Saturday, 6 June 2009

बेटा ! तूने ये सब कहाँ से सीखा?

यूँ इसका पता तो तीन महीने पहले से ही हो गया था लेकिन उस शाम जब दफ्तर में घड़ी की टिकटिक के साथ हम कदमताल कर रहे थे और उसकी सुई को थामे रखने की एक बेकार सी कोशिश कर रहे थे....तभी मोबाइल फोन की रूनझुन ने किसी का मैसेज आने का संदेशा दिया...हरदम कंपनी के ही मैसेज देखने और उन्हें तुरंत डिलीट करने के चक्कर में हमने तुरंत ही फोन लपका और रीड मैसेज के ऑप्शन को आदतन यस कर दिया......मैसेज था....कहानी पढ़ी पसंद आई...कांग्रेट्स...जौकी.....। काम वहीं रूक गया मैसेज फिर से पढ़ा.....फिर-फिर पढ़ा.....। खुद को संयत किया....और लग गए काम पर।
एक और शनिवार की बेकार सी छुट्टी..... मम्मी के घर....अननोन नंबर के कॉल के लिए जसराज जी की सरगम बजी....राँग नंबर कहने की गरज से उठाया तो फोन मुरैना का था....संदेश था कि आपकी कहानी मौत की हमें बहुत पसंद आई और आज हमने इसका पाठ किया....वातावरण निर्माण गजब का था आपको बधाई.....मन में और....व अच्छा काम करने का उत्साह जागा....। तो संदेश तो बस इतना ही है कि जून के पाखी के अंक में मेरी पहली कहानी प्रकाशित हुई और इस पर सबसे अच्छा कमेंट मेरी 70 साला ताई मेरी मानस माँ ने दिया....तीन पन्ने की कहानी को कुछ समझते और कुछ ना समझते हुए भी पुरे धैर्य से पढ़ा फिर बहुत प्यार से सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा-- बेटा ! तूने ये सब कहाँ से सीखा?
खुद के भटकाव को दिशा मिलने की खुशी मात्र है जिसे मैं आप सबसे बाँटना चाह रही हूँ.....रूटिन से विचार और विचार से सृजन की ओर बढ़े पहले कदम के लिए दुआओं की आस के साथ.....।

Thursday, 4 June 2009

मीडिया की भाषा: औदात्य बनाम डगाल

तेज, तीखी गर्मी और झुलसाने.....जलाने वाली गर्मी के बाद भी नम, नाजुक और खुबसूरत फूल जो अहसास जगाते है वह है प्रकृति की उदारता....उसकी उदात्तता का.....बस अपने पेज पर उस फोटो का शीर्षक दे दिया प्रकृति का औदात्य....अगले दिन जब दफ्तर पहुँच कर अपना अखबार देखा तो शीर्षक बदल दिया गया था.....जैसा हमेशा अच्छे शीर्षकों के साथ होता आया है.....साथ ही शाम को शो-कॉज नोटिस की तरह कहा गया कि औदात्य शब्द को पाँच शब्दकोषों में देखा.... कहीं भी वह शब्द नजर नहीं आया आपके पास कहीं हो तो कृपया दिखाएँ.....। लगा पूरा पढ़ा-लिखा दाँव पर लग गया.....यूँ भाषा के मामले में ज्यादा रूढ़ हूँ। कोशिश रहती है कि जहाँ तक हो सके अंग्रेजी के शब्दों से परहेज करूँ....खासतौर पर जब मामला खबरों का हो.....इसलिए यह तय था कि औदात्य कहीं पढ़ा हुआ शब्द है....खैर आखिरकार वह शब्द अपने विस्तृत अर्थ के साथ मिल गया।
उसी दिन एक हार्ड न्यूज में एक शब्द का प्रयोग हुआ डगाल....इससे कुछ दिन पहले हमारे माली ने जो यूपी का है और नितांत खड़ी भाषा बोलता है यह पूछ कर शर्मिंदा कर दिया था कि भाभीजी आपके अखबार में किस तरह की भाषा लिखी जाती है ट्रक के टल्ले से एक की मौत....? ये टल्ले का क्या मतलब होता है? सो उस दिन हम उससे बचते रहे....अब पता नहीं उसने वह खबर पढ़ी नहीं या फिर यह मान लिया हो कि इस अखबार में तो इसी तरह की भाषा इस्तेमाल होती है.... हम शर्मिंदगी से बच गए। इस मामले में जब वरिष्ठों से चर्चा की तो जवाब मिला कि बड़े-बड़े संपादक अपने संपादकीय में बोली के शब्दों का उपयोग करते हैं। सवाल तो उठा कि क्या न्यूज और व्यूवज अलग-अलग नहीं है? खैर आजकल ज्यादा बहस करना बंद कर दिया है इसलिए चुप हो गए.....लेकिन चुप हो जाने से यदि सवाल उठना ही बंद हो जाते तो दुनिया वहीं की वहीं रहती आगे नहीं बढ़ पाती...।
सवाल तो उठा कि आखिर मीडिया की भाषा कैसी हो?
इस देश में जबकि हर 10 किमी पर बोली बदल जाती हो..... वहाँ तो यह सवाल उठना बहुत जरूरी और लाजिमी है। नहीं उठे तो हो आश्चर्य......। फिर जब बोली बदलती है तो तय है कि भाषा में भी देशज शब्दों का प्रवेश होगा। तो फिर किसी ऐसी भाषा की जरूरत और बढ़ जाती है जिसका सम्प्रेषण असीम हो..... क्योंकि बोली की सम्प्रेषणीयता तो ससीम होती है....( अब बवाल तो ससीम शब्द पर भी उठ सकता है, क्योंकि ये बहुत प्रचलित नहीं है, लेकिन यह अखबार नहीं है, इसलिए कोई डर नहीं है)। यह सही है कि चूँकि अखबार का विस्तार साहित्य से ज्यादा है तो इसकी भाषा सरल और आम बोलचाल में प्रयुक्त होने वाली ही हो....लेकिन इसके साथ क्या इसका स्वरूप मानक भाषा का नहीं होना चाहिए?
अब डगाल और टल्ला टाइप शब्द मप्र के मालवा के पठार क्षेत्र की बोली के शब्द है जो इस भौगोलिक भाग के आसपास के हिस्सों की बोली से प्रभावित है....लेकिन इसकी ग्राह्यता मालवी बोली के दो ही क्षेत्रों तक सीमित है....शेष जगहों के लिए अनजान....। तो फिर क्या अखबार और टीवी की भाषा मानक हिंदी नहीं होनी चाहिए?
कहने को तो और भी बहुत कुछ है, लेकिन हम तो समय के प्रति ससीम हैं।

Saturday, 30 May 2009

बिखरे-बिसरे लम्हों के सूत्र

कच्चे-पक्के से मूड के बीच आई अनचाही छुट्टी.... तेज गर्मी के दौर में बस मानसून का इंतजार चल रहा है। आसपास जब भी फुर्सत भरी नजरें फेंको तो प्रकृति उत्सव की तैयारी करती नजर आती है। आँगन का नीम कुरावन के दुसरे दौर की हवाओं में झूम रहा है। दो दिन पहले बित्ते भर का फुटबॉल लिली का खूँटा आज तनकर आँखें दिखाने लगा..... अशोक पर तरह-तरह के परिंदे आने जाने लगे हैं....इंतजार तो यहाँ भी है उस उल्लास का जो प्रकृति के औदार्य और औदात्य के उत्सव से महकेगा.... लेकिन फिलहाल तो रोहिणी की तपन अंदर भी है बाहर भी....। एक अनाकार, अ-लक्ष्य और अनाम-सी बेचैनी..... एक छटपटाहट..... कुछ नहीं कर पाने और कुछ नहीं 'हो' पाने की.... यूँ ये होना बाहरी नहीं है.... लेकिन... शायद इस बेचैनी का सार ही इससे उबरने की कोशिश में निहित है। सो समय का उपयोग अपने बाहर के बिखराव को समेटने में क्यों नहीं किया जाए? बस यही सोचकर सतह पर दिखने वाली अस्त-व्यस्तता को समेटने की कोशिश करने लगी... क्योंकि गहरे में जाकर समेटना यानी कई दिनों की कवायद को न्योतना.... इसी में मेरे हाथ उस दौर की डायरी लगी..... जब सारे आदर्श आकर्षित करते थे.... उनमें कई सारे सूत्र मिले कई तो नितांत व्यक्तिगत और बहुत सारे व्यवहारिक.....कुछ बहुत भावुक और कुछ खालिस बुद्धिजन्य......। बस यूँ ही उन्हें संभालने के उद्देश्य से यहाँ दर्ज कर रही हूँ।
कमियाँ ही जिंदा रखती है, पूरापन मार देता है, एक आसान और सुखद मौत

यदि भलाई करना आपकी मजबूरी है तो ही आप भले आदमी हैं

संस्कारों और विचारों के द्वंद्व से जो कुछ निकलता है वही आधुनिकता है

पैदल चलने से आत्मविश्वास बढ़ता है

किसी से खुशी बाँटने से हम उसे करीब महसूस करते हैं, और दुख हम उसी से बाँटते हैं जो हमारे करीब होता है

और ये सूत्र हाल ही का है
सफलता से इतिहास उपजता है और संघर्ष से साहित्य
आपके अनुभव इससे मिलते-जुलते नहीं है?

Thursday, 28 May 2009

अखबार क्यों पढ़े?

पिछले तीन महीनों में तीन-चार अखबार शुरू हुए और बंद कर दिए गए। आखिरकार यह निष्कर्ष निकाला गया कि आजकल हिंदी अखबारों में पढ़ने के लिए कुछ आता ही नहीं है.....एक वक्त था जब अखबार ब्रश करने जैसे अपरिहार्य हुआ करते थे....और विशिष्ट अखबार टूथपेस्ट का पसंदीदा ब्रांड हुआ करता था, जो बदलाव के लिए भी नहीं बदला जाता था, हाथ में आया तो सबसे aपूरा देखेंगे, फिर तय करेंगे कि फुर्सत मिलते ही आज क्या-क्या पढ़ना है....लेकिन अब तो अखबार सर्दी के दिनों का नहाना हो गया....पानी नहीं है नहाना नहीं हो सकता तो डियो-परफ्यूम से काम चल जाएगा....वो भी दिन भर....नहाना अगले दिन तक के लिए मुल्तवी......(पढ़ना तो खैर कई-कई दिन तक के लिए हो सकता है)....लेकिन नहाना तो अगले दिन पड़ेगा ही। हर दिन हर अखबार में एक-सी खबरें, एक-सा कंटेंट, एक जैसी उबाऊ भाषा और वैसा ही नीरस फॉर्मेट...कई बार तो शीर्षक भी एक से....यूँ लगता है जैसे अखबारों में काम करने वाले एक ही ढर्रे पर सोचते हैं....कुछ दिन पहले टीवी पत्रकार राजदीप सरदेसाई का इंटरव्यू पढ़ा जिसमें उन्होंने कहा था कि- 'उन्हें लगता है कि जो कहीं कुछ नहीं कर पाता है वह पत्रकारिता करने लगता है।' खुद भी उनमें से ही हूँ (ज्यादा समय नहीं बीता यह धारणा अध्यापन के लिए हुआ करती थी)...फिर खबरें भी वही जो पिछली शाम से रात तक टीवी पर पूरे विश्लेषण के साथ जान चुके हैं....यदि कुछ अलग होता है तो वो हैं कथित विजुअल्स, गोया अखबार नहीं चित्रकथा हो। जी हाँ यहाँ बात हिंदी अखबारों की हो रही है। अंग्रेजी अखबार तो अब भी हमारे रोल मॉडल है....यदि वे हिंदी फिल्मों के नामों और गानों के मुखड़ों का अपने शीर्षकों में उपयोग करें तो वे प्रयोग करते हैं और हिंदी अखबार करें तो वे पत्रकारिता का स्तर गिरा रहे हैं। वे शब्दों के एब्रिविएशनों का खबरों में उपयोग करते हैं और हम खुश होते है....वे शब्द कॉईन करते हैं हम उनका प्रयोग करते हैं, याद किजिए हिंदी में हमने हॉर्स-ट्रेडिंग और वाररूम (और भी ना जाने कितने शब्द है जो फिलहाल याद नहीं आ रहे हैं) जैसे कितने शब्द कॉईन किए? हम तर्क देते हैं कि जब वे हिंदी के शब्दों का उपयोग करते हैं तो फिर हम अंग्रेजी के शब्दों से परहेज क्यों करें.....? तब भी जब हमारे पास हिंदी के बेहतर शब्द हो......जिस थाली में खाएँ उसमें छेद क्यों नहीं कर सकते? अब कड़वा ही सही लेकिन है तो सच कि दैनिक अखबार खबरों के मामले में कुछ नया किसी भी सूरत में नहीं दे सकते हैं, क्योंकि टीवी इसके लिए सबसे तेज माध्यम है, तो फिर अखबारों की उपयोगिता क्या है? और उनमें भी किसी विशिष्ट अखबार की ही दरकार क्यों हो? फिर विचारों में ही क्या नया दे रहे हैं.....? हर दिन एक पन्ने में एक या दो घिसे-पिटे नामों के एक ही लीक पर चलते विचारों और शैली के एक या दो लेख और एक या दो संपादकीय.....किसी भी अखबार का संपादकीय उठा कर पढ़ लें.....डिस्कवरी चैनल के भूत-प्रेत या फिर पुर्नजन्म के घंटे भर के कार्यक्रम की तरह होते हैं......जो आखिर में आपको कोई दिशा नहीं देते.....ठीक वैसे ही हिंदी अखबारों के संपादकीय होते हैं.....शुरू से आखिर तक लीपापोती....... ठेठ जुगाली ......ओपिनियन-बिल्डिंग या दृष्टि-निर्माण जैसा कुछ नहीं मिलता.....। लेख देंखे तो कई बार लेखकों ने ऐसे विषयों पर लिखा होता है, जिनका उस विषय से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं होता है....अब इसे क्या कहें? फिर किसी लेखक का एक बार नाम हो तो उसके नाम पर ही लेख छप जाते हैं....फिर उसमें औसत जानकारी और विचार हो जिनमें कुछ भी नयापन नहीं होता है....तो कोई क्यों पढ़े? दरअसल अब अखबारों से रचनात्मकता..... प्रयोगशीलता...... मौलिकता.....वैचारिकता.....और बौद्धिकता का लोप हो गया है.....खासतौर पर हिंदी पत्रकारिता से.....। एक सर्वे के अनुसार पश्चिम में जहाँ इंटरनेट का प्रयोग होता है वहाँ अखबार बुरी हालत में हैं (खबर थोड़ी पुरानी है, लेकिन मौजूँ है), हाँ जिन देशों में अभी इंटरनेट का उपयोग इतना आम नहीं है वहाँ अखबारों का बाजार है, फिर आदत थोड़ी पुरानी है इसलिए छूटती नहीं है जालिम मुँह से लगी हुई वाला मामला भी तो है। यूँ तर्क तो यह भी दिया जाता है कि क्या करें पाठक ही ऐसा पसंद करते हैं....लेकिन तर्क देने वाले भी जानते हैं कि सच क्या है? एक समय था जब हिंदी फिल्मों के मामले में प्रबुद्ध और संवेदनशील दर्शक पूरी तरह से निराश हो चुका था.....प्रतिभाहीन टीम फूहड़ और बेहूदा फिल्में बनाती और दर्शक के टेस्ट का रोना रोती.....लेकिन समय बदला और आज युवा निर्देशक बेहतर फिल्में बना रहे हैं और उस पर तुर्रा ये कि ये फिल्में ना सिर्फ देखी जा रही है, बल्कि पसंद भी की जा रही है.... यूँ ये अच्छा-बुरा सब सापेक्षिक है.... लेकिन है तो ना....! कुछ दिन पहले एक पत्रकार को कहते सुना था कि दुनिया को थॉट्स नहीं आईडियाज चाहिए.....अब उन्हें कौन समझाए कि आईडियाज हवा में नहीं पैदा होते हैं....ये एक प्रक्रिया का परिणाम है (अब वे पत्रकार है तो गलत तो नहीं ही कह रहे होंगे)....नहीं तो अमेरिकी राजनीति में थिंक-टैंक की जगह आईडिया-टैंक होते। बिना थॉट के आईडिया पैदा करने की कुव्वत हो तो कर देखें.....। खैर तो अब इस सबमें अच्छा ये है कि हर सुबह दो अखबारों को 10-10 मिनट में निबटाते हैं और बचे हुए 70 मिनट में कुछ बेहतर पढ़ते हैं....इन कुछ दिनों में दो भारतीय भाषा के और एक विदेशी अनुवाद....एक आत्मकथा, एक वृहत उपन्यास के अतिरिक्त अनगिनत विचारोत्तेजक और शोधपरक लेख....कहानियाँ....संस्मरण और लघु उपन्यास पढ़ डाले हैं....। और यूँ भी नहीं कि सामयिकी से कटे हुए हैं। पता है कि देश के चुनावों में क्या हुआ है? श्रीलंका से लिट्टे का सफाया हो चुका है, लेकिन तमिल समस्या अभी भी बरकरार है..... पाकिस्तान में तालिबानों के खिलाफ कार्यवाही चल रही है और उस पर भारी अमेरिकी दबाव है....नेपाल में भी राजनीतिक संकट का दौर है। अमेरिका मंदी से जूझ रहा है, और ओबामा के आउटसोर्सिंग पर अपने चुनावी वादे को निभाने से बंगलूरू और पुणे पर कैसा संकट आएगा? विष्णु प्रभाकर और नईम नहीं रहे। दक्षिण अफ्रीका में आईपीएल चल रहा है। और भी बहुत कुछ.....तो फिर सवाल है कि दैनिक अखबार क्यों पढ़े?

Thursday, 14 May 2009

उलटी हो गई सब तदबीरें ...

ये महज इत्तेफाक ही है कि इस बार चुनाव से पहले ही विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने मतदान के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए प्रयास किए....और ऐन इसी चुनाव में एकाएक लगा कि मतदान प्रतिशत कम हो गया...मतदान के चार चक्र हो जाने के बाद पूरे देश से आए रूझान ये संकेत दे रहे हैं कि आम तौर पर राजनीति से आम आदमी का मोहभंग हो चुका है....बावजूद इसके कि युवा मतदाता बड़ी संख्या में जुड़ा था....इस बार न तो फिल्मी कलाकारों और चुनाव आयोग की अपील ने काम किया और न ही संगठनों के प्रयासों ने.....उल्टी हो गई सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया...मतदान प्रतिशत बढ़ने की बजाय कम ही हुआ...। इसे क्या कहेंगे....? लोकतंत्र के प्रति अरूचि या फिर राजनीति और राजनीतिक दलों के तरीकों, लटके-झटकों और उनकी विश्वसनीयता के प्रति संदेह ? अब तक के चुनावों में शायद नया जुड़ा मतदाता एकबारगी इस भुलावे का शिकार हो जाता हो....इस दौर का युवा इस भीड़ का हिस्सा होने के लिए कतई तैयार नजर नहीं आता है। यहाँ एक सवाल और उठता है और यह सवाल खतरनाक है कि क्या उदारीकरण के दौर ने युवाओं को राजनीतिक और सामाजिक सरोकारों से दूर कर दिया है? और यदि ऐसा है तो ये भारतीय राजनीति के एक और खराब दौर की शुरूआत होगी...यूँ भी ये दौर कोई ज्यादा आशा नहीं जगाता है। राजनीतिक दल इस दौर से उबरने के अस्थायी उपाय के तौर पर सितारों का सहारा ले रहे हैं। यूँ राजनीति में सितारों का उपयोग राजीव गाँधी ने एक स्पष्ट रणनीति के तहत किया था...लेकिन इस बार राजनीतिक दलों में सितारों को भुनाने की जिस तरह की होड़ रही वह अभूतपूर्व थी....पिछले कई चुनावों से लगातार नेताओं की चुनावी सभाओं और रैलियों में भी मतदाता की दिलचस्पी कम होती नजर आ रही है....ऐसे में फिल्म या फिर टीवी के सितारों के साथ ही लोक कलाकारों के कार्यक्रमों के माध्यम से भीड़ जुटाने का भी खूब उपक्रम हुआ। अब दलों को इस विषय पर भी सर्वे कराना चाहिए कि उस भीड़ में से कितने वोट में बदलते हैं और कितने उस विशिष्ट दल के वोट में? और सवाल तो यह भी उठता है कि आखिर ये सिलसिला चलेगा कब तक? यूँ नेता इस बार के कम मतदान के लिए मौसम को भी एक कारण बता रहे हैं....हम कह सकते हैं कि दिल के खुश रखने को गालिब ये खयाल अच्छा है। फिर भी सवाल अपनी जगह जिंदा है कि राजनीति में आम आदमी की उदासीनता और अरूचि के लगातार बढ़ने के पीछे क्या कारण रहे हैं? क्या अब वो समय नहीं आ गया है कि इसके पीछे छुपे कारणों का विश्लेषण किया जाए? और उन्हें दूर किया जाए नहीं तो भारतीय लोकतंत्र की दुर्दशा को रोका जाना मुश्किल हो जाएगा।

Wednesday, 29 April 2009

जब तवक्को ही उठ गई गालिब

मतदान के लिए फिल्म स्टार से लेकर स्वयं सेवी संगठन तक सभी अभियान चला रहे हैं....इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ कहा जा सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र की शुद्धता के लिए यह पर्याप्त है? 62 साला लोकतंत्र में ये दौर राजनीतिक उदासिनता का दौर है...इसमें एक आम आदमी राजनीति पर चर्चा तो करेगा...लेकिन उसकी रूचि यहीं तक रहेगी। अपने आस-पास ही कई लोग ऐसे हैं, जो यह कहते है कि वोट देने से क्या बदल जाएगा? आप उन्हें नहीं समझा सकते कि क्या बदलेगा? स्वतंत्रता के 62 साल यूँ राष्ट्र राज्य की दृष्टि से ज्यादा लंबा अरसा नहीं होता है, फिर भी इस छोटे से दौर ने हमसे हमारी राजनीतिक जागरूकता छीन ली, ऐसा क्यों हुआ क्या इस पर विचार करने का समय नहीं आ गया है?
बहुत पहले जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सार्थक चर्चाएँ हुआ करती थी, उस दौर में हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक नामवरसिंह से पूछा गया कि क्या हमारा लोकतंत्र इसलिए परिपक्व नहीं है कि हमारे यहाँ अशिक्षा ज्यादा है? तब उन्होंने कहा था कि---दरअसल हमारा लोकतंत्र तो जिंदा ही उन्हीं के दम पर है, पढ़ा-लिखा, शहरी तबका तो लोकतंत्र से कोसों दूर है....आज भी उस स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं आया है....और आए भी क्यों? इन बीते सालों में सकारात्मक बदलाव क्या आए हैं? उल्टे राजनीति का स्तर लगातार गिरता ही जा रहा है। उस पर राजनीति में अपराधियों के आ जाने से बची-खुची उम्मीद भी खत्म हो गई। हम वोट दें, लेकिन किसको? सब बुरों में से कम बुरे को? हमारी राजनीति विकल्पहीनता के दौर में पहुँच गई है....अब मताधिकार को कर्तव्य की तरह निभाना है, क्योंकि कोई उम्मीदवार ऐसा दिखाई नहीं देता, जिससे कोई भी उम्मीद हो.....बकौल गालिब-----
जब तवक्को
(उम्मीद) ही उठ गई गालिब, क्यूँ किसी का गिला करे कोई?
फिर भी राजनीति के हिमालय से गंगा निकालने के प्रयासों पर विराम ना लगे, इसलिए वोट दें.....।

Sunday, 26 April 2009

जैदी को सलाह

हमारे देश में मौलिकता का अकाल है....संविधान देखें तो उधार का थैला है....राजनीतिक व्यवस्था....अर्थव्यवस्था...शिक्षा से लेकर सिनेमा.....साहित्य....संगीत यहाँ तक कि प्रेम और घृणा की अभिव्यक्ति जैसे नितांत निजी मामले तक हमारे अपने नहीं है....ये हमारी पुरानी आदत है....खासतौर पर वैचारिक और रचनात्मक दुनिया में तो....हम इसे भेड़चाल कहते हैं। यह बीमारी अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से प्रचलित है। जैसे साहित्य में प्रभाव.....और सिनेमा, संगीत में प्रेरणा....हाँ मामला जूते फेंकने से जुड़ा हुआ है। ये हमारे वैचारिक, रचनात्मक और क्रियात्मक दिवालिएपन की पराकाष्ठा ही कही जाएगी कि हमारे पास विरोध करने तक का अपना तरीका नहीं है....हम विरोध करने के तरीके की भी नकल करते है...इराक में जैदी ने बुश पर जूता क्या फेंका.....हमारे यहाँ इसकी होड़ शुरू हो गई....यूँ हमारे देश में इसका पहला प्रयोग जरनैलसिंह ने किया था तो यह यहाँ उसका मौलिक प्रयोग है....फिर तो कारवां चल निकला....देश में हर दिन कहीं न कहीं से जूता चलने की खबर आती ही रहती है...ताजा जूता प्रधानमंत्री और पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी के नाम चले....इस मामले में प्रधानमंत्री थोड़ा पिछड़ गए....आडवाणी जी को तो पूरा जोड़ा ही मिला, लेकिन बेचारे मनमोहनसिंह को एक से ही संतोष करना पड़ रहा है। इस मामले में नवीन जिंदल की तो उड़की ही लग गई......वह तो राजनीति की युवा ब्रिगेड का नितांत लो-प्रोफाइल नाम है फिर भी साहब किस्मत देखिए कि जूता प्रतियोगिता में उनका भी नाम आ गया....खैर साहब जो भी हो हमें तो दिवालिएपन के लिए ईनाम मिलना चाहिए.....ऐसा वैसा नहीं, पहला....और पता नहीं जेल में जैदी कुछ कर रहा है या नहीं, लेकिन वहाँ उसे समय का सदुपयोग करते हुए, जूता फेंकने की कला पर एक किताब लिख देनी चाहिए और कहीं नहीं तो हिंदुस्तान में तो उसकी खूब बिक्री होगी....और हाँ अमेरिका में कोई इसका पेटेंट कराने की सोचे इससे पहले ही जैदी को पहली फुर्सत में जूता फेंकू कला का पेटेंट करा लेना चाहिए, बुश पर जूता फेंकने के बाद नौकरी से तो उसे निश्चित ही निकाल दिया होगा....तो इस पेटेंट से उसे खूब आमदनी होगी ...कम से कम हमारे देश से तो निश्चित ही....अब तक तो उसे खासा नुकसान भी हो चुका है.....खैर अब भी जाग जाए तो सवेरा दूर नहीं है.....आमीन....

Friday, 17 April 2009

उम्मीद की रोशनी

भारतीय राजनीति बहुत बुरे दौर में प्रवेश कर चुकी है। यहाँ बुरे दौर से गुजर रही है का उपयोग नहीं किया गया है, क्योंकि गुजरना शब्द एक उम्मीद पैदा करता है कि जल्द ही सब कुछ ठीक हो जाएगा...लेकिन इन हालात में क्या हम ये सपना भी देख सकते हैं?
लगातार खराब होते जा रहे राजनीतिक हालात में यह कहा जाना ही ज्यादा ठीक है कि भारतीय राजनीति बहुत बुरे दौर में प्रवेश कर चुकी है....। राजनीति में मूल्यों का लोप स्वतंत्रता के बाद से शुरू हुआ तो आज तक उसका नीचे जाना नहीं रूका....पता नहीं ये और कितना नीचे जाएगा.....? भारतीय राजनीति में पैसे और ताकत की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। इसके साथ ही हमारी विविधता, जिसके बारे में स्वतंत्रता के बाद के समाजशास्त्रियों ने मान लिया था कि लोकतंत्र के विकसित होते ही इसका प्रभाव कम होने लगेगा...लगातार बढ़ती ही जा रही है....राजनीति में हमारे यहाँ धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा और इसी तरह की अन्य कई तरह की विविधताएँ अब और ज्यादा मुखर हो गई है....इन सब ने हमारी व्यवस्था में दबाव और हित समूह का रूप ले लिया है। ऐसे में ये और ज्यादा ताकतवर हुए और लोकतंत्र की बुराई बनकर उभरे है और इसने लोकतंत्र की भावना को नुकसान ही पहुँचाया है...इससे धीरे-धीरे आम आदमी और पढ़ा-लिखा वर्ग राजनीति से दूरी बनाने लगा...और उस शून्य को भरने के लिए अपराधी किस्म के लोगों का जमघट होने लगा। सब तरह से नाउम्मीदी के इस दौर में मीरा सान्याल और मल्लिका साराभाई का राजनीति में प्रवेश उम्मीद की हल्की-सी रेखा के तौर पर दिखाई देने लगी है....। मल्लिका ने तो आडवाणी जैसे हाई प्रोफाईल नेता के खिलाफ चुनाव लड़ने का साहस दिखाया....जबकि हश्र वे भी जानती होंगी....फिर भी देश में राजनीति के प्रति दिखाई दे रही उदासीनता....हताशा और उपेक्षा के दौर में मीरा-मल्लिका की पहल की तारीफ की जानी चाहिए....और उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
ये विषयांतर है। हाल ही में मध्यकाल के हिंदी कवि ( ये खड़ी बोली के विकास के प्रारंभिक दौर के कवि रहे हैं) अमीर खुसरो की खुबसूरत लाईनें पढ़ी....आप भी मजा लें
खुसरो दरिया प्रेम का
सो उलटी वाकी चाल
जो उबरा सो डूब गया
जो डूबा सो पार
भाव साम्य आमंत्रित है.....याद रखना भी प्रयोजन है....।

Sunday, 12 April 2009

कलम पर भारी जैनी का जूता…..

उस प्रेस कांफ्रेंस में दैनिक जागरण के पत्रकार जरनैल सिंह ने गृहमंत्री पर जूता क्या फेंका देशभर के पत्रकार और कथित सभ्यतावादी लगे आलोचना करने....फिर टीवी चैनलों को तो एक बड़ा स्कूप मिल गया... लंबे समय से उन्हें खबरों की तलाश थी....जैनी ने तो चिदंबरम की तरफ एक ही जूता फेंका लेकिन टीवी पर तो इतने जूते पड़ते दिखाए गए कि बस....इसे पत्रकार के पेशे और उसके संयम की दुहाईयाँ भी दी जाने लगी...आखिरकार जरनैल सिंह मात्र एक पत्रकार ही तो है....इंसान नहीं...? तो उसे तो एक पैटर्न के अनुसार व्यवहार करना चाहिए ना.....! यह हंगामा उस समय नहीं हुआ जब जैदी ने बुश पर जूता फेंका था....शायद उसे दुसरे देश का मामला मान लिया गया था....लेकिन आज ये मामला हमारे देश का है।
इसे व्यवहार के तयशुदा मापदंडों के आधार पर तौलने की बजाय जैनी की मजबूरी के तौर पर देखा जाना चाहिए...एक पूरी की पूरी कौम की पीड़ा से उपजी बेबसी....और उस बेबसी का ये सात्विक विरोध....सोचिए जूते की जगह बंदूक भी हो सकती थी.....एक तरफ जहाँ जैदी का जूता एक देश की पीड़ा का प्रतीक है तो जैनी का जूता एक पूरी कौम की बेबसी का....जिन्हें एक पूरी कौम अपराधी मानती हो वे गवाहों के अभाव में निर्दोष सिद्ध हो जाए और पार्टी उन्हें टिकट भी दे दे तो फिर वह पीड़ित कौम क्या करे? जैनी के गुस्से को मजबूर गुस्से की सात्विक अभिव्यक्ति माना जाना चाहिए....औऱ फिर जो काम देश भर में हुए विरोध प्रदर्शन नहीं कर सका उसे एक जूते ने कर दिखाया.....अब हुआ ना जूता कलम से ज्यादा ताकतवर....जो काम जैनी के जूते ने किया क्या वह काम उसकी कलम कर सकी.....? हाँ इस कैटेगरी में राजबल और नवीन जिंदल मामले को नहीं लिया जा सकता है....

Thursday, 9 April 2009

क्या मंदी के माध्यम से अमेरिका देगा तीसरे विश्ययुद्ध की सौगात!

पिछले लगभग सवा साल से मंदी का भूत पुरी दुनिया की अर्थव्यस्था पर छाया हुआ है. वारेन बफे ने इसे १९३० की मंदी से भी बड़ा आर्थिक संकट बताया है. अकेले अमेरिका में जनवरी २००८ से सितम्बर तक हर माह औसतन ८४ हजार नौकरियां ख़त्म हुई. यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से वहां सबसे ज्यादा है. २० मार्च को अमेरिकी सरकार द्वारा जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में बेरोजगारी का प्रतिशत ८.१ हो गया है जो २५ सालों में सबसे ज्यादा है. फरवरी २००९ में ही ६ लाख ५१ हजार लोगों को नौकरियों से हटाया गया ओर वहां बेरोजगारों की कुल संख्या १२.५ मिलियन तक पहुँच गई है.
उधर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के आशंका व्यक्त की है कि वैश्विक बेरोजगारी का आंकडा २००७ की तुलना में ३० मिलियन हो जाएगा और यदि ये सिलसिला नहीं रुका तो यह बढ़ कर ५० मिलियन तक भी जा सकता है. सिर्फ़ अकेले अमेरिका में नवम्बर २००८ से लेकर फरवरी तक के ४ महीनों में २.५ मिलियन लोगों के नौकरियां छिन गई और ये बेरोजगारी ओद्योगिक उत्पादन के ढह जाने से हुआ है. और यह ज्यादातर देशों में हर साल १० प्रतिशत की दर से गिर रहा है.
आम आदमी इस मंदी को नौकरियों के छिन जाने और वेतन कटौती के सन्दर्भ में ही समझ पा रहा है, लेकिन इसके परिणाम और भी भयावह हो सकते है. इस सिलसिले में लन्दन से प्रकाशित पत्रिका इकोनोमिस्ट ने चेतावनी दी थी कि मंदी की वजह से बहुत सारे विकासशील देशों में सामाजिक अशांति की स्थिति बन सकती है, कुछ इससे मिलती-जुलती आशंका अमेरिकी गुप्तचर विभाग के नए प्रमुख डेनिस ब्लयेर ने भी व्यक्त की है. उन्होंने कहा है कि वैश्विक मंदी की वजह से होने वाली राजनीतिक हलचल से देश की सुरक्षा को खतरा बढ़ रहा है, उनकी चिंता आतंकवाद की है. लेकिन मार्च के अंतिम सप्ताह में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के निदेशक डोमिनिक स्ट्रास कोहेन ने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की बैठक से पहले जिनेवा में यह कह कर चौंका दिया कि-- दुनिया की आर्थिक स्थिति बहुत भयावह होती जा रही है और यदि इसे नहीं संभाला गया तो सामाजिक क्रांति और युद्ध भी भड़क सकता है. कोहेन ने कहा की इस संकट ने बहुत सारे देशों में नाटकीय रूप से बेरोजगारी बढाई है. यह सामाजिक शान्ति के साथ लोकतंत्र के लिए भी खतरा है और हो सकता है कि इसका अंत युद्ध में हो. इसी तरह जर्मनी के राष्ट्रपति और आई ऍम ऍफ़ के पूर्व प्रमुख होर्स्ट कोहलेर ने भी लगभग उसी समय स्ट्रास का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि आने वाले कुछ महीने बहुत मुश्किलों भरे होंगें. कहा जा सकता है कि ये तो बस शुरुआत है, जैसे-जैसे इस समस्या को सुलझाने के लिए प्रयास किए जा रहें है, वैसे-वैसे समस्या आर्थिक से आगे बढ़कर राजनीतिक और सामाजिक रूप लेती जा रहीं है, अमेरिका जैसे देशों की संरक्षणवादी नीतियों से फ्रांस इतना नाराज था की उसने मीटिंग से पहले जी-२० को छोड़ने तक की धमकी तक दे डाली थी. उधर मीटिंग से पहले लन्दन, फ्रांस और जर्मनी में इसके खिलाफ प्रदर्शन हुए... तरलता और संरक्षणवाद के बीच के संघर्ष ने भी स्थितियां बिगाड़ कर रख दी है..... इस बीच हंगरी के प्रधानमंत्री फेरेनक जय्रुस्कानी ने चेतावनी दी है कि आर्थिक संकट पूर्वी यूरोप को योरोपियन यूनियन से अलग कर एक लोह आवरण के रचना कर सकता है। लंदन में हुई जी-20 की बैठक के परिणाम यूँ तो बहुत उत्साहजनक बताए जा रहे हैं, लेकिन यदि हम इतिहास नहीं भूले हो तो शक बना रहता है....हमें भूलना भी नहीं चाहिए कि आईएमएफ सहित सभी तरह की अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ हमेशा से अमेरिका की पिछलग्गू रही है और आज भी इनसे ज्यादा की उम्मीद नहीं की जा सकती है.....और फिर बराक ओबामा का बाय अमेरिकन....उन कंपनियों को सब्सिडी देने की घोषणा करना जिनमें अमेरिकीयों को रोजगार दिया जाएगा....फिर अमेरिका की प्रतिष्ठित कंपनी एआईजी को भी भूला नहीं जा सकता जिसने बैल आउट के लिए मिले पैसे में से सवा आठ सौ करोड़ रु. अपने अधिकारियों को बोनस के रूप में बाँट दिए....क्या ऐसे में विकासशील देशों के पास विश्वास करने के लिए क्या कुछ बचता है....जब थोड़े से संकट में अमेरिका बचाव की मुद्रा में आ खड़ा हुआ है तो क्या उसकी नीयत पर शक किया जाना आश्चर्य पैदा करता है
एआईजी की घटना ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि दरअसल सरकारों की सारी कवायदें पूँजीपतियों को बचाने की है, उन लोगों की दुर्दशा पर ध्यान नहीं है, जिनकी नौकरियाँ जा रही है....और यदि उनके हाथों को काम दिया जाए तो शायद अर्थव्यवस्थाओं को उबारने में मदद मिले......और युद्ध तथा सामाजिक अशांति का खतरा भी कम हो।

Wednesday, 8 April 2009

नमस्ते.....

आखिरकार रोमन से देवनागरी पाने की यातना से मुक्ति मिल ही गई। यह सब कुछ संभव हुआ नवभारत टाईम्स में छपे अनुराग अन्वेषी के लेख से...। अभी इंस्क्रिप्ट की-बोर्ड पर गति आना बाकी है, फिर ब्लॉग लिखना ज्यादा नियमित हो पाएगा ऐसी खुद से उम्मीद है। एक राह पकड़ ली है मधुशाला मिल ही जाएगी। यदि आपमें से कोई भी मेरी तरह की समस्या से दो-चार हो रहा है तो मुझे मेल करें। यूँ कम्प्यूटर के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है फिर भी अन्वेषी का लेख मेल कर सकती हूँ। अन्वेषी जी जहाँ कहीं भी हो उन्हें धन्यवाद पहुँचे.....शेष शुभ

Wednesday, 25 March 2009

अनायास उसका आना....

प्यारी सूरत वालें सारे पत्थर दिल हो मुमकिन है
हम तो उस दिन राय देंगें जिस दिन धोखा खायेंगे.....
जी नहीं यह मेरा नहीं है यह तो हसरत जयपुरी का शेर है....खत्म होते दिन के सिरे का रात से गठबंधन कराती लम्बी सी गर्मी की शाम को..... अनायास ही अपने खजाने में से गुलाम अली की एक भूली बिसरी केसेट हाथ आ गई और शाम बन गई.... इस समय ना तो गुजरे दौर से शिकवा है ना आने वाले से कोई उम्मीद.....ना गुजरते को पकड़ने की चाहत हो....सफ़ेद से सांवले होते आसमान का एक टुकडा जो मेरी खिड़की पर छाया है....उसी को आंखों पर रख कर.....
वादे की शब खामोश फिजायें, दिल में खलिश वो आए ना आए
दर पे निगाहें लब पे दुआएं उफ़ री मोहब्बत हाय जवानी....
चल रही है गजल....इस समय ना कुछ पा लेने की ख्वाहिश है और ना कोई सपना है...ना कुछ पाने की खुशी है और ना कुछ छुट जाने का मलाल है....बस वक़्त के साथ बहते जाने का सुख है..... ये आनंद है....शब्द से परे....मौन...लगातार चकर-चकर करती जबान चुप है....मन हवाओं पर सवार है और वह भी इस अनायास आ पहुचें सुख का लुत्फ़ ले रहा है.... बड़े दिनों से बिसराए इस स्वाद ने आज फिर से जीने का अहसास दे दिया....वरना तो हर दिन एक मशीन सा आता और बिना अहसास के चला जाता है...शायद इसे ही हमारे आध्यात्म में आनंद कहा जाता है....जो ईश्वर का सा अनुभव कराता है....और आख़िर में मंजिलें गम से गुजरना तो है आसां है एक बार
इश्क है नाम ख़ुद अपने से गुजरने जाने का....
कुछ ऐसा ही हाल है इन दिनों.....बस

Monday, 23 March 2009

पाकिस्तान में लोकतंत्र और अमेरिका

लगभग २० दिनों से चल रही किताब 'डॉटर ऑफ़ ईस्ट' आखिर ख़त्म हुई. इस पुरे समय के दौरान जब मैं नहीं पढ़ रही होती थी तब भी बेनजीर मेरे साथ लगी रहती थी.....गहरी नींद में सपनों की तरह....अधूरी नींद में विचारों की तरह और जागते हुए चित्रों की तरह....यहाँ तक की पढ़ते हुए भी विचार और फ़िल्म चलती रहती थी....कहा जा सकता है कि बेनजीर के संघर्ष को पढ़ने के दौरान मैंने भी जिया है....दरअसल बेनजीर की आत्मकथा के बहाने ना सिर्फ़ उसके संघर्ष बल्कि पाकिस्तानी अवाम का लोकतंत्र के लिए संघर्ष की भी जानकारी मिलती है...ये महज इत्तेफाक ही है कि इन दिनों भी पाकिस्तान गहरे सियासी संकट से जूझ रहा है....और ये संकट भी उस देश की बदनसीब जनता को फिर वहीं ले जा रहा है, जहाँ से वह बड़ी मुश्किल से निकला है.....
लगभग महीने भर पहले जब अमेरिका ने 'गुड और बेड' तालिबानी का शोशा छोड़ा था तब यूँही विचार आया था कि कहीं ऐसा तो नही कि पाकिस्तान की सियासत का रिमोट क्षेत्र में अमेरिकी हितों से संचालित होता है....?
बस ये विचार यूँ ही आया था...लेकिन अपनी आत्मकथा में बेनजीर लगातार इसकी तस्दीक करती रहीं....शोध की भाषा में कह लें कि फिलहाल ये विचार एक 'हाइपोथीसिस' बन गया है। नहीं तो क्या कारण है कि ६२ साल की आजादी के बाद भी पाकिस्तान में कुल ४ ही निर्वाचित प्रधानमंत्री हुए...शेष समय फौजी तानाशाही रही...आखिर इस क्षेत्र में अमेरिकी रूचि क्या मात्र रूसी प्रभाव को रोकना ही है.... या पाकिस्तान में रहते हुए भारत और चीन पर लगाम लगाने की रणनीति भी है....?बड़ी अजीब बात है की अमेरिका ने जिया और मुशर्रफ़ दोनों को ही खूब शह दी....इस पुरे समय में कभी भी लोकतंत्र और मानवाधिकारों पर अमेरिका ने चिंता नहीं जताई...चाहे औपचारिक तौर पर शीत युद्ध समाप्त हो चुका है....फिर भी हाल के दिनों में रूसी पुनरुत्थान ने यूरेशिया सहित अमेरिका को चुनौती देना शुरू कर दिया है....बल्कि पश्चिम के विशेषज्ञों ने तो लगभग साल भर पहले से आशंका व्यक्त करनी शुरू कर दी थी कि दुनिया में दुसरे शीत युद्ध की आहट सुनाई देने लगी है.....शायद बीते साल के मध्य में दुनिया में मंदी के भुत ने इस आशंका को वक्ती तौर पर ढँक दिया है...नहीं तो जार्जिया संकट....मध्य एशिया में नाटो की घुसपैठ और पूर्वी यौरोपे में अमेरिका के डिफेन्स सिस्टम लगाने का रूसी विरोध और रूसी चुनावों के प्रति पश्चिमी नजरिया और उस पर रूसी प्रतिक्रिया किसी से छुपी नहीं है....यहाँ अमेरिकी मंदी के तथ्य को उसके रक्षा उद्योग के प्रकाश में भुलाया नहीं जा सकता है....हो सकता है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अमेरिकी हथियारों की खपत कर वह अपनी अर्थव्यवस्था को बूस्ट करने का षडयन्त्र कर रहा हो?

Friday, 20 March 2009

लक्ष्य....जूनून......और जीवट

अपनी बीमारी की छुट्टियों के दौरान, चैत्र के लगभग बीचोबीच जवान होती शाम को मौसम अचानक खुशनुमा हो गया. आसमान पर बादलों की हलकी पर्त चढ़ आयी और हवा चलने लगी. ऐसे में खिड़की से झांकते, झूमते नीम, गुडहल और पतझड़ को सह रहे सागौन को देखते हुए अपने शिथिल हो चले मन का में आनंद ले रही हूँ. बीमारी में शरीर के पस्त होते ही दिमाग के तंतु भी शिथिल हो जाते है, और हम सारे बंधनों से आजाद हो जाते है....ऐसा सिर्फ़ बीमारी में ही होता है कि रात और दिन आते और जाते है....घड़ी की सुई भी घुमती है फिर भी हम इससे आजाद होते है.... सुई और पृथ्वी दोनों को घुमने देते है, क्योंकि हम फिलहाल इनकी तरह घुमने के लिए अभिशप्त नहीं है. 'तुम नहीं गम नहीं शराब नहीं, ऐसी तन्हाई का जवाब नहीं, बार बारहे इसे पड़ा किजे दिल से बेहतर कोई किताब नहीं'.... यूँ ऐसा कम ही होता है...तो इस हाल में दिमाग का सारा कूड़ा साफ़ हो चुका है और जमीं तैयार पड़ी है बस देर है तो कुछ बोने की....... तो फिलहाल जब बुखार उतरता है से लेकर उसके फिर से आने तक हाथ में बेनजीर भुट्टो की आत्मकथा 'डाटर ऑफ़ ईस्ट' पढ़ रही हूँ. आख़िर शाम के अन्तिम सिरे पर आसमान से बूंदे बरसी और खिड़की से हवा पर सवार होकर सौंधी सी खुशबु कमरे में आ धमकी....हवा का चलना बदस्तूर जारी है. बल्कि उसकी गति तेज और तेजतर हो रही है.... इससे पोर्च में लगा विंड चिम तेजी से झनझना रहा है.
उधर बेनजीर अपनी सात साल की अमानवीय....त्रासद..... एकाकी....हताशाभरी और लगभग तोड़ देने वाली जेल की सजा से आजाद होकर अपना इलाज कराने के लिए लन्दन पहुँच गई..... अब तक पढ़े २३५ पन्नों के बाद एक सवाल जो मेरे सामने खड़ा है कि----- वो क्या वजह हैं, जिसने अपने पिता की हत्या, मां और ख़ुद की यंत्रणा दायक सजा के लंबे अरसे के बाद भी बेनजीर को पाकिस्तान के फौजी शासक जनरल जिया से समझौता ना करने के लिए प्रेरित करता रहा? अपनी सात सालों की सजा में ज्यादातर अकेले जेल में और वह भी सी ग्रेड कैदी की तरह बिताने के बाद भी बेनजीर ख़ुद को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखने का समझौता नहीं करती हैं. क्या वह मात्र सत्ता पाने की लालसा है? या फिर एक जूनून है.....एक लक्ष्य पाने का....पाकिस्तान में लोकतंत्र लाने का...? फिलहाल लगातार पढ़ रहीं हूँ और विचार कर रही हूँ.....कहा जा सकता है कि लक्ष्य पाने की प्यास जूनून पैदा करती है और जूनून वह ताकत पैदा करता है, जिसे जीवट कहते है....और यह सकारात्मक भी होता है और नकारात्मक भी....पाठक मुझे माफ़ करेगें लेकिन आतंकवादी भी इसी जूनून की पैदावार है, बस इनकी दिशा विपरीत है....हालाँकि ये 'बस' नहीं है....इस पर फिर कभी......

Sunday, 8 March 2009

होली की शुभकामनाएं

टेसू के सिरे दहकने लगे है....आम भी बौराया हुआ है....कड़वे नीम के फूलों की नशीली सी खुशबु हवा के झोकों को साथ आँगन में शाम से आ धमकती है.... वसंत का यौवन शबाब पर है....दिन थोड़ा नकचडा हो आया है.... सुबह तो पलाश की तरह सिंदूरी हो चली है....शाम 'हम दिल दे चुके सनम' फ़िल्म की नंदिनी के दुपट्टे की तरह लम्बी...... हो चली है, जिसके सुदूर सिरे पर सुलगती से रात उतरती है.....रात का आँचल सिकुड़ गया है....दिन लंबा होकर हरिया गया है.....छत की मुंडेर पर पड़े रंग वासंती बयार में उड़ कर फैल जाना चाहते है....आसमान के साथ ही प्रकृति भी रंगों से खेल रही है....तो फिर हम क्यों नहीं....? टेसू, आम और नीम के ही साथ....बोगनबेलिया.....गुडहल और गुलटर्रा पर भी फागुन चढा है.....देखो तो कैसे-कैसे रंग निकल आए है.....आँगन में तो फागुन अपने जोडीदार वसंत के साथ धमाल मचाये है। यूँही तो होली नहीं मनाई जाती है....जब मन में तरंग उठती है.....जब सारे बंधन तोड़ कर मन का करने का मौसम आता है...जब प्रकृति अपने सबसे मादक रूप में दिखाई देती है....जब सब जगह रंग ही रंग होते है, जब मन भी रंगों से सराबोर होता है तो फिर तन ही क्यों छुट जाए? तो तन, मन और मौसम से ताल मिलाएं और फाग की थाप पर आनंद की तान सुनाये.....प्रेम...खुशी और सदभावना के रंगों से होली खेले और मनाये.....सभी को होली के मुबारकबाद......

Friday, 27 February 2009

ताकि प्यास रहें बरक़रार

हमारी परम्परा में नाद ब्रह्म है और जब उसके साथ दर्शन हो तो बनता है वह अलौकिक होगा....उसकी अनुभूति शब्दों से परे होगी....गूंगे के गुड की तरह....यहाँ हम एक फिल्मी क़व्वाली की चर्चा कर रहें हैं....सुर-ताल के साथ शब्दों की संगत से जो बेहतर बनता है. वह सब बरसात की रात की क़व्वाली 'ना तो कारवां की तलाश है, ना तो हमसफ़र की तलाश है' में मिल जाएगा.... इसे आत्मस्थ होकर सुनने से जो अहसास होता है वह भी अलौकिक.....शायद स्वर्गिक या शायद....शब्द नहीं है....चुक गए है...इसे दर्शन में संप्रेषण की समस्या कहते है...पश्चिम में खासकर कार्ल जेस्पेर्स अनुभूतिगत आदान-प्रदान को मानव होने की खास जरुरत मानते है, लेकिन इसकी सीमाओं से हम इंकार नहीं कर सकते है...फिर जिस तीव्रता, स्तर और मात्रा में मुझे कोई अहसास हुआ है, उसका मापदंड क्या है? अहसास तो व्यक्ति-दर-व्यक्ति अलग होता जाता है, खैर फिलहाल दर्शन नहीं संगीत और अध्यात्मिक अनुभूति की बात हो रही है. मन्ना डे के आलाप के साथ शुरू हुई इस क़व्वाली में सिर्फ़ आराधक और आराध्य ही है, या दुनियावी और श्रृंगारिक दृष्टि से आशिक और माशूक....लेकिन जैसे-जैसे यह आगे बढती है आशिक और माशूक कहीं गुम हो जाते है, फिर जो बचता है वह सिर्फ़ और ब्रह्म और पिंड होता है…संसारिकता कहीं गुम हो जाती है और रूहानियत का जन्म होता है, रेडियो के ज़माने में 'ना तो कारवां की तलाश है' और 'ये इश्क इश्क है इश्क इश्क' दो अलग-अलग कम्पोजीशन के तौर पर सुनी और पहचानी थी...क्योंकि इसकी लम्बाई औसत गानों से ज्यादा है और इस माध्यम की अपनी सीमाएं....तो ना तो कारवां की तलाश है ना तो हमसफ़र की तलाश है.....फिर मंजिल तो साफ़ है, एकांतिकता की दरकार है....मेरे शौके खाना ख़राब को तेरी रहगुजर की तलाश है....रास्ते की तलाश है और वो भी अकले.....अकले होने का कोई गम नहीं, बल्कि चाहत है....वो तो सिर्फ़ प्रेम में ही सम्भव है, आखिर कबीर ने भी तो है की प्रेम गली अति साकरी या में दो ना समाही, जब में था तब हरि नाही, अब हरि है मैं नाहीं...जिस रास्ते से मैं भी नहीं गुजर सकता, उसमे कोई और कैसे साथ चल सकता है?फिर आशा का मद्धम आलाप से प्रवेश करना...मेरे नामुराद जूनून का है इलाज कोई तो मौत है....किसी भी तरह के इस दुःख से निजात की ख्वाहिश...तेरा इश्क है मेरी आरजू, तेरा इश्क है मेरी आबरू....तेरा इश्क में कैसे छोड़ दूँ मेरी उम्र भर की तलाश है....यहाँ तक तो पकी उम्र में ही पहुँचा जा सकता है, क्योंकि इस जूनून तक....दिल इश्क, जिस्म इश्क और जान इश्क है, ईमान की जो पूछो तो ईमान इश्क है.... तो फिर बचा क्या?यहाँ तक तो सब कुछ चलता है, लेकिन जैसे ही क़व्वाली का दूसरा हिस्सा 'ये इश्क इश्क है इश्क इश्क है' शुरू होता है सुफीत्व का आविर्भाव होता है और हम एक सर्वथा नई भावभूमि पर आ खड़े होते है....यहाँ कुछ भी नहीं होता 'नथिंगनेस' भी नहीं क्योंकि इसका अस्तित्व भी 'थिंग' होने के बाद की अवस्था है....यहाँ अतीत के बाद का वर्तमान है...यहाँ न काल है न काल का अहसास......सिर्फ़ नाद है....और है ब्रह्म की अनुभूति ...जमाना नहीं और अहसासे जमाना तक नहीं, यहाँ तो शमन होने लगता है कबीर वाले 'मैं' का, जो धीरे-धीरे गल रहा है...पिघल रहा है.....सहर तक सबका है अंजाम जल कर खाक हो जाना.... एक और सच मृत्यु...चाहे कोई भी हो इससे निजात नहीं है. क़व्वाली में इश्क के फलसफे के गिरह खुलने लगती है....इश्क आजाद है.....हिंदू ना मुसलमान है इश्क....आप की धर्म है और आप ही ईमान है इश्क है....एक चेतावनी.....बहुत कठिन है डगर पनघट की.....उसका जवाब.....जब-जब कृष्ण की बंसी बाजी निकली राधा सज के जान अजान कम ध्यान भुला के लोक लाज को तज के...... एक सी ताल पर जूनून रगों नें दौड़ने लगता है....सप्तक तक जाता सुर..... कहता है कि ये कायनात इश्क है और जान इश्क है....अंत में इश्क की इन्तहा....खाक को बुत और बुत को देवता करता है इश्क इन्तहा ये है कि बन्दे को खुदा करता है इश्क....फिर कबीर तू तू करती तू भई मुझमे रहीं ना मैं.....यूँ फ़िल्म में ये रोशन की कम्पोजीशन है लेकिन असल में ये उनके गुरु भाई फ़तेह अली खान की रचना है....अंत तक आते आते भावनाओं कम अतिरेक और आंसू....आख़िर दुःख और खुशी के अतिरेक के साथ भावनाओं के अतिरेक की अभिव्यक्ति भी तो ये ही करते है....आनंद के समंदर में पुरी तरह डूबे हुए....शब्द खत्म हुए....हाँ एक प्यास बनायें रखें ......घूंट घूंट पिए.....क्योंकि तृप्ति से ज्यादा आनंददायक है प्यास....जय हो के ज़माने में सुने इश्क की महिमा और बताएं......

Saturday, 7 February 2009

फिर सवालों का जंगल है..




दिमाग के घर में दीवार नहीं है.... इसलिए विचारों का पंछी कभी भी बेधड़क आता और जाता रहता है....मायूसी की बात ये है कि समय और सब्र के वो दरख्त ठुठ हो गए है जिन पर कभी अहसासों के पछियों के घोंसले हुआ करते थे....फिर भी कभी-कभी ये पंछी अपने माजी से रूबरू होने के लिए उदासी की गठरी उठाये चले आते हैं.....आज दोपहर भी वह आकर उसी ठूंठ पर अपनी उदासी की गठरी लिए आ बैठा.....सूरज तप रहा था और वह जोगी की तरह ऑंखें मूंदे तप की मुद्रा में बैठा रहा.... धूप ने उसे स्याह कर दिया था....इस स्याही ने उसकी गठरी बहुत भारी कर दी और वह उसे वहीं छोड़ कर उड़ गया....मतलब उसके अवसाद की गठरी मेरे दिमाग के घर में अब पड़ी हुई है.... वह अपना अवसाद मेरे लिए छोड़ गया है....ये अवसाद छूत की बीमारी है और इसका संक्रमण मुझे भी हो गया....किसी शायर ने क्या खूब लिखा है कि---- ना मिला कर उदास लोगों से/ हुस्न तेरा बिखर ना जाए कहीं.....तो अब ये अवसाद फिलहाल मेरा मेहमान है....यूँ ये बिन बुलाया मेहमान ही रहता है.... अक्सर किसी न किसी बहाने से आ ही जाता है ... इन दिनों फिर से अजीब से सवालों ने आ घेरा है....अपनी गठरी छोड़ कर पंछी तो उड़ गया लेकिन उसमें से अवसाद की केंचुल हमारे हाथ रह गई..... अवसाद दौड़ का हिस्सा होने की.... दौड़ते हुए कण-कण क्षरण होते देखने का....इस अनजानी, अनचाही और अपरिचित दौड़ में कई पड़ाव और मंजिलें है.... और हर पड़ाव पर पहुँच कर यूँ लगता है कि कहीं पीछे कुछ रह गया है.... हर मंजिल पर पहुँच कर एक रिक्तता हमारा इंतजार करती है...भोतिक उपलब्धि कहीं न कहीं हमें खोखला कर देती है ...महत्वाकांक्षा अपनी तरफ़ आकर्षित करती है तो जीवन की प्रयोजनहीनता का विचार अपनी और बकौल ग़ालिब --- ईमां मुझे रोके है तो खीचें है मुझे कुफ्र, काबा मेरे पीछे है कलिसा मेरे आगे.......

Thursday, 5 February 2009

सीने में जलन आँखों में तूफान सा क्यों है?

ना जाने क्या लावे सा बहता है....? एक बेचेनी.....एक छटपटाहट..... सुबह शाम एक उलझन .....लगातार एक जलन.... जीवन के रूटीन हो जाने के बाद की एकरसता ......सपनों को भोग लेने के बाद की नीरसता.... यदि सपनें टूटते है तो कम-से-कम उसकी किरचें तो होती है...लेकिन सपने पुरे होने के बाद....होता है खालीपन.....जीवन में क्या सच है....कमी या पूरापन....फिर पूरापन क्या है? आज जो पुरा लग रहा है क्या वो कल भी इतना ही पुरा लगेगा....या कल फिर से नई दौड़ होगी..? कभी-कभी यूँ लगता है कि जीवन में एक दर्द .....एक कमी...एक अभाव जरुरी है....कोई आकर्षण तो हो.... खुशी के बाद जो एक रीतापन होता है वह कमी के बाद नहीं होता है.... तकलीफ तो हमेशा कुछ होने का अहसास कराती है... खुशी की तरह नहीं कि आती है और रूटीन बन कर रह जाती है...दर्द से निजात के लिए लगातार के प्रयास होते है.... उससे निकलने के लिए तरह-तरह के उपाय.... हर दिन कि नवीनता....एक नया दिन ख़ुद से लड़ने...घायल होने और हार जाने के बाद फिर से खड़ा होने की ताकत जुटाने का न टूटने वाला क्रम.....सह कर सीखने और जीवन को सम्रद्ध करने और करते रहने का जूनून....तेज प्यास..... और तृप्ति के खवाब....लगातार चलती जद्दोजहद.....तभी तो अज्ञेय ने लिखा है कि दुःख माँजता है... और यकीनन वह माँजता है.... चमका कर सोना कर देता है.... और खुशी उथला कर देती है.... शायद इसीलिए कहा गया है कि दुःख के अहसास के बिना आई खुशी आदमी को दीमक की तरह खोखला कर देता है... सोचें कि उस राजा की तरह जिसे पैसों की इतनी हवस थी कि उसने इसके लिए तप किया.... और फिर उसे वरदान मिला कि वह जिस चीज पर हाथ रख देगा वह सोना हो जायेगी.....हमारे भी साथ हो जाए कि हम जो चाहे वह मिल जाए तो...... वक्ती तौर पर तो उपलब्धि होगी.... खुशी का अहसास होगा लेकिन.... फिर....? जीवन से सारे आकर्षण....सारी जद्दोजहद....प्रयास...उमंग... उत्साह सब कुछ काफूर हो जाएगा। जीवन में एक ही रंग होगा... एक ही सा अहसास और अपनी भाषा में कहें तो बोरियत होगी और होगी ऊब..... शायद तभी तो धर्मवीर भारती और शिवाजी सावंत जैसे विद्वानों ने अपूर्णता को जीवन की जरुरत माना है। तो संघर्ष है तो गति है....जीवन है....प्रवाह.....सृजन....रस....और अन्त में दुनिया है..... फिर...अधूरेपन को पुरे मन से सलाम....जीवन को रसमय और आकर्षक बनने के लिए....है या नहीं? आप बताएं

Tuesday, 27 January 2009

धूप का रंग है पीला...दिन हुआ सुनहरा...

आज रात कुछ अजीब सा अहसास हुआ.... गहरी नींद में कमरे में पायल की रुन-झुन सुनाई दी..नींद थोडी सी कुनमुनाई और फिर सो गई....थोडी देर बाद कहीं से प्रभाती के सुर कानों में पड़े....लगा कि आधी रात को कौन गा रहा है? फिर किसी ने प्यार से थपथपा कर जगाया....आखें खोली तो सिरहाने उजली-निखरी सुबह खड़ी मुस्कुरा रही थी....फिर सो नहीं पाई...बहुत देर तक उसकी उंगली पकड़े उसकी रुनझुन के साथ चलती रही....पता नहीं कब सुबह ने अपना आँचल धीरे से छुडा लिया...और मेरा हाथ जवान होती दोपहर के हाथ में दे दिया...पुरा दिन उसके साथ न जाने कहाँ-कहाँ की खाक छानी.....और मखमल सी सरकती शाम की गोद में आ गिरी....फिर.....फिर पता नहीं क्या हुआ...? अब पहेली क्यों बुझाऊ इन दिनों कुछ नशा सा छाया रहता है....हर दिन की शुरुआत गुलगुली गुलाबी सुबह के खिलखिलाने की आवाज से होती है...हवाओं से दिन भर खुशबु आती रहती है...दोपहर मीठी-मीठी और शाम मखमली लगती है...रात गुनगुनाती हुई आती है और लोरी सुना कर सुलाती है... मन न जाने क्यों उड़ता फिरता है....यूँ ही केलेंडर देखा और सारा-का-सारा माजरा समझ में आ गया....वसंत आ चुका है....मतलब हमें मालूम हो या न हो...प्रकृति हमें किसी भी तरह जता देती है.....कहती है कि ये मेरा यौवन का....श्रृंगार का मौसम है....प्रकृति अपने पुरे शबाब पर है....वह सभी कलाओं में ख़ुद को अभिव्यक्त कर रही है...सुबह से रात तक दिन कितने रूप-मुड़ और शेड बदलता है....आप गिन नहीं पाते है. हर दम फाग के सुर गूंजते रहते है....हवा छेड़छाड़ करती रहती है. हम शहरियों को तो पता भी नहीं होता है कि खेतों में सरसों के फूल खिल गए है...पलाश पर सिंदूर दहक रहा है...फिर भी यूँ लगता है कि कहीं कुछ तो खुबसूरत जरुर हो रहा है....चारों और रंग महक रहें है... मन मयूर हो रहा है....होली यूँ ही नहीं मनाई जाती है...जब सभी ओर रंग उड़ रहें हो, मन में यूँ तरंग का आलम हो...बिना कारण आल्हाद का अहसास हो....तो फिर रंगों का खेल नहीं होगा तो क्या होगा...? वसंत ओर फागुन की जोड़ी राग, रंग, आनंद ओर सृजन का मौसम है....वातानुकूलित घरों-दफ्तरों, मल्टीप्लेक्स और मॉल से निकल कर ठूठ हुए पेडों पर फूटती कोपलें....कहीं दूरदराज में कोई भूले हुए पलाश के दहकने को देखें....प्रकृति के सुन्दरतम रूप को निहारें....उसके सौन्दर्य से प्रेरणा लेकर सिरजे.....शायद यही वसंत और फागुन का उत्स है....सार और अर्थ है... वसंत शुभ...आनंदकारी...आल्हादकारी....और सृजनात्मक हो....वाग्देवी सरस्वती....बुद्धि...मेधा और कल्पना से समृद्ध करें.तो वसंत आप में और आप वसंत में महके...इसी आकांक्षा के साथ वसंत पंचमी की शुभकामना