Saturday, 30 October 2010

उमंग है तो अवसाद भी होगा


हर तरफ सफाई का दौर चल रहा है... सोचा थोड़ा अपने अंदर के जंक का भी कुछ करे, लेकिन बड़ी मुश्किल पेश आई... सामान हो तो छाँट कर अलग कर दें, लेकिन विचारों का क्या करें? कई सारे टहलते रहते हैं, किसी एक को पकड़ कर झाड़े-पोंछे तो दूसरा आ खड़ा होता है और इतनी जल्दी मचाता है कि पहले को छोड़ना पड़ता है... दूसरे को चमकाने की कवायद शुरू करें तो पहला निकल भागता है, उसके निकल भागने का अफसोस कर रहे होते हैं तो जो हाथ में होता है, उसके निकल जाने की भी सूरत निकल आती है... बस यही क्रम लगातार चल रहा है।... कुल मिलाकर बेचैनी...। अंदर-बाहर उत्सव का माहौल है, लेकिन कहीं गहरे... उमंग और उदासी के बीच छुपाछाई का खेल चल रहा है। आजकल संगीत का नशा रहता है... और इन दिनों एक ही सीडी स्थाई तौर पर बज रही है... मेंहदी हसन की... तो ‘बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी’ गज़ल चल रही थी और उसका अंतरा – उनकी आँखों ने खुदा जाने किया क्या जादू... के जादू को वो विस्तार दे रहे थे और उस विस्तार से उदासी का मीठा-मखमली जादू फैलता-गहराता जा रहा था।
मन की प्रकृति भी अजीब है, कल जिस बात को मान लिया था, आज उसी से विद्रोह कर बैठता है। ओशो के उद्धरण से समझा लिया था कि जिस तरह के प्रकृति के दूसरे कार्य-व्यापार का कोई उद्देश्य नहीं है, उसी तरह जीवन का भी कोई उद्देश्य नहीं है... लेकिन उस मीठी-मखमली उदासी के समंदर से जब बाहर आए तो जीवन के निरूद्देश्य और अर्थहीन होने का नमक हमारे साथ लौटा... अब फिर से वही कश्मकश है, यदि जीवन है तो फिर उसका कोई अर्थ तो होना ही है और यदि नहीं है तो फिर जीवन क्यों है? और इसी से उपजता है एक भयंकर सवाल... मृत्यु... ?
एक बार फिर चेतना इसके आसपास केंद्रीत होने लगी है... जब एक दिन मर जाना है तो फिर कुछ भी करने का हासिल क्या है? मरने के बाद क्या बचा रहेगा... जो भी बचेगा, उसका हमारे लिए क्या मतलब होगा? औऱ जब मतलब नहीं है तो फिर कुछ भी क्यों करें... ? हाँलाकि सच ये भी है कि कर्म करना हमारी मजबूरी है।
वही पुराने सवाल, जिनका कोई जवाब नहीं है... बेमौका है... उत्सव के बीच है ... खत्म होने से पहले ही अवसाद... यही धूप-छाँव है... यही अँधेरा-उजाला.... सुख-दुख... यही जीवन-मृत्यु... तो फिर उमंग-अवसाद भी सही...। आखिरकार तो नितांत विरोधी दिखती भावनाएँ... कहीं-न-कहीं एक दूसरे से गहरे जुड़ी हुई जो होती है.... नहीं...!

आखिर में – 100 पोस्ट पूरी होने पर वादे के मुताबिक मिला डिजिटल कैमरा, लेकिन त्योहार और व्यस्तता के बीच कहीं आना-जाना नहीं हो पा रहा है तो फोटो लेने की सूरत भी नहीं निकल पा रही है...

Saturday, 23 October 2010

ब्लॉग-शतक पूरा



ये ब्लॉग का 100 वाँ पीस है। एक साल 11 महीने और ठीक 2 दिन पहले शुरू किए ब्लॉग अस्तित्व की ये प्रगति कोई बहुत उत्साहजनक नहीं है, आखिर अब तक मात्र 100 पीस ही तो लिखे हैं। कहाँ तो सोचा था कि इसे नियमित लिखेंगे और कहाँ बहुत-बहुत दिनों तक इसमें कुछ पोस्ट ही नहीं हो पाता है। कारण साफ है, जब खुद को उलीच कर कुछ लाना होता है तो जो बाहर आता है, वो तो खदानों से निकले कच्चे हीरे की तरह होता है। फिर हम हीरा बनने की उस प्रक्रिया और समय से तो अनजान ही रहते हैं, लेकिन है तो वो निर्मिति का ही हिस्सा... उसे चमक और कीमत देने का परिश्रम और समय भी तो उसी में जुड़ता है, तो कच्चे हीरे को आकार और शक्ल देने में लगने वाला समय भी तो शामिल था। लब्बोलुआब यूँ है कि जब तक विचार पैदा हो और उसका प्रेशर इतना हो कि उसका बाहर आना किसी भी तरह रोका नहीं जा सके तभी लिखे जाने की सूरत बनती थी।
वैसे ब्लॉग शुरू करने के पीछे लक्ष्य सिर्फ हर दिन होने वाली घटनाओं को लेकर पैदा होने वाली उबलन को शब्द और आकार देना रहा था। शुरुआती कुछ पीस लिखने के बाद ही ये अहसास हो गया कि आमतौर पर ब्लॉग रायटर्स यही कर रहे हैं, फिर यहाँ तो समय और मन दोनों को साधने का दुःसाध्य कर्म करना भी आ जुड़ता था। और इस दौरान उस विषय पर इतना ज्यादा लिखा जा चुका होता था कि फिर अलग से कुछ और लिखने के लिए कुछ बचता ही नहीं था। तो फिर अस्तित्व को अपनी डायरी का रूप दे डाला। इसमें कहानी, कविता (जो कि मेरा माध्यम नहीं है, फिर भी), यात्रा संस्मरण सब कुछ को शामिल कर लिया। फिर पता नहीं कहाँ, कैसे इसका स्वर भीतर की ओर मुड़ गया। खैर ब्लॉग लिखने का उद्देश्य शुरुआती कुछ भी रहा हो, लेकिन लिखते-लिखते महसूस हुआ कि भीतर की तरफ जाते हुए इस लिखने का मतलब खुद के ज्यादा करीब जाना, खुद को जानना, समझना और अपने ‘भीतर’ को शक्ल देना रहा, इसलिए भी संख्या पर विचार क्यों किया जाए... लेकिन कुछ भी गणित से इतर कहीं हो पाया है?
तो आखिर शतक तक का सफर ऊबड़-खाबड़ तो कभी साफ-शफ़्फ़ाफ रास्तों से होता हुआ पूरा हो गया। इस सारे समय में कुछ और हुआ हो या न हुआ हो, अंदर की उलझनों को सुलझाने की स्थितियाँ तो बनी ही है, बेचैनी ने रास्ता पाया, छटपटाहट ने आकार... कहीं-कहीं तो इस बेचैनी का कारण भी हाथ आया... अब इस सारी प्रक्रिया में थोड़ी-बहुत तकलीफ और त्रास तो होना ही हुआ, लेकिन ज्यादातर तो ये खुद के नए सिरे से बनने का ही हिस्सा रहा। यूँ कहें कि लिखने से पहले ये जाना ही नहीं था कि – हम जान ही नहीं सकते हैं कि खुद को कह लेने में जितना हम देते हैं, उससे कहीं ज्यादा हम पाते हैं।
वैसे लिखना व्यावसायिक मजबूरी है, इसलिए सिलसिला तो बहुत दिनों से चल रहा था, लेकिन इस क्रम में दुनियावी मसले ही शामिल थे। अपने बीहड़ की तरफ ले जाते रास्ते से हमेशा कतरा कर निकलते रहे... इसलिए असल में व्यक्त होना कितना भरता और कितना खाली करता है, इस अनुभव से वंचित ही रहे, लेकिन जब व्यक्त होने का लक्ष्य लेकर चले तो खुद को पाते, सुलझाते, जानते, सहेजते, सहलाते और चकित होते चले गए। एक बार इस बीहड़ में उतरने का हौसला दिखाया तो धीरे-धीरे खज़ाने का रास्ता निकलता गया। अब कुछ पाना है तो मुश्किल भी होगी, दुख भी, असुविधा और त्रास भी होगा, पसीना और खून दोनों ही बहेगा... लेकिन जो मिलेगा, उसका सुख कहीं ज्यादा होगा। तो सफर कहाँ रूकेगा, इसका फिलहाल तो कोई अनुमान नहीं है। अपनी कश्ती को अपने ही समंदर में छोड़ दिया है... बस इस उम्मीद में कि कभी तो कोई मोती हाथ लगेगा.... आमीन....!

Sunday, 17 October 2010

चाँद गर धरती पे उतरा, देखकर डर जाओगे


हर बार मोबाइल के प्लेलिस्ट में गज़ल को शफल करते हुए दो-चार गज़लों के बाद या तो चुपके-चुपके रात दिन या फिर ये दिल ये पागल दिल मेरा बजने लगती... फिर से अपनी पसंद की गज़ल ढूँढते रहते, आखिर उस दिन म्यूजिक फॉर्मेट करने के दौरान इन दोनों गज़लों को डिलीट मार ही दिया। हाँलाकि हर बार इस बात के लिए डाँट पड़ती है कि – ये क्या बचपना है? खेल बना लिया है म्यूज़िक फॉर्मेट करने को... जितना डालती हो, सुन भी पाती हो... ? यूँ बात तो सही ही है, लेकिन क्या करें कि कम से काम चलता नहीं है!
शहद-शरद रात और अगले दिन की छुट्टी हो तो फिर रात को देर तक जिए जाने के लालच में दूर तक चले जा रहे थे। रात बहुत हो चुकी थी, ये वही सड़कें थीं जो दिन में बिल्कुल दूसरी होती है... शायद ये खुद भी अपने को पहचान नहीं पाती हो...। दिन में जो सड़कें बेहाल-परेशान होती है, वो ही रात को थोड़ी उदास, खूबसूरत और सौम्य हो जाती है, तो घूमने का मजा दोगुना हो जाता है। यूँ लगता है कि वो हमारा ही इंतजार कर रही है। दूर से कहीं से फिर से वही गज़ल ये दिल ये पागल दिल मेरा... उस वक्त अंतरा चल रहा था – एक अजनबी झोंके ने जब पूछा मेरे ग़म का सबब, सेहरा की भीगी रेत पर मैंने लिखा आवारगी... वहीं रूक गए, सरे राह डूबने-डूबने का सामान मिल गया। तो फिर उसे डिलीट क्यों किया था?
अबकी स्मृति की दराज़ खुल गई और बहुत सारी बेतरतीब चीज़ों के बीच अचानक से एक नामालूम-सी फिल्म का डायलॉग याद आ गया कि – सपने जब तक दिमाग में रहते हैं, तभी तक खूबसूरत होते हैं, हाथों में आते ही वे खत्म हो जाते हैं...।
इसका इंटरप्रिटेशन तो यूँ है कि सब कुछ जो आप चाहते हैं, यदि वो हासिल हो जाए तो फिर क्या जीना आसान हो जाता है। नहीं... सरासर नहीं... तब तो शायद जीना और भी मुश्किल हो जाता है, तो फिर... अभाव ही जिंदगी को पूरा करते हैं। यदि आप किसी चीज़ को शिद्दत से पसंद करते हैं तो फिर उससे दूरी बना कर ही खुश रहा जा सकता है। कई बार उसकी दूरी ही सब कुछ को खूबसूरत बनाती है फिर से एक शेर याद आया –
हर हँसी मंज़र से यारों फ़ासले क़ायम रखो
चाँद गर धरती पे उतरा देखकर डर जाओगे...
क्या ग़लत है?
यूँ तो बात यहाँ ख़त्म हुई, लेकिन चलते-चलते मौसम की बात – कई बार कुछ बदमाशियाँ बड़ी मीठी लगती है, अब देखिए ना क्वाँर की विदाई इस तरह बादलों की शरारत से हो तो क्या मीठा नहीं लगेगा... दशहरे की शुभकामना के साथ...

Sunday, 10 October 2010

जीवन के प्रवाह की रूकावट है लक्ष्य...!



महाकाल उत्सव के दौरान सोनल मानसिंह के ओड़िसी नृत्य का कार्यक्रम होना था और उसे देखने के लिए छुट्टी माँगी तो सुझाव आया कि -क्यों न कार्यक्रम की रिपोर्टिंग भी आप ही कर लें...!
पत्रकारिता के शुरुआती दिन थे, बाय लाइन का लालच और ग्लैमर दोनों ही था... डेस्क पर काम करने वालों को तो बाय लाइन का यूँ भी चांस नहीं था, तो उत्साह में हाँ कर दी। सावन के महीने में हर सोमवार को शास्त्रीय नृत्य और संगीत की महफिल की दावत महाकाल के दरबार में हुआ करती है। उज्जैन किसी जमाने में ग्वालियर रियासत का हिस्सा रहा, जहाँ सिंधियाओं ने शासन किया तो उत्तर वालों और दक्षिण वालों के महीने के हिसाब से यहाँ 30 दिन का सावन 45 दिन का हो जाता है (यूँ तो हर महीना ही)। तो कम-से-कम 6 सोमवार की दोहरी दावत...। बारिश होने के बीच भी समय पर पहुँच गए। ज्यादा लोग नहीं थे, अब शास्त्रीय नृत्य का कार्यक्रम था, लोग ज्यादा होंगे भी कैसे? कार्यक्रम शुरू हुआ तो सारी चेतना संचालक के बोलने पर ठहर गई, आखिर रिपोर्टिंग करनी है तो संगतकारों के नाम, प्रस्तुति का क्रम, ताल, राग सबका ही तो ध्यान रखना है... इसके साथ ही आस-पास पर भी नजर बनाए रखनी है, कोई उल्लेखनीय घटना... कहीं कुछ छूट नहीं जाए...तथ्य... तथ्य... और तथ्य...। दो घंटे लगभग बैठने के बाद भी डूबने का संयोग नहीं बन पाया, फिर बार-बार ध्यान घड़ी की तरफ... रिपोर्ट फाइल करने का समय, रिपोर्ट पहले एडिशन से जो जानी है। आखिर आधा कार्यक्रम छोड़कर ही उठना पड़ा...। जैसे गए थे, वैसे ही सूखे-साखे लौट आए। रिपोर्ट फाइल की... और सब खत्म...।
उसके बाद कई मौके आए रिपोर्टिंग के, लेकिन तौबा कर ली... आनंद और तथ्य दोनों साथ-साथ नहीं साध सकते... जो कर सकते हो, वे करें, यहाँ तो नहीं होने वाला। तब जाना कि जहाँ तथ्य हैं, वहाँ आनंद नहीं, वहाँ डूबना भी संभव नहीं है। ठीक जिंदगी की तरह... ये आज इसलिए याद आ रहा है कि एकाएक एक पत्रिका में ओशो को पढ़ा कि – ‘जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है, जिस तरह नदी और हवा के बहने, फूलों के खिलने, सुबह-शाम होने, चाँद-सूरज के निकलने, डूबने, छिप जाने, बादलों के आने-जाने-बरसने के साथ ही दूसरे जीवों के जीवन का भी अपना कोई लक्ष्य नहीं है, उसी तरह इंसान के जीवन का भी अपना कोई लक्ष्य नहीं है।’
ठीक है कहा जा सकता है कि इंसान इन सबसे अलग है, क्योंकि उसके पास दिमाग है, इसलिए उसके जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। लेकिन जरा ठहरें... और सोचें... क्या लक्ष्य जीवन के प्रवाह की रूकावट नहीं है। अपने जीवन को एक विशेष दिशा की तरफ ले जाना, उस प्रवाह को प्रभावित करना नहीं है? नहीं इसका ये कतई मतलब नहीं है कि हम कुछ भी नहीं करें... कुछ करने से तो निजात ही नहीं है, करने के लिए अभिशप्त जो ठहरे, लेकिन हम जो कुछ भी करें, उसे डूबकर, आनंद के साथ, शिद्दत से करें... क्षण को जिएँ... ठीक वैसे ही जैसे बिरजू महाराज के कथक को देखा... बिना ये जानें कि ताल क्या थी, संगतकार कौन थे, प्रस्तुति का क्रम क्या था और तोड़े कौन-से सुनाए... क्योंकि आनंद तो इसके बिना ही है, डूबना तो तभी हो सकता है ना, जब कोई सहारा न हो...। कुल मिलाकर यहाँ गीता अपने कर्म के सिद्धांत में खुलती है, हमने तो अभी तक कर्म के सिद्धांत को ऐसे ही जाना है, जो करें, इतनी शिद्दत से करें कि करना ही लक्ष्य हो जाए... मतलब फल की चिंता तक पहुँच ही न पाएँ, भविष्य का बोध ही गुम जाए... बस आज, अभी जो कर रहे हैं, वही रहे...।
इस विचार का एक सिरा फिर से एक प्रश्न से टकराता है – कला जीवन के लिए है या जीवन कला के लिए...? इस पर विचार करना बाकी है...!

Sunday, 3 October 2010

फिर मुझे प्यास के दरिया में उतारा जाए...


ज्यादातर तो दिल के पास ही रहती है पासबान-ए-अक्ल, लेकिन जब तनहा रह जाता है दिल तो पूछिए नहीं क्या कयामत आती है। मुक्त है मन और हम भी, हवा के प्रवाह की सवारी है और कण-कण खिरते और जाया होते जाने की चेतना भी, फिर से वही खींचतान... होने और होना चाहने की...। दिन-रात सब कुछ हवा पर सवार है, कब आते हैं और कब निकल जाते हैं, कुछ निशान ही नजर नहीं आते हैं। सब कुछ अपनी गति और जरूरत से हो रहा है, लेकिन कहीं कोई असंगति है, तभी तो कुछ भी पहुँच नहीं पा रहा है, वहाँ, जहाँ इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। शहद-शहद शरद की रातें पसरी पड़ी है, लेकिन ना जाने क्यों बार-बार क्वांर की तपन की हूक उठती है, यदि ये बाहर है तो अंतर कैसे अलग रह सकता है....! लेकिन ये आँच अंदर पहुँच नहीं पा रही है। पढ़ना, सुनना और जानना सब कुछ तो हो रहा है, लेकिन गुनना नहीं हो पा रहा है। विचार आते नहीं, आते तो ठहरते नहीं और ठहरते हैं तो पकते नहीं... कई बार अंबार होता है, लेकिन वो भी बेकार ही लगता है... अब कच्चे-कच्चेपन में क्या तो स्वाद होगा और क्या गंध...! तो उसे वहीं छोड़ देते हैं, घुम-फिरकर वहीं-वही..... बेचैनी है... सब कुछ तो है, लेकिन जो जगह बरसों तक छटपटाहट के कब्जे में रही उसके मुक्त होने से सबकुछ उलट-पुलट हो गया है, खालीपन उतर कर पसर गया... हर कहीं। आखिर मुक्ति को सह पाना भी आसान तो नहीं ही हैं ना! खुद को कई दफा उलीच लिया, कुछ मिलता ही नहीं है, बस हाथ आती है बेचैनी और डर.... दोनों का एक ही-सा सुर है। कहीं खत्म तो नहीं हो रहे हैं....चुक तो नहीं रहे हैं...? क्या वो समय आ गया है, जहाँ सवाल खत्म होने लगे हैं, सब कुछ को उसी तरह से स्वीकार कर रहे हैं, जैसाकि वो है? आखिर तो इतना सब करते हुए भी क्यों इस तरह का सन्नाटा है... क्यों इतनी खामोशी है....? संतुष्ट हैं और इस संतुष्टि से घबराहट है... क्यों है ये? खुद को हमेशा ही इस बेचैनी और छटपटाहट से आयडेंटिफाई किया है, तो ऐसा लगता है, जैसे आयडेंटिटी क्रायसिस की स्थिति में पहुँच गए हैं।
फिर से – रास आया नहीं तस्कीन का साहिल कोई
फिर मुझे प्यास के दरिया में उतारा जाए....

Wednesday, 15 September 2010

अध्यात्म... मतलब घर लौटना...!



फूलते काँस देखकर धक से रह गए... अभी तक बारिश का फेयरवेल तो हुआ नहीं, तो फिर प्रकृति ऐसे कैसे शरद का संकेत दे सकती है? लेकिन भूल गए कि प्रकृति को किसी नियम, अनुशासन, तर्क और अनुभवों में बाँधा नहीं जा सकता है, या तो ऐसा है कि उसका अपना अनुशासन है, जिस तक हमारी पहुँच नहीं है या फिर यूँ कहा जा सकता है कि वो हर नियम और अनुशासन से मुक्त है, स्वतंत्र औऱ स्वछंद है... यही सोचते हुए दफ्तर पहुँचे, पार्किंग से बिल्डिंग तक पहुँचते हुए ही महसूस हो गया कि चाहे भादौ चल रहा है, लेकिन क्वांर की आँच पहुँचने लगी है, हिरण तक को काला कर देने वाली धूप का सिलसिला शुरू होने वाला है और ये महज उसकी आहट है।
पहुँचते ही रिसेप्शन से सूचना मिली कि बुक स्टॉल से आपके लिए फोन था, आपने जो मँगवाया है, वो आ गया है।
ठीक है...
राजेश कई बार कह चुके हैं कि तुम्हें जो भी मैग्जिन पढ़नी है, वो तुम सब्सक्राइब क्यों नहीं कर लेती, बेकार में ऑफ रूट जाकर खरीदती हो... समय बर्बाद होता है। लेकिन पता नहीं क्या ऐसा है जो मुझे उस पर अमल करने से रोकता है। लौटते हुए बुक स्टॉल पर कई तरह की पत्रिकाएँ खरीदी... फिर नजर चली गई ओशो टाइम्स पर... ये भी दे दें। हर बार तो नहीं खरीदती हूँ, लेकिन कुछ चार-पाँच महीनों के बाद फिर इसे पढ़ने का मन हुआ।
इन पिछले महीनों में अखबारों के अतिरिक्त तथ्य, तर्क, न्यूज और व्यूव्ज, फिक्शन और रिसर्च, कहानी, कविता, ब्लॉग, अनूदित और ओरिजनल हर विधा को पढ़ने का क्रम चल रहा है, फिर भी लगता है कि कुछ ऐसा है जो छूटा हुआ है। लगातार विचार, तथ्य, तर्क और सूचनाएँ जमा करते-करते ऊब होने लगी थी, कुछ टेस्ट चेंज होना चाहिए... शायद यही वजह हो कि एक बार फिर ओशो टाइम्स... ऐसा हर बार थोड़े अनियत अंतराल से होता आ रहा है। आज जब इसके कारण ढूँढने बैठी तो स्मृतियों के साथ ही ‘भूत’ हुए एहसासों को भी खंगाला और पाया कि यायावरी अच्छी तो लगती है, लेकिन घर आखिरकार घर होता है। देश-विदेश घुमो, पहाड़, समुद्र, जंगल, खंडहर, इमारत, सड़कें, मॉल देखो लेकिन आखिरकार घर लौटने का जो अहसास है, वो इन सबसे अलग है, बहुत उत्साहित करने वाला, ऊष्मा और अपनेपन से भरा...। दुनिया भर की खूबसूरती एक तरफ और अपना घर एक तरफ...। यूँ ही तो नहीं कहा गया है कि अपना घर कैसा भी हो स्वर्ग होता है... सुरक्षित... ऊष्मा से भरपूर, सुविधाजनक और अपनेपन से लबरेज़... मतलब...! मतलब कि अध्यात्म को पढ़ना ठीक वैसा ही है, जैसे खूब सारी यायावरी के बाद अपने घर लौटना... अपने पहचाने परिवेश, अपनी दुनिया, अपने व्यक्तिगत सुख, शांति, सुविधा, सुरक्षा, गर्माहट और अपनेपन के दायरे में आ जाना... जानने के लिए घुमना जरूरी है तो मनन के लिए घर लौटना भी तो जरूरी है। अपने अंदर के महीन तंतुओं, रेशों... को देखना, समझना, सहलाना... पहचानना भी तो जरूरी है। वो सब जो प्रकृतितः इंसानों को हासिल है, लेकिन जिसे दुनिया की दौड़-भाग ने छीन लिया है, उस तक पहुँचना सुकून देता है, ठीक वैसे ही, जैसे लंबे सफ़र से घर लौटकर मिलता है... नहीं!

Sunday, 5 September 2010

कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण और मौला, मौला, मौला, मेरे मौला


10-12 दिन लंबे चले तनाव के खत्म होने के अगले ही दिन इत्तफाक से कृष्ण जन्माष्टमी की छुट्टी पड़ी, अब अखबार वालों को तो छुट्टी होती नहीं, लेकिन उस तनाव के दौरान की गई भाग-दौड़ के बाद शरीर को तो कम, मन को आराम की तलब ज्यादा महसूस हुई, फिर घर में तो छुट्टी थी ही, सो एक छुट्टी और...। सुबह नींद खुली तो आसपास का बिखरापन, बेतरतीबी नजर आई... सोचा छुट्टी का सदुपयोग किया जाए और लग गए... उसी बिखरेपन से मिली एक नायाब कैसेट... अवसर के अनुकूल वृंदावन... जन्माष्टमी, जसराज जी, वृंदावन और कृष्ण.... कैसेट चल रही थी थोड़ी देर बस ‘होने’ का मन करने लगा, सो काम बीच में छोड़कर आँखें मूँद ली। फिर काफी सारा काम समेट लिया गया था। कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण भोर ही मुख बोलो...कृष्ण, कृष्ण बोलो...। बहुत सारे साल वैष्णवी असहिष्णुता से चिढ़ की वजह से कृष्ण से भी अनबन रही, लेकिन समझदारी की दहलीज पर पहुँचते-पहुँचते जब कृष्ण के चरित्र को बहुत थोड़ा जाना तो उसकी दिव्यता और साधारणता दोनों ने ही आकर्षित किया... लगा कि ये क्षुद्रताएँ तो हमारी हैं, यदि कृष्ण हुए तो वे तो उन सबसे परे हैं... उनका हिंदू धर्म या फिर वैष्णव सम्प्रदाय से सूत भर भी नाता नहीं है, जयवंती तोड़ी का आखिरी हिस्सा कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण का जाप शुरू हो गया था... विज्ञान क्या कहता है पता नहीं, लेकिन आँखें मूँदे हुए महसूस हुआ कि शायद हमारी आत्मा ब्रह्म के गुरुत्वाकर्षण का शिकार हो गई है... तर्क और भावना से अलग, दिखाई देने वाली दुनिया से दूर कहीं ओर हैं और शायद हम हैं ही नहीं... राँझा, राँझा करती आपे राँझा होई... पहली बार हीर के इन शब्दों को परखा.... शायद यही वो पराकाष्ठा है, जिसे हीर ने पाया, वो उसे बनाए रख पाई, हम दुनियादार हैं, तो खट से अलग हो जाएँगें, लेकिन अभी है।
दोपहर के खाने के बाद किसी चैनल पर म्यूजिक का कोई प्रोग्राम देख रहे थे। एक लड़की गा रही थी... मौला, मौला, मौला मेरे मौला... दरारें-दरारें है माथे पे मौला, मरम्मत मुकद्दर की कर दो मौला... मेरे मौला.... दलेर मेंहदी जो जज थे उठ कर आए और तान मिलाई... फिर से मौला, मौला, मौला का वैसा ही जाप... फिर से वही अनुभव...।
लगा नहीं कि मौला और कृष्ण के जाप का कोई अलग-अलग असर होता होगा...? कोई भी जाप करो... असर एक-सा ही होता है, तो फिर ये जो झगड़े हैं, वो क्या हैं? नहीं ये सहिष्णुता का गान नहीं है, ये महज एक जिज्ञासा है... क्या ये असर संगीत का है? इसका जवाब धर्म के पास तो खैर है ही नहीं... जवाब या तो अध्यात्म दे सकता है या फिर विज्ञान...।

Thursday, 26 August 2010

जीवन की संजीवनी, छोटी-सी खुशी


हर बार ये निर्भरता अखरती थी, लेकिन बहुत ज्यादा असुविधा नहीं होने पर इसे नजरअंदाज कर दिया जाता रहा। यूँ कह लें एडजस्टमेंट करने की बजाए निर्भरता को चुन लिया था। कहीं आना-जाना हो तो ड्रायवर के भरोसे... ड्रायवर भी कर्तव्य परायण... बीमारी, समस्या और त्योहारों की एकाध छुट्टी के अतिरिक्त छुट्टी लेता नहीं, इसलिए भी गाड़ी सीखने के बारे में सोचा तो कई बार लेकिन हर बार तमाम तरह के बहाने बनाकर इस विचार को खारिज कर दिया। कभी ये सोचकर कि कहाँ जाकर सीखेंगे, कभी दोस्तों ने सुझाव दिया कि ड्रायवर ही सीखा देगा (अब चूँकि वो तो हर दिन ही आता है, इसलिए उससे तो कभी भी सीख ही लेंगे), समय कैसे मैनेज करेंगे, जरूरत क्या है, इस शहर में गाड़ी चलाना यूँ भी जोखिम भरा है, जब तक पीछे की सीट पर बैठो तभी तक आनंद है, ड्रायविंग कोई बहुत आनंददायक चीज नहीं है... आदि-आदि... तो लब्बोलुआब यूँ कि ड्रायविंग सीखने को टालते रहे। ड्रायवर कई बार गाड़ी सीखने के लिए कह चुका है... सिखाने की बात पर भी उसने हाँ कर दी, लेकिन समय तो आपको ही निकालना पड़ेगा... पुछल्ला जोड़ा ... अब यही तो गड़बड़ है... समय की ही तो किल्लत है (क्यों नहीं... ओबामा, मनमोहनसिंह, सोनिया गाँधी, अमिताभ बच्चन, शाहरूख खान, मुकेश-अनिल अंबानी और रतन टाटा के बाद हमारा ही तो नंबर है मसरूफ़ियत में...!)।
फिर एक दिन ड्रायवर ने डरते-डरते खुद ही पूछा – आपके ऑफिस के पीछे है एक कार ड्रायविंग स्कूल, क्या मैं उससे बात कर आऊँ?
सोचा चलो, शायद यही निमित्त हो और हाँ कर दी। शाम को पूरी तफ्सील के साथ वो हाजिर था। तो अगले ही दिन से सीखने का क्रम शुरू हुआ। पहले ही दिन स्टेयरिंग के कॉम्प्लीकेशन से मूड उखड़ गया... तीन दिन मन मार कर गए तो लगा कुछ-कुछ पकड़ा है, उसने चौथे दिन गियर, क्लच और एक्सीलरेटर सभी थमा दिए... भगवान एक साथ चार-चार चीजें कैसे संभाली जाएगी...? साथ में हिदायत ये भी कि सामने की तरफ तो ध्यान रखना ही है, पीछे से और दोनों तरफ से आती गाड़ियों का भी ध्यान रखना पड़ेगा... अरे... दो ही आँखें हैं और वो भी सामने की ओर... इतना सारा कैसे ध्यान रखेंगे? हर सुबह खुद को ठेलठाल कर ड्रायवर की सीट पर बैठाते और जैसे ही उतरते तो यूँ लगता जैसे नर्क से बाहर आ गए हैं... अभी तो ब्रेक का किस्सा बाकी था। हफ्ते भर बाद उसने ब्रेक भी थमा दिया, एक और का इजाफा... सुनसान में तो गाड़ी दौड़ा लो, लेकिन जरा भी भीड़ नजर आई कि हाथ-पैर फूलने लगते, वो जब ब्रेक लगाने को कहता, गाड़ी रूकती औऱ बंद हो जाती .... फिर वही कवायद... लेकिन पहले गियर में एक्सीलरेटर दबाओ तो गाड़ी बंद... फिर घबराहट। हर दिन सिखाने वाला ड्रायवर से पूछता, प्रेक्टिस कराई?
तो धीरे-धीरे गाड़ी चलाना शुरू किया। ड्रायवर हिदायत देता जाता और हम उस पर अमल करते जाते... यहाँ एक अच्छी बात है कि यदि सीखना हो तो पूरी तरह से जिज्ञासु विद्यार्थी हो जाते हैं, तो गाड़ी चलाते जाते और ड्रायवर से पूछते जाते...। उस दिन बिना ड्रायवर की हिदायत के चौथे गियर में गाड़ी चला रहे थे और ब्रेक लगाने की जरूरत लगी तो तुरंत ब्रेक ठोंका, गाड़ी पहले गियर में डाली और आगे बढ़ा ली... आश्चर्य गाड़ी बंद नहीं हुई... खुशी इतनी कि हमारे साथ-साथ गाड़ी भी लहराई... इतना सारा लिखने के पीछे का सबक बड़ा अहम है कि इस बेहद मामूली-सी उपलब्धि ने खुशी का अहसास कराया ... और इस अहसास को हमने दर्ज भी किया (क्योंकि ये अहसास होता तो रहा ही है, लेकिन कभी उस तरह से पकड़ा नहीं) कि पाना दरअसल हमेशा कुछ बड़ा, भौतिक, सार्वजनिक या ऐसा नहीं होता है, जिससे रातों-रात जिंदगी बदल जाती है, फिर ऐसा हर दिन नहीं होता है, हर दिन पाने का एहसास छोटी-छोटी चीजों से होता है। छोटा-छोटा कुछ सीखना, छोटी-मोटी खुशियाँ बस इतना ही पाना है और यही है खुशी... शायद यही जीवन के लिए संजीवनी भी है।
बहुत दिनों पहले उठे सवाल कि ‘पाना क्या है?’ का लगे हाथों जवाब भी मिला... हर वो चीज जो आपमें कुछ ‘एड’ करती हो, पाना है। ये आपके हाथ से बनी स्वादिष्ट दाल से लेकर कोई अच्छी लिखी कहानी तक, किचन में किए गए नए प्रयोग के सफल होने से लेकर किसी नए और खूबसूरत विचार के पैदा होने तक, किसी अच्छी किताब को पढ़ने से लेकर गाड़ी चलाना सीख लेने तक, किसी दोस्त की परेशानी में उसे राहत देने वाली राय देने से लेकर दुनिया के किसी कोने में पैदा हुए किसी विचार को महज जान लेने तक... या फिर किसी खूबसूरत बंदिश को सुनने और किसी सरल से गाने को ठीकठाक सुर के साथ गा लेने जैसी बेहद मामूली और छोटी-छोटी चीजें पाने के दायरे में आती है, तो फिर जीवंतता के साथ जीने के लिए हर दिन कुछ छोटा-छोटा सीख कर जीवन को सरस करने का नुस्खा मजेदार नहीं है...?

Monday, 16 August 2010

छोड़ो कल की बातें...


स्वतंत्रता दिवस का हैंग ओवर उतर चुका है... हम फिर से वही हो गए हैं और इस बात से बहुत राहत हुई है। क्योंकि अभिनय... आखिर अभिनय ही हो है... चाहे वह कृत्रिम रूप पैदा हुई भावनाएँ ही क्यों न हो...? तो एक बार फिर अपने खालिस रूप में आ खड़े हुए हैं, वैसे ही निस्संग, उदासीन और आत्म-केंद्रीत... यही तो हैं हम... वो तो एक उबाल था... उस दौरान एक तो बारिश नहीं हो रही है, उस पर दो दिन से लगातार देशभक्ति की बातें, गाने और इतिहास के गौरव-गान को सुन-सुनकर पकने लगे थे। हर साल इन दो और गणतंत्र दिवस के दो दिन यही सब कुछ चलता है… कभी कोई खिलाड़ी किसी खेल में विदेश में जाकर देश का झंडा गाड़ आता है, तब भी भावनाओं का ऐसा ही उबाल देखने में आता है। कारगिल युद्ध के समय भी ऐसा ही कुछ हुआ था। 62, 65 और 71 के युद्धों में भी ऐसा ही कुछ हुआ होगा... कभी-कभी आज पर भी बातें हो जाती है, बाजार झंडों, बैनरों और तीन रंग के कपड़ों से पटा पड़ा है, राजनेता इसका उपयोग घोषणा करने और जनता पर उनके द्वारा (!) किए गए एहसानों का हिसाब दिखाने में करते हैं... अब तो इस कवायद में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, मॉल और शो-रूम भी कूद पड़े हैं... लगे हैं सारे 64 साल पहले मिली आज़ादी को आज भुनाने में... आज़ादी पर छूट के विज्ञापन दे रहे हैं, अखबारों के पन्ने काले हो रहे हैं, आज़ाद देश की उपलब्धियों और चुनौतियों के साथ इतिहास पर से धूल साफ करने में ... टीवी चैनलों के पास तो दिखाने की सीमा ही नहीं है, सेना का जीवन, विदेशों में भारतीयों द्वारा मनाए जा रहे आज़ादी के जश्न को दिखाने में... सेलिब्रिटी के लिए आज़ादी का मतलब (होता सब प्रायोजित है, लेकिन...) और स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास तो खैर है कि कबाड़े में कि जब चाहो तब धूल साफ कर चमकाओ और फिर दिखा दो... इन्हीं दिनों में बँटवारे की कड़वी यादें भी ताज़ा कर दी जाती है.... हाँ ये भी तो माध्यम हो सकता है कथित ‘देशभक्ति’ के ज्वार को उभारने में... हमारी देशभक्ति तो यूँ भी नकारात्मकता में ही पुष्पित-पल्लवित होती है... जब कोई दुश्मन-सा दिखे और हम उसे गाली दें... तब ही तो होंगे हम देशभक्त... पाकिस्तान के खिलाफ देखिए कैसे हम सारे एक हो जाते हैं और खुद को देशभक्त कहलाने लगते हैं? लगे रहते हैं, पाकिस्तान से अपनी तुलना करने में... कभी-कभी तो लगता है कि हमारी देशभक्ति भी सापेक्षिक है...बिना दुश्मन, बिना विपदा हमें कभी याद ही नहीं आता कि देश जैसी कोई शै भी है, जिसके प्रति हमारी जिम्मेदारी है... रेडियो तो खैर इन सबका अगुआ रहा ही है... इसमें फरमाइशी गानों के प्रोग्राम में सारी फरमाइशें भी तो देशभक्ति के गीतों की ही होती है... आखिरकार हमें देश याद ही इन दिनों आता है... तो सब तरफ आजादी की धूम नजर आ रही है और इस बात पर गहरी कोफ़्त हो रही है... तो सवाल ये उठता है कि कब तक हम प्रतीकों के माध्यम से अपनी देशभक्ति को परिभाषित करेंगे और न्यायसंगत ठहराएँगें? हर साल यही सब करते हैं और अगले दिन हम वही हो जाते हैं, हमारे कर्म, विचार और भावना में कहीं देश होता ही नहीं है। फिर देश क्या है, और देशभक्ति का मतलब क्या? हर साल हम एक रस्म निभा कर सोचते हैं कि देश के प्रति हमने अपना कर्तव्य पूरा किया... और अगले दिन हम वही हो जाते हैं, स्वार्थी, गैर-जिम्मेदार, असंवेदनशील और मक्कार...।
समय आ गया है कि हम शहीदों का पीछा छोड़े, छोड़ दें इसकी जुगाली करना कि उन्होंने इस देश का आज़ाद कराने के लिए क्या-क्या कुर्बानियाँ दी, इतिहास को विराम दे दें... शहीदों की कुर्बानियों के एवज में हम क्या कर सकते हैं, उस पर विचार करें, हम वर्तमान को कैसे खूबसूरत बनाएँ ताकि आने वाली पीढ़ी अपने इतिहास पर गर्व करें... कुछ भविष्य के लिए करें... कुछ आज को सुधारने के लिए करें....।

Saturday, 14 August 2010

मुट्ठी में बँधे सपनों का सच – 1




थर्ड सेम की क्लासेस शुरु हो चुकी थी। बारिश के ही दिन थे... कैंपस हरे रंग की पृष्ठभूमि पर चटख रंगों से बनी एक बड़ी-सी पैंटिंग-सा खूबसूरत और दिलफरेब नजर आ रहा था। आज का बकरा यूँ तो तय था... सुधीर... वो कल सीधे जेएनयू कैंपस से आया था, आज वो बदला हुआ दिख भी रहा था... लेकिन, उसे बकरा बनाने में मजा नहीं है... बस यही सोचकर कुछ उदासी थी और कुछ खलबली भी... कारण बहुत स्पष्ट था, उस बकरे को हलाल करने में क्या मजा जो अपनी गर्दन खुद ही हमारे छुरे के नीचे रख दें, तो आज इससे काम चलना नहीं था, इससे से न तो समोसे का स्वाद आएगा और न ही कॉफी से ताज़गी मिलेगी (अपना घोषित फंडा था, खुद पेमैंट करेंगे तो चाय और कोई दूसरा पिलाएगा तो कॉफी... चाय उन दिनों 3 रुपए की और कॉफी 5 की मिलती थी) तो हर हाल में किसी दूसरे को ढूँढना होगा। चौकड़ी बेर की झाड़ी के नीचे बने चबूतरे पर बैठकर अभी इस विचार पर मंथन कर ही रही थी कि दूर तक फैली हुई हरी-हरी घास के बीच की पगडंडी पर नींबू पीले रंग का टी-शर्ट पहने आता प्रभु नजर आ गया। बबली चिल्लाई ... हुर्रे बकरा... नजर गई और सभी के चेहरे खिल गए।
प्रभु के पास आते ही एक से बढ़कर एक तारीफ के शब्द उसे मिलने लगे... ये...!!! नई टी-शर्ट... या बहुत अच्छी लग रही है... या कितना अच्छा रंग पहना है प्रभु... या आज तो जम रहे हो.. उसने भी अपनी झेंपी-सी मुस्कुराहट चमकाई और सफाई दी – इट्स नॉट न्यू...। लहजा वही दक्षिण भारतीय... आय वोर इट ऑन वेलकम पार्टी ऑलरेडी...।
ऊँह... दैट डे वी डिड नॉट नोटिस दिस...।
कैंटीन बंद – चलताऊ हिंदी में उसने संकेत समझने के संकेत देने शुरू कर दिए।
दीप्ति ने कहा नहीं खुल गई है। थोड़ी बहुत खींचतान और नोंकझोंक के बाद बात बन गई... बननी ही थी। हर कोई जानता था कि यदि ये चौकड़ी पीछे पड़ जाएगी तो फिर कोई भी बच नहीं सकता है, तभी प्रोफेसर क्लास में जाते दिखे और सभा विसर्जित हो गई। शीत-युद्ध पढ़ाया जा रहा था, अभी तक हम तो यही समझे बैठे थे कि शीत-युद्ध विचारधारा की लड़ाई है और इसलिए सोवियत संघ और चीन दोनों एक ही खेमे में हैं, लेकिन उस दिन जो चैप्टर पढ़ाया जा रहा था, उसमें सोवियत संघ और चीन के बीच खऱाब रिश्तों पर बात हो रही थी।
जब सुधीर ने प्रोफेसर से सवाल किया कि यहाँ विचारधारा कहाँ हैं? यहाँ तो वर्चस्व और हित का संघर्ष है? तो ऐसा लगा जैसे टॉप गियर में चल रही गाड़ी पर एकाएक ब्रेक लग गया और गियर बदल नहीं पाने से वो खड़ी हो गई। खून का प्रवाह नीचे की ओर होता महसूस हुआ और, एक तीखी जलन नीचे से उपर तक दौड़ गई। इतना सादा सा सवाल सुधीर ने पूछा, हमारे अंदर क्यों नहीं आया? चाहे पूछें या ना पूछें... सवाल तो पैदा होना चाहिए ना! बस सारी केमिस्ट्री का कबाड़ा हो गया। कैंटीन में पहले चाय की ट्रे आई तो बेखुदी इतनी ज्यादा थी कि वो ही कप उठा लिया... रजनी फुसफुसाई भी कि चाय है, लेकिन फ्यूज पूरी तरह से उड़ चुका था। बस ऐसे ही कब और कैसे घर पहुँचे पता नहीं चला। पहुँच कर हर दिन की तरह कमरा बंद कर लिया। दिन अभी सुनहरा था, कब साँवला और फिर सुरमई हो गया पता नहीं चला, जबकि खिड़की से तकिया लगाए, गज़ल पर गज़ल सुनते शब्द और सुर के साथ आँसुओं में अवसाद को धोते रहे थे... खुद को समझाया था, इंसान हो... हो जाता है, हर वक्त इस तरह का तना-खींचापन क्यों? और फिर ये तो कोई बात नहीं ना कि किसी के भी अंदर उठा सवाल तुम्हारे अंदर भी पैदा होना चाहिए... धीरे-धीरे सब गुज़र गया...।

Thursday, 5 August 2010

शब्द व्यर्थ हैं, मगर शब्दातीत अर्थ है


अज्ञेय ने लिखा है – शब्द माना व्यर्थ हैं, इसीलिए कि इनमें शब्दातीत कुछ अर्थ है।
दुनिया तेजी से बदल रही है, शब्दों ने लंबा रास्ता तय किया... कहे गए, लिखे गए, छपे, फिर इनमें ध्वनि जुड़ी और अंत में दृश्य जुड़े... दृश्य जुड़ते ही शब्द सिहरने-काँपने लगे... अपने वजूद को लेकर आशंकित वे अपने संसार को समेटने लगे.... दृश्य लुभाते है, ध्वनियाँ डुबाती है, लेकिन शब्द... वे हमें जहाँ ले जाते हैं, वह बीहड़ है... हम वहाँ नहीं जाना चाहते हैं, क्योंकि बीहड़ को हम साध नहीं सकते हैं। ये चैतन्य है, गूँज देते हैं, लंबी... दूर तक.... साध लें तो साधू बना देते हैं। दृश्य का दौर है, शब्द पार्श्व में कहीं चले गए हैं। शब्द की सत्ता खतरे में है, तभी तो उनका जो जैसे चाहे वैसा उपयोग कर रहा है। खोखले हो चुके हैं, अर्थ खो चुके हैं, तभी तो इनकी व्यर्थता उभरती है और दृश्य महत्वपूर्ण हो उठते हैं। दृश्य जो कुंद करते हैं, पंगु बनाते हैं, ‘मैं’ को छीन लेते हैं उसे श्रीहीन बना देते हैं, फिर भी आकर्षित करते हैं। दृश्य अफीम की तरह सपनों की दुनिया देते हैं, लेकिन बदले में कल्पनाएँ हर लेते हैं। तभी तो कलम अब हथियार नहीं रही, फुटेज हथियार हो गए हैं। डिस्पोजेबल का दौर है... यही उपभोक्तावाद का सार भी...। जब तक उपयोगी है, है, जब उपयोग नहीं रहा, जंक...., लेकिन ये सब निर्जीव के साथ तो किया जा सकता है, चैतन्य के साथ नहीं किया जा सकता... दृश्य जब तक आकर्षक है तब तक ही देखे और दिखाए जा सकते हैं, जहाँ आकर्षण खत्म, दृश्यों का वजूद भी खत्म... शब्द लेकिन अपनी सत्ता के साथ कोई समझौता नहीं करते हैं, इसलिए वे हाशिए पर चले गए हैं।
तो एक बार फिर से अज्ञेय की शरण – शब्द तो व्यर्थ है
... लेकिन जब उनके शब्दातीत अर्थ उभरते हैं, तो फिर क्रांति होती है। तो माना कि आज उम्मीद नजर नहीं आती, लेकिन प्रकृति का चलन गोलाकार है, इसलिए एक दिन फिर से शब्दातीत अर्थ उभरेंगे.... हम आशान्वित हैं....

Tuesday, 27 July 2010

यूटोपिया से आगे....




ऐसा आजकल हर दिन होता है। यहाँ ई-मेल एक्सेस करने, फेसबुक पर मैसेजिंग करने और ब्लॉगिंग करने का समय होता है और वो आती जाती है, उसे देखते ही कहीं, कुछ सिकुड़ता जाता है। वो आती है, पंखा बंद करती है, कमरे की झाड़ू लगाती है और निकलते हुए पंखा फिर से चालू कर देती है। वो जितने समय कमरे में रहती है, काम से इत्तर बहुत सारा कुछ अंदर चलता रहता है, शायद सारा ध्यान उसके काम की तरफ लगा रहा है, देखना तो कुछ नहीं होता है, लेकिन कहीं अंदर बहुत सारा कुछ सरसराता रहता है। उसने इसी साल दसवीं की परीक्षा पास की और ग्यारहवीं में आई हैं। जब उसने अपने रिजल्ट की बात बताई तो पता नहीं कैसे कह बैठे कि – खूब मन लगा के पढ़ाई करना, हमारे पास बस यही एक चीज है।
फिर खुद ही सोचा, हमारे पास का क्या मतलब था? अभी इसकी तह खुल नहीं रही है, कभी खुलेगी तब इस पर बात होगी। फिलहाल तो उसकी उपस्थिति और कमरे में पसरी असहजता की बात....।
एक उम्र होती है, जब सारी ‘अच्छी’ बातें आकर्षित करती है। और इस बात पर आश्चर्य होता है कि क्यों दुनिया इतनी अजीब है? तब तो खऱाब ही कहा जाता था, लेकिन अब समझदार हो गए हैं ना! तो शब्द को थोड़ा ‘मॉडरेट’ कर लिया है, अजीब... ठीक भी है न! ना अच्छा न बुरा, बस अजीब! क्यों नहीं सब कुछ को सबसे अच्छे तरीके से जिया जा सकता है? कहा ना! वो उम्र ही ऐसी होती है, क्योंकि हमें खुद कुछ करना नहीं होता है, इसलिए हम सपने देखते हैं, और उसी में जीते भी है... एक मालवी कहावत है कि यदि सपने में लड्डू देखे तो फिर देसी घी के क्यों नहीं... तो मामला कुछ ऐसा ही। यूटोपिया.....इसे ही तो कहा जाता है ना....!
तो उस दौर में प्लेटो का आदर्श, दार्शनिक राजा और सैनिक शिक्षा की वकालत करती उसकी शिक्षा व्यवस्था तो भाती थीं, लेकिन उनके परिवार की घिचपिच ने सब कुछ पर पानी फेर दिया, फिर अरस्तू आ गए.... वो थोड़े दुनियादार आदमी थे, सब कुछ ठीक लगा, लेकिन यहाँ भी मामला अटका कि वे दासों की परंपरा को सही मानते थे। दासों के बारे में वे बहुत सारी मानवीय बातें करते हैं, वे उन्हें इंसान भी मानते हैं, लेकिन फिर भी वे जरूरी मानते हैं। तो लगा करता था कि आखिर यूनानी खून है.... दासों के बिना कैसे काम करेगा। फिर वही यूटोपिया... हाँ मूर का यूटोपिया.... उस उम्र के सबसे करीब होता है.... आज ये सब इसलिए याद आ रहा है कि एक तरफ हम पैर फैलाए अपने सिस्टम पर गिटिरपिटिर कर रहे होते हैं और सोनू.... वही... काम करने वाली लड़की, अपना काम करती हैं। कहीं हमें अपने अंदर अरस्तू का जिंदा होना महसूस होता है, हम भी तो वही है।
ठीक-ठीक दासों का समर्थन नहीं हैं, भई जमाना भी बदला है और हाँ हम भी तो बदले हैं कहीं। हम खुद को ही जवाब देते हैं - वो जो काम करती है, उसका पैसा पाती है। कहीं तो ये भी उठता है कि हम भी तो दास ही है... फिर अरस्तू भी कहाँ गलत कहते थे? वे तो कहते थे, कि जो जिस काम में माहिर हो, उसे वही करना चाहिए। यदि हम बुद्धि के काम ठीक से कर सकते हैं तो हमें वो और यदि वो.... हाँ सोनू.... घर के कामों में दक्ष है तो वो वही करे....इससे घर के कामों में हम जितना समय देते हैं, उतना हम समाज की ‘भलाई’ के काम में लगाए.... एक तरह से वो हमारी सहयोगी है.... आ गए न हम भी वहीं। हमने धीरे से पतली गली निकाली, अर्थशास्त्र में इसे श्रम विभाजन कहते हैं। अरे वाह! कैसी तीक्ष्ण बुद्धि पाई है....

Tuesday, 13 July 2010

भूली-बिसरी किताब-सा हाथ आया सुख



ऐसा नहीं होता है, लेकिन कल रात ऐसा हुआ। हर दिन का वही क्रम - रात के खाने के बाद टहलना, कभी भी इसे अलग नहीं पाया... कभी-कभी तो टहलने वाली सड़क सिर्फ इसलिए बदल दी जाती है कि हर दिन इसी सड़क पर टहलते हैं, कुछ चेंज हो ..... कल रात अलग यूँ था कि अपने मोबाइल में म्यूजिक को नए सिर से फॉर्मेट किया था और दिन भर उसे सुनने का मौका नहीं मिला, सो रात को टहलते हुए साथ ले लिया। नई बस रही सुनसान कॉलोनी में इक्का-दुक्का टिमटिमाती ट्यूब की रोशनी.... हालाँकि आषाढ़ के मध्य में आ पहुँचे हैं और बारिश की आस है फिर भी साफ आसमान पर झिलमिलाते तारे है, आश्चर्य है कि बुरे नहीं लग रहे हैं.... हल्की-हल्की हवा और बहुत पहले सुनी हुई गज़लें..... फिर कुछ इस दिल को बेकरारी है..... कहीं कुछ मीठा सा छूकर गुजर गया... अपने-अपने गुजरे दिन को चुभलाते हुए भूली-बिसरी गज़लों के साथ जगा था वो एहसास..... बड़ा अजबनी.... बहुत पराया.... फिर भी भला-सा लगने वाला।
कहीं पढ़ा था कि – मन अपने सामने भी खुद को नहीं खोलता है।
अपने अंदर उगी यह अजनबीयत उसी मन की नई-नई खुलती पर्तों का नतीजा है। क्या और कितना कुछ होता है, मन के भीतर, लगातार खोलते चले जाने के बाद भी खुलता ही चला जा रहा है। कुछ इसी तरह का अनुभव है इन दिनों... न अतीत है, न भविष्य.... आज भी हवा के पंखों पर सवार.... हल्का और ताजा...। न गुजरे हुए को लेकर कोई कड़वाहट, असंतोष और अभाव, न आने वाले पर किसी तरह की ख़्वाहिश, सपना या महत्वाकांक्षा का बोझ .... न आज के लिए कोई दौड़.... न कुछ पाना चाहना और न कुछ छूट जाने का दुख..... न दौड़.... न हार.... न जीत, न कुछ करना और न ही इस नहीं कर पाने को लेकर कोई मलाल.... कुछ भी नहीं है, फिर भी कुछ है, कहता-सा, जीता-सा, मुस्कुराता-सा कुछ.... कुछ नहीं करते, पाते, सोचते-विचारते, पढ़ते-सुनते हुए भी भरा-भरा अहसास... शायद ये जीवन में पहली बार महसूस हुआ है।
मजदूरों-से हैं, जब तक पत्थर नहीं तोड़ लें, तब तक न तो नींद आए न भूख लगे... ठीक वैसे ही, जब तक खुद को खुरचे नहीं, थोड़ा खून निकाले, थोड़े आँसू हो.. तब जाकर लगे कि हम जिंदा है, लेकिन इन दिनों अचानक से अपने अंदर उगी इस अजनबीयत का क्या करें ये समझ नहीं आ रहा है। बहुत सालों बाद खुद को इतना निर्द्वंद्व और इतना हल्का पाया..... प्रवाह का हिस्सा होने के बाद भी किसी तरह की बेचैनी या छटपटाहट नहीं... कोई दुख, बेचैनी, छटपटाहट या कोई निरीहता भी नहीं.... खुद को इतने परायेपन के साथ देख और भोग रहे हैं, जैसे ये हम न हैं कोई ओर है। हाँ ये सुख है, इसी तरह से आता है, जैसे कोई गुम हो चुकी पुरानी पसंदीदा किताब या फिर कहीं अटाले में पड़ी मिले कोई बहुमूल्य सीडी... बस यूँ ही आया है ये... और आश्चर्य ये है कि न आँसू है, न बेचैनी और न ही छटपटाहट... कुछ यूँ कि न शब्द मिले न भाव... बस है.... कुछ बहा ले जाता-सा, सुख है।

Thursday, 1 July 2010

अफ्रीका के महासागर पर जूही के फूल



जेठ की अंतिम रात और आषाढ़ के पहले सूर्योदय के बीच का वक़्फ़ा…. बादल अल्हड़ हो रहे हैं इसलिए जिम्मेदारी कहीं नहीं नजर आ रही है। वे आसमान पर उधम तो मचाते हैं, बरसते नहीं है। मौसम विभाग का हमेशा का रोना है.... अभी आया, बस बरसेगा और अगले ही दिन कहना शुरू कर देता हैं कि कमजोर हो गया है, तो मानसून तो जैसे छुपाछाई का खेल खेल रहा है। हाँ तो जेठ की उस गुजरती रात के जालों में से उलझा शेर – सुबह होती है, शाम होती है, जिंदगी यूँ ही तमाम होती है – टप्प से गिरा और नींद का शीशा झनझना कर टूट गया। दिमाग के गोदाम में पड़े जंक ने यूँ भी बेचैन किया हुआ है, ऐसे में गहरी नींद का रात के ऐन बीचोंबीच टूट जाना...... जैसे खुद का बेवजह, बेकार हो जाना....। गहरी काली और निस्तब्ध रात के बीच आँखों के बल्बों को बेआवाज टिमटिमाने की सजा.... विचारों का रेला गोदाम की दरारों से बाहर बहने लगा तो फिर नींद के आने के लिए जगह ही नहीं बची। कितना कुछ ठूँसा हुआ है, इसमें.... कोई ओर-छोर ही नहीं है। सुबह से रात तक न जाने कितना अटाला हम जमा करते हैं बिना ये सोचे कि इसकी जरूरत कहाँ और कितनी है?
आखिर पता नहीं किस क्षण नींद जिंदगी की तरह अपना रास्ता बनाकर पहुँच ही गई। कहाँ तो अलस्सुबह उठ जाने की योजना थी और कहाँ चाय के कप और सुबह के अखबार के साथ उठाए गए तो घड़ी ने नौ बजा दिए थे...... ओफ! फिर वही बेकार के एक्सप्रेशंस, जिनके होने का कोई मतलब नहीं था.....लेकिन थे। खैर, फिर से जंक जमा करने का सामान था और हम थे। नजरें टिकी थी अखबार के आखिरी पन्ने की उस रोचक खबर पर कि अफ्रीका में महासागर के निशान मिले हैं...... खबर का आखिरी हिस्सा था और पतिदेव ने बाहर से आकर धप्प से एक अंजुरी भर जूही के फूल उस खबर पर बिखरा दिए थे.... वाह क्या इत्तफ़ाक है!
आखिरी हिस्सा यूँ था कि महासागर के उभरने के निशान तो हैं, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में पूरे 1 करोड़ साल लगेंगे..... अब कौन जीता है तेरी जुल्फ़ के सर होने तक......? लेकिन जूही के छोटे-छोटे, नाजुक फूल तो आज के ही हैं.... आज के ही लिए हैं.....। तो यूँ ही एक विचार आया कि इस क्षण, इस घड़ी, इस जगह को बिसराकर हम भूत-भविष्य, पृथ्वी-अंतरिक्ष की चिंता कर रहे हैं, लेकिन कैसे चूक गए कि मानसून की बारिश न होने के बाद भी कितना कुछ हमारे आसपास घट रहा है..... कैसे चूक गए कि गुलमोहर अब भी अपने लाल भड़क छाते को ताने हर आते-जाते को लुभा रहा है, कि नीम में आई कोंपलें कैसे झूमर की तरह हवा में लहरा रही है, कि कैसे सागौन तीन मंजिला मकान की छत तक आ पहुँचा और कैसे जूही अपनी सुवास का बंदनवार सजाए, हर आने-जाने वाले को एकबारगी पलटकर देखने के लिए मजबूर कर रही है, कैसे छूट जाता है, ये सब और हम उलझे रहते हैं कि जी-20 में क्या हुआ? फीफा में क्या हो रहा है? खाप पंचायतें क्या कर रही हैं? और ऑनर किलिंग पर कोई भी नेता क्यों नहीं बोल रहा है? पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने से हमारा घरेलू बजट कितना गड़बड़ाएगा और रसोई गैस की खपत को कम करने के लिए क्या-क्या उपाय करने की जरूरत है? अफगानिस्तान से नाटो सेनाओं के चले जाने के बाद क्या होगा? नक्सली समस्य़ा को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तालमेल क्यों नहीं हैं और क्यों बेकसूर लोगों की जान इनकी आपसी खींचतान में जा रही है? औऱ पाकिस्तान में कब लोकतंत्र जैसा लोकतंत्र आएगा? कैसे ये सब कुछ याद रहता है, बस वही नहीं याद रहता है, जो हमारे बहुत पास, आँखों की ज़द, हथेलियों की पहुँच में उगता-मुरझाता, जागता-मुस्कुराता रहता है, क्यों नहीं दिखता, याद रहता, आह्लादित और तरंगित करता हमें?..... क्या ये वाकई हमारी संवेदनाओं के मरने की शुरुआत है?

Friday, 25 June 2010

LOVE STORY


Get up i am telling u about the life..- she said
oh come on... its midnight...let me sleep - i request her.
No.... when i will not be with u remember me... and all this....listen... and God knows what she recite all the night... it is morning.... it melt slowly and gently.... she stood up from bed and screm...lets go for the walk....
Have u gone mad? - first u did not sleep me whole night... and then... go for walk.... no...
i saw her with lots of affection...
she comb her hair and knot with clucher... i find her very beautiful at that moment. I remember that piece of ghazal – KAUN SI BAAT HAI TUMME AISI, ITNE ACHCHE KYUN LAGATE HO….and sung….she smile sweetly and said – BAND KARO, KITNE BESURE HO. I said….i am questioning not singing…she put unreal anger on face and said come fast - she orderd and went outside... i don't have any options... i questioned myself - why i am so helpless before her... there is no answer, except this, i love her...
outside there is mild cold...sun peeks from east... i hold her hand and suddenly i go front of her, sit on knee and proposed - lets get married.
she laugh whole hearted- u r mad....seriously u r.
what happened? - i stare her with wonder...- what about laughing in this...
why marriage? - she asked
i feel insecure about u...- i answered
why?
i don't believe u, i am living in this dread that some day u 'll leave me...
now she is be serious...- yaa i can go any time...
thats why i want to marry u. - i disclosed
she smile - u think if we will get married then i could not leave u. nothing can stop me...-
she said with solidity.
then how can i tie u? - i asked her with some innocence
no, u can't...- she said.- i don't believe in to hook up in relations....
i want to live with freeodm... confinement ruin relations, I don’t want my relation to be like this.
There is raining....and she screams with happiness.
In next morning, again in my deep sleep, i want to hold her unconciously....she is not
there....suddenly i wake up with hassel and searching her madly....but i did not find her except a slip of bye.

Monday, 21 June 2010

देह की नागफ़नी, नागफ़नी की देह


संघर्ष घना है, हमेशा की तरह। लेकिन इस बार उसका रूप बिल्कुल ही नया है। कहाँ से आ गया ये सब.... ये सब तो कहीं था ही नहीं। कहाँ तो विदेह हो जाने की तीखी आकांक्षा और अब ये दैहिकता की अंकुरित होती चेतना, दो सिरे। अपने होने का खास लगना, बहुत सारी आँखों में चिह्नित होते खुद को देखने का सुख और उस सुख से उपजा दुख। न दुख अपना न सुख.... फिर भी दोनों अपने। ये बीज इस मिट्टी में कहाँ से आया? ये जमीन तक इसके लिए अनुकूल नहीं थी और ये कब अंकुरित हुआ? चलो अंकुरित हुआ होता तो समझ में आता, लेकिन ये तो बीहड़ झाड़ी हो चली है। अब इसे उखाड़ने का दुरुह कार्य... लहूलुहान होना ही ठहरा..... । ये देह की नागफ़नी कहाँ से और कैसे आ गई? ये बिल्कुल अपरिचित झाड़ी..... कैसे उग आई...? और अब उग आई है तो इसका क्या किया जाए...... ? इसे यूँ ही पनपते रहने तो नहीं दिया जा सकता है ना.... ? यही संघर्ष है... नया तो नहीं है.... हाँ ऐसा कभी रहा नहीं.... अपनी भौतिकता के प्रति हमेशा की उदासीनता कहीं गुम हो गई और एकाएक लगाव पैदा हो गया..... और इस लगाव से उपजा है संघर्ष..... हमेशा तो वैचारिकता का ही वैचारिकता से द्वंद्व रहा करता था, लेकिन इस बार ये बिल्कुल नया है। हमेशा ही कहा जाता है कि जो होती हूँ, वही नहीं होना चाहती हूँ। खुद का अतिक्रमण करने की चुभती चाह....। बस यही अस्वाभाविक ख़्वाहिश है। अपने होने को हमेशा लाँघ जाने की चाह और उसके लिए इतने ही दुर्गम उपाय.... उस सबसे दूर जो स्वाभाविक होता है, उस सबकी ओर जो कृत्रिम होता है, यही चाह है, यही संघर्ष और यही त्रास। जो सहज होता है, उसी से बचना... ।
अपना भौतिक स्व इतना गहरा कैसे हो गया? वो इतना आँखों में खटकने कैसे लगा? अपना आत्मिक स्व कहाँ बिला गया, इस सबमें... और क्यों वो मुझसे अलग हो गया? क्या वाकई अलग हो गया? यदि हो जाता तो हो सकता है कि ये संघर्ष नहीं होता, लेकिन वो भी है। फिर वही होना और होना चाहना के बीच का तनाव...। ये कैक्टस की चुभती सी देह कहीं आँखों में अटकती है.... तो फिर देह का कैक्टस लहूलुहान किए हुए हैं। संघर्ष सघन है ..... कारण विरल.....।

Sunday, 13 June 2010

...मुझे ऐ जिंदगी दीवाना कर दे




उस दिन इयरफोन लगे हुए थे। 14 मिनट 21 सेकंड लंबी इस कव्वाली के आखिरी सिरे पर थी--कई-कई वार चढ़ी कोठे ते नी मैं उतरी कई-कई वारी..... न दिल चैन न सबर यकीं नू.... न भूलदी सूरत प्यारी.... आ जा सजणा.... ना जा सजणा ......तू जितीया ते मैं हारी... छेती आजा ढोलणा.... तैनू अखियाँ उड़ीक दिया.....
विरह..... तड़प, समर्पण और बेबसी का चरम..... डूबने की शुरुआत..... उतर जाने के लिए आँखें बंद की, सिर कुर्सी की पुश्त पर टिका दिया...... उस एक क्षण के लिए..... लेकिन तभी पड़ोस में काम कर रहे साथी को किसी ने आवाज दी। उसने तो नहीं सुनी लेकिन यहाँ सुनाई पड़ गई.... क्षण छूट गया, अब भी कानों में वो लंबी सरगम सुनाई पड़ रही थी, लेकिन आँखें खुली हुई थीं और हमारे सामने खुरदुरी हकीकत फैल गई थी। टेबल-कुर्सी, कम्प्यूटर, फोन, आते-जाते, हँसते-बतियाते लोग...... जागृति के सारे लक्षण फिर से साकार हो उठे थे.... घड़ी भर की निजात का ये क्षण भी हाथ से फिसल गया था।
रविवार की छुट्टी..... सुनहरी से साँवली होती जेठ की सुबह.... जमा होती खूब सारी उम्मीदें..... बादल, बारिश, फुहारों का इंतजार। सारा काम जल्दी-जल्दी निबटाया.... डूब जाने के लिए सारी अनुकूलताएँ...... एक क्षण, सादा.... अनायास-सा आता है, लेकिन उसके लिए कितने-कितने जतन करने पड़ते हैं! दोपहर को हमेशा की तरह केट नैप के बाद की चाय.... कप पड़े हुए थे..... बहुत पुरानी उपेक्षित-सी पड़ी सीडी हाथ आई.....सूरदास का भजन जसराजजी की आवाज.... विरह का दर्द....... कुब्जा के रंग में राचि रहे...... राधा संग अइबो छोड़ दिया...... श्रीकृष्णचंद्र ने मथुरा ते गोकुल को अइबो छोड़ दिया...... फिर से डूबने-डूबने के मुहाने पर...... इस बार तो बस डूब ही चुके थे...... सुरदास प्रभु निठुर भए..... सुरदास प्रभु निठुर भए.... हसबो इठलइबो छोड़ दियो......अभी आलाप चल ही रहा था कि वॉशिंग मशीन का बजर बज उठा.... सब खत्म.....। क्यों होता है, ऐसा?
इतने चौकन्नेपन की जरूरत नहीं है? अब बजर बजा है तो बजा है, लेकिन नहीं वो कहीं अटक गया है। अचानक-से याद आ गया – मैं अपने आप से घबरा गया हूँ, मुझे ऐ जिंदगी दीवाना कर दे......और रूलाई फूट गई.....क्योंकि ये तो सिर्फ एक उदाहरण है.... मसलन – कैसेट का अटक जाना, बाथरूम का टपकता नल या फिर जलती लाइट, प्रेसवाले लड़के की या सब्जी वाले की आवाज.... केलैंडर का फड़फड़ाना या फिर तेज हवा में भड़भड़ाते खिड़की-दरवाजे, चाय नाश्ते के जूठे पड़े बर्तन या फिर जूठे पड़े चाय के कपों में चींटी हो जाना...... फेहरिस्त बहुत लंबी है, कुछ भी हो सकता है, लौटा लाने के लिए.... एक सादे-से अनुभव को पाने के लिए कितने सारे षडयंत्र!
संक्षिप्त में यूँ है कि जाग्रतावस्था में खुद को कभी भी खुद से मुक्त नहीं पाया। हमेशा त्वचा की तरह से चिपकी रहती है ये भौतिक चेतना... बस गहरी नींद में ही इससे मुक्ति है, लेकिन मुश्किल ये है कि नींद में इस मुक्ति का अहसास नहीं होता है। इतनी-सारी सतर्कता, इतना सारा चौकन्नापन क्यों है? क्यों नहीं घड़ी-दो-घड़ी खुद को छोड़ पाती.... अपनी चेतना को समेट कर सुला पाती, कि खुद के पास बैठकर देख पाती कि इस चौकन्नेपन से मुक्ति के बाद कैसा लगता है, कि बाहर से बेखबर होकर भीतर के अँधेरे को देखना, पीना, जीना कैसा लगता है? क्यों बाहर इस कदर चेतना में अटका पड़ा रहता कि भीतर मुड़ने-जुड़ने के लिए अनुष्ठान करना पड़ता है, फिर भी सफल हो गए तो ठीक... आखिर तो बाहर को सहते-सहते कभी-कभी इस सबको झटक कर अलग खड़े हो जाने का..... भौतिक स्व से दूर होकर आंतरिक स्व को टोहने का सुख बहुत सुलभ क्यों नहीं है? क्यों भौतिक जगत हमारे बाहर भी पसरा हुआ है और भीतर भी..... क्यों इसी में सब कुछ अटका पड़ा रहता है, क्यों इससे निजात नहीं है? क्या इस बेचैनी और छटपटाहट की वजह भौतिकता, दृश्य जगत का ये असीम विस्तार ही तो नहीं, जो हमें घेरे हुए हैं, बाहर से और भीतर से भी.....?.

Monday, 7 June 2010

इश्क़-ए-हक़ीक़ी में अन्नपूर्णा देवी


4 जून के स्क्रीन में अन्नपूर्णा देवी पर एक खुबसूरत आर्टिकल पढ़ा...... खुबसूरत से अच्छा और कोई शब्द फिलहाल मिल नहीं रहा है...... क्योंकि उस अनुभूति को जिसे मैंने पढ़ने के दौरान और आज तक जी रही हूँ, शब्द नहीं दे पा रही हूँ, इसलिए फिलहाल सिर्फ खुबसूरत शब्द से ही काम चला रही हूँ।
ये एकसाथ ही बहुत ज्यादा जाना और बहुत कम सुना नाम है। ज्यादा जाना इसलिए कि उस्ताद अलाउद्दीन खाँ साहब की बेटी, उस्ताद अली अकबर खाँ की बहन के साथ ही पंडित रविशंकर की पहली पत्नी अन्नपूर्णा देवी का परिचय ज्यादातर इतना ही है..... लेकिन वो इससे कहीं ज्यादा है..... फिर परिचय इतना ही क्यों है? क्योंकि वे इतना ही चाहती हैं..... अजीब है ना..... ? हाँ तो उनका हकीकत में परिचय पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, चंद्रकांत सरदेशमुख, आशीष खान, सुधीर फड़के और उन्हीं की तरह कई-कई संगीत के दिग्गजों की गुरु के रूप में दिया जाता हैं....., फिर भी वे न तो कंसर्ट देती है और न ही रिकॉर्डिंग करती हैं...... क्यों? ये उनका निर्णय है। वे कहती है कि संगीत मेरे ईश्वर के लिए है.... मेरे लिए है.....। बस यही वो बात है, जिसने मुझे लिखने के लिए मजबूर किया। एक तरफ प्रतिष्ठा और शोहरत के लिए कुछ भी कर गुजरने वाली इस दुनिया में खुद के वजूद को इस तरह ईश्वर के हवाले कर देने के पीछे का मनोविज्ञान क्या होगा?
स्वभाव की वो कौन-सी केमिस्ट्री है, व्यक्तित्व का वो कौन सा तार है जो उन्हें अपने स्थूल होने के प्रति इतनी अचल निस्संगता देता है और अपने हक़ीकी स्व के प्रति इतनी गहरी ईमानदार निष्ठा देता है? वो क्या है? जो किसी सपने, किसी ख़्वाहिश, किसी प्रलोभन से नहीं डोलता है? मान, प्रतिष्ठा, शोहरत, समृद्धि, प्रशंसा, महत्वाकांक्षा, सफलता, उपलब्धि हर चीज के प्रति इतनी ठोस निर्लिप्तता, अचल उदासीनता और निश्चल निस्संगता कैसे आती है? और वो कैसा मन है, जो इस दौड़ती भागती दुनिया के बीच भी वैसा ही अटल, वैसा ही निश्चल बना रह सकता है? क्या ये इस तरह का संतत्व...... अचीव किया जा सकता है, पाया जा सकता है? या वो बस स्वभाव होता है? क्या इतनी निर्द्वंद्वता कभी पाई जा सकती है? क्योंकि यही तो उस मंजिल तक पहुँचाती है, जिसे फ़कीरी कहते हैं...... सब होने से दूर.... सब पाने से अलग..... सब जीने से निस्संग..... बस इश्क-ए-हक़ीक़ी में गर्क होना.....। यही तो है ना जीवन का आनंद.......?

Friday, 4 June 2010

इत्तफ़ाकन जो हँस लिया हमने, इंतकामन उदास रहते हैं


ऐसा शायद होता ही होगा.... तभी तो उत्सव से जुड़ता है अवसाद। क्या होता होगा इसका मनोविज्ञान.....? क्यों होता है, ऐसा कि जमकर उत्सव मनाने के बाद समापन के साथ ही गाढ़ी-सी उदासी........ न जाने कहाँ से चुपके से आ जाती है.... करने लगती है चीरफाड़, उस सबकी, जिसे आपने जिया...... भोगा.......और किया....... पूछने लगती है सवाल कि क्यों किया ऐसा.......इस जीने से क्या मिल गया?
क्या खुद को सामूहिकता में बहा देने...... बिखेरने और फैला देने का प्रतिशोध होता है ये अवसाद..... क्योंकि उत्सव की कल्पना ही सामूहिकता से शुरू होती है। तो क्या अपने स्व को बहा देने के दुख से पैदा होता होगा अवसाद......। कहीं लगता है, कि ये सामूहिकता और व्यक्तिगतता के बीच का द्वंद्व या फिर..... भौतिकता और आध्यात्मिकता के बीच का तनाव तो नहीं है? क्योंकि अक्सर गहरी एकांतिकता में अनायास आ पहुँचे आनंद के क्षणों को जी लेने के बाद तो ऐसी कोई अवसादिक अनुभूति नहीं होती.....उसके बाद तो एक दिव्यता का एहसास होता है, तो फिर सामूहिकता के आनंद को जी लेने के बाद ऐसा क्यों होता है?
तो क्या यहाँ भी मामला भौतिक और आध्यात्मिक है.....? भौतिकता को जी लेने, भोग लेने के बाद रिक्तता का अहसास अवश्यंभावी है...... और आध्यात्मिकता के बाद खुद के थोड़ा और आगे बढ़ने....... कुछ और भरे होने..... कुछ ज्यादा भारी हो जाने का सुख.....? क्या भौतिकता रिक्त करती है और आध्यात्मिकता भरती है? तो फिर भौतिकता के प्रति इतना गहरा आग्रह क्यों होता है? तो इसका मतलब ये है कि हम सीधे-सीधे खुद से ही भाग रहे हैं...... अवसाद सिर्फ उन्हीं के लिए है जो स्व के प्रति आग्रही है..... वरना तो मजा ही सब कर्मों के मूल में है। फिर हमें ये वैसा क्यों नहीं रखता है..... हम क्यों उत्सव के बाद अवसादग्रस्त हो जाते हैं....? क्या ये ऐसा है ? – इत्तफ़ाकन जो हँस लिया हमने, इंतकामन उदास रहते हैं…..
कहीं गड़बड़ केमिस्ट्री में ही तो नहीं....?

Friday, 21 May 2010

लोकतंत्र के अप्स एंड डाउंस


शुक्रवार की शाम थी.... इंतजार के पहले दिन के मुहाने पर बैठे थे, अभी एक दिन और बाकी था। अपने एक जैसे रूटिन में सन्डे का इंतजार करते रहने के दौरान यूँ ही एक तुकबंदी रच डाली थी
सोम, मंगल खुमार
बुध, गुरु उतार
शुक्र, शनि इंतजार
तब कहीं आता है रविवार....
हाँ तो टीवी के सामने अपनी खाने की थाली लगी थी..... बालिका वधु का हमेशा की तरह ही अतार्किक उत्सुकता जगाने वाला अंत हुआ था। थाली में से दाल की कटोरी तो पहले ही अलग कर चुके थे, एक-एक कौर खाकर दोनों सब्जियों को भी रिजेक्ट कर चुके थे, आम के रस के साथ चपाती खाना.... च्च.... तो फिर चपाती किसके साथ खाएँ.... इसकी खोज करने के लिए किचन में पहुँचे तो दही नजर आया.... चीनी और पीसी इलायची डाल कर थाली में रखा..... समय को पुरी तरह से निचोड़ लेने के लिए टीवी के सामने बैठकर भी किताब हाथ में हुआ करती है, वो तब भी थी...... एनडीटीवी पर ब्रेक खत्म हो चुका था, हमारा सिर किताब में ही था कि श्योपुर का नाम सुनकर कान खड़े हुए..... किताब में बुकमार्क फँसाया और टीवी देखने लगे। रूबीना खान शापू मध्यप्रदेश में भूख की रिपोर्ट लेकर आई थी, वे श्योपुर में एक माँ से चर्चा कर रही थी, जो उसे बता रही थी कि वे अपने बच्चों को खाने में खरपतवार दे पाती है, क्योंकि उनके पास आलू खरीदने के भी पैसे नहीं है..... कौर गले में अटक गया और साँस सीने में.....हाथ का चम्मच चला-चला कर हमने दही की छाछ बना डाली थी। रिपोर्ट गुलज़ार की फिल्मों की तरह कभी फ्लैश बैक में 2008 में जाती तो कभी वर्तमान में आ जाती है, दो साल से हालात में कोई फर्क नहीं आया.... अपने शहर से उत्तर में श्योपुर, दक्षिण में खंडवा और पश्चिम में झाबुआ तक के 200 किमी के रेडियस में इस कदर भूख पसरी हुई है..... कहीं कुछ काँपा..... आँखों से कुछ पहले आँसू भी ठिठक गए..... छोटे-छोटे बच्चों की निकली हड्डियाँ और सूखे से चेहरे..... कहाँ पहुँचे हैं हम विकास करके.....?
रूबीना अब भोपाल में शाइनिंग इंडिया का नजारा दिखा रही थी.... हमारी रूकी हुई साँस फिर से चलने लगी, गले का कौर उतर गया, नहीं सब कुछ उतना बुरा भी नहीं है। उसने इस बात से अपनी रिपोर्ट का समापन किया कि – खाते-पीते मध्यमवर्ग को शर्म मगर नहीं आती.... उसी निश्छल बेबसी में हमने सवाल किया – आती है भाई बहुत आती है, लेकिन हम क्या कर सकते हैं......?
उसी बेचैनी में पतिदेव ने जवाब दिया – कुछ नहीं बस अपना टैक्स ईमानदारी से चुकाइए....
निश्छलता बाकी थी, अभी कल ही तो सवाल उठा कि हम कितना बचे हैं..... नहीं अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है...... अब भी कुछ बचे हुए हैं। फिर से एक बेतुका सवाल किया – हम तो ईमानदारी से अपना टैक्स भर रहे हैं, फिर भी तो बच्चे भूखे हैं।
सवाल करते ही सारी निश्छलता हवा हो गई...... खाँटी दुनियादारी सतह पर फैल गई..... जवाब जो पाना था – हमारे टैक्स चुकाने और बच्चों की भूख शांत होने के बीच बहुत सारे अप्स एंड डाउंस हैं...... हमारे लोकतंत्र के अप्स एंड डाउंस....
नहीं है क्या?