Wednesday, 29 April 2009
जब तवक्को ही उठ गई गालिब
बहुत पहले जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सार्थक चर्चाएँ हुआ करती थी, उस दौर में हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक नामवरसिंह से पूछा गया कि क्या हमारा लोकतंत्र इसलिए परिपक्व नहीं है कि हमारे यहाँ अशिक्षा ज्यादा है? तब उन्होंने कहा था कि---दरअसल हमारा लोकतंत्र तो जिंदा ही उन्हीं के दम पर है, पढ़ा-लिखा, शहरी तबका तो लोकतंत्र से कोसों दूर है....आज भी उस स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं आया है....और आए भी क्यों? इन बीते सालों में सकारात्मक बदलाव क्या आए हैं? उल्टे राजनीति का स्तर लगातार गिरता ही जा रहा है। उस पर राजनीति में अपराधियों के आ जाने से बची-खुची उम्मीद भी खत्म हो गई। हम वोट दें, लेकिन किसको? सब बुरों में से कम बुरे को? हमारी राजनीति विकल्पहीनता के दौर में पहुँच गई है....अब मताधिकार को कर्तव्य की तरह निभाना है, क्योंकि कोई उम्मीदवार ऐसा दिखाई नहीं देता, जिससे कोई भी उम्मीद हो.....बकौल गालिब-----
जब तवक्को (उम्मीद) ही उठ गई गालिब, क्यूँ किसी का गिला करे कोई?
फिर भी राजनीति के हिमालय से गंगा निकालने के प्रयासों पर विराम ना लगे, इसलिए वोट दें.....।
Sunday, 26 April 2009
जैदी को सलाह
Friday, 17 April 2009
उम्मीद की रोशनी
लगातार खराब होते जा रहे राजनीतिक हालात में यह कहा जाना ही ज्यादा ठीक है कि भारतीय राजनीति बहुत बुरे दौर में प्रवेश कर चुकी है....। राजनीति में मूल्यों का लोप स्वतंत्रता के बाद से शुरू हुआ तो आज तक उसका नीचे जाना नहीं रूका....पता नहीं ये और कितना नीचे जाएगा.....? भारतीय राजनीति में पैसे और ताकत की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। इसके साथ ही हमारी विविधता, जिसके बारे में स्वतंत्रता के बाद के समाजशास्त्रियों ने मान लिया था कि लोकतंत्र के विकसित होते ही इसका प्रभाव कम होने लगेगा...लगातार बढ़ती ही जा रही है....राजनीति में हमारे यहाँ धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा और इसी तरह की अन्य कई तरह की विविधताएँ अब और ज्यादा मुखर हो गई है....इन सब ने हमारी व्यवस्था में दबाव और हित समूह का रूप ले लिया है। ऐसे में ये और ज्यादा ताकतवर हुए और लोकतंत्र की बुराई बनकर उभरे है और इसने लोकतंत्र की भावना को नुकसान ही पहुँचाया है...इससे धीरे-धीरे आम आदमी और पढ़ा-लिखा वर्ग राजनीति से दूरी बनाने लगा...और उस शून्य को भरने के लिए अपराधी किस्म के लोगों का जमघट होने लगा। सब तरह से नाउम्मीदी के इस दौर में मीरा सान्याल और मल्लिका साराभाई का राजनीति में प्रवेश उम्मीद की हल्की-सी रेखा के तौर पर दिखाई देने लगी है....। मल्लिका ने तो आडवाणी जैसे हाई प्रोफाईल नेता के खिलाफ चुनाव लड़ने का साहस दिखाया....जबकि हश्र वे भी जानती होंगी....फिर भी देश में राजनीति के प्रति दिखाई दे रही उदासीनता....हताशा और उपेक्षा के दौर में मीरा-मल्लिका की पहल की तारीफ की जानी चाहिए....और उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
ये विषयांतर है। हाल ही में मध्यकाल के हिंदी कवि ( ये खड़ी बोली के विकास के प्रारंभिक दौर के कवि रहे हैं) अमीर खुसरो की खुबसूरत लाईनें पढ़ी....आप भी मजा लें
खुसरो दरिया प्रेम का
सो उलटी वाकी चाल
जो उबरा सो डूब गया
जो डूबा सो पार
भाव साम्य आमंत्रित है.....याद रखना भी प्रयोजन है....।
Sunday, 12 April 2009
कलम पर भारी जैनी का जूता…..
इसे व्यवहार के तयशुदा मापदंडों के आधार पर तौलने की बजाय जैनी की मजबूरी के तौर पर देखा जाना चाहिए...एक पूरी की पूरी कौम की पीड़ा से उपजी बेबसी....और उस बेबसी का ये सात्विक विरोध....सोचिए जूते की जगह बंदूक भी हो सकती थी.....एक तरफ जहाँ जैदी का जूता एक देश की पीड़ा का प्रतीक है तो जैनी का जूता एक पूरी कौम की बेबसी का....जिन्हें एक पूरी कौम अपराधी मानती हो वे गवाहों के अभाव में निर्दोष सिद्ध हो जाए और पार्टी उन्हें टिकट भी दे दे तो फिर वह पीड़ित कौम क्या करे? जैनी के गुस्से को मजबूर गुस्से की सात्विक अभिव्यक्ति माना जाना चाहिए....औऱ फिर जो काम देश भर में हुए विरोध प्रदर्शन नहीं कर सका उसे एक जूते ने कर दिखाया.....अब हुआ ना जूता कलम से ज्यादा ताकतवर....जो काम जैनी के जूते ने किया क्या वह काम उसकी कलम कर सकी.....? हाँ इस कैटेगरी में राजबल और नवीन जिंदल मामले को नहीं लिया जा सकता है....
Thursday, 9 April 2009
क्या मंदी के माध्यम से अमेरिका देगा तीसरे विश्ययुद्ध की सौगात!
उधर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के आशंका व्यक्त की है कि वैश्विक बेरोजगारी का आंकडा २००७ की तुलना में ३० मिलियन हो जाएगा और यदि ये सिलसिला नहीं रुका तो यह बढ़ कर ५० मिलियन तक भी जा सकता है. सिर्फ़ अकेले अमेरिका में नवम्बर २००८ से लेकर फरवरी तक के ४ महीनों में २.५ मिलियन लोगों के नौकरियां छिन गई और ये बेरोजगारी ओद्योगिक उत्पादन के ढह जाने से हुआ है. और यह ज्यादातर देशों में हर साल १० प्रतिशत की दर से गिर रहा है.
आम आदमी इस मंदी को नौकरियों के छिन जाने और वेतन कटौती के सन्दर्भ में ही समझ पा रहा है, लेकिन इसके परिणाम और भी भयावह हो सकते है. इस सिलसिले में लन्दन से प्रकाशित पत्रिका इकोनोमिस्ट ने चेतावनी दी थी कि मंदी की वजह से बहुत सारे विकासशील देशों में सामाजिक अशांति की स्थिति बन सकती है, कुछ इससे मिलती-जुलती आशंका अमेरिकी गुप्तचर विभाग के नए प्रमुख डेनिस ब्लयेर ने भी व्यक्त की है. उन्होंने कहा है कि वैश्विक मंदी की वजह से होने वाली राजनीतिक हलचल से देश की सुरक्षा को खतरा बढ़ रहा है, उनकी चिंता आतंकवाद की है. लेकिन मार्च के अंतिम सप्ताह में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के निदेशक डोमिनिक स्ट्रास कोहेन ने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की बैठक से पहले जिनेवा में यह कह कर चौंका दिया कि-- दुनिया की आर्थिक स्थिति बहुत भयावह होती जा रही है और यदि इसे नहीं संभाला गया तो सामाजिक क्रांति और युद्ध भी भड़क सकता है. कोहेन ने कहा की इस संकट ने बहुत सारे देशों में नाटकीय रूप से बेरोजगारी बढाई है. यह सामाजिक शान्ति के साथ लोकतंत्र के लिए भी खतरा है और हो सकता है कि इसका अंत युद्ध में हो. इसी तरह जर्मनी के राष्ट्रपति और आई ऍम ऍफ़ के पूर्व प्रमुख होर्स्ट कोहलेर ने भी लगभग उसी समय स्ट्रास का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि आने वाले कुछ महीने बहुत मुश्किलों भरे होंगें. कहा जा सकता है कि ये तो बस शुरुआत है, जैसे-जैसे इस समस्या को सुलझाने के लिए प्रयास किए जा रहें है, वैसे-वैसे समस्या आर्थिक से आगे बढ़कर राजनीतिक और सामाजिक रूप लेती जा रहीं है, अमेरिका जैसे देशों की संरक्षणवादी नीतियों से फ्रांस इतना नाराज था की उसने मीटिंग से पहले जी-२० को छोड़ने तक की धमकी तक दे डाली थी. उधर मीटिंग से पहले लन्दन, फ्रांस और जर्मनी में इसके खिलाफ प्रदर्शन हुए... तरलता और संरक्षणवाद के बीच के संघर्ष ने भी स्थितियां बिगाड़ कर रख दी है..... इस बीच हंगरी के प्रधानमंत्री फेरेनक जय्रुस्कानी ने चेतावनी दी है कि आर्थिक संकट पूर्वी यूरोप को योरोपियन यूनियन से अलग कर एक लोह आवरण के रचना कर सकता है। लंदन में हुई जी-20 की बैठक के परिणाम यूँ तो बहुत उत्साहजनक बताए जा रहे हैं, लेकिन यदि हम इतिहास नहीं भूले हो तो शक बना रहता है....हमें भूलना भी नहीं चाहिए कि आईएमएफ सहित सभी तरह की अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ हमेशा से अमेरिका की पिछलग्गू रही है और आज भी इनसे ज्यादा की उम्मीद नहीं की जा सकती है.....और फिर बराक ओबामा का बाय अमेरिकन....उन कंपनियों को सब्सिडी देने की घोषणा करना जिनमें अमेरिकीयों को रोजगार दिया जाएगा....फिर अमेरिका की प्रतिष्ठित कंपनी एआईजी को भी भूला नहीं जा सकता जिसने बैल आउट के लिए मिले पैसे में से सवा आठ सौ करोड़ रु. अपने अधिकारियों को बोनस के रूप में बाँट दिए....क्या ऐसे में विकासशील देशों के पास विश्वास करने के लिए क्या कुछ बचता है....जब थोड़े से संकट में अमेरिका बचाव की मुद्रा में आ खड़ा हुआ है तो क्या उसकी नीयत पर शक किया जाना आश्चर्य पैदा करता है
एआईजी की घटना ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि दरअसल सरकारों की सारी कवायदें पूँजीपतियों को बचाने की है, उन लोगों की दुर्दशा पर ध्यान नहीं है, जिनकी नौकरियाँ जा रही है....और यदि उनके हाथों को काम दिया जाए तो शायद अर्थव्यवस्थाओं को उबारने में मदद मिले......और युद्ध तथा सामाजिक अशांति का खतरा भी कम हो।
Wednesday, 8 April 2009
नमस्ते.....
Wednesday, 25 March 2009
अनायास उसका आना....
हम तो उस दिन राय देंगें जिस दिन धोखा खायेंगे.....
जी नहीं यह मेरा नहीं है यह तो हसरत जयपुरी का शेर है....खत्म होते दिन के सिरे का रात से गठबंधन कराती लम्बी सी गर्मी की शाम को..... अनायास ही अपने खजाने में से गुलाम अली की एक भूली बिसरी केसेट हाथ आ गई और शाम बन गई.... इस समय ना तो गुजरे दौर से शिकवा है ना आने वाले से कोई उम्मीद.....ना गुजरते को पकड़ने की चाहत हो....सफ़ेद से सांवले होते आसमान का एक टुकडा जो मेरी खिड़की पर छाया है....उसी को आंखों पर रख कर.....
वादे की शब खामोश फिजायें, दिल में खलिश वो आए ना आए
दर पे निगाहें लब पे दुआएं उफ़ री मोहब्बत हाय जवानी....
चल रही है गजल....इस समय ना कुछ पा लेने की ख्वाहिश है और ना कोई सपना है...ना कुछ पाने की खुशी है और ना कुछ छुट जाने का मलाल है....बस वक़्त के साथ बहते जाने का सुख है..... ये आनंद है....शब्द से परे....मौन...लगातार चकर-चकर करती जबान चुप है....मन हवाओं पर सवार है और वह भी इस अनायास आ पहुचें सुख का लुत्फ़ ले रहा है.... बड़े दिनों से बिसराए इस स्वाद ने आज फिर से जीने का अहसास दे दिया....वरना तो हर दिन एक मशीन सा आता और बिना अहसास के चला जाता है...शायद इसे ही हमारे आध्यात्म में आनंद कहा जाता है....जो ईश्वर का सा अनुभव कराता है....और आख़िर में मंजिलें गम से गुजरना तो है आसां है एक बार
इश्क है नाम ख़ुद अपने से गुजरने जाने का....
कुछ ऐसा ही हाल है इन दिनों.....बस
Monday, 23 March 2009
पाकिस्तान में लोकतंत्र और अमेरिका
लगभग महीने भर पहले जब अमेरिका ने 'गुड और बेड' तालिबानी का शोशा छोड़ा था तब यूँही विचार आया था कि कहीं ऐसा तो नही कि पाकिस्तान की सियासत का रिमोट क्षेत्र में अमेरिकी हितों से संचालित होता है....?
बस ये विचार यूँ ही आया था...लेकिन अपनी आत्मकथा में बेनजीर लगातार इसकी तस्दीक करती रहीं....शोध की भाषा में कह लें कि फिलहाल ये विचार एक 'हाइपोथीसिस' बन गया है। नहीं तो क्या कारण है कि ६२ साल की आजादी के बाद भी पाकिस्तान में कुल ४ ही निर्वाचित प्रधानमंत्री हुए...शेष समय फौजी तानाशाही रही...आखिर इस क्षेत्र में अमेरिकी रूचि क्या मात्र रूसी प्रभाव को रोकना ही है.... या पाकिस्तान में रहते हुए भारत और चीन पर लगाम लगाने की रणनीति भी है....?बड़ी अजीब बात है की अमेरिका ने जिया और मुशर्रफ़ दोनों को ही खूब शह दी....इस पुरे समय में कभी भी लोकतंत्र और मानवाधिकारों पर अमेरिका ने चिंता नहीं जताई...चाहे औपचारिक तौर पर शीत युद्ध समाप्त हो चुका है....फिर भी हाल के दिनों में रूसी पुनरुत्थान ने यूरेशिया सहित अमेरिका को चुनौती देना शुरू कर दिया है....बल्कि पश्चिम के विशेषज्ञों ने तो लगभग साल भर पहले से आशंका व्यक्त करनी शुरू कर दी थी कि दुनिया में दुसरे शीत युद्ध की आहट सुनाई देने लगी है.....शायद बीते साल के मध्य में दुनिया में मंदी के भुत ने इस आशंका को वक्ती तौर पर ढँक दिया है...नहीं तो जार्जिया संकट....मध्य एशिया में नाटो की घुसपैठ और पूर्वी यौरोपे में अमेरिका के डिफेन्स सिस्टम लगाने का रूसी विरोध और रूसी चुनावों के प्रति पश्चिमी नजरिया और उस पर रूसी प्रतिक्रिया किसी से छुपी नहीं है....यहाँ अमेरिकी मंदी के तथ्य को उसके रक्षा उद्योग के प्रकाश में भुलाया नहीं जा सकता है....हो सकता है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अमेरिकी हथियारों की खपत कर वह अपनी अर्थव्यवस्था को बूस्ट करने का षडयन्त्र कर रहा हो?
Friday, 20 March 2009
लक्ष्य....जूनून......और जीवट
उधर बेनजीर अपनी सात साल की अमानवीय....त्रासद..... एकाकी....हताशाभरी और लगभग तोड़ देने वाली जेल की सजा से आजाद होकर अपना इलाज कराने के लिए लन्दन पहुँच गई..... अब तक पढ़े २३५ पन्नों के बाद एक सवाल जो मेरे सामने खड़ा है कि----- वो क्या वजह हैं, जिसने अपने पिता की हत्या, मां और ख़ुद की यंत्रणा दायक सजा के लंबे अरसे के बाद भी बेनजीर को पाकिस्तान के फौजी शासक जनरल जिया से समझौता ना करने के लिए प्रेरित करता रहा? अपनी सात सालों की सजा में ज्यादातर अकेले जेल में और वह भी सी ग्रेड कैदी की तरह बिताने के बाद भी बेनजीर ख़ुद को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखने का समझौता नहीं करती हैं. क्या वह मात्र सत्ता पाने की लालसा है? या फिर एक जूनून है.....एक लक्ष्य पाने का....पाकिस्तान में लोकतंत्र लाने का...? फिलहाल लगातार पढ़ रहीं हूँ और विचार कर रही हूँ.....कहा जा सकता है कि लक्ष्य पाने की प्यास जूनून पैदा करती है और जूनून वह ताकत पैदा करता है, जिसे जीवट कहते है....और यह सकारात्मक भी होता है और नकारात्मक भी....पाठक मुझे माफ़ करेगें लेकिन आतंकवादी भी इसी जूनून की पैदावार है, बस इनकी दिशा विपरीत है....हालाँकि ये 'बस' नहीं है....इस पर फिर कभी......
Sunday, 8 March 2009
होली की शुभकामनाएं
Friday, 27 February 2009
ताकि प्यास रहें बरक़रार
Saturday, 7 February 2009
फिर सवालों का जंगल है..

Thursday, 5 February 2009
सीने में जलन आँखों में तूफान सा क्यों है?
Tuesday, 27 January 2009
धूप का रंग है पीला...दिन हुआ सुनहरा...
आज रात कुछ अजीब सा अहसास हुआ.... गहरी नींद में कमरे में पायल की रुन-झुन सुनाई दी..नींद थोडी सी कुनमुनाई और फिर सो गई....थोडी देर बाद कहीं से प्रभाती के सुर कानों में पड़े....लगा कि आधी रात को कौन गा रहा है? फिर किसी ने प्यार से थपथपा कर जगाया....आखें खोली तो सिरहाने उजली-निखरी सुबह खड़ी मुस्कुरा रही थी....फिर सो नहीं पाई...बहुत देर तक उसकी उंगली पकड़े उसकी रुनझुन के साथ चलती रही....पता नहीं कब सुबह ने अपना आँचल धीरे से छुडा लिया...और मेरा हाथ जवान होती दोपहर के हाथ में दे दिया...पुरा दिन उसके साथ न जाने कहाँ-कहाँ की खाक छानी.....और मखमल सी सरकती शाम की गोद में आ गिरी....फिर.....फिर पता नहीं क्या हुआ...? अब पहेली क्यों बुझाऊ इन दिनों कुछ नशा सा छाया रहता है....हर दिन की शुरुआत गुलगुली गुलाबी सुबह के खिलखिलाने की आवाज से होती है...हवाओं से दिन भर खुशबु आती रहती है...दोपहर मीठी-मीठी और शाम मखमली लगती है...रात गुनगुनाती हुई आती है और लोरी सुना कर सुलाती है... मन न जाने क्यों उड़ता फिरता है....यूँ ही केलेंडर देखा और सारा-का-सारा माजरा समझ में आ गया....वसंत आ चुका है....मतलब हमें मालूम हो या न हो...प्रकृति हमें किसी भी तरह जता देती है.....कहती है कि ये मेरा यौवन का....श्रृंगार का मौसम है....प्रकृति अपने पुरे शबाब पर है....वह सभी कलाओं में ख़ुद को अभिव्यक्त कर रही है...सुबह से रात तक दिन कितने रूप-मुड़ और शेड बदलता है....आप गिन नहीं पाते है. हर दम फाग के सुर गूंजते रहते है....हवा छेड़छाड़ करती रहती है. हम शहरियों को तो पता भी नहीं होता है कि खेतों में सरसों के फूल खिल गए है...पलाश पर सिंदूर दहक रहा है...फिर भी यूँ लगता है कि कहीं कुछ तो खुबसूरत जरुर हो रहा है....चारों और रंग महक रहें है... मन मयूर हो रहा है....होली यूँ ही नहीं मनाई जाती है...जब सभी ओर रंग उड़ रहें हो, मन में यूँ तरंग का आलम हो...बिना कारण आल्हाद का अहसास हो....तो फिर रंगों का खेल नहीं होगा तो क्या होगा...? वसंत ओर फागुन की जोड़ी राग, रंग, आनंद ओर सृजन का मौसम है....वातानुकूलित घरों-दफ्तरों, मल्टीप्लेक्स और मॉल से निकल कर ठूठ हुए पेडों पर फूटती कोपलें....कहीं दूरदराज में कोई भूले हुए पलाश के दहकने को देखें....प्रकृति के सुन्दरतम रूप को निहारें....उसके सौन्दर्य से प्रेरणा लेकर सिरजे.....शायद यही वसंत और फागुन का उत्स है....सार और अर्थ है... वसंत शुभ...आनंदकारी...आल्हादकारी....और सृजनात्मक हो....वाग्देवी सरस्वती....बुद्धि...मेधा और कल्पना से समृद्ध करें.तो वसंत आप में और आप वसंत में महके...इसी आकांक्षा के साथ वसंत पंचमी की शुभकामना
Wednesday, 21 January 2009
समंदर के सिरहाने गुजरे वे दिन
दमन की यात्रा
लहर दर लहर वो आपके पास आता है... चिढाता...खिजाता और फिर मनाता रहा...हम भी उससे रूठने का नाटक करतें रहें.....बस यूँ ही रुठते मनाते शाम हो गई और विदाई का समय आ खड़ा हुआ...फिर वह धीरे-धीरे दूर और दूर होता चला गया और आख़िर में आंखों से ओझल हो गया बस कारवां गुजर गया गुबार देखते रहें.........
Thursday, 15 January 2009
इस्रेइल के हमले और हमारा असमंजस
हम तो वो भी नही कर सकते है जिसे पुरी कहती है कि किया जाना चाहिए....हमें तो इसके लिए भी अमेरिका सहित पुरी दुनिया की सहमति की जरुरत होती है..... असल में हमें कृष्ण जैसे नेता की जरुरत है और गाँधी जैसे नायक की.... क्योंकि हम नायक की पूजा करते है और नेता का अनुसरण करतें है.... हमें कृष्ण होने की और गाँधी को सोचने की जरुरत है जबकि बदकिस्मती से गाँधी हमारे नेता है. मानवीय मूल्य हमारे जीवन के प्रदर्शक है... और भावना हमारी संचालक ...... ऐसा अक्सर होता है कि प्रदर्शक मूल्य हार जाते है और संचालक शक्ति जीत जाती है.... मेरे साथ तो ऐसा ही होता है और आपके.....?