Wednesday, 26 January 2011

ये दुनिया ऊँटपटाँगा....


हम अपने पड़ोसी के कुत्तों और रेडियो दोनों से परेशान रहते हैं... दिन में जोर-जोर से रेडियो बजता है और रात में जोर-जोर से कुत्ते भौंकते हैं। मतलब दिन-रात की परेशानी... ड्रायवर इसलिए परेशान है कि वो गाड़ी साफ करता है और कुत्ते आसपास मँडराते हैं और गंदा कर देते हैं। वो थोड़ा है भी विशेष... महीने के बीच में ही घोषणा कर दी कि – बस अगले महीने और आपके साथ काम करूँगा... फिर मैं आपके साथ काम नहीं कर पाऊँगा।
लगा कि एकाएक बड़ी मुसीबत में आ फँसे। पूछा – क्यों भाई?
जवाब मिला – कुछ खास नहीं बस अब मैं ड्रायवरी करना ही नहीं चाहता।
एक बार और कुरेदा... तब भी जवाब वही मिला। हमारा ईगो भी ऐंठ में आ गया। ठीक है, डेढ़ महीना है, हम ही सीख लेंगे गाड़ी... थोड़ा ठंडा हुआ तो... ठीक है जैसे पहले जाते थे, वैसे ही जाएँगें, ऊँ..ह..ह शहर में ड्रायवरों की कोई कमी तो है नहीं...एक ढूँढों तो हजार मिलेंगे... साहब हो रहे हैं ड्रायवरी नहीं करेंगे तो क्या करेंगे... पढ़े लिखे हैं क्या कि कहीं और कोई और काम मिल जाएँगें... आदि-आदि...। शाम को घर पहुँचकर जो खबर सुनाई तो एक बार फिर धमक सुनाई दी। फिर वही सवाल, वही जवाब... मान लिया, भाई छोड़ेगा ही। तीन-चार दिन बाद जब हमारे ईगो की ऐंठन कम हुई तो फिर प्यार से फुसला कर पूछा। जवाब ने जैसे आसमान से गिरा दिया।
जवाब मिला – मैं छुट्टी नहीं ले पाता हूँ।
लेकिन हमने तो कभी आपको छुट्टी के लिए इंकार नहीं किया।
हाँ, लेकिन आप छुट्टी के पैसे नहीं काटते हैं ना, तो मैं छुट्टी नहीं ले पाता हूँ। राजेश और मैंने एक-दूसरे को चौंक कर देखा... इसका क्या? याद आया पिछले चार महीनों में अपनी बीमारी और पिता की मौत पर वह 15-15 दिनों की छुट्टी ले चुका था, उसे छुट्टी के पैसे देने के पीछे भी हमारी सोच कोई मानवतावादी या फिर सहानुभूतिपूर्ण नहीं थी। बस जो हमें मिलता है, हम उसे आगे बढ़ा रहे थे। मतलब हमारे अपने वर्क प्लेस से हमें भी साल भर में कुछ निश्चित छुट्टियाँ मिलती है, तो हमें लगा कि उसे भी कुछ तो मिलना ही चाहिए... बस... लेकिन... खैर...। प्रस्ताव राजेश की ओर से आया – ठीक है ऐसा करते हैं, जब भी आप छुट्टी लोगे हम उसका पैसा नहीं देंगे और सन-डे को यदि हमने बुलाया तो हम उसका पैसा देंगे, चलेगा...?
वो खुश... अब मैं काम कर सकता हूँ। चलिए एक बड़ी समस्या हल हुई। इस बीच गाड़ी चलाना सीख लेने की उसकी रट कम नहीं हुई और आखिरकार चलाना सीख ली... अब ये बात अलग है कि उसकी अनुपस्थिति में सड़क पर गाड़ी दौड़ाने का साहस अभी तक नहीं आ पाया है, हाँ उसके होते ही आत्मविश्वास आसमान पर होता है।
जनवरी गुजर रहा है। संस्थान में हर कोई कुछ-न-कुछ सूँघने की कोशिश कर रहा है। छोटी-से-छोटी घटना का एक ही निष्कर्ष निकलता है अपरेजल... क्यों नहीं भई आखिर अप्रैल जो आ रहा है।
घर से निकले ही थे कि साथी का फोन आया पिछले साल हुए अपरेजल को लेकर बहुत सारा असंतोष उँडेलने और इस बार भी यदि ठीक नहीं हुआ तो संस्थान को छोड़ देने की परोक्ष चेतावनी देते हुए उन्होंने ये जानने चाहा कि – छाप-तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाय के... अमीर खुसरो का ही है ना! मैं हिंदी के विकास पर एक राइट-अप तैयार कर रहा था।
हाँ, अमीर खुसरो का ही लिखा हुआ है।
ओके, थैंक्य यू... फोन काट दिया गया।
सिग्नल पर गाड़ी रूकी तो लगा कि ड्रायवर कुछ कहना चाह रहा है। उसने एक बार फिर झटका दिया – भाभीजी आपको और सरजी को ये लगता होगा ना कि मुझे बहुत कम समय के काम के लिए बहुत ज्यादा पैसा दिया जा रहा है?
जवाब ही नहीं सूझा... क्या दें, हड़बड़ाए... – अरे नहीं, हमारे पास काम ही इतना है क्या करें?
इसीलिए तो मैं चाह रहा था कि आप चलाना सीख लें, जरा-सा ही तो चलाना है। क्या है कि मुझे बड़ी शर्म आती है कि मैं इतना-सा काम करता हूँ और इतना पैसा लेता हूँ।
हम भी तब तक संभल गए – बल्कि तो यदि किसी दिन हम आपको दिन भर के लिए बुलाते हैं तो हमें लगता है कि आज दिन भर आपको परेशान किया।
जवाब मिला – उल्टा मुझे तो खुशी होती है, कि चलो आज के लिए आप जो देंगे उतना काम तो कम-से-कम आज मैंने किया...।
ये हैं हमारे ड्रायवर श्रीमान गोपाल कुशवाह... और एक ये हैं
नोटिस बोर्ड पर लगे नए नोटिस को पढ़ने के लिए लगातार लोगों का आना-जाना लगा हुआ था। थोड़ी भीड़ छँटी तो हम भी वहाँ पहुँचे। संस्थान के कर्मचारियों के लिए प्रबंधन ने निशुल्क योग प्रशिक्षण क्लासेस की व्यवस्था की है। ये ऐच्छिक है, आप चाहे तो काम के घंटों में से ही समय निकाल कर सीख सकते हैं। इस पर हमारे साथी की टिप्पणी थी – ये भी अच्छा है। योग सीख लो, अपनी शारीरिक क्षमता बढ़ाओ और फिर गधों की तरह यहाँ का काम करते जाओ...।
हमारी समझ में ये नहीं आया कि इस पर हँसे कि रोएँ....पड़ोसी ने फिर से ऊँची आवाज में अपना रेडियो चालू कर दिया है... इस बार कैलाश खैर गा रहे हैं – ये दुनिया ऊँटपटाँगा, कित्थे हत्थ तो कित्थे टाँगा..... चक दे फट्टे...
हमें लगा सही है... नहीं क्या?

Tuesday, 18 January 2011

स्वागतम् ऋतुराज...


तमाम दिमागी ख़लल, भौतिक व्यस्तताओं और दुनियावी उलझनों के बीच भी हमारी चेतना का कोई हिस्सा अपने ‘होने’ को न सिर्फ बचाए रखता है, बल्कि गाहे-ब-गाहे हमें ये अहसास भी कराता रहता है कि वो न सिर्फ है, बल्कि उसके होने से हमारे अंदर भी कुछ उसी की तरह का कुछ ‘अनूठा’ जिंदा है, हम उतने मशीनी हुए नहीं है, जितना हमने अपने आप को मान लिया है। तो इस सबके बीच हमारी चेतना ने पकड़ ही लिया है कि बसंत आ पहुँचा है...। यूँ भी ऋतुएँ अपने आने के लिए केलैंडर की मोहताज नहीं होती है, हमारी इंद्रियाँ ही उनके आने को चिह्न लेती हैं, सर्दी, गर्मी और बारिश को तो... लेकिन जब बसंत आता है तो उसका आगमन मन तक पहुँचता है।
मौसम की चपेट में आए शरीर ने आखिरकार मन-मस्तिष्क को राहत का सामान मुहैया करा ही दिया... शरीर बीमार है तो जाहिर है सारी वैचारिकता, संवेदनाएँ और भावनात्मकताओं से भी निजात है। सिरहाने राग मारवा में संतुर बज रहा है औऱ हमने खिड़की के सारे पर्दे चढ़ाकर शरीर को दर्द में डूबने के लिए आजाद कर दिया है, ताकि दिल-दिमाग भी थोड़ी फुर्सत पा लें। सुबह से दोपहर हो चली है और संतुर के साथ खिड़की के शीशों पर बसंत की धूप लगातार संगत कर रही है... परेशान होकर लिहाफ हटाया और उस शरारती धूप को अंदर आने के लिए रास्ता क्या दिया, वो पूरे कमरे में पसर गई... फिर क्या था, हमने भी खुद को उसमें डूबने के लिए छोड़ दिया। यादों की रहगुजर उभर आई और फुर्सत का आलम देखकर मन नॉस्टेल्जिक हो उठा।
ये तब की बात है जब ऋतुराज बसंत का नाम और चेहरा अलग-अलग हुआ करते थे। जानते तो थे कि बसंत नाम की कोई ऋतु होती है, लेकिन कब आती है, ये नहीं जानते थे, दूसरी तरफ जब आती थी तो लगता था कि हो न हो ये दिन कुछ अलग है। मतलब पीले पत्तों का झरना, नई कोंपलों का आना, हवा की हल्की खुनक, शाम का खुलापन, दिन का फैलना ये सब महसूस तो होता था, लेकिन ये बहुत बाद में जाना कि ये ही तो ऋतुराज है। परीक्षा के दिन हुआ करते थे, किताबें के बीच घिरे हुए पता नहीं क्या-क्या महसूस हुआ करता था। एक तो किताबों का नशा दूसरा मौसम का.... नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिले... यूँ लगता था कि दिन का कुछ कर डालें... क्या? ...
ये तो स्पष्ट नहीं था, लेकिन कुछ ऐसा कि दिन को तोड़-मरोड़ डालें या फिर कहीं छुपाकर ज़ेवरों के लॉकर में रख दें... या फिर विद्या की पत्तियों या फिर सूखे गुलाबों की तरह अपनी किताबों के पन्नों में रख दें... बस कुछ ऐसा करें कि ये दिन गुजरने नहीं पाएँ... यहीं रूक जाए, ठहर जाए हमें यूँ ही नशा देते रहें... यूँ ही मदहोश करते रहें.... ओ... बसंत....बसंत...बसंत... कितना खुशनुमा, कितना खूबसूरत, कितना नशीला...।
वो अब भी आया है... वो अब भी हमारे आसपास घट रहा है अब भी सूखे पत्ते वैसे ही झर रहे हैं, कोंपले वैसी ही फूट रही हैं, हवा में वैसा ही नशा है, शाम का खुलापन और दिन का फटना बदस्तूर है... उसी तरह से मदहोश करता, बहलाता, उकसाता, फुसलाता... लेकिन बस हम ही उससे अलग है, रूठे हुए, अलगाए हुए, उदासीन और निर्लिप्त... दुनियादार हुए पड़े हैं, बिना अहसास के, मशीन की तरह... जड़... लेकिन नहीं, उसका आना इतना नामालूम, इतना गैर-मामूली नहीं है कि हम उसे नजरअंदाज़ कर दें... तो .... स्वागतम् ऋतुराज...

Wednesday, 22 December 2010

बाबूजी धीरे चलना...


सुबह के क्रम के तहत अखबारों पर नजर डाली जा रही थी, खबरों को पढ़ने के दौरान तो इयरफोन लगाए ही जा सकते हैं। पास की कुर्सी पर आकर बैठे नए-नए भर्ती हुए रिपोर्टर ने हलो की, हमने भी गर्दन हिलाकर हलो कर दी और मशगूल हो गए अखबार देखने में...। थोड़ी देर बाद लगा कि शायद वो हमसे कुछ पूछ रहा है। हमने एक कान से फोन हटाया... – क्या सुन रही हैं मैम?
उसने सवाल किया तो बजाए जवाब देने के इयरफोन निकाल कर उसके हाथ में दे दिए। यूँ भी मजा तो खराब कर ही चुका था वह। गज़ल चल रही थी मुहब्बत करने वाले कम न होंगे... नहीं बेग़म अख़्तर नहीं मेंहदी हसन की आवाज में... अगर तू इत्तफ़ाकन मिल भी जाए... ये लाइन दोहराई जा रही थी। शायद तीन-चार दफा हो गया था, उसने धीरे से इयरफोन निकाल कर पूछा – कैसे सुन लेती हैं मैम आप इस तरह की चीजें? एक ही लाइन को कितनी देर से गाए चले जा रहे हैं हज़रत...।
हमने मुस्कुरा कर जवाब दिया सुकून मिलता है, डूबने का स्कोप होता है और... उसने तुरंत हमारी बात काटी – इतना समय किसके पास है?
हमने बहुत धीरज से अपने कंधे उचका दिए... गोयाकि उसकी बात एक नासमझ की बतकही हो... फिर खुद ही लगा पुरानी पीढ़ी के हो चले हैं, समय की कीमत ही नहीं जानते हैं, सच तो यह भी है कि दौड़ने की उम्र से आगे जा चुके हैं, फिर खुद को ठीक किया... नहीं, ये आज की पीढ़ी हैं, इन्हें न संगीत की समझ है ना शायरी की... हाँ शीला की जवानी या मुन्नी बदनाम हुई टाइप की चीजें ही इनके लिए ठीक है।
लेकिन ये समय का काँटा धँसा तो धँसा ही रह गया। शाम टीवी के आगे अपनी थाली लिए बैठे तो (कहा जाता है कि टीवी देखते हुए खाना नहीं खाना चाहिए, मोटे होने का डर बना रहता है, लेकिन समय का जुगाड़ कहाँ से करें? देखिए, हम भी कहने लगे कि समय कहाँ हैं?) दीपिका पादुकोण अपनी मनमोहिनी मुस्कान के साथ कहती दिखी - इंडिया को चाहिए सब कुछ लाइटनिंग फास्ट... लिजिए सब कुछ तेज गति से ही चाहिए...। ज्यादा सीसी और तेज पिकअप वाली गाड़ियाँ, तेज नेटवर्क वाली मोबाइल और इंटरनेट सर्विस, तेज गति की फिल्में औऱ संगीत, छोटे लेख और कहानियाँ, तेज घटनाक्रम वाले उपन्यास, जल्दी और ज्यादा नाम-दाम देने वाला रोजगार, जल्दी और तेज तरक्की देने वाली एमएनसी... सुपर फास्ट ट्रेनें, फास्ट फूड, तेज रफ्तार जेट और पता नहीं क्या-क्या... बस जिंदगी तेज दौड़ रही है, दौड़... दौड़... और बस दौड़... तेज दौड़... आखिर कहाँ जाना है इतना तेज दौड़कर, जानता तो कोई कुछ नहीं, लेकिन ‘आसमान गिरा’ की तर्ज पर सारे-के-सारे दौड़ रहे हैं... बचपन भर खरगोश और कछुए की कहानी पढ़ी-सुनी, लेकिन आजकल लगता है कछुआ होना गुनाह है, अपराध है, अभिशाप है... सोचकर ही मन कुछ खट्टा हो गया, लेकिन क्या धीमा जीवन इतना बुरा है? यदि ये इतना बुरा होता तो इटली के लेखक और फुटबॉलर कार्लो पेट्रिनी 1949 में स्लो मूवमेंट नहीं चलाते। इटली में मैकडोनल्ड्स के खिलाफ शुरू हुए इस मूवमेंट में स्लो फूड से लेकर स्लो पेरेंटिंग तक की बात कही गई है। आखिर सोचें कि जीना, महसूस करना तो लाइटनिंग फास्ट नहीं हो सकता है ना? पहली बारिश में रूखी-सूखी धरती पर नन्हीं-नन्हीं बूँदों के पदचाप से उठती धूल और सौंधी खुशबू को क्या लाइटनिंग फास्ट स्पीड से देखा और महसूस किया जा सकता है... सुबह के सूरज को धरती से आसमान की तरफ हौले-हौले जाते देखने की क्रिया तो तेज नहीं हो सकती है। फूलों का खिलना, शाम का ढलना, मौसम का बदलना ये सब आहिस्ता-आहिस्ता होने वाली घटनाएँ हैं, जब प्रकृति किसी किस्म की जल्दी में नहीं है तो फिर हमें क्यों होना चाहिए? धीरे-धीरे अपने आस-पास को जानना, जीना-निहारना, जज़्ब करना न सिर्फ अपने परिवेश को जानना है बल्कि अपने अंदर बीजारोपण करने जैसा है। आखिर तो जीवन जीने के लिए है, आऩंद लेने के लिए, महसूस करने, खुश होने औऱ खुश करने के लिए है ना...। मशीन की तरह तेज गति से ना तो जीवन का आनंद लिया जा सकता है और न ही कुछ महसूस किया जा सकता है तो फिर बाबूजी धीरे चलना...

Friday, 10 December 2010

मुक्ति की चाह... किससे और क्यों...?


बेतरह उलझन और कठिन सामाजिकता निबाहने का दौर तो गुजर गया, लेकिन पता नहीं क्यों कहीं कुछ अटका पड़ा हुआ है, तभी तो कुछ बेचैनी-सी है। लगातार देर रात तक जागने और सुबह जल्दी उठ जाने के बीच आज की सुबह कुछ सुकूनभरी थी... लंबे समय के बाद सुबह की दौड़-धूप से दूर निपट तनहाई... छुट्टी की सुबह हो और ऐसा अकेलापन हो तो और मन क्या चाहेगा, जबकि उसकी शिद्दत से जरूरत भी हो...सुबह गुनगुना उनींदापन और मीठी-महकती उदासी के बीच सामाजिक जीवन को जीने के दौरान उभरे अर्थहीनता के आइसबर्ग को दूर ढकेल दिया और जरा खुद के करीब आ बैठे। पिछली कई रातों से ऐसा हो रहा है कि गहरी नींद के बीच एक शब्द ‘मुक्ति’ लगातार एक ही जैसी आहट और आवृत्ति के साथ जहन पर तब तक दस्तक देता रहता है,... जब तक कि नींद न उचट जाए... नींद उचटने के बाद सवाल – किससे मुक्ति? कैसी मुक्ति? हर बार की तरह जवाब नहीं।
दाग़ के अशआर औऱ शुमोना की आवाज के साथ... होशो हवास ताब-ओ-तवां दाग़ जा चुके/ अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया... घुलने की चाहत जागी थी। एकाएक मुक्ति की गुत्थी सुलझती हुई नजर आई थी। अपने भौतिक और अभौतिक होने से मुक्ति की माँग... घुलने... बह जाने... कुछ न होने की चाह...। भौतिक होने के अहम औऱ अभौतिक होने की कभी-कभी बोझिल हो जाती प्यास से मुक्ति... उस बोझ से मुक्ति की चाहत, जो सामाजिकता औऱ व्यक्तिगतता की वजह से खुद पर लादा हुआ-सा महसूस होता है। भौतिक के अदृश्य हो जाने और अभौतिक के घुल जाने की आकांक्षा... जागा कि ‘हम’ होने से ‘न-कुछ’ हो जाए... अपनी अनुपस्थिति में देखें दुनिया को, असंपृक्त, निर्लिप्त और निस्संग होकर... देखें कि जो दुनिया हमारे होने पर ऐसी है, वो हमारे द्वारा छोड़े खाली स्थान के साथ कैसी होगी? महसूस करें कि खुद के ‘दिखने’ और ‘होने’ से अलग खुद का होना क्या है और कैसा है? जानें कि जो अब्सर्ड हमारे होते हैं, क्या वही अब्सर्ड हमारे न होते भी होता है, हो सकता है ... महसूस करें कि अपने ‘होने’ से मुक्त होने के बाद का ‘होना’ कैसे होता होगा? अपनी भौतिकता की कभी नर्म तो कभी गर्म होती अनुभूति के बिना कैसा लगता है? और अपने अभौतिक होने के अहम के गल जाने, तरल होकर बह जाने के बाद अपना ‘होना’ कैसा होता होगा? क्या ऐसा होना हो भी पाता है, या फिर ये बस एक न-पूरी होने वाली आकांक्षा ही है... या इसका होना वैसा होता होगा, जैसे गाढ़ी नींद....! लेकिन गाढ़ी नींद तो जागने तक होने वाली मौत होती है, जिसमें कोई चेतना नहीं होती है... यहाँ मामला अपने ‘न-होने’ की चेतना के बाद दुनियावी चेतना का है... ठोस स्व के पिघलने, गलने औऱ बह जाने के बाद न-कुछ होकर दुनिया के कारोबार को देखने और महसूस करने की नामुमकिन-सी इच्छा... क्यों है ये?

Sunday, 28 November 2010

यहाँ सादगी अश्लील शब्द और भूख गैर-जरूरी मसला है


शादियों का सिलसिला शुरू हो चला है और अपनी बहुत सीमित दुनिया में भी लोग ही बसते हैं तो उनके यहाँ होने वाले शादी-ब्याह में हम भी आमंत्रित होते हैं... फिर मजबूरी ही सही, निभानी तो है...। हर बार किसी औपचारिक सामाजिक आयोजन में जाने से पहले तीखी चिढ़ के साथ सवाल उठता है कि लोग ऐसे आयोजन करते क्यों हैं? और चलो करें... लेकिन हमें क्यों बुलाते हैं? इस तरह के आयोजनों में जाने से पहले की मानसिक ऊहापोह और अलमारी के रिजर्व हिस्से से निकली कीमती साड़ी की तरह की कीमती कृत्रिमता का बोझ चाहे कुछ घंटे ही सही, सहना तो होता ही है ना... ! बड़ी मुश्किल से आती शनिवार की शाम के होम होने की खबर तो पहले सी ही थी, उस पर हुई बारिश ने शाम के बेकार हो जाने की कसक को दोगुना कर दिया। शहर के सुदूर कोने में कम-से-कम 5 एकड़ में फैले उस मैरेज गार्डन तक पहुँचने के दौरान कितनी बार खूबसूरत शाम के यूँ जाया हो जाने की हूक उठी होगी, उसका कोई हिसाब नहीं था।
उस शादी की भव्यता का अहसास बाहर ही गाड़ियों की पार्किंग के दौरान हो रही अफरातफरी से लगाया जा चुका था। गार्डन में हल्की फुहारों से नम हुई कारपेट लॉन में पैर धँस रहे थे। गार्डन का आधा ही हिस्सा यूज हो रहा था और प्रवेश-द्वार से स्टेज ऐसा दिख रहा था, जैसे बहुत दूर कोई कठपुतली का खेल चल रहा हो।
शुरूआती औपचारिकता के बाद हमने देखने-विचारने के लिए एक कुर्सी पकड़ ली थी... आते-जाते जूस, पंच और चाय का आनंद उठाते लकदक कपड़ों, गहनों में घुमते-फिरते लोगों को देखते रहे। करीब 60 फुट चौड़े स्टेज पर दुल्हा-दुल्हन को आशीर्वाद देने के लिए कतार में खड़े लोगों को देखकर हँसी आई थी... यही शायद एकमात्र ऐसी जगह है जहाँ देने वाले कतार बनाकर खड़े हों... वो भी आशीर्वाद और बधाई जैसी अमूल्य चीज... यही दुनिया है...।
खाने में देशी-विदेशी सभी तरह के व्यंजनों के स्टॉल थे... कहीं पहुँच पाए, कहीं नहीं... पता नहीं ये थकान होती है, ऊब या फिर खाना खाने का असुविधाजनक तरीका... घर पहुँचकर जब दूध गर्म करती हूँ... हर बार सुनती हूँ कि – ‘शादियों में बैसाखीनंदन हो जाती हो...।’ बादाम का हलवा ले तो लिया, लेकिन उसकी सतह पर तैरते घी को देखकर दो चम्मच ही खाकर उसे डस्टबिन में डाल दिया... फिर अपराध बोध से भर गए... यहाँ हर कोई हमारी ही तरह हरेक नई चीज को चखने के लोभ में क्या ऐसा ही नहीं कर रहा होगा? तो क्या देश की 38 प्रतिशत आबादी की भूख केवल मीडिया की खबर है...? यहाँ देखकर तो ऐसा कतई नहीं लगता कि इस देश में भूख कोई मसला है, प्रश्न है...।
विधायक, सांसद और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ शहर के बड़े व्यापारी, उद्योगपतियों का आना-जाना चल रहा था, कीमती सूट-शेरवानी में मर्द और महँगी चौंधियाती साड़ियों और सोने-हीरे के जेवरों में सजी महिलाओं के देखकर यूँ ही एक विचार आया... कि जिस तरह नेता रैली, बंद, धरने, हड़ताल और जुलूस के माध्यम से अपना शक्ति-प्रदर्शन करते हैं, उसी तरह अमीर, शादियों में अपना शक्ति प्रदर्शन करते हैं... किसके यहाँ कौन वीआईपी गेस्ट आए... कितने स्टॉल थे, कितने लोग, मैन्यू में क्या नया और सजावट में क्या विशेष था... संक्षेप में शादी का बजट किसका कितना ज्यादा रहा... यहाँ शक्ति को संदर्भों में देखने की जरूरत है। कुल मिलाकर इस दौर में जिसके पास जो है, वो उसका प्रदर्शन करने को आतुर नजर आ रहा है, मामला चाहे सुंदर देह और चेहरे का हो, पैसे का, ताकत का या फिर बुद्धि का... यहाँ सादगी एक अश्लील शब्द, भूख-गरीबी गैर जरूरी प्रश्न है तो जाहिर है कि प्रदर्शन को एक स्थापित मूल्य होना होगा, हम लगातार असंवेदना... गैर-जिम्मेदारी और अ-मानवीयता की तरफ बढ़ रहे हैं... बस एक चुभती सिहरन दौड़ गई...।

Thursday, 25 November 2010

कुछ भी तो व्यर्थ नहीं...


कार्तिक की आखिरी शाम... आसमान पर बादलों की हल्की परतों के पीछे चाँद यूँ नजर आ रहा था, जैसे उसने भूरे-सफेद रंग का दुपट्टा डाल रखा हो... फिर हर दिन बादलों, फुहारों और बारिश के बीच निकलता रहा... अगहन में सर्दी की तरफ बढ़ते और सावन-सा आभास देते दिन... अखबार बताते हैं कि ये गुजरात में आए चक्रवात का असर है... देश में कहीं कुछ होता है तो असर हमें महसूस होता है, कभी हिमालय पर गिरी बर्फ से शहर ठिठुरने लगता है तो कभी दक्षिण में आए तूफान से यहाँ बरसात होती है। और इन सबके पीछे भी दुनिया के किसी सुदूर कोने में हुआ कोई प्राकृतिक परिवर्तन होता है, तो क्या पूरी सृष्टि... ये चर-अचर जगत किसी अदृश्य सूत्र, कोई तार... किसी तंतु... या फिर किसी तरंग से एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है? होगा ही तभी तो कहाँ क्या घटन-अघटन होता है और उसका असर कहाँ पड़ता दिखाई देता है, चाहे दिखाई दे या न दें... । ये बहुत सुक्ष्म परिवर्तन हैं और लगातार स्थूलता की तरफ बढ़ती हमारी दुनिया इन सुक्ष्म परिवर्तनों को देख तो क्या महसूस भी कर पाएगी... ? ... हम तो रोजमर्रा में हमारे आसपास होते बारीक और बड़े परिवर्तनों के प्रति ही अनजान होते हैं... या फिर उन्हें देखकर अनदेखा कर देते हैं, तो ये सृष्टि की विराटता में घटित होता है, जिसकी एक बूँद का 100 वाँ हिस्सा ही हम तक पहुँचता होगा।
कभी ये फितूर-सा रहा था कि अपने हर कर्म के अर्थ तक पहुँचें... लेकिन फिर वही... अपनी संवेदनाओं, समझ, समय और ज्ञान की सीमा आड़े आ गईं और धीरे-धीरे तेज रफ्तार जिंदगी का हिस्सा होते चले गए। फिर भूल ही गए कि यूँ हर चीज के होने का एक अर्थ है, उद्देश्य है, महत्व है, अब ये अलग बात है कि हमें वो नजर नहीं आता है।
फिर भी प्रवाह का हिस्सा होने के बाद भी जैसा बार-बार महसूस होता है, कि आकंठ डूबने के बाद भी हमारे अंदर कुछ ऐसा होता है, जो खुद को सूखा बचा लेता है.... पाता है तो वो हमें ‘वॉर्न’ करता रहता है कि दुनिया की हर चीज हम देखें ना देखें, महसूस करें ना करें हमें, हमारे जीवन, हमारे कर्म... अनुभव और आखिर में हमारे स्व को प्रभावित करता है... इस दृष्टि से हर साँस, हर घटना, अनुभूति, हर वो इंसान जो हमारे संपर्क में आता है... हमें कुछ सिखाता है... कुछ समझाता है... समृद्ध करता है, चाहे उसका होना... घटना क्षणिक क्यों न दिखता हो, उसकी प्रक्रिया बहुत लंबी और प्रभाव बहुत स्थायी होते हैं।
याद आते हैं... सिलिगुड़ी से दार्जिलिंग की यात्रा में मिले वे कॉलेज में पढ़ने वाले बच्चे... तीन दिन की यात्रा की थकान... सुबह से फिर ट्रेन का सफर... खाने का सामान खत्म और तेज भूख... हर स्टेशन पर खाने जैसे ‘खाने’ की तलाश... नहीं मिलने पर निराशा ... और फिर सामने आई पराँठें-सब्जी को वो प्लेट.... कहीं कौंधा था – इस दुनिया में हमारा लेना-देना स्थायी रहता है, किसी-न-किसी रूप में फिर से हमारे सामने होता है, समय और देश की सीमा के परे... चाहे अगले-पिछले जन्म पर विश्वास न हो, लेकिन ऐसे किसी समय में महसूस होता है, कि ये जो अजनबी हैं, जिनसे हम पहले कभी नहीं मिले... शायद कभी नहीं मिलेंगे, हमारे जीवन में किसी भी रूप में आए हैं तो इसका कोई सूत्र कोई सिरा कहीं न कहीं हमसे जुड़ा है, हमारे जीवन, हमारे अनुभव या फिर हमारे भूत-भविष्य से, न मानें फिर भी अगले-पिछले जन्म से भी जुड़ा हो सकता है... ये अलग बात है कि वो हमें नजर नहीं आता है। तो कहीं कुछ भी होना बेकार नहीं होता, चाहे वो बुरा हो... वो हर अनुभव, सुख-दुख, पीड़ा, घटना, परिवेश, सपने, चाहत, ठोकरें, उपलब्धि हो या फिर कोई इंसान... जो कुछ भी सकारात्मक या नकारात्मक होता है, घटता है... हरेक चीज का एक अर्थ होता है, यदि दुख होता है तो भी और सुख होता है तो भी... हमें समझाता है, बचकर चलना, डूबकर जीना सिखाता है... समृद्ध करता है, वक्ती उत्तेजना या टूटन के बाद भी हम खुद को कदम-दो-कदम आगे की ओर पाते हैं... खासतौर पर दुख... पीड़ा... वेदना.... क्योंकि जैसा कि धर्मवीर भारती ने लिखा है
सब बन जाते पूजा गीतों की कड़ियाँ
यही पीड़ा, यह कुंठा, ये शामें, ये घड़ियाँ
इनमें से क्या है
जिसका कोई अर्थ नहीं।
कुछ भी तो व्यर्थ नहीं

Wednesday, 10 November 2010

...और सुबह हो गई


ऐसा पहली ही बार हुआ, कि पता नहीं रात के किस वक्त नींद उचट गई और बहुत कोशिश करने, मनाने के बाद भी नहीं आई तो नहीं ही आई... बहुत देर तक करवटें बदल-बदल कर उसके आने का इंतजार करते रहे, लेकिन सब बेकार.... फिर अचानक गर्दन के नीचे आई बाँह ने समेट लिया और सिर को जिंदगी के धड़कते सीने पर टिका दिया.... थपकियों का दौर शुरू हुआ तो उस अँधेरे कमरे में दूधिया हँसी बिखर गई और सिरहाने पड़े रिमोट का बटन दबते ही एक बार फिर से मेंहदी हसन की ज़हनियत कमरे में फैल गई। रात के गहरे, अँधेरे सन्नाटे को चीर कर उनकी गाढ़ी, उदास आवाज फैल गई.... मैं खयाल हूँ किसी और का मुझे चाहता कोई और है... समय तो भैरवी का नहीं था, लेकिन गज़ल उसी थाट में थीं। खैर शास्त्रीयता उतनी ही अच्छी है, जितनी हमारे आनंद में बाधा न दे, तो समय-वमय के बंधन को झटक दिया और डूब गए, उस गज़ल के आलोक में। .... मैं किसी के दस्ते-तलब में हूँ तो किसी के हर्फे दुआ में हूँ, मैं नसीब हूँ किसी और का, मुझे माँगता कोई और है.... सुनते ही सारे अहसास झर गए... अँधेरे में रात के पहरों का तो खैर कोई हिसाब रहा ही नहीं, सारी ख़लिश, चुभन, जलन और तपन कहीं गल गई, बह गई, खालिस ‘होना’ भी कहीं नहीं रहा, बस धुआँ-धुआँ सा अहसास रह गया।
एक हसरत जागी कि काश जिंदगी यूँ ही गुजर जाए... एक गज़ल... एक धड़कता दिल और थपकियाँ देती हथेली... धुआँ-धुआँ अहसास और गहरा नशा.... मूँदी आँखें और.... बस.....न आगे कुछ न पीछे.... न कमी और न ख़्वाहिश, कोई उम्मीद, कोई सपना, कोई चाहत नहीं....यही और इतना ही आनंद... गहरे जाकर खुद को छोड़ देने का नशा और उपलब्धि... उतना मुश्किल भी नहीं है, लेकिन आसान भी कहाँ है? इस एहसास को पीते रहे, जीते रहे... लेकिन न तो जिंदगी कहीं ठहरती है और न ही वक्त... हम चाहे देखें ना देखें वह बस चलता रहता है... तो अँधेरे का गाढ़ापन थोड़ा कम हुआ.... खुली खिड़की से सुबह ही सिंदूरी आभा दाखिल होने लगी और आँखों के आगे दुनिया खुल गई.... नशे पर सुनहरी सुबह छा गई.... आँगन में अख़बार के गिरने की कसैली-सी आहट के साथ रात का नशीला जादू टूट गया... सुबह हो गई।

Sunday, 7 November 2010

रात की स्याहियों के हैं गहरे संदर्भ


किसी भी हालत में सुबह जल्दी उठने का संकल्प था, तो निभाना भी था। सुबह जब साढ़े छः बजे जगाए गए तो पलकों में इतनी सारी नींद थी कि वे खुलने को भी तैयार नहीं थीं... फिर भी कभी-कभी ही ऐसी मौज आती है तो उठना ही ठहरा। जब घर से बाहर निकले तो गली में रात के जले-अधजले पटाखों में से अपने लिए खुशी के कुछ क़तरे ढूँढते गरीब बच्चे नजर आए....। फिर दिवाली के प्रसाद की माँग करते दरवाजे-दरवाजे भटकते बच्चे और उनके माता-पिता दिखे.... दिखे, क्योंकि और कुछ नजरों के सामने था ही नहीं.... सारी चकाचौंध गुल हो चुकी है। दीपावली की रात चाँद की शीतलता को चुनौती देती रंगीन चौंधियाती रोशनी थी... और अगली ही सुनहरी सुबह इतना गहन अँधेरा... रोशनी का कारवाँ गुजर गया गुब़ार बचा हुआ है... खुमार उतरा है और उतार का दौर है... उन्माद के बैठते ही रोशनी का मुलम्मा उतर चुका था और जिंदगी अपनी कालिख के साथ मौजूद नजर आईं... ये कालिख पहले भी थीं, लेकिन उन्माद में दिखाई नहीं दी या फिर देख कर भी अनदेखा कर दिया... आखिर हम रोशनी... जगमग... और चकाचौंध की तरफ ही तो देखते, दौड़ते हैं और इसी की चाहत करते हैं।
क्यों नहीं... आखिर रोशनी से हमें सब तरह की सुविधा मुहैया जो होती है, तभी तो इसका गुणगान हमें मुफीद होता है, लेकिन अँधेरा...(!) अँधेरा... मतलब असुविधा... वो सब कुछ अँधेरे में समाहित है, जो प्राकृत है, दुख, पीड़ा, वेदना, त्रास, निराशा, अभाव... जिसे हम जीवन की नकारात्मकता कहते हैं, सब कुछ अँधेरे का हिस्सा है। और जाहिर है हम इसी से बचना चाहते हैं, क्योंकि अँधेरा हमें भागने की सहूलियत नहीं देता... बिजली गुल हो जाने के बाद कितनी बेचैनी होती है... क्योंकि वो हमसे दृश्य जगत की सारी सुविधा छिन लेता है... बँटने, भागने और बचने के सारे विकल्प, सारी सुविधा हमसे ले लेता है। हमें अपने अंदर के दलदल के साथ अकेला छोड़ देता है, वो हमें अंदर-बाहर के नर्क और कीच को सहने, देखने और भोगने को मजबूर करता है, भाग पाने के सारे रास्ते बंद कर देता है इसलिए वो क्रूर है।
हम रोशनी की तरफ भागते हैं... हम भागना चाहते हैं, सहना नहीं... जरा-मरा अँधेरा हुआ नहीं कि दीपावली की तरह जगर-मगर रोशनी कर डालते हैं। अँधेरे से बचते हैं, बचना चाहते हैं, उसे ‘अवाइड’ करना चाहते हैं, क्योंकि अँधेरा पलायन के रास्ते बंद कर देता है, और पलायन हमें सुरक्षा का अहसास देता है, लेकिन अँधेरे में तो सहना ही होता है, बस....। जबकि हकीकत में अँधेरा सृष्टि का पहला और अंतिम सत्य है... सृष्टि के पहले का सच है... ये अँधकार ... हर दिन सूरज निकलने और डूबने की कवायद करता है.... अँधेरा नहीं.... क्योंकि ये कहीं जाता ही नहीं है, वो तो बस होता है.... हम चाहे या न चाहे.... सूरज बस उसे छुपा देने का ‘पराक्रम’ ही कर पाता है, उससे ज्यादा करने की उसकी कुव्वत नहीं होती है। अंतरिक्ष और गर्भ का अँधेरा क्या कुछ नहीं कहता हैं…? दरअसल सृजन का क्रम और स्रोत अँधेरा ही है ... बिना पीड़ा और दुख के किसी भी तरह का सृजन संभव नहीं है... फिर भी हम अँधेरे से डरते हैं। तो जब हम अँधेरे से भागते हैं तो इसका मतलब है कि हम दुख, तकलीफ और पीड़ा से बचना चाहते हैं और प्रकारांतर से सृजन से बचते हैं, रोशनी से बचने और भागने की कोशिश करते हैं, जबकि बिना अँधेरे को भोगे न तो हमें उजाले का मतलब समझ में आएगा और न ही उसकी कद्र ही होगी... ठीक वैसे ही जैसे बिना भूख तृप्ति का मतलब समझ नहीं आता....।

Saturday, 30 October 2010

उमंग है तो अवसाद भी होगा


हर तरफ सफाई का दौर चल रहा है... सोचा थोड़ा अपने अंदर के जंक का भी कुछ करे, लेकिन बड़ी मुश्किल पेश आई... सामान हो तो छाँट कर अलग कर दें, लेकिन विचारों का क्या करें? कई सारे टहलते रहते हैं, किसी एक को पकड़ कर झाड़े-पोंछे तो दूसरा आ खड़ा होता है और इतनी जल्दी मचाता है कि पहले को छोड़ना पड़ता है... दूसरे को चमकाने की कवायद शुरू करें तो पहला निकल भागता है, उसके निकल भागने का अफसोस कर रहे होते हैं तो जो हाथ में होता है, उसके निकल जाने की भी सूरत निकल आती है... बस यही क्रम लगातार चल रहा है।... कुल मिलाकर बेचैनी...। अंदर-बाहर उत्सव का माहौल है, लेकिन कहीं गहरे... उमंग और उदासी के बीच छुपाछाई का खेल चल रहा है। आजकल संगीत का नशा रहता है... और इन दिनों एक ही सीडी स्थाई तौर पर बज रही है... मेंहदी हसन की... तो ‘बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी’ गज़ल चल रही थी और उसका अंतरा – उनकी आँखों ने खुदा जाने किया क्या जादू... के जादू को वो विस्तार दे रहे थे और उस विस्तार से उदासी का मीठा-मखमली जादू फैलता-गहराता जा रहा था।
मन की प्रकृति भी अजीब है, कल जिस बात को मान लिया था, आज उसी से विद्रोह कर बैठता है। ओशो के उद्धरण से समझा लिया था कि जिस तरह के प्रकृति के दूसरे कार्य-व्यापार का कोई उद्देश्य नहीं है, उसी तरह जीवन का भी कोई उद्देश्य नहीं है... लेकिन उस मीठी-मखमली उदासी के समंदर से जब बाहर आए तो जीवन के निरूद्देश्य और अर्थहीन होने का नमक हमारे साथ लौटा... अब फिर से वही कश्मकश है, यदि जीवन है तो फिर उसका कोई अर्थ तो होना ही है और यदि नहीं है तो फिर जीवन क्यों है? और इसी से उपजता है एक भयंकर सवाल... मृत्यु... ?
एक बार फिर चेतना इसके आसपास केंद्रीत होने लगी है... जब एक दिन मर जाना है तो फिर कुछ भी करने का हासिल क्या है? मरने के बाद क्या बचा रहेगा... जो भी बचेगा, उसका हमारे लिए क्या मतलब होगा? औऱ जब मतलब नहीं है तो फिर कुछ भी क्यों करें... ? हाँलाकि सच ये भी है कि कर्म करना हमारी मजबूरी है।
वही पुराने सवाल, जिनका कोई जवाब नहीं है... बेमौका है... उत्सव के बीच है ... खत्म होने से पहले ही अवसाद... यही धूप-छाँव है... यही अँधेरा-उजाला.... सुख-दुख... यही जीवन-मृत्यु... तो फिर उमंग-अवसाद भी सही...। आखिरकार तो नितांत विरोधी दिखती भावनाएँ... कहीं-न-कहीं एक दूसरे से गहरे जुड़ी हुई जो होती है.... नहीं...!

आखिर में – 100 पोस्ट पूरी होने पर वादे के मुताबिक मिला डिजिटल कैमरा, लेकिन त्योहार और व्यस्तता के बीच कहीं आना-जाना नहीं हो पा रहा है तो फोटो लेने की सूरत भी नहीं निकल पा रही है...

Saturday, 23 October 2010

ब्लॉग-शतक पूरा



ये ब्लॉग का 100 वाँ पीस है। एक साल 11 महीने और ठीक 2 दिन पहले शुरू किए ब्लॉग अस्तित्व की ये प्रगति कोई बहुत उत्साहजनक नहीं है, आखिर अब तक मात्र 100 पीस ही तो लिखे हैं। कहाँ तो सोचा था कि इसे नियमित लिखेंगे और कहाँ बहुत-बहुत दिनों तक इसमें कुछ पोस्ट ही नहीं हो पाता है। कारण साफ है, जब खुद को उलीच कर कुछ लाना होता है तो जो बाहर आता है, वो तो खदानों से निकले कच्चे हीरे की तरह होता है। फिर हम हीरा बनने की उस प्रक्रिया और समय से तो अनजान ही रहते हैं, लेकिन है तो वो निर्मिति का ही हिस्सा... उसे चमक और कीमत देने का परिश्रम और समय भी तो उसी में जुड़ता है, तो कच्चे हीरे को आकार और शक्ल देने में लगने वाला समय भी तो शामिल था। लब्बोलुआब यूँ है कि जब तक विचार पैदा हो और उसका प्रेशर इतना हो कि उसका बाहर आना किसी भी तरह रोका नहीं जा सके तभी लिखे जाने की सूरत बनती थी।
वैसे ब्लॉग शुरू करने के पीछे लक्ष्य सिर्फ हर दिन होने वाली घटनाओं को लेकर पैदा होने वाली उबलन को शब्द और आकार देना रहा था। शुरुआती कुछ पीस लिखने के बाद ही ये अहसास हो गया कि आमतौर पर ब्लॉग रायटर्स यही कर रहे हैं, फिर यहाँ तो समय और मन दोनों को साधने का दुःसाध्य कर्म करना भी आ जुड़ता था। और इस दौरान उस विषय पर इतना ज्यादा लिखा जा चुका होता था कि फिर अलग से कुछ और लिखने के लिए कुछ बचता ही नहीं था। तो फिर अस्तित्व को अपनी डायरी का रूप दे डाला। इसमें कहानी, कविता (जो कि मेरा माध्यम नहीं है, फिर भी), यात्रा संस्मरण सब कुछ को शामिल कर लिया। फिर पता नहीं कहाँ, कैसे इसका स्वर भीतर की ओर मुड़ गया। खैर ब्लॉग लिखने का उद्देश्य शुरुआती कुछ भी रहा हो, लेकिन लिखते-लिखते महसूस हुआ कि भीतर की तरफ जाते हुए इस लिखने का मतलब खुद के ज्यादा करीब जाना, खुद को जानना, समझना और अपने ‘भीतर’ को शक्ल देना रहा, इसलिए भी संख्या पर विचार क्यों किया जाए... लेकिन कुछ भी गणित से इतर कहीं हो पाया है?
तो आखिर शतक तक का सफर ऊबड़-खाबड़ तो कभी साफ-शफ़्फ़ाफ रास्तों से होता हुआ पूरा हो गया। इस सारे समय में कुछ और हुआ हो या न हुआ हो, अंदर की उलझनों को सुलझाने की स्थितियाँ तो बनी ही है, बेचैनी ने रास्ता पाया, छटपटाहट ने आकार... कहीं-कहीं तो इस बेचैनी का कारण भी हाथ आया... अब इस सारी प्रक्रिया में थोड़ी-बहुत तकलीफ और त्रास तो होना ही हुआ, लेकिन ज्यादातर तो ये खुद के नए सिरे से बनने का ही हिस्सा रहा। यूँ कहें कि लिखने से पहले ये जाना ही नहीं था कि – हम जान ही नहीं सकते हैं कि खुद को कह लेने में जितना हम देते हैं, उससे कहीं ज्यादा हम पाते हैं।
वैसे लिखना व्यावसायिक मजबूरी है, इसलिए सिलसिला तो बहुत दिनों से चल रहा था, लेकिन इस क्रम में दुनियावी मसले ही शामिल थे। अपने बीहड़ की तरफ ले जाते रास्ते से हमेशा कतरा कर निकलते रहे... इसलिए असल में व्यक्त होना कितना भरता और कितना खाली करता है, इस अनुभव से वंचित ही रहे, लेकिन जब व्यक्त होने का लक्ष्य लेकर चले तो खुद को पाते, सुलझाते, जानते, सहेजते, सहलाते और चकित होते चले गए। एक बार इस बीहड़ में उतरने का हौसला दिखाया तो धीरे-धीरे खज़ाने का रास्ता निकलता गया। अब कुछ पाना है तो मुश्किल भी होगी, दुख भी, असुविधा और त्रास भी होगा, पसीना और खून दोनों ही बहेगा... लेकिन जो मिलेगा, उसका सुख कहीं ज्यादा होगा। तो सफर कहाँ रूकेगा, इसका फिलहाल तो कोई अनुमान नहीं है। अपनी कश्ती को अपने ही समंदर में छोड़ दिया है... बस इस उम्मीद में कि कभी तो कोई मोती हाथ लगेगा.... आमीन....!

Sunday, 17 October 2010

चाँद गर धरती पे उतरा, देखकर डर जाओगे


हर बार मोबाइल के प्लेलिस्ट में गज़ल को शफल करते हुए दो-चार गज़लों के बाद या तो चुपके-चुपके रात दिन या फिर ये दिल ये पागल दिल मेरा बजने लगती... फिर से अपनी पसंद की गज़ल ढूँढते रहते, आखिर उस दिन म्यूजिक फॉर्मेट करने के दौरान इन दोनों गज़लों को डिलीट मार ही दिया। हाँलाकि हर बार इस बात के लिए डाँट पड़ती है कि – ये क्या बचपना है? खेल बना लिया है म्यूज़िक फॉर्मेट करने को... जितना डालती हो, सुन भी पाती हो... ? यूँ बात तो सही ही है, लेकिन क्या करें कि कम से काम चलता नहीं है!
शहद-शरद रात और अगले दिन की छुट्टी हो तो फिर रात को देर तक जिए जाने के लालच में दूर तक चले जा रहे थे। रात बहुत हो चुकी थी, ये वही सड़कें थीं जो दिन में बिल्कुल दूसरी होती है... शायद ये खुद भी अपने को पहचान नहीं पाती हो...। दिन में जो सड़कें बेहाल-परेशान होती है, वो ही रात को थोड़ी उदास, खूबसूरत और सौम्य हो जाती है, तो घूमने का मजा दोगुना हो जाता है। यूँ लगता है कि वो हमारा ही इंतजार कर रही है। दूर से कहीं से फिर से वही गज़ल ये दिल ये पागल दिल मेरा... उस वक्त अंतरा चल रहा था – एक अजनबी झोंके ने जब पूछा मेरे ग़म का सबब, सेहरा की भीगी रेत पर मैंने लिखा आवारगी... वहीं रूक गए, सरे राह डूबने-डूबने का सामान मिल गया। तो फिर उसे डिलीट क्यों किया था?
अबकी स्मृति की दराज़ खुल गई और बहुत सारी बेतरतीब चीज़ों के बीच अचानक से एक नामालूम-सी फिल्म का डायलॉग याद आ गया कि – सपने जब तक दिमाग में रहते हैं, तभी तक खूबसूरत होते हैं, हाथों में आते ही वे खत्म हो जाते हैं...।
इसका इंटरप्रिटेशन तो यूँ है कि सब कुछ जो आप चाहते हैं, यदि वो हासिल हो जाए तो फिर क्या जीना आसान हो जाता है। नहीं... सरासर नहीं... तब तो शायद जीना और भी मुश्किल हो जाता है, तो फिर... अभाव ही जिंदगी को पूरा करते हैं। यदि आप किसी चीज़ को शिद्दत से पसंद करते हैं तो फिर उससे दूरी बना कर ही खुश रहा जा सकता है। कई बार उसकी दूरी ही सब कुछ को खूबसूरत बनाती है फिर से एक शेर याद आया –
हर हँसी मंज़र से यारों फ़ासले क़ायम रखो
चाँद गर धरती पे उतरा देखकर डर जाओगे...
क्या ग़लत है?
यूँ तो बात यहाँ ख़त्म हुई, लेकिन चलते-चलते मौसम की बात – कई बार कुछ बदमाशियाँ बड़ी मीठी लगती है, अब देखिए ना क्वाँर की विदाई इस तरह बादलों की शरारत से हो तो क्या मीठा नहीं लगेगा... दशहरे की शुभकामना के साथ...

Sunday, 10 October 2010

जीवन के प्रवाह की रूकावट है लक्ष्य...!



महाकाल उत्सव के दौरान सोनल मानसिंह के ओड़िसी नृत्य का कार्यक्रम होना था और उसे देखने के लिए छुट्टी माँगी तो सुझाव आया कि -क्यों न कार्यक्रम की रिपोर्टिंग भी आप ही कर लें...!
पत्रकारिता के शुरुआती दिन थे, बाय लाइन का लालच और ग्लैमर दोनों ही था... डेस्क पर काम करने वालों को तो बाय लाइन का यूँ भी चांस नहीं था, तो उत्साह में हाँ कर दी। सावन के महीने में हर सोमवार को शास्त्रीय नृत्य और संगीत की महफिल की दावत महाकाल के दरबार में हुआ करती है। उज्जैन किसी जमाने में ग्वालियर रियासत का हिस्सा रहा, जहाँ सिंधियाओं ने शासन किया तो उत्तर वालों और दक्षिण वालों के महीने के हिसाब से यहाँ 30 दिन का सावन 45 दिन का हो जाता है (यूँ तो हर महीना ही)। तो कम-से-कम 6 सोमवार की दोहरी दावत...। बारिश होने के बीच भी समय पर पहुँच गए। ज्यादा लोग नहीं थे, अब शास्त्रीय नृत्य का कार्यक्रम था, लोग ज्यादा होंगे भी कैसे? कार्यक्रम शुरू हुआ तो सारी चेतना संचालक के बोलने पर ठहर गई, आखिर रिपोर्टिंग करनी है तो संगतकारों के नाम, प्रस्तुति का क्रम, ताल, राग सबका ही तो ध्यान रखना है... इसके साथ ही आस-पास पर भी नजर बनाए रखनी है, कोई उल्लेखनीय घटना... कहीं कुछ छूट नहीं जाए...तथ्य... तथ्य... और तथ्य...। दो घंटे लगभग बैठने के बाद भी डूबने का संयोग नहीं बन पाया, फिर बार-बार ध्यान घड़ी की तरफ... रिपोर्ट फाइल करने का समय, रिपोर्ट पहले एडिशन से जो जानी है। आखिर आधा कार्यक्रम छोड़कर ही उठना पड़ा...। जैसे गए थे, वैसे ही सूखे-साखे लौट आए। रिपोर्ट फाइल की... और सब खत्म...।
उसके बाद कई मौके आए रिपोर्टिंग के, लेकिन तौबा कर ली... आनंद और तथ्य दोनों साथ-साथ नहीं साध सकते... जो कर सकते हो, वे करें, यहाँ तो नहीं होने वाला। तब जाना कि जहाँ तथ्य हैं, वहाँ आनंद नहीं, वहाँ डूबना भी संभव नहीं है। ठीक जिंदगी की तरह... ये आज इसलिए याद आ रहा है कि एकाएक एक पत्रिका में ओशो को पढ़ा कि – ‘जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है, जिस तरह नदी और हवा के बहने, फूलों के खिलने, सुबह-शाम होने, चाँद-सूरज के निकलने, डूबने, छिप जाने, बादलों के आने-जाने-बरसने के साथ ही दूसरे जीवों के जीवन का भी अपना कोई लक्ष्य नहीं है, उसी तरह इंसान के जीवन का भी अपना कोई लक्ष्य नहीं है।’
ठीक है कहा जा सकता है कि इंसान इन सबसे अलग है, क्योंकि उसके पास दिमाग है, इसलिए उसके जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। लेकिन जरा ठहरें... और सोचें... क्या लक्ष्य जीवन के प्रवाह की रूकावट नहीं है। अपने जीवन को एक विशेष दिशा की तरफ ले जाना, उस प्रवाह को प्रभावित करना नहीं है? नहीं इसका ये कतई मतलब नहीं है कि हम कुछ भी नहीं करें... कुछ करने से तो निजात ही नहीं है, करने के लिए अभिशप्त जो ठहरे, लेकिन हम जो कुछ भी करें, उसे डूबकर, आनंद के साथ, शिद्दत से करें... क्षण को जिएँ... ठीक वैसे ही जैसे बिरजू महाराज के कथक को देखा... बिना ये जानें कि ताल क्या थी, संगतकार कौन थे, प्रस्तुति का क्रम क्या था और तोड़े कौन-से सुनाए... क्योंकि आनंद तो इसके बिना ही है, डूबना तो तभी हो सकता है ना, जब कोई सहारा न हो...। कुल मिलाकर यहाँ गीता अपने कर्म के सिद्धांत में खुलती है, हमने तो अभी तक कर्म के सिद्धांत को ऐसे ही जाना है, जो करें, इतनी शिद्दत से करें कि करना ही लक्ष्य हो जाए... मतलब फल की चिंता तक पहुँच ही न पाएँ, भविष्य का बोध ही गुम जाए... बस आज, अभी जो कर रहे हैं, वही रहे...।
इस विचार का एक सिरा फिर से एक प्रश्न से टकराता है – कला जीवन के लिए है या जीवन कला के लिए...? इस पर विचार करना बाकी है...!

Sunday, 3 October 2010

फिर मुझे प्यास के दरिया में उतारा जाए...


ज्यादातर तो दिल के पास ही रहती है पासबान-ए-अक्ल, लेकिन जब तनहा रह जाता है दिल तो पूछिए नहीं क्या कयामत आती है। मुक्त है मन और हम भी, हवा के प्रवाह की सवारी है और कण-कण खिरते और जाया होते जाने की चेतना भी, फिर से वही खींचतान... होने और होना चाहने की...। दिन-रात सब कुछ हवा पर सवार है, कब आते हैं और कब निकल जाते हैं, कुछ निशान ही नजर नहीं आते हैं। सब कुछ अपनी गति और जरूरत से हो रहा है, लेकिन कहीं कोई असंगति है, तभी तो कुछ भी पहुँच नहीं पा रहा है, वहाँ, जहाँ इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। शहद-शहद शरद की रातें पसरी पड़ी है, लेकिन ना जाने क्यों बार-बार क्वांर की तपन की हूक उठती है, यदि ये बाहर है तो अंतर कैसे अलग रह सकता है....! लेकिन ये आँच अंदर पहुँच नहीं पा रही है। पढ़ना, सुनना और जानना सब कुछ तो हो रहा है, लेकिन गुनना नहीं हो पा रहा है। विचार आते नहीं, आते तो ठहरते नहीं और ठहरते हैं तो पकते नहीं... कई बार अंबार होता है, लेकिन वो भी बेकार ही लगता है... अब कच्चे-कच्चेपन में क्या तो स्वाद होगा और क्या गंध...! तो उसे वहीं छोड़ देते हैं, घुम-फिरकर वहीं-वही..... बेचैनी है... सब कुछ तो है, लेकिन जो जगह बरसों तक छटपटाहट के कब्जे में रही उसके मुक्त होने से सबकुछ उलट-पुलट हो गया है, खालीपन उतर कर पसर गया... हर कहीं। आखिर मुक्ति को सह पाना भी आसान तो नहीं ही हैं ना! खुद को कई दफा उलीच लिया, कुछ मिलता ही नहीं है, बस हाथ आती है बेचैनी और डर.... दोनों का एक ही-सा सुर है। कहीं खत्म तो नहीं हो रहे हैं....चुक तो नहीं रहे हैं...? क्या वो समय आ गया है, जहाँ सवाल खत्म होने लगे हैं, सब कुछ को उसी तरह से स्वीकार कर रहे हैं, जैसाकि वो है? आखिर तो इतना सब करते हुए भी क्यों इस तरह का सन्नाटा है... क्यों इतनी खामोशी है....? संतुष्ट हैं और इस संतुष्टि से घबराहट है... क्यों है ये? खुद को हमेशा ही इस बेचैनी और छटपटाहट से आयडेंटिफाई किया है, तो ऐसा लगता है, जैसे आयडेंटिटी क्रायसिस की स्थिति में पहुँच गए हैं।
फिर से – रास आया नहीं तस्कीन का साहिल कोई
फिर मुझे प्यास के दरिया में उतारा जाए....

Wednesday, 15 September 2010

अध्यात्म... मतलब घर लौटना...!



फूलते काँस देखकर धक से रह गए... अभी तक बारिश का फेयरवेल तो हुआ नहीं, तो फिर प्रकृति ऐसे कैसे शरद का संकेत दे सकती है? लेकिन भूल गए कि प्रकृति को किसी नियम, अनुशासन, तर्क और अनुभवों में बाँधा नहीं जा सकता है, या तो ऐसा है कि उसका अपना अनुशासन है, जिस तक हमारी पहुँच नहीं है या फिर यूँ कहा जा सकता है कि वो हर नियम और अनुशासन से मुक्त है, स्वतंत्र औऱ स्वछंद है... यही सोचते हुए दफ्तर पहुँचे, पार्किंग से बिल्डिंग तक पहुँचते हुए ही महसूस हो गया कि चाहे भादौ चल रहा है, लेकिन क्वांर की आँच पहुँचने लगी है, हिरण तक को काला कर देने वाली धूप का सिलसिला शुरू होने वाला है और ये महज उसकी आहट है।
पहुँचते ही रिसेप्शन से सूचना मिली कि बुक स्टॉल से आपके लिए फोन था, आपने जो मँगवाया है, वो आ गया है।
ठीक है...
राजेश कई बार कह चुके हैं कि तुम्हें जो भी मैग्जिन पढ़नी है, वो तुम सब्सक्राइब क्यों नहीं कर लेती, बेकार में ऑफ रूट जाकर खरीदती हो... समय बर्बाद होता है। लेकिन पता नहीं क्या ऐसा है जो मुझे उस पर अमल करने से रोकता है। लौटते हुए बुक स्टॉल पर कई तरह की पत्रिकाएँ खरीदी... फिर नजर चली गई ओशो टाइम्स पर... ये भी दे दें। हर बार तो नहीं खरीदती हूँ, लेकिन कुछ चार-पाँच महीनों के बाद फिर इसे पढ़ने का मन हुआ।
इन पिछले महीनों में अखबारों के अतिरिक्त तथ्य, तर्क, न्यूज और व्यूव्ज, फिक्शन और रिसर्च, कहानी, कविता, ब्लॉग, अनूदित और ओरिजनल हर विधा को पढ़ने का क्रम चल रहा है, फिर भी लगता है कि कुछ ऐसा है जो छूटा हुआ है। लगातार विचार, तथ्य, तर्क और सूचनाएँ जमा करते-करते ऊब होने लगी थी, कुछ टेस्ट चेंज होना चाहिए... शायद यही वजह हो कि एक बार फिर ओशो टाइम्स... ऐसा हर बार थोड़े अनियत अंतराल से होता आ रहा है। आज जब इसके कारण ढूँढने बैठी तो स्मृतियों के साथ ही ‘भूत’ हुए एहसासों को भी खंगाला और पाया कि यायावरी अच्छी तो लगती है, लेकिन घर आखिरकार घर होता है। देश-विदेश घुमो, पहाड़, समुद्र, जंगल, खंडहर, इमारत, सड़कें, मॉल देखो लेकिन आखिरकार घर लौटने का जो अहसास है, वो इन सबसे अलग है, बहुत उत्साहित करने वाला, ऊष्मा और अपनेपन से भरा...। दुनिया भर की खूबसूरती एक तरफ और अपना घर एक तरफ...। यूँ ही तो नहीं कहा गया है कि अपना घर कैसा भी हो स्वर्ग होता है... सुरक्षित... ऊष्मा से भरपूर, सुविधाजनक और अपनेपन से लबरेज़... मतलब...! मतलब कि अध्यात्म को पढ़ना ठीक वैसा ही है, जैसे खूब सारी यायावरी के बाद अपने घर लौटना... अपने पहचाने परिवेश, अपनी दुनिया, अपने व्यक्तिगत सुख, शांति, सुविधा, सुरक्षा, गर्माहट और अपनेपन के दायरे में आ जाना... जानने के लिए घुमना जरूरी है तो मनन के लिए घर लौटना भी तो जरूरी है। अपने अंदर के महीन तंतुओं, रेशों... को देखना, समझना, सहलाना... पहचानना भी तो जरूरी है। वो सब जो प्रकृतितः इंसानों को हासिल है, लेकिन जिसे दुनिया की दौड़-भाग ने छीन लिया है, उस तक पहुँचना सुकून देता है, ठीक वैसे ही, जैसे लंबे सफ़र से घर लौटकर मिलता है... नहीं!

Sunday, 5 September 2010

कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण और मौला, मौला, मौला, मेरे मौला


10-12 दिन लंबे चले तनाव के खत्म होने के अगले ही दिन इत्तफाक से कृष्ण जन्माष्टमी की छुट्टी पड़ी, अब अखबार वालों को तो छुट्टी होती नहीं, लेकिन उस तनाव के दौरान की गई भाग-दौड़ के बाद शरीर को तो कम, मन को आराम की तलब ज्यादा महसूस हुई, फिर घर में तो छुट्टी थी ही, सो एक छुट्टी और...। सुबह नींद खुली तो आसपास का बिखरापन, बेतरतीबी नजर आई... सोचा छुट्टी का सदुपयोग किया जाए और लग गए... उसी बिखरेपन से मिली एक नायाब कैसेट... अवसर के अनुकूल वृंदावन... जन्माष्टमी, जसराज जी, वृंदावन और कृष्ण.... कैसेट चल रही थी थोड़ी देर बस ‘होने’ का मन करने लगा, सो काम बीच में छोड़कर आँखें मूँद ली। फिर काफी सारा काम समेट लिया गया था। कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण भोर ही मुख बोलो...कृष्ण, कृष्ण बोलो...। बहुत सारे साल वैष्णवी असहिष्णुता से चिढ़ की वजह से कृष्ण से भी अनबन रही, लेकिन समझदारी की दहलीज पर पहुँचते-पहुँचते जब कृष्ण के चरित्र को बहुत थोड़ा जाना तो उसकी दिव्यता और साधारणता दोनों ने ही आकर्षित किया... लगा कि ये क्षुद्रताएँ तो हमारी हैं, यदि कृष्ण हुए तो वे तो उन सबसे परे हैं... उनका हिंदू धर्म या फिर वैष्णव सम्प्रदाय से सूत भर भी नाता नहीं है, जयवंती तोड़ी का आखिरी हिस्सा कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण का जाप शुरू हो गया था... विज्ञान क्या कहता है पता नहीं, लेकिन आँखें मूँदे हुए महसूस हुआ कि शायद हमारी आत्मा ब्रह्म के गुरुत्वाकर्षण का शिकार हो गई है... तर्क और भावना से अलग, दिखाई देने वाली दुनिया से दूर कहीं ओर हैं और शायद हम हैं ही नहीं... राँझा, राँझा करती आपे राँझा होई... पहली बार हीर के इन शब्दों को परखा.... शायद यही वो पराकाष्ठा है, जिसे हीर ने पाया, वो उसे बनाए रख पाई, हम दुनियादार हैं, तो खट से अलग हो जाएँगें, लेकिन अभी है।
दोपहर के खाने के बाद किसी चैनल पर म्यूजिक का कोई प्रोग्राम देख रहे थे। एक लड़की गा रही थी... मौला, मौला, मौला मेरे मौला... दरारें-दरारें है माथे पे मौला, मरम्मत मुकद्दर की कर दो मौला... मेरे मौला.... दलेर मेंहदी जो जज थे उठ कर आए और तान मिलाई... फिर से मौला, मौला, मौला का वैसा ही जाप... फिर से वही अनुभव...।
लगा नहीं कि मौला और कृष्ण के जाप का कोई अलग-अलग असर होता होगा...? कोई भी जाप करो... असर एक-सा ही होता है, तो फिर ये जो झगड़े हैं, वो क्या हैं? नहीं ये सहिष्णुता का गान नहीं है, ये महज एक जिज्ञासा है... क्या ये असर संगीत का है? इसका जवाब धर्म के पास तो खैर है ही नहीं... जवाब या तो अध्यात्म दे सकता है या फिर विज्ञान...।

Thursday, 26 August 2010

जीवन की संजीवनी, छोटी-सी खुशी


हर बार ये निर्भरता अखरती थी, लेकिन बहुत ज्यादा असुविधा नहीं होने पर इसे नजरअंदाज कर दिया जाता रहा। यूँ कह लें एडजस्टमेंट करने की बजाए निर्भरता को चुन लिया था। कहीं आना-जाना हो तो ड्रायवर के भरोसे... ड्रायवर भी कर्तव्य परायण... बीमारी, समस्या और त्योहारों की एकाध छुट्टी के अतिरिक्त छुट्टी लेता नहीं, इसलिए भी गाड़ी सीखने के बारे में सोचा तो कई बार लेकिन हर बार तमाम तरह के बहाने बनाकर इस विचार को खारिज कर दिया। कभी ये सोचकर कि कहाँ जाकर सीखेंगे, कभी दोस्तों ने सुझाव दिया कि ड्रायवर ही सीखा देगा (अब चूँकि वो तो हर दिन ही आता है, इसलिए उससे तो कभी भी सीख ही लेंगे), समय कैसे मैनेज करेंगे, जरूरत क्या है, इस शहर में गाड़ी चलाना यूँ भी जोखिम भरा है, जब तक पीछे की सीट पर बैठो तभी तक आनंद है, ड्रायविंग कोई बहुत आनंददायक चीज नहीं है... आदि-आदि... तो लब्बोलुआब यूँ कि ड्रायविंग सीखने को टालते रहे। ड्रायवर कई बार गाड़ी सीखने के लिए कह चुका है... सिखाने की बात पर भी उसने हाँ कर दी, लेकिन समय तो आपको ही निकालना पड़ेगा... पुछल्ला जोड़ा ... अब यही तो गड़बड़ है... समय की ही तो किल्लत है (क्यों नहीं... ओबामा, मनमोहनसिंह, सोनिया गाँधी, अमिताभ बच्चन, शाहरूख खान, मुकेश-अनिल अंबानी और रतन टाटा के बाद हमारा ही तो नंबर है मसरूफ़ियत में...!)।
फिर एक दिन ड्रायवर ने डरते-डरते खुद ही पूछा – आपके ऑफिस के पीछे है एक कार ड्रायविंग स्कूल, क्या मैं उससे बात कर आऊँ?
सोचा चलो, शायद यही निमित्त हो और हाँ कर दी। शाम को पूरी तफ्सील के साथ वो हाजिर था। तो अगले ही दिन से सीखने का क्रम शुरू हुआ। पहले ही दिन स्टेयरिंग के कॉम्प्लीकेशन से मूड उखड़ गया... तीन दिन मन मार कर गए तो लगा कुछ-कुछ पकड़ा है, उसने चौथे दिन गियर, क्लच और एक्सीलरेटर सभी थमा दिए... भगवान एक साथ चार-चार चीजें कैसे संभाली जाएगी...? साथ में हिदायत ये भी कि सामने की तरफ तो ध्यान रखना ही है, पीछे से और दोनों तरफ से आती गाड़ियों का भी ध्यान रखना पड़ेगा... अरे... दो ही आँखें हैं और वो भी सामने की ओर... इतना सारा कैसे ध्यान रखेंगे? हर सुबह खुद को ठेलठाल कर ड्रायवर की सीट पर बैठाते और जैसे ही उतरते तो यूँ लगता जैसे नर्क से बाहर आ गए हैं... अभी तो ब्रेक का किस्सा बाकी था। हफ्ते भर बाद उसने ब्रेक भी थमा दिया, एक और का इजाफा... सुनसान में तो गाड़ी दौड़ा लो, लेकिन जरा भी भीड़ नजर आई कि हाथ-पैर फूलने लगते, वो जब ब्रेक लगाने को कहता, गाड़ी रूकती औऱ बंद हो जाती .... फिर वही कवायद... लेकिन पहले गियर में एक्सीलरेटर दबाओ तो गाड़ी बंद... फिर घबराहट। हर दिन सिखाने वाला ड्रायवर से पूछता, प्रेक्टिस कराई?
तो धीरे-धीरे गाड़ी चलाना शुरू किया। ड्रायवर हिदायत देता जाता और हम उस पर अमल करते जाते... यहाँ एक अच्छी बात है कि यदि सीखना हो तो पूरी तरह से जिज्ञासु विद्यार्थी हो जाते हैं, तो गाड़ी चलाते जाते और ड्रायवर से पूछते जाते...। उस दिन बिना ड्रायवर की हिदायत के चौथे गियर में गाड़ी चला रहे थे और ब्रेक लगाने की जरूरत लगी तो तुरंत ब्रेक ठोंका, गाड़ी पहले गियर में डाली और आगे बढ़ा ली... आश्चर्य गाड़ी बंद नहीं हुई... खुशी इतनी कि हमारे साथ-साथ गाड़ी भी लहराई... इतना सारा लिखने के पीछे का सबक बड़ा अहम है कि इस बेहद मामूली-सी उपलब्धि ने खुशी का अहसास कराया ... और इस अहसास को हमने दर्ज भी किया (क्योंकि ये अहसास होता तो रहा ही है, लेकिन कभी उस तरह से पकड़ा नहीं) कि पाना दरअसल हमेशा कुछ बड़ा, भौतिक, सार्वजनिक या ऐसा नहीं होता है, जिससे रातों-रात जिंदगी बदल जाती है, फिर ऐसा हर दिन नहीं होता है, हर दिन पाने का एहसास छोटी-छोटी चीजों से होता है। छोटा-छोटा कुछ सीखना, छोटी-मोटी खुशियाँ बस इतना ही पाना है और यही है खुशी... शायद यही जीवन के लिए संजीवनी भी है।
बहुत दिनों पहले उठे सवाल कि ‘पाना क्या है?’ का लगे हाथों जवाब भी मिला... हर वो चीज जो आपमें कुछ ‘एड’ करती हो, पाना है। ये आपके हाथ से बनी स्वादिष्ट दाल से लेकर कोई अच्छी लिखी कहानी तक, किचन में किए गए नए प्रयोग के सफल होने से लेकर किसी नए और खूबसूरत विचार के पैदा होने तक, किसी अच्छी किताब को पढ़ने से लेकर गाड़ी चलाना सीख लेने तक, किसी दोस्त की परेशानी में उसे राहत देने वाली राय देने से लेकर दुनिया के किसी कोने में पैदा हुए किसी विचार को महज जान लेने तक... या फिर किसी खूबसूरत बंदिश को सुनने और किसी सरल से गाने को ठीकठाक सुर के साथ गा लेने जैसी बेहद मामूली और छोटी-छोटी चीजें पाने के दायरे में आती है, तो फिर जीवंतता के साथ जीने के लिए हर दिन कुछ छोटा-छोटा सीख कर जीवन को सरस करने का नुस्खा मजेदार नहीं है...?

Monday, 16 August 2010

छोड़ो कल की बातें...


स्वतंत्रता दिवस का हैंग ओवर उतर चुका है... हम फिर से वही हो गए हैं और इस बात से बहुत राहत हुई है। क्योंकि अभिनय... आखिर अभिनय ही हो है... चाहे वह कृत्रिम रूप पैदा हुई भावनाएँ ही क्यों न हो...? तो एक बार फिर अपने खालिस रूप में आ खड़े हुए हैं, वैसे ही निस्संग, उदासीन और आत्म-केंद्रीत... यही तो हैं हम... वो तो एक उबाल था... उस दौरान एक तो बारिश नहीं हो रही है, उस पर दो दिन से लगातार देशभक्ति की बातें, गाने और इतिहास के गौरव-गान को सुन-सुनकर पकने लगे थे। हर साल इन दो और गणतंत्र दिवस के दो दिन यही सब कुछ चलता है… कभी कोई खिलाड़ी किसी खेल में विदेश में जाकर देश का झंडा गाड़ आता है, तब भी भावनाओं का ऐसा ही उबाल देखने में आता है। कारगिल युद्ध के समय भी ऐसा ही कुछ हुआ था। 62, 65 और 71 के युद्धों में भी ऐसा ही कुछ हुआ होगा... कभी-कभी आज पर भी बातें हो जाती है, बाजार झंडों, बैनरों और तीन रंग के कपड़ों से पटा पड़ा है, राजनेता इसका उपयोग घोषणा करने और जनता पर उनके द्वारा (!) किए गए एहसानों का हिसाब दिखाने में करते हैं... अब तो इस कवायद में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, मॉल और शो-रूम भी कूद पड़े हैं... लगे हैं सारे 64 साल पहले मिली आज़ादी को आज भुनाने में... आज़ादी पर छूट के विज्ञापन दे रहे हैं, अखबारों के पन्ने काले हो रहे हैं, आज़ाद देश की उपलब्धियों और चुनौतियों के साथ इतिहास पर से धूल साफ करने में ... टीवी चैनलों के पास तो दिखाने की सीमा ही नहीं है, सेना का जीवन, विदेशों में भारतीयों द्वारा मनाए जा रहे आज़ादी के जश्न को दिखाने में... सेलिब्रिटी के लिए आज़ादी का मतलब (होता सब प्रायोजित है, लेकिन...) और स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास तो खैर है कि कबाड़े में कि जब चाहो तब धूल साफ कर चमकाओ और फिर दिखा दो... इन्हीं दिनों में बँटवारे की कड़वी यादें भी ताज़ा कर दी जाती है.... हाँ ये भी तो माध्यम हो सकता है कथित ‘देशभक्ति’ के ज्वार को उभारने में... हमारी देशभक्ति तो यूँ भी नकारात्मकता में ही पुष्पित-पल्लवित होती है... जब कोई दुश्मन-सा दिखे और हम उसे गाली दें... तब ही तो होंगे हम देशभक्त... पाकिस्तान के खिलाफ देखिए कैसे हम सारे एक हो जाते हैं और खुद को देशभक्त कहलाने लगते हैं? लगे रहते हैं, पाकिस्तान से अपनी तुलना करने में... कभी-कभी तो लगता है कि हमारी देशभक्ति भी सापेक्षिक है...बिना दुश्मन, बिना विपदा हमें कभी याद ही नहीं आता कि देश जैसी कोई शै भी है, जिसके प्रति हमारी जिम्मेदारी है... रेडियो तो खैर इन सबका अगुआ रहा ही है... इसमें फरमाइशी गानों के प्रोग्राम में सारी फरमाइशें भी तो देशभक्ति के गीतों की ही होती है... आखिरकार हमें देश याद ही इन दिनों आता है... तो सब तरफ आजादी की धूम नजर आ रही है और इस बात पर गहरी कोफ़्त हो रही है... तो सवाल ये उठता है कि कब तक हम प्रतीकों के माध्यम से अपनी देशभक्ति को परिभाषित करेंगे और न्यायसंगत ठहराएँगें? हर साल यही सब करते हैं और अगले दिन हम वही हो जाते हैं, हमारे कर्म, विचार और भावना में कहीं देश होता ही नहीं है। फिर देश क्या है, और देशभक्ति का मतलब क्या? हर साल हम एक रस्म निभा कर सोचते हैं कि देश के प्रति हमने अपना कर्तव्य पूरा किया... और अगले दिन हम वही हो जाते हैं, स्वार्थी, गैर-जिम्मेदार, असंवेदनशील और मक्कार...।
समय आ गया है कि हम शहीदों का पीछा छोड़े, छोड़ दें इसकी जुगाली करना कि उन्होंने इस देश का आज़ाद कराने के लिए क्या-क्या कुर्बानियाँ दी, इतिहास को विराम दे दें... शहीदों की कुर्बानियों के एवज में हम क्या कर सकते हैं, उस पर विचार करें, हम वर्तमान को कैसे खूबसूरत बनाएँ ताकि आने वाली पीढ़ी अपने इतिहास पर गर्व करें... कुछ भविष्य के लिए करें... कुछ आज को सुधारने के लिए करें....।

Saturday, 14 August 2010

मुट्ठी में बँधे सपनों का सच – 1




थर्ड सेम की क्लासेस शुरु हो चुकी थी। बारिश के ही दिन थे... कैंपस हरे रंग की पृष्ठभूमि पर चटख रंगों से बनी एक बड़ी-सी पैंटिंग-सा खूबसूरत और दिलफरेब नजर आ रहा था। आज का बकरा यूँ तो तय था... सुधीर... वो कल सीधे जेएनयू कैंपस से आया था, आज वो बदला हुआ दिख भी रहा था... लेकिन, उसे बकरा बनाने में मजा नहीं है... बस यही सोचकर कुछ उदासी थी और कुछ खलबली भी... कारण बहुत स्पष्ट था, उस बकरे को हलाल करने में क्या मजा जो अपनी गर्दन खुद ही हमारे छुरे के नीचे रख दें, तो आज इससे काम चलना नहीं था, इससे से न तो समोसे का स्वाद आएगा और न ही कॉफी से ताज़गी मिलेगी (अपना घोषित फंडा था, खुद पेमैंट करेंगे तो चाय और कोई दूसरा पिलाएगा तो कॉफी... चाय उन दिनों 3 रुपए की और कॉफी 5 की मिलती थी) तो हर हाल में किसी दूसरे को ढूँढना होगा। चौकड़ी बेर की झाड़ी के नीचे बने चबूतरे पर बैठकर अभी इस विचार पर मंथन कर ही रही थी कि दूर तक फैली हुई हरी-हरी घास के बीच की पगडंडी पर नींबू पीले रंग का टी-शर्ट पहने आता प्रभु नजर आ गया। बबली चिल्लाई ... हुर्रे बकरा... नजर गई और सभी के चेहरे खिल गए।
प्रभु के पास आते ही एक से बढ़कर एक तारीफ के शब्द उसे मिलने लगे... ये...!!! नई टी-शर्ट... या बहुत अच्छी लग रही है... या कितना अच्छा रंग पहना है प्रभु... या आज तो जम रहे हो.. उसने भी अपनी झेंपी-सी मुस्कुराहट चमकाई और सफाई दी – इट्स नॉट न्यू...। लहजा वही दक्षिण भारतीय... आय वोर इट ऑन वेलकम पार्टी ऑलरेडी...।
ऊँह... दैट डे वी डिड नॉट नोटिस दिस...।
कैंटीन बंद – चलताऊ हिंदी में उसने संकेत समझने के संकेत देने शुरू कर दिए।
दीप्ति ने कहा नहीं खुल गई है। थोड़ी बहुत खींचतान और नोंकझोंक के बाद बात बन गई... बननी ही थी। हर कोई जानता था कि यदि ये चौकड़ी पीछे पड़ जाएगी तो फिर कोई भी बच नहीं सकता है, तभी प्रोफेसर क्लास में जाते दिखे और सभा विसर्जित हो गई। शीत-युद्ध पढ़ाया जा रहा था, अभी तक हम तो यही समझे बैठे थे कि शीत-युद्ध विचारधारा की लड़ाई है और इसलिए सोवियत संघ और चीन दोनों एक ही खेमे में हैं, लेकिन उस दिन जो चैप्टर पढ़ाया जा रहा था, उसमें सोवियत संघ और चीन के बीच खऱाब रिश्तों पर बात हो रही थी।
जब सुधीर ने प्रोफेसर से सवाल किया कि यहाँ विचारधारा कहाँ हैं? यहाँ तो वर्चस्व और हित का संघर्ष है? तो ऐसा लगा जैसे टॉप गियर में चल रही गाड़ी पर एकाएक ब्रेक लग गया और गियर बदल नहीं पाने से वो खड़ी हो गई। खून का प्रवाह नीचे की ओर होता महसूस हुआ और, एक तीखी जलन नीचे से उपर तक दौड़ गई। इतना सादा सा सवाल सुधीर ने पूछा, हमारे अंदर क्यों नहीं आया? चाहे पूछें या ना पूछें... सवाल तो पैदा होना चाहिए ना! बस सारी केमिस्ट्री का कबाड़ा हो गया। कैंटीन में पहले चाय की ट्रे आई तो बेखुदी इतनी ज्यादा थी कि वो ही कप उठा लिया... रजनी फुसफुसाई भी कि चाय है, लेकिन फ्यूज पूरी तरह से उड़ चुका था। बस ऐसे ही कब और कैसे घर पहुँचे पता नहीं चला। पहुँच कर हर दिन की तरह कमरा बंद कर लिया। दिन अभी सुनहरा था, कब साँवला और फिर सुरमई हो गया पता नहीं चला, जबकि खिड़की से तकिया लगाए, गज़ल पर गज़ल सुनते शब्द और सुर के साथ आँसुओं में अवसाद को धोते रहे थे... खुद को समझाया था, इंसान हो... हो जाता है, हर वक्त इस तरह का तना-खींचापन क्यों? और फिर ये तो कोई बात नहीं ना कि किसी के भी अंदर उठा सवाल तुम्हारे अंदर भी पैदा होना चाहिए... धीरे-धीरे सब गुज़र गया...।

Thursday, 5 August 2010

शब्द व्यर्थ हैं, मगर शब्दातीत अर्थ है


अज्ञेय ने लिखा है – शब्द माना व्यर्थ हैं, इसीलिए कि इनमें शब्दातीत कुछ अर्थ है।
दुनिया तेजी से बदल रही है, शब्दों ने लंबा रास्ता तय किया... कहे गए, लिखे गए, छपे, फिर इनमें ध्वनि जुड़ी और अंत में दृश्य जुड़े... दृश्य जुड़ते ही शब्द सिहरने-काँपने लगे... अपने वजूद को लेकर आशंकित वे अपने संसार को समेटने लगे.... दृश्य लुभाते है, ध्वनियाँ डुबाती है, लेकिन शब्द... वे हमें जहाँ ले जाते हैं, वह बीहड़ है... हम वहाँ नहीं जाना चाहते हैं, क्योंकि बीहड़ को हम साध नहीं सकते हैं। ये चैतन्य है, गूँज देते हैं, लंबी... दूर तक.... साध लें तो साधू बना देते हैं। दृश्य का दौर है, शब्द पार्श्व में कहीं चले गए हैं। शब्द की सत्ता खतरे में है, तभी तो उनका जो जैसे चाहे वैसा उपयोग कर रहा है। खोखले हो चुके हैं, अर्थ खो चुके हैं, तभी तो इनकी व्यर्थता उभरती है और दृश्य महत्वपूर्ण हो उठते हैं। दृश्य जो कुंद करते हैं, पंगु बनाते हैं, ‘मैं’ को छीन लेते हैं उसे श्रीहीन बना देते हैं, फिर भी आकर्षित करते हैं। दृश्य अफीम की तरह सपनों की दुनिया देते हैं, लेकिन बदले में कल्पनाएँ हर लेते हैं। तभी तो कलम अब हथियार नहीं रही, फुटेज हथियार हो गए हैं। डिस्पोजेबल का दौर है... यही उपभोक्तावाद का सार भी...। जब तक उपयोगी है, है, जब उपयोग नहीं रहा, जंक...., लेकिन ये सब निर्जीव के साथ तो किया जा सकता है, चैतन्य के साथ नहीं किया जा सकता... दृश्य जब तक आकर्षक है तब तक ही देखे और दिखाए जा सकते हैं, जहाँ आकर्षण खत्म, दृश्यों का वजूद भी खत्म... शब्द लेकिन अपनी सत्ता के साथ कोई समझौता नहीं करते हैं, इसलिए वे हाशिए पर चले गए हैं।
तो एक बार फिर से अज्ञेय की शरण – शब्द तो व्यर्थ है
... लेकिन जब उनके शब्दातीत अर्थ उभरते हैं, तो फिर क्रांति होती है। तो माना कि आज उम्मीद नजर नहीं आती, लेकिन प्रकृति का चलन गोलाकार है, इसलिए एक दिन फिर से शब्दातीत अर्थ उभरेंगे.... हम आशान्वित हैं....