास कराती है... खुशी की तरह नहीं कि आती है और रूटीन बन कर रह जाती है...दर्द से निजात के लिए लगातार के प्रयास होते है.... उससे निकलने के लिए तरह-तरह के उपाय.... हर दिन कि नवीनता....एक नया दिन ख़ुद से लड़ने...घायल होने और हार जाने के बाद फिर से खड़ा होने की ताकत जुटाने का न टूटने वाला क्रम.....सह कर सीखने और जीवन को सम्रद्ध करने और करते रहने का जूनून....तेज प्यास..... और तृप्ति के खवाब....लगातार चलती जद्दोजहद.....तभी तो अज्ञेय ने लिखा है कि दुःख माँजता है... और यकीनन वह माँजता है.... चमका कर सोना कर देता है.... और खुशी उथला कर देती है.... शायद इसीलिए कहा गया है कि दुःख के अहसास के बिना आई खुशी आदमी को दीमक की तरह खोखला कर देता है... सोचें कि उस राजा की तरह जिसे पैसों की इतनी हवस थी कि उसने इसके लिए तप किया.... और फिर उसे वरदान मिला कि वह जिस चीज पर हाथ रख देगा वह सोना हो जायेगी.....हमारे भी साथ हो जाए कि हम जो चाहे वह मिल जाए तो...... वक्ती तौर पर तो उपलब्धि होगी.... खुशी का अहसास होगा लेकिन.... फिर....? जीवन से सारे आकर्षण....सारी जद्दोजहद....प्रयास...उमंग... उत्साह सब कुछ काफूर हो जाएगा। जीवन में एक ही रंग होगा... एक ही सा अहसास और अपनी भाषा में कहें तो बोरियत होगी और होगी ऊब..... शायद तभी तो धर्मवीर भारती और शिवाजी सावंत जैसे विद्वानों ने अपूर्णता को जीवन की जरुरत माना है। तो संघर्ष है तो गति है....जीवन है....प्रवाह.....सृजन....रस....और अन्त में दुनिया है..... फिर...अधूरेपन को पुरे मन से सलाम....जीवन को रसमय और आकर्षक बनने के लिए....है या नहीं? आप बताएं

Tuesday, 27 January 2009

धूप का रंग है पीला...दिन हुआ सुनहरा...

आज रात कुछ अजीब सा अहसास हुआ.... गहरी नींद में कमरे में पायल की रुन-झुन सुनाई दी..नींद थोडी सी कुनमुनाई और फिर सो गई....थोडी देर बाद कहीं से प्रभाती के सुर कानों में पड़े....लगा कि आधी रात को कौन गा रहा है? फिर किसी ने प्यार से थपथपा कर जगाया....आखें खोली तो सिरहाने उजली-निखरी सुबह खड़ी मुस्कुरा रही थी....फिर सो नहीं पाई...बहुत देर तक उसकी उंगली पकड़े उसकी रुनझुन के साथ चलती रही....पता नहीं कब सुबह ने अपना आँचल धीरे से छुडा लिया...और मेरा हाथ जवान होती दोपहर के हाथ में दे दिया...पुरा दिन उसके साथ न जाने कहाँ-कहाँ की खाक छानी.....और मखमल सी सरकती शाम की गोद में आ गिरी....फिर.....फिर पता नहीं क्या हुआ...? अब पहेली क्यों बुझाऊ इन दिनों कुछ नशा सा छाया रहता है....हर दिन की शुरुआत गुलगुली गुलाबी सुबह के खिलखिलाने की आवाज से होती है...हवाओं से दिन भर खुशबु आती रहती है...दोपहर मीठी-मीठी और शाम मखमली लगती है...रात गुनगुनाती हुई आती है और लोरी सुना कर सुलाती है... मन न जाने क्यों उड़ता फिरता है....यूँ ही केलेंडर देखा और सारा-का-सारा माजरा समझ में आ गया....वसंत आ चुका है....मतलब हमें मालूम हो या न हो...प्रकृति हमें किसी भी तरह जता देती है.....कहती है कि ये मेरा यौवन का....श्रृंगार का मौसम है....प्रकृति अपने पुरे शबाब पर है....वह सभी कलाओं में ख़ुद को अभिव्यक्त कर रही है...सुबह से रात तक दिन कितने रूप-मुड़ और शेड बदलता है....आप गिन नहीं पाते है. हर दम फाग के सुर गूंजते रहते है....हवा छेड़छाड़ करती रहती है. हम शहरियों को तो पता भी नहीं होता है कि खेतों में सरसों के फूल खिल गए है...पलाश पर सिंदूर दहक रहा है...फिर भी यूँ लगता है कि कहीं कुछ तो खुबसूरत जरुर हो रहा है....चारों और रंग महक रहें है... मन मयूर हो रहा है....होली यूँ ही नहीं मनाई जाती है...जब सभी ओर रंग उड़ रहें हो, मन में यूँ तरंग का आलम हो...बिना कारण आल्हाद का अहसास हो....तो फिर रंगों का खेल नहीं होगा तो क्या होगा...? वसंत ओर फागुन की जोड़ी राग, रंग, आनंद ओर सृजन का मौसम है....वातानुकूलित घरों-दफ्तरों, मल्टीप्लेक्स और मॉल से निकल कर ठूठ हुए पेडों पर फूटती कोपलें....कहीं दूरदराज में कोई भूले हुए पलाश के दहकने को देखें....प्रकृति के सुन्दरतम रूप को निहारें....उसके सौन्दर्य से प्रेरणा लेकर सिरजे.....शायद यही वसंत और फागुन का उत्स है....सार और अर्थ है... वसंत शुभ...आनंदकारी...आल्हादकारी....और सृजनात्मक हो....वाग्देवी सरस्वती....बुद्धि...मेधा और कल्पना से समृद्ध करें.तो वसंत आप में और आप वसंत में महके...इसी आकांक्षा के साथ वसंत पंचमी की शुभकामना

Wednesday, 21 January 2009

समंदर के सिरहाने गुजरे वे दिन

जिसने भी सुना पेशानी पे सिलवटें लाकर कंधे उचकाकर पूछा-- ये कहाँ है....और वहाँ क्या है? सच भी है पर्यटन के नक्शे पर दमन का कोई नाम नहीं है... लेकिन दो रविवारों के बीच के दिनों को समंदर के सिरहानें बिताना तय कर हमने अपने कान बंद कर लिए.... आखिर मुंबई के अलावा और कौन सी जगह है जहाँ रात भर का सफर कर पहुँचा जा सकता हो...?

तो गुजरती रात का सिरा पकड़ कर जब हम वापी रेलवे स्टेशन उतरे तो मालवा के पठार की ठण्ड हमें छोड़ने वहाँ तक आई. दमन और वापी भाई-बहन की तरह हाथ पकड़े खड़े हुए है.... पता ही नहीं चलता है कि कहाँ वापी ख़त्म हुआ और कहाँ से दमन शुरू हुआ..... अचानक एक बड़े से सीमेंट का दरवाजा जिस पर लिखा हुआ है कि -- केन्द्र शासित प्रदेश दमन और दीव में आपका स्वागत है----आपको बताता है कि आप दमन पहुँच गए है..... नानी दमन बीच के पास होटल में अपना सामान रखा। बेचेनी इतनी कि बिना चाय पीए बीच पहुँच गए...पास ही चाय पी बीच पर सिलवासा से चले सूरज की आहट सुनाई पड़ने लगी थी .... लेकिन ये क्या.....? सामने जो आलसी अजगर की तरह पानी पसरा है क्या ये समंदर है? एक बारगी तो लगा कि शायद ये यहाँ की कोई बड़ी सी नदी है....क्योंकि समंदर इतना उनींदा ...इतना अलसाया कैसे हो सकता है? यदि वहाँ गुजराती में लगे बोर्ड को जिस पर लिखा था कि -- ये समुद्र बहुत तोफानी है. यहाँ स्नान करना मना है---नहीं देखा होता तो हम इसे नदी ही समझते.... खैर हमने सोचा कि आखिर रात भर इसने भी काफी मशक्कत की होगी इसलिए थक गया होगा....हम भी रूम पर जाकर सो गए....११ बजे के लगभग जब हम मोटी दमन बीच पर पहुंचे.... तो शुरूआती रेत के बाद बहुत दूर तक पत्थर ही पत्थर नजर आए.... हम भी उन पत्थरों पर चलते-चलते बहुत दूर निकल गए... फिर भी समंदर नहीं मिला... बकवास सी इडली ने जवाब दे दिया था.... सूरज ने दमन में अपनी किरणें फैला दी थी.... वहाँ भेल बेचने वाले घूम रहें थे...भूख लगने लगी थी...वहीं पत्थरों पर बैठ गए.... भेल खाने लगे.... थोड़ा ईंधन पहुँचा तो फिर आगे जाने का मन बनाया...लेकिन भेल वाले रमेश ने हमें कहा कि पानी कभी भी आ सकता है...आप आगे जाने की बजाय लौट जाओ क्योंकि ये समंदर छकाता है....सामने से ही नहीं कभी पीछे से भी आ धमकता है....और देखते देखते वो हमारे सामने था पुरी मस्ती और मूड के साथ....
दमन गंगा के पुल को पार कर जम्पोर बीच की तरफ़ चल पड़े... न जाने कैसे गली-कुचों से निकल कर एक छोटा से मैदान के बाहर ऑटो ने हमे उतार दिया... मैदान के उस पार रेत का टीले सा पार कर जब हम नीचे उतरे तो जानकी बेन की दुकान पर लगी कुर्सियों पर जा कर बैठ गए. यहाँ थोडी दूर तक सूखी....फिर थोडी नम....गीली और बहुत दूर तक रिसती रेत का मैदान पसरा पड़ा था....कुछ युवा क्रिकेट खेल रहें थे....घोड़ा गाड़ी समंदर के आँगन मजे से दौड़ रही थी...जानकी बेन ओम्लेट....मछली...चिप्स...नारियलपानी और चाय बेचती है...उनके घर आए नन्हे मेहमान रोहित ने राजेश को चुनौती देते हुए पूछा ---- वोलीबाल खेलना आता है...? राजेश ने भी चुनौती स्वीकार कर उसके साथ खेलना शुरू कर दिया..... बहुत दूर तक समंदर की तलाश में चलती चली गई....लेकिन फिर थक कर लौट आई... पैरों में रेत किरकिरा रही थी और मन में भी...आखिरकार फिर से लौटना है....सब कुछ को छोड़कर...उसी दुनिया में जिससे भागते फिरते है.... उन्हीं लोगों..उसी रूटीन में....तभी जानकी बेन ने बताया कि वो बहुत दूर जो अंगूठे के आकार के लोग नजर आ रहें हैं न...वहीं पानी है...उसे यहाँ तक आने में तीन घंटे लगेंगे.....हम बिना मिले ही लौट आए...अब इतनी पास आए है तो उस जख्मी शहर के हाल जाने बिना कैसे लौट सकते है.... जिससे मेरी बचपन की स्मृति...और कुछ छूटते रिश्ते जुड़े हुए है....जी हाँ मुंबई.... डबल डेकर फ्लाईंग रानी में सवार होकर पहुँच गए मुंबई... सबसे पहले जुहू.... फिर ताज....इस बार मुंबई घुमा नहीं....उसे जानने की कोशिश की... असाधारण लोगों का एक साधारण शहर...है मुंबई....जहाँ के बाशिंदे तमाम मुश्किलों....अभावों और प्रतिकूलताओं के बाद भी जीवंत और मददगार बनें हुए है.... जो असाधारण लोगों का एक साधारण शहर...है मुंबई....जहाँ के बाशिंदे तमाम मुश्किलों....अभावों और प्रतिकूलताओं के बाद भी जीवंत और मददगार बनें हुए है.... जो अपने अभावों को उपलब्धि और परेशानियों को गरिमा बना कर जी रहें है...बस लौटने का दिन आ गया....अपनी उसी दुनिया में जो उबाती है....बुलाती है....अच्छी भी और बुरी भी...जो जानी पहचानी भी और अपरिचित भी....

कुछ शहर के बारे में: मुंबई के इतने पास होने के बाद भी लगता है कि यहाँ मुंबई की हवा नहीं पहुंचती है.... पुरी तरह एक पारंपरिक मध्यमवर्गीय शहर... सिवा दमन गंगा नदी के किनारे बने एक किले और उसमे बने चर्च के यहाँ पुर्तगालियों के कोई अवशेष नजर नहीं आए....ये शहर कोली गुजराती बाशिंदों का शहर है....हमारे होटल के नेपाली काका ने हमें बताया कि यहाँ शराब के अलावा और कुछ नहीं है.... उन्होंने ठीक ही कहा.... चाय पीने के लिए हमें बहुत दूर-दूर तक चल कर जाना पड़ता था.... और हर तीसरी दुकान वहाँ शराब की थी लेकिन यदि दमन की चाय की चर्चा नहीं करना उसका अपमान करना होगा...कम जगह मिलती है लेकिन बहुत बढिया मिलती है....देहाती गाडापन और गुजराती मसाले का इतना कमल ब्लेंड जितना तो दार्जिलिंग में भी नहीं मिला.... वेटलैंड के समर्थक माफ़ करेंगे ये कहने के लिए कि दमन गुजरात का वेट लैंड है.... सही समझे शराब के मामले में....गुजरात जहाँ शराबबंदी है....वहाँ के शौकीन आख़िर कहाँ जायेंगे...? जल्द ही हमें ये समझ में आ गया कि यहाँ हमारा ज्यादा गुजारा नहीं है...फिर भी.....

दमन की यात्रा

इस बार नए साल की शुरुआत नए तरीके से करने की सोच लिए दमन की और चल पड़े सोचा तो था कि कुछ बदलेगा ....हम अपने काम...माहौल और जगह से कुछ समय के लिए ही सही दूर होंगें ... राहत तो मिलेगी.... लेकिन हम भूल गए थे कि हम सब कुछ छोड़ सकते है.... अपने आपको कहाँ फ़ेंक सकते है...? और यदि आप राहत में नहीं हो तो फिर कहीं भी राहत नहीं होगी... खैर दमन पहुँचते ही जम्पोर के रेतीले बीच पर रात को आई लहरों के निशान..... सुबह वाक पर गए समंदर की टेरीटरी पर क्रिकेट....और वोलीबोल खेलते बच्चो को देख कर कुछ देर के लिए ही सही ख़ुद को भूल गए नानी दमन पर हमारी उससे मुलाकात हो ही गई....

अगली सुबह जम्पोर के रेतीले बीच की सैर के लिए निकले.... सूरज बस आसमान पर धीरे-धीरे चहलकदमी करते हुए आधे आसमान पर पहुँच चुका था.... लेकिन समंदर मोर्निंग वाक पर था और बच्चे उसके आँगन में धमाचौकडी मचा रहे थे.... रेत पर हांलाकि समंदर के क़दमों के निशान बाकी



थे....



सुबह जब हम नानी दमन बीच पर पहुंचे दूर तक पत्थर नजर आ रहें थे.... न समंदर नजर आ रहा था न ही उसके निशान थे.....थोडी देर बाद भेल वाले ने बताया की अभी समंदर भी तफरीह के लिए गया हुआ है और बस आधे घंटे में लौट आएगा...हमने भी सोचा कि अब इतनी दूर आए है तो उससे मिल कर ही जायें...
लहर दर लहर वो आपके पास आता है... चिढाता...खिजाता और फिर मनाता रहा...हम भी उससे रूठने का नाटक करतें रहें.....बस यूँ ही रुठते मनाते शाम हो गई और विदाई का समय आ खड़ा हुआ...फिर वह धीरे-धीरे दूर और दूर होता चला गया और आख़िर में आंखों से ओझल हो गया बस कारवां गुजर गया गुबार देखते रहें.........









Thursday, 15 January 2009

इस्रेइल के हमले और हमारा असमंजस

तमाम दुनिया के विरोध और आलोचनाओं के बाद भी पश्चिम एशिया का लड़ाकू देश इस्रेइल गाजा पट्टी पर लगातार हमले कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के बाद भी उसका अभियान जारी है.....इसे कहते है शेरदिली.... आप चाहे कितना ही मानवीय हो लें यदि आपका विरोधी आपकी मानवता को नहीं समझता है तो आपकी सारी कसरत बेकार है...असल में इस्रेइल के गाजा पर हमले उस दौर में हो रहें है जब हमारा देश संकट के दौर से गुजर रहा है.... हम हताश है.... अविश्वास के शिकार है और स्वाभिमान की जरुरत के मारे है....इस निराशा से उबरने के लिए हमें नेता की जरुरत है और इसके लिए हम कोई भी कीमत देने के लिए तैयार है.... चाहे वो कीमत अपने मूल्यों के रूप में ही क्यों न चुकानी पड़ें। ये सही है की isreil बेवजह एशिया की पश्चिमी पट्टी को खून से रंग रहा है.... हमास के बहाने का खून बहा रहा है.... अमेरिका की सरपरस्ती में अपने क्षेत्र में शक्ति प्रदर्शन कर रहा है... और कोई मौका होता तो हम ( हम पर शायद सबको आपत्ति हो इसलिए मैं) भी इस तबाही का जमकर विरोध करते.... लेकिन आज ये लगता है कि काश हम भी ऐसा करते.....कर सकते.... अपनी लडाई को ख़ुद के बूते अंजाम पर पहुँचाने की कुव्वत हासिल कर पाते... हम पर हुए हमले का प्रतिकार बिना किसी के कंधे का सहारा लिए कर पाते.... काश इस बार हम भी इस्रेइल हो पाते....दरअसल यहाँ से हमारा असमंजस शुरू होता है....मानवीय मूल्यों और भावनाओं के बीच संघर्ष.....हिंसा हर हालत में अमानवीय है.... और गाजा पट्टी-इस्रेइल मामला हर सूरत में अमानवीय है.... लेकिन जब सवाल मुंबई पर आतंकवादी हमलों और इसके बाद हमारी सरकार द्वारा की गई और की जा रही कार्रवाही का हो तो हम अनायास ही भावना के क्षेत्र में चले जाते है...हमें लगता है कि हमें भी इस्रेइल की तरह ही प्रतिकार करना चाहिए.... करना होगा... आज इस्रेइल हमारा नायक.... क्योंकि उसके चारों तरफ़ से दुश्मनों से घिरे होने के बाद भी वह वही करता है.... जिसे वो ठीक समझता है.... जो उसके लिए ठीक है... और हम...? हम जो ठीक समझते है उसे तक क्रियान्वित नहीं कर पाते.....हमें लगता है कि हमें भी इस्रेइल की तरह ही प्रतिकार करना चाहिए.... करना होगा...
हम तो वो भी नही कर सकते है जिसे पुरी कहती है कि किया जाना चाहिए....हमें तो इसके लिए भी अमेरिका सहित पुरी दुनिया की सहमति की जरुरत होती है..... असल में हमें कृष्ण जैसे नेता की जरुरत है और गाँधी जैसे नायक की.... क्योंकि हम नायक की पूजा करते है और नेता का अनुसरण करतें है.... हमें कृष्ण होने की और गाँधी को सोचने की जरुरत है जबकि बदकिस्मती से गाँधी हमारे नेता है. मानवीय मूल्य हमारे जीवन के प्रदर्शक है... और भावना हमारी संचालक ...... ऐसा अक्सर होता है कि प्रदर्शक मूल्य हार जाते है और संचालक शक्ति जीत जाती है.... मेरे साथ तो ऐसा ही होता है और आपके.....?

सतह के नीचे बहती मज़बूरी

आज मुंबई की बात..... हादसों को अपने सीने पर सहने के बाद मुंबई प्रवास सैलानियों की तरह नहीं बल्कि पर्यवेक्षक की नजर से हुआ। ३ दिनों तक तूफान से जूझने के बाद क्या और कितना बदला यह जानने की उत्सुकता ज्यादा थी। जानना था कि क्या अब भी शहर की हवा नमकीन है.... क्या अब भी इस शहर की रातों का जागना और दिन का भागना बदस्तूर जारी है.... अब भी समंदर चहलकदमी करते हुए किलोमीटर २ किलोमीटर दूर चला जाता है और इसी तरह लौट आता है? क्या अब भी अरब सागर के पश्चिम में ढलते सूरज की परछाई से लहरें गलबहिया करतें है....अब भी लोग लोकल और बसों की रफ्तार से लोग कदम-ब-कदम करतें हैं...अब भी जमीन और आसमान के बीच आधी रात में प्रेशर कुकर की सीटी सुनाई देती है...? पहले लोग गेटवे आफ इंडिया की सैर के लिए आते थे....आज ताज के दीदार के लिए आते है.... गेटवे का गौरव अंग्रेज इतिहास का हिस्सा हो गया और आज आतंक के दौर के इतिहास का आइना टाटा का होटल ताज महल हो गया ..... कहतें है की हमलों को झेल रहें शहर के दुसरे हिस्सों की जिंदगियां मशीन की तरह रफ्तार से चल रही थी बाद में धीरे-धीरे सब कुछ सहज होता चला गया....दरअसल यह सहजता नहीं है...ये मज़बूरी है....मालेगाँव से मैन हट्टन तक पसरी एक सी मज़बूरी....कौन सा शहर रुका है...कौन का शहर खाली हो गया है..? कोई नहीं .....असल में जीवट और जिजीविषा के नीचे लगतार बह रही है हमारी बेबसी....कुछ न कर पाने और निरंतर सहते रहने की मज़बूरी.... कहाँ जा सकते हैं इससे भागकर....?

Tuesday, 13 January 2009

जीवन के मायने क्या?

बड़ी उदास सी सुबह और बोझिल सा दिन है....एक सा कम और एक से जीवन से ऊब का दौर है.....फिर से सवालों ने सिर उठाये है.... हर दिन आता है और निकल जाता है... रात खाली हो जाती है.... मशीन से जीते हुए संवदेनाओं के सिरे भी थाम नहीं पाते है.... काम करना....खाना-सोना..... घूमना-फिरना.....खरीदना....मजे करना....पैसा कमाना... और खर्च करना.... क्या यही जीवन है? या जीवन का कोई और भी मकसद है....? यूँ कोई और मकसद नजर तो नहीं आता है.... फिर सवाल उठता है कि जीवन क्यों है...? हम क्या इसलिए जीते है कि हममे मरने की हिम्मत नहीं है? और यदि जीवन का कोई मतलब नहीं है तो फिर हमारे सुख-दुःख....नाकामयाबी और उपलब्धि.... खुशी या फिर दर्द क्या इनमें से क्या किसी का भी कोई मतलब नहीं है? तो फिर हम क्यों है....क्या हम स्रष्टि के संचालन के लिए मात्र मोहरे है...? तो हमारे अनुभव....अहसास.....रचना....कर्म....किसी का भी कोई मतलब नहीं है ? क्या वाकई दुनिया मिथ्या है...? और हमारे होने या ना होने का कोई मतलब.....मकसद नहीं है..... तो हम क्यों है...? बड़ी उलझन है.... उदासी और हताशा है. होने की निर्रथकता का गहरा अहसास.....बेबसी... होने और ना होना चाहने के बीच का निर्वात.....

Saturday, 10 January 2009

पाक-नापाक, हम ढुलमुल

मुंबई हादसे को महीने भर से ज्यादा हो गया है..... हम पहले ही दिन से पाकिस्तान के खिलाफ सुबूत दे रहे है.... और वो लगातार हमें झुठला रहा है.... वो कह रहा है कि हम युद्ध के लिए तैयार है..... हम कह रहें है कि हम युद्ध नहीं चाहते है।
समझ में नहीं आ रहा है कि गुनाह किसने किया है....? हमारे लिए इंसानी जानों की कीमत क्या है...? कभी-कभी तो शुबहा होने लगता है कि हमारे सियासतदानों के लिए अवाम का मतलब कहीं मात्र वोट ही तो नहीं ....? हमारे लिए ये कोई पहला मौका नहीं है कि हम आतंकवाद के शिकार हुए है ...... संसद पर हुए हमले के बाद हम कुछ नहीं कर पाए..... हमारी समस्या ये है कि हम कोई भी कार्यवाही करने के लिए दूसरों की और देखते रहते है....? इस मामले में भी हम चाहते है कि हमे अमेरिका इशारा करे ...... और हम कार्यवाही करें ....हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका ने हमारे मुश्किल के दौर में हमे न सिर्फ़ अकला छोड़ दिया था बल्कि हमारे लिए मुश्किलें बढाई थी.... और हम इतनी बड़ी घटना के बाद भी सिवाए बयानबाजी के और कुछ भी नहीं कर रहें है.....दुसरे विश्व्ययुद्ध के बाद से पुरी दुनिया में यदि अमेरिकी भूमिका को देखें तो स्पष्ट हो जायगा कि उस देश की नीयत क्या है.... पुरी दुनिया में जहाँ कहीं अमेरिकी हस्तक्षेप हुआ है वहां अमेरिकी स्वार्थ रहें है....(यहाँ स्वार्थ और हितों में अन्तर है, अन्तरराष्ट्रीय राजनीति पुरी तरह हितों का ही खेल है, लेकिन अमेरिकी राजनीति पुरी तरह स्वार्थों से ही संचालित होती है) अब हमें इस मुगालते से भी बाहर आ जाना चाहिए की उसने भारत से परमाणु समझोता इसलिए किया कि हमे इसकी जरुरत है.... नहीं ये डील इसलिए हुई है कि उसे इस डील की जरूरत है ....मंदी की चपेट में आई अपनी अर्थव्यवस्था को बूस्ट करने के लिए किसी ऐसे बकरे की जरुरत थी... जिसकी जनसंख्या विशाल हो..... और ये हमसे बेहतर ओर कौन हो सकता है..... आखिर आतंकवाद ने उत्तर और दक्षिण के देशों के झगडों को हाशिये पर धकेल दिया है लेकिन ये मुद्दा खत्म नहीं हुआ है कि उत्तर के देश गरीब देशों को अपनी पुरानी हो चुकी तकनीक ऊँचे दामों पर बेचते है.....इस तरह से गरीब देश इन अमीर देशों के लिए ऐसे कचराघर है.... जहाँ वे अपना कचरा भी फेंकतें है और उसकी कीमत भी लेते है..... अमेरिका के लिए हम सिर्फ़ एक बड़ा बाजार है..... जहाँ वो सब कुछ बेच सकता है....अमेरिका और पाकिस्तान हमेश से रणनीतिक साझीदार रहें है और रहेंगे अमेरिका कभी भी नहीं चाहेगा कि भारत और पाकिस्तान के रिश्तें सुधरे..... यदि ऐसा होता है तो सबसे ज्यादा नुकसान उसे ही होगा.... उसका हथियारों का बाजार प्रभावित होगा और दक्षिण एशिया में उसकी जड़ें कमजोर होगी.... फिर जरा सोचिये आतंकवाद से सबसे ज्यादा फायदा किसे हुआ है....? किसने इस विषबेल को पोसा है? अमेरिका ने ही ना तो फिर वो क्यों चाहेगा की दक्षिण और पश्चिम एशिया में शान्ति हो तभी तो यहाँ पाकिस्तान को और पश्चिम में इसरैएल की पीठ पर लगातार अमेरिका का हाथ है.....फिर लौटते है मुंबई मामले पर... अब अमेरिका ने पलटी मरी और इस बात पर जोर देने लगा है की भारत को पाकिस्तान के साथ मिलकर जाँच करनी चाहिए..... अब कहिये कि शिकार और शिकारी मिलकर फैसला करेंगे तो .... गौर फरमाए कि ---- मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है, क्या मेरे हक में फैसला देगा.....तो अब भलाई इसी में है कि हम कन्धों की तलाश छोडें और अपने साथ हुए अन्याय का ख़ुद ही प्रतिरोध करें..... किसका इंतजार है अब???

Friday, 9 January 2009

और भी गम है ज़माने में मोहब्बत के सिवा

आसमान मेहरबान हो रहा है.....प्रकृति अपने औदात्य से सौन्दर्य के संसार की रचना कर रही है .....सुनहरी सुबह धुंधली हो गई सूरज को बादलों ने कैद कर दिया है...और पुरे आसमान पर धमाचौकडी मचाए हुए है....बादलों और सूरज के बीच मोहब्बत का रूठने मनाने और छेड़-छाड़का मौसम है .... इस मौसम ने लिहाफ का गुनगुनापन भला लग रहा है..... ऐसे में सुबह का आगाज़ बूंदों के छमछम ने नींद गायब कर दी कोफी के प्याले के साथ एक बारगी विचार आया कि ये दुनिया घंटे दो घंटे ठहर क्यों नहीं जाती .........हम अपने साथ आ जाए और अहसास ऐ दुनिया गुम हो जाए ...... मगर हाय ये किस्मत आंगन में धप की आवाज़ हुई और हाथ कांपा.... कोफी छलकी ...... आज का अखबार सामने था .....
कबीर ने समझ कर हमें भी समझाया कि माया महाठगिनी.....मगर हम समझ कर भी नहीं समझे....अखबार में छपी ३ ख़बरों ने दिमाग के गोदाम में हलचल मचा दी.....१. मुंबई की घटना पर भारत-पाक के बीच बेवजह की और बेनतीजा आरोप-प्रत्यारोप....२. इस्राइल का गाजा पर हमला और ३. सत्यम का असत्यम.....हाँ इसी में कही मुंबई को हादसें के बाद इस शहर की पड़ताल भी करेंगे...... मगर आज नही....

Saturday, 27 December 2008

बुश पर फेंके जूते के बहाने

वो पुरसिशे ग़म को आए है कुछ कह न सकूँ, चुप रह न सकूँ खामोश रहूँ तो मुश्किल है कह दूँ तो शिकायत होती है
इराक के पत्रकार जैदी के सामने ऐसी कोई दुविधा नहीं है।इराकी पत्रकार ने बुश पर जूतें फ़ेंक कर किसी पत्रकार के गुस्से का इजहार नहीं किया है..... उसने सबसे पहले इराकी समाज का और फिर पुरी दुनिया के गुस्से को आकार दिया है.... सभ्यतावादी तो नैतिकता का मर्सिया पढ़ रहें है.... और पत्रकारिता के मूल्यों की बात की जा रही है......लेकिन जरा ठहरिये ये किसी पत्रकार की अभिव्यक्ति नहीं है कहा तो ये जा रहा है कि एक पत्रकार का हथियार कलम है उसे जूतों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए..... लेकिन जरा सोचिये दुनिया भर में बुश और अमेरिका के खिलाफ कलम चलाई जा रही है क्या बुश बदले या अमेरिकन नीतियों में बदलाव आया? तो फिर अपने गुस्से का जैदी क्या करें? वही जो उन्होंने किया है..... ये दुनिया के क्रोध की सबसे सात्विक अभिव्यक्ति है इससे बेहतर कोई तरीका नहीं हो सकता है। लगभग यही कालखंड है जब केरल में शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के पिता ने अपने गुस्से का इजहार किया इसे क्या कहा जाय? एक ही दौर में अलग-अलग समाजों के लोगों द्वारा अलग-अलग तरह से गुस्से का इजहार.... दुनिया में बदलाव की बयार नजर आने लगी है सामूहिक गुस्से को व्यक्त करने के लिए किसी संगठन की जरुरत नहीं है, कोई एक भी उसका संवाहक बन सकता है दरअसल हो ये रहा है कि राजनीति और समाज एक दुसरे कि तरफ़ पीठ कर खड़ी है, दोनों के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है....समाज व्यवस्था की उप व्यवस्था राजनीति पर अब लोगों को भरोसा नहीं रहा.... इसके प्रति लोगों में एक गहरी हताशा..... और गहरा अविश्वास है यदि समय रहते इस दिशा में कुछ नहीं किया गया तो परिणाम और गंभीर हो सकते है..... हम देख ही रहें है कि राजनीति से किस तरह युवाओं का मोहभंग हो चुका है..... जैसा कि किसी विद्वान् को पढ़ा था कि राजनीति बदमाशों की अन्तिम शरण स्थली है..... तो अब इसमे अपराधियों का ही दखल है.... और यदि यही चलता रहा तो फिर भविष्य का तो भगवान भी मालिक नहीं है..... अब आम आदमी को ही आगे आना होगा..... तभी व्यवस्था में सुधार की कोई उम्मीद की जा सकती है .... रही बात जैदी की तो वे तो रातोंरात स्टार बन गए फिदायीन होकर आतंकवादी जो नहीं कर सकें वो जैदी ने कर दिखाया ..... अब ये जुगाली आप कीजिये कि वो नाम कमाने की तरकीब थी या सचमुच का गुस्सा...?

Monday, 1 December 2008

मौका भी है और दस्तूर भी

मुंबई के बाद जो कुछ हो रहा है वह अभूतपूर्व है. स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार जिस तरह जनता का गुस्सा फूटा है, उससे लगने लगा जैसे मुर्दा हो चुके भारतीय समाज में जान आ गई हो. अब तक पेम्पर होते आए राजनेताओं के लिए ये जनता का ये रूप बिल्कुल नया है इसलिए सभी बोखालायें हुए है और बकवास करने लगे हैं ऐसे मौकों पर जिस सभ्यता की जरुरत थी वह नेताओं ने नहीं दिखाई. ये दौर भी गुजर जाएगा, जैसे अब तक हुए हमलों को भुला दिया गया ये भी भुला दिया जाएगा समाज फिर मुर्दा हो जाएगा, क्योंकि व्यवस्था तो मुर्दा ही है न फिर भी अब सब साँस रोके सरकार से कुछ करने की आस लगाये हुए है। यूँ ये हमारे इतिहास से मेल नहीं खाता है, क्योंकि अब तक का हमारा इतिहास सिर्फ़ बचाव का रहा है आक्रमण का नहीं.... संसद पर आतंकी हमला इसका उदाहरण है तब भी हमारी सरकार ने कहा था कि समय आ गया है....लेकिन वो समय कभी नहीं आया शायद अब भी नहीं .
ये थोड़ा तल्ख़ है, लेकिन सच है कि हमारे इतिहास ने हमे गर्व करने का एक भी मौका नहीं दिया है हम हमेशा ही पिटते आए है और अब हम इससे ऊब चुके है.....हमारे जवानों ने आतंकियों का जम कर मुकाबला किया हमे उनकी बहादुरी पर गर्व है और हम उन पर भरोसा करते है. फिर भी मुंबई में जो कुछ हुआ उसमे देश को गर्व करने लायक कुछ भी नहीं हुआ. हमने आतंकवाद के खिलाफ कोई जंग नहीं जीती है हम इस ज़ंग में बुरी तरह नाकाम रहे है और हम न सिर्फ़ ख़ुद से शर्मिंदा है बल्कि हमने दुनिया में अपना गौरव भी खोया है. लगभग २०० लोगों की जान.....४०० से ज्यादा घायलों.....बेहिसाब माली नुकसान के साथ २० बहादुरों को खोया है.....हमने पाया क्या है? उल्टे एक शक्ति संपन्न देश के रूप में हमारी प्रतिष्ठा खाक में मिल गई है. लगभग सवा अरब की जनसंख्या वाले इस विशाल देश को मात्र १० आतंकवादियों ने पुरे तिन दिनों तक बंधक बनाये रखा.....सेना, प्रशासन और सरकारों को उलझाएँ रखा.....हम आतंकवादियों के मारे जाने को हमारी सफलता माने तो ये हमारी बेवकूफी से कम और कुछ भी नहीं हैं, क्योंकि वे तो मरने ही आए थे. जीत तो तब होती जब हम इतना होने के बाद भी हम कम से कम ६ आतंकवादियों को जिन्दा पकड़ने में कामयाब होते.....जितने आतंकवादियों को हमने मारा उससे २० गुना ज्यादा लोगों की जानें हमने गवाई हैं. तो फिर हासिल क्या हुआ हैं, सरकार और प्रशासन से लोगों का भरोसा उठ गया हैं और दुनिया में आपकी छवि ख़राब हुई हैं....राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि ये सब्र का इम्तिहान हैं...अब यह सब्र कहाँ ख़त्म होगा इसका जवाब नहीं मिल रहा हैं. उधर अमेरिका के भावी राष्ट्रपति तक ने कहा दिया कि अपनी रक्षा करना एक संप्रभु राष्ट्र का अधिकार हैं...... पता नहीं सरकार को किस चीज का इंतजार हैं? ये मौका हैं अपनी खोई साख लौटाने का, भारत को तुंरत पाकिस्तान के आतंकवादी केम्पों पर हमला कर देना चाहिए.....अमेरिका भी अभी तो भारत का विरोध नहीं करेगा....फिर मुंबई मामले में हम मंदी को भूल गए.....यदि युद्ध होता हैं तो यह मंदी को दूर करने में भी मदद करेगा..... कार्यवाही करने का यहाँ मौका भी हैं दस्तूर भी...... कुछ कहना हैं?

Friday, 28 November 2008

एक बेबस राष्ट्र के पीड़ित नागरिक

एक सॉफ्ट स्टेट होना किसे पसंद होगा? लेकिन बदकिस्मती से भारत वही है. कम से कम मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के बाद तो हम इससे इंकार नहीं कर सकते है. साहस का सम्बन्ध क्षमता से ज्यादा इच्छा से है. और हमने बार-बार ये साबित किया है कि हममे इच्छाशक्ति का अभाव है. चंद लोग एक पुरे देश को दहशतजदा कर सकते है और हमारी सरकारें सांत्वना के कुछ शब्द कह कर शांत हो जाती है. हमारे खुफिया तंत्र की नाकामी से कितने निर्दोष नागरिक, पुलिस और सेना के जवानों की जान को खतरा होता है कभी इस पर विचार किया गया? कितनी बार और कितने साल तक देश में यही सब कुछ होता रहेगा और हम सहते रहेंगे? यदि खबरों को सही माने तो मुंबई में ४० आतंकवादी घुसे हैं इस लिहाज से उन ४० दुस्साहसियों ने एक पुरे देश.....एक पुरी व्यवस्था को चुनोती दी है.....हम इससे इंकार नहीं कर सकते है कि आतंकवादियो को मदद स्थानीय लोग करते है और उन्हें डिटेक्ट करने के लिए पुलिस को ज्यादा स्वतंत्रता देने की जरुरत है एक ऐसे समय में जब देश पर संकट है राजनेता अपनी राजनीति से बाज आए. आडवानी अपनी और मोदी अपनी रोटी निर्दोष नागरिकों, पुलिस और सेना की लाश पर सेंक रहे हैं. दिल्ली में भाजपा इस घटना को विधानसभा चुनाव के लिए भुनाते हुए अखबार ने विज्ञापन देती है, अखबार विज्ञापन छापते हैं और टेलिविज़न चैनेल उसे दिखाते है. सब गैर जिम्मेदार..... आखिर हम कब जिम्मेदार व्यवहार करेंगे.... लोग फंसे है....मर रहे हैं लेकिन किसी को कोई लेना देना है. ऐसे मौके पर जब देश को कम से कम एकजुट होने की जरुरत है सबकी खिचडी अलग पक रही हैं. मीडिया भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहा है.इस घटना से कई सवाल उठते है. क्या हमारी जानों की सरकारों की नजर में कोई कीमत नहीं है? क्या एक सॉफ्ट स्टेट के सड़े हुए तंत्र का इलाज साध्वी प्रज्ञा और महंत पांडे के ही पास है?