Tuesday, 13 July 2010

भूली-बिसरी किताब-सा हाथ आया सुख



ऐसा नहीं होता है, लेकिन कल रात ऐसा हुआ। हर दिन का वही क्रम - रात के खाने के बाद टहलना, कभी भी इसे अलग नहीं पाया... कभी-कभी तो टहलने वाली सड़क सिर्फ इसलिए बदल दी जाती है कि हर दिन इसी सड़क पर टहलते हैं, कुछ चेंज हो ..... कल रात अलग यूँ था कि अपने मोबाइल में म्यूजिक को नए सिर से फॉर्मेट किया था और दिन भर उसे सुनने का मौका नहीं मिला, सो रात को टहलते हुए साथ ले लिया। नई बस रही सुनसान कॉलोनी में इक्का-दुक्का टिमटिमाती ट्यूब की रोशनी.... हालाँकि आषाढ़ के मध्य में आ पहुँचे हैं और बारिश की आस है फिर भी साफ आसमान पर झिलमिलाते तारे है, आश्चर्य है कि बुरे नहीं लग रहे हैं.... हल्की-हल्की हवा और बहुत पहले सुनी हुई गज़लें..... फिर कुछ इस दिल को बेकरारी है..... कहीं कुछ मीठा सा छूकर गुजर गया... अपने-अपने गुजरे दिन को चुभलाते हुए भूली-बिसरी गज़लों के साथ जगा था वो एहसास..... बड़ा अजबनी.... बहुत पराया.... फिर भी भला-सा लगने वाला।
कहीं पढ़ा था कि – मन अपने सामने भी खुद को नहीं खोलता है।
अपने अंदर उगी यह अजनबीयत उसी मन की नई-नई खुलती पर्तों का नतीजा है। क्या और कितना कुछ होता है, मन के भीतर, लगातार खोलते चले जाने के बाद भी खुलता ही चला जा रहा है। कुछ इसी तरह का अनुभव है इन दिनों... न अतीत है, न भविष्य.... आज भी हवा के पंखों पर सवार.... हल्का और ताजा...। न गुजरे हुए को लेकर कोई कड़वाहट, असंतोष और अभाव, न आने वाले पर किसी तरह की ख़्वाहिश, सपना या महत्वाकांक्षा का बोझ .... न आज के लिए कोई दौड़.... न कुछ पाना चाहना और न कुछ छूट जाने का दुख..... न दौड़.... न हार.... न जीत, न कुछ करना और न ही इस नहीं कर पाने को लेकर कोई मलाल.... कुछ भी नहीं है, फिर भी कुछ है, कहता-सा, जीता-सा, मुस्कुराता-सा कुछ.... कुछ नहीं करते, पाते, सोचते-विचारते, पढ़ते-सुनते हुए भी भरा-भरा अहसास... शायद ये जीवन में पहली बार महसूस हुआ है।
मजदूरों-से हैं, जब तक पत्थर नहीं तोड़ लें, तब तक न तो नींद आए न भूख लगे... ठीक वैसे ही, जब तक खुद को खुरचे नहीं, थोड़ा खून निकाले, थोड़े आँसू हो.. तब जाकर लगे कि हम जिंदा है, लेकिन इन दिनों अचानक से अपने अंदर उगी इस अजनबीयत का क्या करें ये समझ नहीं आ रहा है। बहुत सालों बाद खुद को इतना निर्द्वंद्व और इतना हल्का पाया..... प्रवाह का हिस्सा होने के बाद भी किसी तरह की बेचैनी या छटपटाहट नहीं... कोई दुख, बेचैनी, छटपटाहट या कोई निरीहता भी नहीं.... खुद को इतने परायेपन के साथ देख और भोग रहे हैं, जैसे ये हम न हैं कोई ओर है। हाँ ये सुख है, इसी तरह से आता है, जैसे कोई गुम हो चुकी पुरानी पसंदीदा किताब या फिर कहीं अटाले में पड़ी मिले कोई बहुमूल्य सीडी... बस यूँ ही आया है ये... और आश्चर्य ये है कि न आँसू है, न बेचैनी और न ही छटपटाहट... कुछ यूँ कि न शब्द मिले न भाव... बस है.... कुछ बहा ले जाता-सा, सुख है।

Thursday, 1 July 2010

अफ्रीका के महासागर पर जूही के फूल



जेठ की अंतिम रात और आषाढ़ के पहले सूर्योदय के बीच का वक़्फ़ा…. बादल अल्हड़ हो रहे हैं इसलिए जिम्मेदारी कहीं नहीं नजर आ रही है। वे आसमान पर उधम तो मचाते हैं, बरसते नहीं है। मौसम विभाग का हमेशा का रोना है.... अभी आया, बस बरसेगा और अगले ही दिन कहना शुरू कर देता हैं कि कमजोर हो गया है, तो मानसून तो जैसे छुपाछाई का खेल खेल रहा है। हाँ तो जेठ की उस गुजरती रात के जालों में से उलझा शेर – सुबह होती है, शाम होती है, जिंदगी यूँ ही तमाम होती है – टप्प से गिरा और नींद का शीशा झनझना कर टूट गया। दिमाग के गोदाम में पड़े जंक ने यूँ भी बेचैन किया हुआ है, ऐसे में गहरी नींद का रात के ऐन बीचोंबीच टूट जाना...... जैसे खुद का बेवजह, बेकार हो जाना....। गहरी काली और निस्तब्ध रात के बीच आँखों के बल्बों को बेआवाज टिमटिमाने की सजा.... विचारों का रेला गोदाम की दरारों से बाहर बहने लगा तो फिर नींद के आने के लिए जगह ही नहीं बची। कितना कुछ ठूँसा हुआ है, इसमें.... कोई ओर-छोर ही नहीं है। सुबह से रात तक न जाने कितना अटाला हम जमा करते हैं बिना ये सोचे कि इसकी जरूरत कहाँ और कितनी है?
आखिर पता नहीं किस क्षण नींद जिंदगी की तरह अपना रास्ता बनाकर पहुँच ही गई। कहाँ तो अलस्सुबह उठ जाने की योजना थी और कहाँ चाय के कप और सुबह के अखबार के साथ उठाए गए तो घड़ी ने नौ बजा दिए थे...... ओफ! फिर वही बेकार के एक्सप्रेशंस, जिनके होने का कोई मतलब नहीं था.....लेकिन थे। खैर, फिर से जंक जमा करने का सामान था और हम थे। नजरें टिकी थी अखबार के आखिरी पन्ने की उस रोचक खबर पर कि अफ्रीका में महासागर के निशान मिले हैं...... खबर का आखिरी हिस्सा था और पतिदेव ने बाहर से आकर धप्प से एक अंजुरी भर जूही के फूल उस खबर पर बिखरा दिए थे.... वाह क्या इत्तफ़ाक है!
आखिरी हिस्सा यूँ था कि महासागर के उभरने के निशान तो हैं, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में पूरे 1 करोड़ साल लगेंगे..... अब कौन जीता है तेरी जुल्फ़ के सर होने तक......? लेकिन जूही के छोटे-छोटे, नाजुक फूल तो आज के ही हैं.... आज के ही लिए हैं.....। तो यूँ ही एक विचार आया कि इस क्षण, इस घड़ी, इस जगह को बिसराकर हम भूत-भविष्य, पृथ्वी-अंतरिक्ष की चिंता कर रहे हैं, लेकिन कैसे चूक गए कि मानसून की बारिश न होने के बाद भी कितना कुछ हमारे आसपास घट रहा है..... कैसे चूक गए कि गुलमोहर अब भी अपने लाल भड़क छाते को ताने हर आते-जाते को लुभा रहा है, कि नीम में आई कोंपलें कैसे झूमर की तरह हवा में लहरा रही है, कि कैसे सागौन तीन मंजिला मकान की छत तक आ पहुँचा और कैसे जूही अपनी सुवास का बंदनवार सजाए, हर आने-जाने वाले को एकबारगी पलटकर देखने के लिए मजबूर कर रही है, कैसे छूट जाता है, ये सब और हम उलझे रहते हैं कि जी-20 में क्या हुआ? फीफा में क्या हो रहा है? खाप पंचायतें क्या कर रही हैं? और ऑनर किलिंग पर कोई भी नेता क्यों नहीं बोल रहा है? पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने से हमारा घरेलू बजट कितना गड़बड़ाएगा और रसोई गैस की खपत को कम करने के लिए क्या-क्या उपाय करने की जरूरत है? अफगानिस्तान से नाटो सेनाओं के चले जाने के बाद क्या होगा? नक्सली समस्य़ा को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तालमेल क्यों नहीं हैं और क्यों बेकसूर लोगों की जान इनकी आपसी खींचतान में जा रही है? औऱ पाकिस्तान में कब लोकतंत्र जैसा लोकतंत्र आएगा? कैसे ये सब कुछ याद रहता है, बस वही नहीं याद रहता है, जो हमारे बहुत पास, आँखों की ज़द, हथेलियों की पहुँच में उगता-मुरझाता, जागता-मुस्कुराता रहता है, क्यों नहीं दिखता, याद रहता, आह्लादित और तरंगित करता हमें?..... क्या ये वाकई हमारी संवेदनाओं के मरने की शुरुआत है?

Friday, 25 June 2010

LOVE STORY


Get up i am telling u about the life..- she said
oh come on... its midnight...let me sleep - i request her.
No.... when i will not be with u remember me... and all this....listen... and God knows what she recite all the night... it is morning.... it melt slowly and gently.... she stood up from bed and screm...lets go for the walk....
Have u gone mad? - first u did not sleep me whole night... and then... go for walk.... no...
i saw her with lots of affection...
she comb her hair and knot with clucher... i find her very beautiful at that moment. I remember that piece of ghazal – KAUN SI BAAT HAI TUMME AISI, ITNE ACHCHE KYUN LAGATE HO….and sung….she smile sweetly and said – BAND KARO, KITNE BESURE HO. I said….i am questioning not singing…she put unreal anger on face and said come fast - she orderd and went outside... i don't have any options... i questioned myself - why i am so helpless before her... there is no answer, except this, i love her...
outside there is mild cold...sun peeks from east... i hold her hand and suddenly i go front of her, sit on knee and proposed - lets get married.
she laugh whole hearted- u r mad....seriously u r.
what happened? - i stare her with wonder...- what about laughing in this...
why marriage? - she asked
i feel insecure about u...- i answered
why?
i don't believe u, i am living in this dread that some day u 'll leave me...
now she is be serious...- yaa i can go any time...
thats why i want to marry u. - i disclosed
she smile - u think if we will get married then i could not leave u. nothing can stop me...-
she said with solidity.
then how can i tie u? - i asked her with some innocence
no, u can't...- she said.- i don't believe in to hook up in relations....
i want to live with freeodm... confinement ruin relations, I don’t want my relation to be like this.
There is raining....and she screams with happiness.
In next morning, again in my deep sleep, i want to hold her unconciously....she is not
there....suddenly i wake up with hassel and searching her madly....but i did not find her except a slip of bye.

Monday, 21 June 2010

देह की नागफ़नी, नागफ़नी की देह


संघर्ष घना है, हमेशा की तरह। लेकिन इस बार उसका रूप बिल्कुल ही नया है। कहाँ से आ गया ये सब.... ये सब तो कहीं था ही नहीं। कहाँ तो विदेह हो जाने की तीखी आकांक्षा और अब ये दैहिकता की अंकुरित होती चेतना, दो सिरे। अपने होने का खास लगना, बहुत सारी आँखों में चिह्नित होते खुद को देखने का सुख और उस सुख से उपजा दुख। न दुख अपना न सुख.... फिर भी दोनों अपने। ये बीज इस मिट्टी में कहाँ से आया? ये जमीन तक इसके लिए अनुकूल नहीं थी और ये कब अंकुरित हुआ? चलो अंकुरित हुआ होता तो समझ में आता, लेकिन ये तो बीहड़ झाड़ी हो चली है। अब इसे उखाड़ने का दुरुह कार्य... लहूलुहान होना ही ठहरा..... । ये देह की नागफ़नी कहाँ से और कैसे आ गई? ये बिल्कुल अपरिचित झाड़ी..... कैसे उग आई...? और अब उग आई है तो इसका क्या किया जाए...... ? इसे यूँ ही पनपते रहने तो नहीं दिया जा सकता है ना.... ? यही संघर्ष है... नया तो नहीं है.... हाँ ऐसा कभी रहा नहीं.... अपनी भौतिकता के प्रति हमेशा की उदासीनता कहीं गुम हो गई और एकाएक लगाव पैदा हो गया..... और इस लगाव से उपजा है संघर्ष..... हमेशा तो वैचारिकता का ही वैचारिकता से द्वंद्व रहा करता था, लेकिन इस बार ये बिल्कुल नया है। हमेशा ही कहा जाता है कि जो होती हूँ, वही नहीं होना चाहती हूँ। खुद का अतिक्रमण करने की चुभती चाह....। बस यही अस्वाभाविक ख़्वाहिश है। अपने होने को हमेशा लाँघ जाने की चाह और उसके लिए इतने ही दुर्गम उपाय.... उस सबसे दूर जो स्वाभाविक होता है, उस सबकी ओर जो कृत्रिम होता है, यही चाह है, यही संघर्ष और यही त्रास। जो सहज होता है, उसी से बचना... ।
अपना भौतिक स्व इतना गहरा कैसे हो गया? वो इतना आँखों में खटकने कैसे लगा? अपना आत्मिक स्व कहाँ बिला गया, इस सबमें... और क्यों वो मुझसे अलग हो गया? क्या वाकई अलग हो गया? यदि हो जाता तो हो सकता है कि ये संघर्ष नहीं होता, लेकिन वो भी है। फिर वही होना और होना चाहना के बीच का तनाव...। ये कैक्टस की चुभती सी देह कहीं आँखों में अटकती है.... तो फिर देह का कैक्टस लहूलुहान किए हुए हैं। संघर्ष सघन है ..... कारण विरल.....।

Sunday, 13 June 2010

...मुझे ऐ जिंदगी दीवाना कर दे




उस दिन इयरफोन लगे हुए थे। 14 मिनट 21 सेकंड लंबी इस कव्वाली के आखिरी सिरे पर थी--कई-कई वार चढ़ी कोठे ते नी मैं उतरी कई-कई वारी..... न दिल चैन न सबर यकीं नू.... न भूलदी सूरत प्यारी.... आ जा सजणा.... ना जा सजणा ......तू जितीया ते मैं हारी... छेती आजा ढोलणा.... तैनू अखियाँ उड़ीक दिया.....
विरह..... तड़प, समर्पण और बेबसी का चरम..... डूबने की शुरुआत..... उतर जाने के लिए आँखें बंद की, सिर कुर्सी की पुश्त पर टिका दिया...... उस एक क्षण के लिए..... लेकिन तभी पड़ोस में काम कर रहे साथी को किसी ने आवाज दी। उसने तो नहीं सुनी लेकिन यहाँ सुनाई पड़ गई.... क्षण छूट गया, अब भी कानों में वो लंबी सरगम सुनाई पड़ रही थी, लेकिन आँखें खुली हुई थीं और हमारे सामने खुरदुरी हकीकत फैल गई थी। टेबल-कुर्सी, कम्प्यूटर, फोन, आते-जाते, हँसते-बतियाते लोग...... जागृति के सारे लक्षण फिर से साकार हो उठे थे.... घड़ी भर की निजात का ये क्षण भी हाथ से फिसल गया था।
रविवार की छुट्टी..... सुनहरी से साँवली होती जेठ की सुबह.... जमा होती खूब सारी उम्मीदें..... बादल, बारिश, फुहारों का इंतजार। सारा काम जल्दी-जल्दी निबटाया.... डूब जाने के लिए सारी अनुकूलताएँ...... एक क्षण, सादा.... अनायास-सा आता है, लेकिन उसके लिए कितने-कितने जतन करने पड़ते हैं! दोपहर को हमेशा की तरह केट नैप के बाद की चाय.... कप पड़े हुए थे..... बहुत पुरानी उपेक्षित-सी पड़ी सीडी हाथ आई.....सूरदास का भजन जसराजजी की आवाज.... विरह का दर्द....... कुब्जा के रंग में राचि रहे...... राधा संग अइबो छोड़ दिया...... श्रीकृष्णचंद्र ने मथुरा ते गोकुल को अइबो छोड़ दिया...... फिर से डूबने-डूबने के मुहाने पर...... इस बार तो बस डूब ही चुके थे...... सुरदास प्रभु निठुर भए..... सुरदास प्रभु निठुर भए.... हसबो इठलइबो छोड़ दियो......अभी आलाप चल ही रहा था कि वॉशिंग मशीन का बजर बज उठा.... सब खत्म.....। क्यों होता है, ऐसा?
इतने चौकन्नेपन की जरूरत नहीं है? अब बजर बजा है तो बजा है, लेकिन नहीं वो कहीं अटक गया है। अचानक-से याद आ गया – मैं अपने आप से घबरा गया हूँ, मुझे ऐ जिंदगी दीवाना कर दे......और रूलाई फूट गई.....क्योंकि ये तो सिर्फ एक उदाहरण है.... मसलन – कैसेट का अटक जाना, बाथरूम का टपकता नल या फिर जलती लाइट, प्रेसवाले लड़के की या सब्जी वाले की आवाज.... केलैंडर का फड़फड़ाना या फिर तेज हवा में भड़भड़ाते खिड़की-दरवाजे, चाय नाश्ते के जूठे पड़े बर्तन या फिर जूठे पड़े चाय के कपों में चींटी हो जाना...... फेहरिस्त बहुत लंबी है, कुछ भी हो सकता है, लौटा लाने के लिए.... एक सादे-से अनुभव को पाने के लिए कितने सारे षडयंत्र!
संक्षिप्त में यूँ है कि जाग्रतावस्था में खुद को कभी भी खुद से मुक्त नहीं पाया। हमेशा त्वचा की तरह से चिपकी रहती है ये भौतिक चेतना... बस गहरी नींद में ही इससे मुक्ति है, लेकिन मुश्किल ये है कि नींद में इस मुक्ति का अहसास नहीं होता है। इतनी-सारी सतर्कता, इतना सारा चौकन्नापन क्यों है? क्यों नहीं घड़ी-दो-घड़ी खुद को छोड़ पाती.... अपनी चेतना को समेट कर सुला पाती, कि खुद के पास बैठकर देख पाती कि इस चौकन्नेपन से मुक्ति के बाद कैसा लगता है, कि बाहर से बेखबर होकर भीतर के अँधेरे को देखना, पीना, जीना कैसा लगता है? क्यों बाहर इस कदर चेतना में अटका पड़ा रहता कि भीतर मुड़ने-जुड़ने के लिए अनुष्ठान करना पड़ता है, फिर भी सफल हो गए तो ठीक... आखिर तो बाहर को सहते-सहते कभी-कभी इस सबको झटक कर अलग खड़े हो जाने का..... भौतिक स्व से दूर होकर आंतरिक स्व को टोहने का सुख बहुत सुलभ क्यों नहीं है? क्यों भौतिक जगत हमारे बाहर भी पसरा हुआ है और भीतर भी..... क्यों इसी में सब कुछ अटका पड़ा रहता है, क्यों इससे निजात नहीं है? क्या इस बेचैनी और छटपटाहट की वजह भौतिकता, दृश्य जगत का ये असीम विस्तार ही तो नहीं, जो हमें घेरे हुए हैं, बाहर से और भीतर से भी.....?.

Monday, 7 June 2010

इश्क़-ए-हक़ीक़ी में अन्नपूर्णा देवी


4 जून के स्क्रीन में अन्नपूर्णा देवी पर एक खुबसूरत आर्टिकल पढ़ा...... खुबसूरत से अच्छा और कोई शब्द फिलहाल मिल नहीं रहा है...... क्योंकि उस अनुभूति को जिसे मैंने पढ़ने के दौरान और आज तक जी रही हूँ, शब्द नहीं दे पा रही हूँ, इसलिए फिलहाल सिर्फ खुबसूरत शब्द से ही काम चला रही हूँ।
ये एकसाथ ही बहुत ज्यादा जाना और बहुत कम सुना नाम है। ज्यादा जाना इसलिए कि उस्ताद अलाउद्दीन खाँ साहब की बेटी, उस्ताद अली अकबर खाँ की बहन के साथ ही पंडित रविशंकर की पहली पत्नी अन्नपूर्णा देवी का परिचय ज्यादातर इतना ही है..... लेकिन वो इससे कहीं ज्यादा है..... फिर परिचय इतना ही क्यों है? क्योंकि वे इतना ही चाहती हैं..... अजीब है ना..... ? हाँ तो उनका हकीकत में परिचय पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, चंद्रकांत सरदेशमुख, आशीष खान, सुधीर फड़के और उन्हीं की तरह कई-कई संगीत के दिग्गजों की गुरु के रूप में दिया जाता हैं....., फिर भी वे न तो कंसर्ट देती है और न ही रिकॉर्डिंग करती हैं...... क्यों? ये उनका निर्णय है। वे कहती है कि संगीत मेरे ईश्वर के लिए है.... मेरे लिए है.....। बस यही वो बात है, जिसने मुझे लिखने के लिए मजबूर किया। एक तरफ प्रतिष्ठा और शोहरत के लिए कुछ भी कर गुजरने वाली इस दुनिया में खुद के वजूद को इस तरह ईश्वर के हवाले कर देने के पीछे का मनोविज्ञान क्या होगा?
स्वभाव की वो कौन-सी केमिस्ट्री है, व्यक्तित्व का वो कौन सा तार है जो उन्हें अपने स्थूल होने के प्रति इतनी अचल निस्संगता देता है और अपने हक़ीकी स्व के प्रति इतनी गहरी ईमानदार निष्ठा देता है? वो क्या है? जो किसी सपने, किसी ख़्वाहिश, किसी प्रलोभन से नहीं डोलता है? मान, प्रतिष्ठा, शोहरत, समृद्धि, प्रशंसा, महत्वाकांक्षा, सफलता, उपलब्धि हर चीज के प्रति इतनी ठोस निर्लिप्तता, अचल उदासीनता और निश्चल निस्संगता कैसे आती है? और वो कैसा मन है, जो इस दौड़ती भागती दुनिया के बीच भी वैसा ही अटल, वैसा ही निश्चल बना रह सकता है? क्या ये इस तरह का संतत्व...... अचीव किया जा सकता है, पाया जा सकता है? या वो बस स्वभाव होता है? क्या इतनी निर्द्वंद्वता कभी पाई जा सकती है? क्योंकि यही तो उस मंजिल तक पहुँचाती है, जिसे फ़कीरी कहते हैं...... सब होने से दूर.... सब पाने से अलग..... सब जीने से निस्संग..... बस इश्क-ए-हक़ीक़ी में गर्क होना.....। यही तो है ना जीवन का आनंद.......?

Friday, 4 June 2010

इत्तफ़ाकन जो हँस लिया हमने, इंतकामन उदास रहते हैं


ऐसा शायद होता ही होगा.... तभी तो उत्सव से जुड़ता है अवसाद। क्या होता होगा इसका मनोविज्ञान.....? क्यों होता है, ऐसा कि जमकर उत्सव मनाने के बाद समापन के साथ ही गाढ़ी-सी उदासी........ न जाने कहाँ से चुपके से आ जाती है.... करने लगती है चीरफाड़, उस सबकी, जिसे आपने जिया...... भोगा.......और किया....... पूछने लगती है सवाल कि क्यों किया ऐसा.......इस जीने से क्या मिल गया?
क्या खुद को सामूहिकता में बहा देने...... बिखेरने और फैला देने का प्रतिशोध होता है ये अवसाद..... क्योंकि उत्सव की कल्पना ही सामूहिकता से शुरू होती है। तो क्या अपने स्व को बहा देने के दुख से पैदा होता होगा अवसाद......। कहीं लगता है, कि ये सामूहिकता और व्यक्तिगतता के बीच का द्वंद्व या फिर..... भौतिकता और आध्यात्मिकता के बीच का तनाव तो नहीं है? क्योंकि अक्सर गहरी एकांतिकता में अनायास आ पहुँचे आनंद के क्षणों को जी लेने के बाद तो ऐसी कोई अवसादिक अनुभूति नहीं होती.....उसके बाद तो एक दिव्यता का एहसास होता है, तो फिर सामूहिकता के आनंद को जी लेने के बाद ऐसा क्यों होता है?
तो क्या यहाँ भी मामला भौतिक और आध्यात्मिक है.....? भौतिकता को जी लेने, भोग लेने के बाद रिक्तता का अहसास अवश्यंभावी है...... और आध्यात्मिकता के बाद खुद के थोड़ा और आगे बढ़ने....... कुछ और भरे होने..... कुछ ज्यादा भारी हो जाने का सुख.....? क्या भौतिकता रिक्त करती है और आध्यात्मिकता भरती है? तो फिर भौतिकता के प्रति इतना गहरा आग्रह क्यों होता है? तो इसका मतलब ये है कि हम सीधे-सीधे खुद से ही भाग रहे हैं...... अवसाद सिर्फ उन्हीं के लिए है जो स्व के प्रति आग्रही है..... वरना तो मजा ही सब कर्मों के मूल में है। फिर हमें ये वैसा क्यों नहीं रखता है..... हम क्यों उत्सव के बाद अवसादग्रस्त हो जाते हैं....? क्या ये ऐसा है ? – इत्तफ़ाकन जो हँस लिया हमने, इंतकामन उदास रहते हैं…..
कहीं गड़बड़ केमिस्ट्री में ही तो नहीं....?

Friday, 21 May 2010

लोकतंत्र के अप्स एंड डाउंस


शुक्रवार की शाम थी.... इंतजार के पहले दिन के मुहाने पर बैठे थे, अभी एक दिन और बाकी था। अपने एक जैसे रूटिन में सन्डे का इंतजार करते रहने के दौरान यूँ ही एक तुकबंदी रच डाली थी
सोम, मंगल खुमार
बुध, गुरु उतार
शुक्र, शनि इंतजार
तब कहीं आता है रविवार....
हाँ तो टीवी के सामने अपनी खाने की थाली लगी थी..... बालिका वधु का हमेशा की तरह ही अतार्किक उत्सुकता जगाने वाला अंत हुआ था। थाली में से दाल की कटोरी तो पहले ही अलग कर चुके थे, एक-एक कौर खाकर दोनों सब्जियों को भी रिजेक्ट कर चुके थे, आम के रस के साथ चपाती खाना.... च्च.... तो फिर चपाती किसके साथ खाएँ.... इसकी खोज करने के लिए किचन में पहुँचे तो दही नजर आया.... चीनी और पीसी इलायची डाल कर थाली में रखा..... समय को पुरी तरह से निचोड़ लेने के लिए टीवी के सामने बैठकर भी किताब हाथ में हुआ करती है, वो तब भी थी...... एनडीटीवी पर ब्रेक खत्म हो चुका था, हमारा सिर किताब में ही था कि श्योपुर का नाम सुनकर कान खड़े हुए..... किताब में बुकमार्क फँसाया और टीवी देखने लगे। रूबीना खान शापू मध्यप्रदेश में भूख की रिपोर्ट लेकर आई थी, वे श्योपुर में एक माँ से चर्चा कर रही थी, जो उसे बता रही थी कि वे अपने बच्चों को खाने में खरपतवार दे पाती है, क्योंकि उनके पास आलू खरीदने के भी पैसे नहीं है..... कौर गले में अटक गया और साँस सीने में.....हाथ का चम्मच चला-चला कर हमने दही की छाछ बना डाली थी। रिपोर्ट गुलज़ार की फिल्मों की तरह कभी फ्लैश बैक में 2008 में जाती तो कभी वर्तमान में आ जाती है, दो साल से हालात में कोई फर्क नहीं आया.... अपने शहर से उत्तर में श्योपुर, दक्षिण में खंडवा और पश्चिम में झाबुआ तक के 200 किमी के रेडियस में इस कदर भूख पसरी हुई है..... कहीं कुछ काँपा..... आँखों से कुछ पहले आँसू भी ठिठक गए..... छोटे-छोटे बच्चों की निकली हड्डियाँ और सूखे से चेहरे..... कहाँ पहुँचे हैं हम विकास करके.....?
रूबीना अब भोपाल में शाइनिंग इंडिया का नजारा दिखा रही थी.... हमारी रूकी हुई साँस फिर से चलने लगी, गले का कौर उतर गया, नहीं सब कुछ उतना बुरा भी नहीं है। उसने इस बात से अपनी रिपोर्ट का समापन किया कि – खाते-पीते मध्यमवर्ग को शर्म मगर नहीं आती.... उसी निश्छल बेबसी में हमने सवाल किया – आती है भाई बहुत आती है, लेकिन हम क्या कर सकते हैं......?
उसी बेचैनी में पतिदेव ने जवाब दिया – कुछ नहीं बस अपना टैक्स ईमानदारी से चुकाइए....
निश्छलता बाकी थी, अभी कल ही तो सवाल उठा कि हम कितना बचे हैं..... नहीं अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है...... अब भी कुछ बचे हुए हैं। फिर से एक बेतुका सवाल किया – हम तो ईमानदारी से अपना टैक्स भर रहे हैं, फिर भी तो बच्चे भूखे हैं।
सवाल करते ही सारी निश्छलता हवा हो गई...... खाँटी दुनियादारी सतह पर फैल गई..... जवाब जो पाना था – हमारे टैक्स चुकाने और बच्चों की भूख शांत होने के बीच बहुत सारे अप्स एंड डाउंस हैं...... हमारे लोकतंत्र के अप्स एंड डाउंस....
नहीं है क्या?

Thursday, 20 May 2010

होने-गंवाने का हिसाब


मानसून के आमद की खबरों के बीच पश्चिम में गर्मी अपने पूरे शबाब पर है..... दाना चुगने के लिए चोंच खोले चिड़िया के बच्चे की तरह धरती का मुँह जगह-जगह से खुलने लगा है..... मौसम की कुछ ज्यादा ही मेहरबानी रहती है हम पर जरा बदला नहीं.... मन भी बदलने लगता है.....। हाँ तो अभी हर जगह तपन है.... भारी..... तेज-तीखे दिन और गहरी गुनगुनी शामों के साथ पठार की रातें जरा सुरमई मीठी हो जाती है, लेकिन क्या करें कि दिन भर की तपन
उसकी मिठास भी लील लेती है......तो जब रात हाथ आती है तो खुद हम कुछ बचे नहीं होते हैं। अब यूँ ही हम कितने बचे होते हैं......?
बस यही खऱाब आदत है, बात सीधी हो लेकिन पहुँच जाती है टेढ़ी-मेढ़ी गलियों में...... यूँ भी हम कितने बचे हुए हैं........ ? अब ये तो कोई सवाल नहीं है..... लेकिन है कैसे नहीं.... यही तो सवाल है...... सवालों वाला......खूब सारे खाँचों.... बहुत सारे रिश्तों.... सपनों, ख्वाहिशों, जरूरतों, अपेक्षाओं और समझौतों के बीच
कोई भी जितना बचा रह पाता है.... बस उतने ही हम भी बचे हुए हैं.....। रिश्तों के बीच अपने होने को भूले..... हर रिश्ते, हर जगह और हर काम की अपेक्षाओं के बीच खुद कण-कण झरते हैं...... बहुत चुपके से..... खाँचों में पूरे ही स्वाहा हो गए..... और किसी पारंपरिक खाँचों को न भी बखाने तो जो भौतिक खाँचे हैं, वे तो हैं ही ना.... औरत, शादीशुदा....वर्किंग.....अजीब-सी.... घमंडी.... अकड़ू..... थोड़ी बहुत सहानुभूति हो तो.... संवेदनशील.... अच्छी और दो-तीन कांप्लीमेंट.... परिभाषित हुए और खेल खत्म.... बस इतने ही तो हैं, हम.... कितने.... बस कुछ शब्द.....यही है जिंदगी कुछ ख्बाव, चंद उम्मीदें.... लेकिन यहाँ तो मामला अपना है.... जीवन की कौन कहे.....। फिर बारी आती है खुद अपनी..... कई-कई सपनों, जरूरतों और ख्वाहिशों के पीछे भागते हम...... इस दौरान कितना और क्या छोड़ देते हैं, हिसाब ही नहीं रखते हैं। मेरे साथ रहने वाले 'विद्वान' कहते हैं कि - ''हर चीज की कीमत चुकानी पड़ती है, अब ये आपको तय करना है कि किसके बदले आप कितना चुकाना चाहते हैं....'' तो फिर खुद को अपने सपनों पर कुर्बान करते रहते है, यदि एक सपना हो तो नुकसान उतना नहीं होता.... लेकिन यदि सपनों की फौज ही हो तो फिर तो हम रेत के एक कण जितने वाल्यूम में भी नहीं बचते हैं.... लेकिन परवाह किसे हैं, सपनों के पीछे दौड़ते जाने के जुनून, असफल होने का दुख या सफल होने के नशे के बीच ये याद ही नहीं रहता है कि हम खुद को टटोल लें.... देख लें.... कि अब अपने लिए कितना बचे हैं... ...? और जब हमें इतना होश आता है कि हम अपने होने को टटोल लें, सहेज लें.... तो पता लगता है कि सहेजने जैसा तो अब कुछ बचा ही नहीं है....। लेकिन
ज्यादातर तो हो जाने से ही संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन हमारे जैसे कुछ होने से नहीं चुपाते हैं तो फिर इसी तरह के सवाल उठाते हैं, जिनका न सिर होता है और न ही पैर.... तो हम बहुत कुछ हो तो जाते हैं, लेकिन इस होने के चक्कर में रह कुछ नहीं जाते हैं... . एक खाली-खाली सा वजूद जो दूसरों के लिए बहुत कुछ होता है, बस अपने ही लिए कुछ नहीं रह पाता है....। अब ये तो कोई इत्तफाक नहीं है कि मैं ये सब लिख रही हूँ और मेंहदी हसन साहब शायर फरहत
शहजाद को फरमा रहे हैं -
अपना आप गंवा कर तूने, पाया है क्या,
मत सोचा कर, मर जाएगा......
फिर.......?

Tuesday, 11 May 2010

दर्द के लिए दवा के तौर पर दर्द की तलाश


बेचैन दिन और तपती-सी रातें हैं.... उद्वेलन, उलझन और विषाद की पर्तें चढ़ने लगी है। होने पर सवाल और मुट्ठी में बँधी रेत-सी फिसलती....साँसों का अहसास.... हो पाने का अहसास और होने को बहा दिए जाने की तीखी ख्वाहिश..... ऐसे ही तपते, उलझे और मुश्किल दिनों में शिद्दत से बीमार हो जाने की ख्वाहिश करती हूँ.....। बेवकूफ कही जाती हूँ.... इसलिए ख्वाहिश तो करती हूँ, लेकिन उसे जाहिर नहीं करती...... अक्सर 2-4 दिनों के बुखार के बाद यूँ लगता है, जैसे पुनर्जन्म हुआ है..... पुराना सब कुछ कहीं इन दिनों में बह गया है.... सारी उलझनें सुलझ जाती है और जीवन अपने पूरेपन में नया हो जाता है..... हम भी.....लेकिन या तो मैं गलत हूँ या फिर मेरे एहसास..... या फिर...... पता नहीं... मेरा लगना और चाहना एक बार फिर से उसी शिद्दत से उभर रहा है। विचारों और ख्वाहिशों की गुंजलक बन गई है.... उलझनें गहरी हो गई है और कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है.....। तो फिर वही ख्वाहिश उभरी है...। अपने धुल जाने और नए हो जाने के लिए फिर से बीमार हो जाना चाहती हूँ।
इन दिनों निर्मल वर्मा की डायरी पढ़ रही हूँ। इससे पहले कभी किसी की डायरी पढ़कर यह नहीं लगा कि ये मेरा आइना है.... इसे पढ़कर हर दिन लगता है। इच्छा जागती है कि काश ये कंठस्थ हो जाए..... इसकी हरेक चीज मुझे याद रहे..... जानती हूँ, थोड़ा मुश्किल है। हाँ तो इसका जिक्र इसलिए यहाँ आया कि वे भी यही कहते हैं....
क्या बीमारी किसी सॉल्वेंट का काम करती है, जिसमें हमारा मैं घुल जाता है और हम दुबारा इस दुनिया में नई साँस लेने आते हैं – मानो देह का बुखार आत्मा के ज्वर को अपने में समा लेता है और उसे हल्का और मुक्त छोड़ देता है।

ये पढ़कर मुझे अच्छा लगा..... आखिर इस दुनिया में कोई तो है/था, जो मेरी ही तरह महसूस करता है/था। हालाँकि कोई भी विचार, अहसास दुनिया में अनूठा, अलबेला नहीं होता है, लेकिन जब तक हमें उस तरह से सोचने और महसूस करने वाला न मिले तब तक के लिए तो वह अनूठा ही हुआ ना....! खैर अच्छा लगने का कारण एक तो यह है कि आखिर कार मैं ऐसा कुछ तो महसूस करती हूँ जो निर्मल वर्मा जैसे धुरंधर बौद्धिक ने भी कभी अनुभव किया है। दिल के खुश रखने के लिए कोई भी खयाल क्या बुरा है।
तो मेरे बीमार होने की दुआ करें...... आमीन!

Saturday, 8 May 2010

माँ एक रसायन है



माँ से हमारा रिश्ता सबसे पुराना होता है, खून का....इसलिए उसे तो हमें प्यार करना हुआ ही..... कुछ ऐसे रिश्ते भी होते हैं, जो माँ की तरह खून से तो नहीं बँधे होते हैं, लेकिन उनके होना, हमारे जीवन की नींव में होता है, और वो इतना पुख्ता होता है, कि उसका अहसास हमें जीवन के हर मोड़ पर होता रहता है.... वो माँ नहीं होती, लेकिन उससे कम भी नहीं होती.... फिर हरेक के जीवन में ऐसे रिश्ते नहीं होते हैं, ये बहुत रेयर है..... मैं खुशनसीब हूँ कि मेरे पास ऐसा रिश्ता है.....मदर्स डे पर एक ऐसा ही रिश्ता...... आदरांजलि के साथ
गर्मियों की शाम थी.... वे जल्दी-जल्दी मुझे तैयार कर रही थीं.... पता नहीं कब से दोनों ने मुझसे जुड़े हुए कामों को आपस में बाँट लिया था.... या फिर ये यूँ ही बस होता चला गया था। बालों में तेल लगाना, उन्हें रीठा-शिकाकाई से धोना बा (ताईजी, यूँ गुजराती में माँ के लिए बा शब्द का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन हम भाई-बहन ताईजी को बा कहते हैं, क्योंकि भइया, (ताईजी का बेटा) उन्हें बा कहता है, इसलिए हम भी उन्हें बा कहने लगे) के जिम्मे था और उन्हें सुलझाना, बाँधना और जुएँ निकालना माँ के हिस्से।
दरअसल मेरे लंबे खूबसूरत बालों को लेकर बा और पप्पा (ताऊजी) दोनों ही अतिरिक्त रूप से सतर्क थे। और वे उसके लिए वे सारे खटकर्म करते थे, जो उन्हें कोई भी सुझा देता था। हाँ तो बा मुझे डांस क्लास ले जाने के लिए तैयार खड़ी थी और मैं खेलने में मगन थी। पता नहीं माँ जल्दी-जल्दी कर सुलझा रही थी इसलिए या फिर मुझे दुख रहा था, इसलिए मैं जोर सी चीखी थी... आप बाल खींच रही हैं।
माँ ने सिर पर तड़ाक से चपत लगाई थी.... तू सीधी नहीं बैठ रही है, कैसे सुलझाऊँ.... बा का गोरा चेहरा तमतमा आया था। गुस्सा वे करती नहीं हैं, फिर भी खीझकर बोली थी, उसे दुख रहा है, तू छोड़ मैं कर देती हूँ। माँ गुस्सा होकर वहाँ से चली गई थी। अपने राम को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। ना तो माँ एक से ज्यादा आम खाने को देगी, ना आम आते ही उन्हें हाथ लगाने देंगी, रात को खिचड़ी खानी होगी तो भी माँ तो बनाकर देने से रही..... कलाकंद भी तो बा ही मँगवा कर खिलाएगी तो फिर माँ के गुस्सा होने से फर्क क्या पड़ता है.... होती रहे गुस्सा....।
उनके साथ मेरा बचपन भरा-भरा था, मैं बा के साथ ही रहती, कहीं जाना हो तो बा के साथ, बा मायके जाए या फिर बहन के घर शादी में मैं साथ ही टँगी रहती थी। शायद ही कभी किसी ने बा को मेरे बिना देखा हो। माँ के साथ आना-जाना मुझे ज्यादा सुहाता नहीं था। माँ बहुत अनुशासित हैं और बहुत टोका-टोकी करती हैं... और बा.... बा के साथ तो बिंदास रहा जा सकता है। इसलिए जब माँ मायके जाती तो हम दोनों भाई-बहनों की कोशिश हुआ करती थी कि हम ना जाएँ और हाँ बा की भी.... हमारे न जाने के पीछे के कारण स्पष्ट थे, यदि आधी रात को भी हलवा खाने की फरमाईश की तो बा ही पूरी करेगी.... माँ तो डाँट-पीटकर सुला ही दें....।
शायद उसी समय का वाकया है.... बैसाख के अंतिम दिन थे, परीक्षाएँ खत्म हो चुकी थी। माँ मायके जाने की तैयारी कर रही थी, वे चाहती थीं कि हम दोनों भी उनके साथ जाएँ.... कारण स्पष्ट था, सभी बहनें अपने-अपने परिवार के साथ वहाँ आएगी.... आखिर नाना-नानी को भी तो हमारा इंतजार होता था, फिर शायद एक वजह यह भी रही होगी कि वहाँ हम दोनों बहुत सयाने माने जाते थे, कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं, कोई जिद नहीं... जाहिर है वहाँ हमारी तारीफ हुआ करती थी.... हो सकता है माँ को यह अच्छा लगता हो.... यूँ माँ ने हमारी तारीफ कभी नहीं की.... शायद यहाँ भी दोनों ने कोई समझौता किया हो कि अनुशासन माँ देगी और प्यार बा करेगी।
मुझे ननिहाल जाना पसंद नहीं था, बात यह है कि बा की वजह से हम दोनों भाई-बहन बहुत चटोरे हो गए थे। हर दिन सामान्य खाना हमारे बस की बात नहीं थी.... और चूँकि नानी हमारी माँ की भी माँ हैं, इसलिए अनुशासन में वे माँ से भी एक कदम आगे थी....इसलिए उनका फरमान रहता थी कि घर में जो कुछ बना है, सभी वही खाएँगे.... जब खाने की थाली पर बैठकर हम भाई-बहन नाक-भौं सिकोड़ते थे तो नानी हमारी माँ से कहतीं थी - तेरी जेठानी ने तेरे बच्चों को बहुत बिगाड़ दिया है, सिर्फ अच्छा खाने को चाहिए...। तब तो यूँ लगता था कि नानी बा की बुराई कर रही है, आज समझ में आता है, कि नहीं वो उनकी तारीफ थी।
हाँ तो माँ जाने के लिए अंदर के कमरे में सूटकेस जमा रही थी और बा बहुत बेचैनी से अंदर-बाहर-अंदर-बाहर कर रही थीं। कभी कोई दवा लेकर आतीं और माँ को रखने के लिए देती तो कभी ग्लूकोज देती, तो कभी हिदायतें....बहुत देर तक माँ अपनी झुँझलाहट छिपाने की कोशिश करती रहीं, फिर रहा नहीं गया तो कह दिया - आपके बच्चों को आपके पास ही छोड़ जाती हूँ।
बा थोड़ी खिसिया गईं.... नहीं बेटा गुस्सा मत कर... बच्चे वहाँ जाकर बीमार हो जाते हैं ना! बस इसीलिए थोड़ी चिंता होती है।
माँ मीठे-से मुस्कुरा दी - मैं ध्यान रखूँगी, आप चिंता न करें।
लेकिन फिर ऐन मौके पर पता नहीं कहाँ क्या गड़बड़ा जाता कि मैं माँ के साथ जाने से इंकार कर देती..... क्योंकि यहाँ जितनी स्वतंत्रता मिलती है, और जितना स्पेशल ट्रीटमेंट मिलता है, वह ननिहाल में मिलने से रहा।
जाने वाले दिन सामान आँगन में रखकर ऑटो का इंतजार हो रहा होता है, तभी बा आकर माँ की गोद भरती है। ऑटो आकर घर के सामने खड़ा हुआ है.... इधर दोनों एक-दूसरे के गले मिलकर सुबकने लगती है। मुझे बड़ी हैरत होती है, माँ तो अपनी माँ से मिलने जा रही है तो फिर वो क्यों रो रही है? और बा को क्या हो गया है? लेकिन दोनों को रोता देखकर मैं भी बुक्का फाड़कर रोने लगती हूँ तो बा मुझे गले लगा लेती है। ये सीन साल-दर-साल गर्मियों में दोहराया जाता रहा है।
पता नहीं ऐसा डांस की प्रैक्टिस करने से होता है, या फिर ये विरासत में मिला है.... रात में पैर बहुत दर्द करते थे... आधी रात को उठकर बैठ जाती और बुक्का फाड़कर रोने लगती.... बा घबराकर उठती ( माँ बताती हैं कि जब मैं तीन महीने की थी, तभी से बा के साथ सोने लगी थी।)। सिर पर प्यार से हाथ फेरती, क्या हुआ बेटा....?
पाँव बहुत दुख रहे हैं....- मैं कहती
वे बहुत देर तक दबाती रहती, नींद लगती और फिर जाग कर रोने लगती.... फिर वे केरोसीन लाकर लगाने लगती तो पलंग पर सोया हुआ भईया ( बा का बेटा) उसकी गंध से जाग जाता और कहता - सारे बिस्तरों में केरोसीन की गंध भर जाएगी।
बा को गुस्सा आ जाता... तू चुपचाप सो तो, घासलेट की गंध अभी उड़ती है, फिर छोरी के पाँव दुख रहे हैं और तुझे गंध की पड़ी है।
शायद बहुत बचपन की बात है.... कोई विशेष अवसर था, इसलिए फइयों (बुआओं) के परिवार को खाने पर बुलाया था। बाल धोने की बारी थी और बा मुझे नहला रही थी। खूब देर तक सिर को रगड़ा फिर साबुन से गर्दन रगड़ने लगी और कहा - देख गर्दन कितनी काली कर रखी है। ठीक से नहाती भी नहीं है।
फई बहुत देर तक मुझे यूँ नहलाते देख शायद ऊब गईं थी... वे बोल पड़ी - भाभी कितना ही रगड़ो यह तो काली ही रहेगी।
मैं रूआँसी हो गईं थी... और बा चिढ़ गईं थी। आपको ऐसा कहना शोभा नहीं देता - जाने कैसे वे कह गईं थीं, जबकि मैंने उन्हें कभी किसी को जवाब देते नहीं देखा था। फई को खिसियाते देखा था मैंने।
मेरी शादी के बाद की घटना थी... किसी शादी से लौटी थी, इसलिए साड़ी पहनी थी और तैयार भी हुई थी.... हमेशा की तरह भाई से किसी बौद्धिक बहस में उलझी हुईं थी और मेरा ध्यान नहीं था कि वे बहुत देर से मुझे देख रही थी। फिर बहुत सकुचाते हुए कहती हैं - तू तो हीरोइन की तरह लग रही है।
उनके पास तारीफ करने का इससे बेहतर और कोई तरीका जो नहीं था। बरसों बरस अपने रंग को लेकर ताने सहती और डिप्रेशन में रहती एक लड़की से एक गोरी-चिट्टी और खूबसूरत महिला ऐसा कहे जो उसकी माँ भी नहीं है तो फिर मानना पड़ेगा कि ऐसा सिर्फ माँ ही कह सकती है, .... सिर्फ और सिर्फ माँ।
बा के रूप में मैंने स्त्री के आदर्श रूप को जाना है। जाना है कि माँ होने के लिए बच्चे तो जन्म देना जरूरी नहीं है.... ये रसायन है, फिर वे तो माँ भी हैं.... मैंने अपने जीवन में उन्हें कभी माँ के अतिरिक्त किसी और भूमिका में नहीं देखा.... बहुत सारे रिश्ते उनके आसपास हैं, फिर भी हर रिश्तों में जो सबसे ज्यादा उभरकर आता है, वह उनका माँ होना..... वे पत्नी हैं, बहन, भाभी, सास, जेठानी और अब तो दादी भी.... लेकिन फिर भी उनका माँ वाला रूप उन सबसे उपर है, वह हमेशा हर रिश्ते में माँ हो जाती हैं। शायद इसीलिए वे हर रिश्ते को प्यार और मीठी-सी सुवास से भर देती है। अपने बच्चों को सभी माएँ प्यार करती हैं, लेकिन यदि दुसरों के बच्चों को प्यार कर पाए तभी औरत वहाँ पहुँच पाती है, जहाँ वो सचमुच माँ हो पाती है। मेरी बा ऐसी ही है....। स्मृति तो इतनी है कि एक उपन्यास भी कम हो.... लेकिन क्या प्यार की कोई माप हो सकती है? क्या शब्द वो सब कह पाते हैं, जो हम सचमुच कहना चाहते हैं? नहीं... शब्द महज शब्द हैं.....लेकिन अहसासों को कहने के लिए हमें इनका ही सहारा लेना पड़ता है.... फिर किसी को यह कहने के लिए कि उसका होना हमारे जीवन की नींव से है, शब्द ही सहारा होते हैं....इसीलिए... इतने सारे बहाए हैं.... पता नहीं कितना कह पाई हूँ....?

Tuesday, 4 May 2010

जीने का शऊर आ रहा है....?


झिलमिलाते तारों और खिलखिलाती हवा के साथ रात की जुगलबंदी के माहौल में अपनी साधना के पन्नों को पलटते हुए बहुत सारी शहद की बूँदे जहन में उतरी थी.... सोचा था, सुबह बहुत मीठी होगी...। जागने से पहले और नींद के लंबे दौर के बाद जब आँखें खुली तो पता नहीं क्यों कुछ बोझ सा महसूस हुआ, फिर सो गईं। सुबह चाय के कप के साथ अखबार पर फिसलती नजरें थी.... क्या पढ़ा ये तो पता नहीं लेकिन जो कुछ देखा वो कहीं टँक गया। एकाएक लगा कि बहुत हॉचपॉच हो रहा है। शायद दिमाग की स्टोरिंग कैपेसिटी कम है या फिर सारी ड्राइव फुल हो गई है.... तभी तो सूचनाओं की ड्राइव को खोलो तो विचारों की खुल आती है और अहसासों की ड्राइव को खोलने की कोशिश करें तो स्मृतियों की खुल पड़ती है..... अब ये तो आपकी समझ में आता ही है कि जब आप काम करना चाहते हैं, और सिस्टम बार-बार दिक्कत दे रहा हो तो, फिर किस तरह की बेचैनी होने लगती है। ठीक वैसी ही बेचैनी है..... काम करने का अपना सिस्टम है, तो हाथ यांत्रिक तरीके से काम कर रहे होते हैं, और दिमाग अपनी तरह से, लेकिन मन में कहीं कुछ ऐसा है, जो कहीं जम नहीं पा रहा है, कहीं स्थिर नहीं हो पा रहा है। बहुत सारी अनुभूतियों और सवालों की खिचड़ी पक रही है...... कहीं केंद्रीत नहीं कर पा रही हूँ.... और कुमारजी सुनाते हैं, उड़ जाएगा हंस अकेला.....,कहीं कुछ जमा हुआ दरकने लगा...... गीला-गीलापन उतर आया और विचार आया यही सच है..... लेकिन ये आज क्यों...... नहीं ये उभरता रहता है, आज फिर उभरा है..... क्या जीने का शऊर आ गया?
मरने का सलीका आते ही जीने का शऊर आ जाता है....
नहीं....?

Sunday, 2 May 2010

भूख जगाता बाजार


गर्मियों के सुलगते दिन और बुझती रातों को जीना एक अहसास है... ठंडी सफेद चादरों पर जागे देर तक, तारों को देखते रहे छत पर पड़े हुए... की तरह का....तो देर तक जागती रातों वाली ऐसी ही राख हुई छुट्टी की सुबह थी। नींद गाढ़ी थी और उसका खुमार और भी गाढ़ा.... बाहर से लगातार आ रही ठक-ठक से पड़ा नींद में खलल.... उफ्, छुट्टी की सुबह भी चैन नहीं.... शिकायतें हमारा स्थायी-भाव है (सिर्फ मेरा ही नहीं, हम सबका)। बाहर जाकर देखा तो पास में बन रहे मकान के चौकीदार का 13 साल का बेटा था जितेंद्र.... हमारे हुलिए और मुद्रा को देखकर उसने चमकते दाँतों को थोड़ा झलकाकर खिसियाई-सी हँसी बिखेरी.... भईया है?
चिढ़कर पूछा - क्यों?
गाड़ी धोनी थी ना!
उसकी बात हमारी समझ में नहीं आई...।
क्या करना है, इतनी सुबह?
भईया ने कहा था कि गाड़ी धोनी है, इसलिए....- उसने बात अधूरी छोड़ दी।
अरे अभी तो सिर्फ सात ही बजी है, नौ बजे तक आना... – नींद पूरी तरह से हवा हो गई थी, इसलिए लहजे में भी थोड़ी नर्मी आ गई.... धीरे से पीछे बेटा लगा दिया।
बाद में लगभग हर दिन वह सुबह आ धमकता.... कोई काम है?
अरे इतना छोटा बच्चा और वह भी लड़का क्या काम करेगा? कभी गार्डन साफ करवाया, फिर हर दिन पौधों को पानी पिलाने की जिम्मेदारी भी उसे दे दी। अब धीरे-धीरे वह शाम को कुछ काम है? कहता हुआ आ टपकता.... एक दिन रहा नहीं गया, पूछना ही पड़ा.... इतना सारा काम करने की क्यों सूझ रही है। उसका जवाब था.... जूते खऱीदने हैं।
मामला यूँ था कि उसे हर काम के पैसे मिलते थे... दो गाड़ी धोई तो 10 रु. पौधों को पानी पिलाया और गार्डन साफ किया तो हर काम के 10 रु. तो बस वह काम की तलाश में आ धमकता.... वह छुटिट्यों में काम करके पैसा जमा कर 11 सौ रु. के जूते खरीदना चाहता है। हमने उसे समझाया – बेटा, इन 10-10 रुपयों को इकट्ठा कर तुम खऱीद चुके जूते.... भूल जा... उन जूतों को....। तीन चार दिन बाद पता चला कि उसके पिता ने दोनों भाईयों को शहर की किसी दुकान पर काम में लगा दिया है।
अब आप इस पर तो जरा भी मत विचारो कि सरकार के मरे बाल श्रम निषेध कानून का क्या होगा? मामला यह नहीं है। उस 10 बाय 10 की कोठरी में मकान में मजदूरी करते पाँच बच्चों के साथ रहते माता-पिता के बच्चे को 11 सौ रु. के जूते लेने की इच्छा कहाँ से जागी? यहाँ आकर गाँधीजी असफल हो जाते हैं, जरूरतें सीमित करो... अरे मामला जरूरतों से आगे का है, इच्छा और फिर वह सीधे जा मिलता है, भूख से.... हवस से....। भूख पहले भी थी, लेकिन इतनी विकराल नहीं थी, जितनी विकराल भूख होगी, उतनी ही विशाल उसकी तृप्ति भी होगी। तो यूँ तो जितेंद्र को जरूरत नहीं थी इतने महँगे जूतों की, लेकिन उसकी भूख तो थी। उसने किसी विज्ञापन में धोनी को वे जूते पहने देख लिया था, फिर.... ? कहाँ से लाए संतोष..... यह जो बाजार है, जिसने अब तक सिर्फ भूख ही पैदा की है, तृप्ति नहीं....तो फिर संतोष आएगा कहाँ से?
औद्योगिक क्रांति के बाद के विकास का इतिहास पूरी तरह से बाजारों की खोज का इतिहास रहा है, इसी खोज ने उपनिवेश बनाए और ग्लोबलाइजेशन के लिए जमीन तैयार की.... सोवियत संघ का पतन तो महज तात्कालिक कारण रहा। मूल कारण तो भूख ही है... लगातार पाने की... सफलता, शोहरत, दौलत, चमक-दमक.... हर कहीं पसरी, लगातार फैलती भूख...विकास की आड़ में फैलती-पनपती भूख... विकास को जस्टिफाई करती.... उसे डिफाइन करती भूख.... बाजार सिर्फ भूख ही पैदा कर सकता है.... उसे तृप्त करना बाजार के बस का रोग नहीं है। बाजार द्वारा पैदा की गई हवस और उसकी तृप्ति के गुमनाम रास्तों से आया मवाद सारे समाज में फैल गया है। हम कितना ही कहें जातीय, ऐतिहासिक या धार्मिक मामले हैं,... लेकिन इन सबके मूल में कहीं एक ही चीज है, भूख.... बेहिसाब भूख.... कहीं पेट भरने की.... तो कहीं पाने और भोगने की...।
भूख का विस्तार जरूरतों के पहाड़ों को तो कब का लाँघ चुका है.... वह सबकुछ को डुबो देने को आतुर है..... और देखिए.... कि बाजार ने सपनों के चमकीले साँप हर घर में छोड़ दिए हैं.... उससे कोई बचाव, कोई सुरक्षा न तो सरकारों के बस में है और न ही कथित संस्कृति के बस में..... हम बस इस ‘भूख’ के प्रवाह में डूब रहे हैं..... बचाव कुछ नहीं.... है, डूबना ही नियति है.... बस

Wednesday, 21 April 2010

डुबोया मुझको होने ने....


हम हर वक्त होना चाहते हैं, बल्कि होने के अलावा हम और कुछ चाह भी नहीं सकते हैं, एक साथ पैसा, शोहरत, इज्जत, नाम, खुबसूरती, तंदुरूस्ती और पता नहीं क्या-क्या.... चाहते हैं.... होना और होना.... होने की दौड़ में हैं हम सब... पूरी जिंदगी इस होने के नाम कुर्बान करते हैं, फिर आखिर में क्या हो पाते हैं हम? हममें से हरेक लगता है होने के लिए ही पैदा हुआ है। होना ही सब चेतना, क्रिया, विचार, संवेदना और भावना के मूल में हैं। सपने इसका स्रोत हैं। यूँ हर कोई कुछ-न-कुछ तो हो ही जाता है, लेकिन जो हकीकत में होना चाहते हैं, वह कितने हो पाते हैं। कुछ ही वहाँ तक पहुँच पाते हैं, जहाँ वे होना चाहते हैं, शेष तो बस घिसटते हुए कुछ भी हो जाते हैं। फिर भी कुछ न कुछ तो होना ही होता है। हम भी हुए कुछ.... वो तो नहीं जो चाहा था, लेकिन फिर भी होने जैसे कुछ तो हुए ही.... (अब होना तो मजबूरी है ना) फिर होना हर पल होता है, तो होते ही रहते हैं। होना अच्छा भी लगता है, कहीं कुछ हमें दूसरों से उपर करता लगता है, कभी हम दूसरों से कम भी होते है, फिर भी होते तो हैं ही, ये लगातार चलती रहती है, मरने तक.... होने के लिए ही जो जन्मे हैं....।
ज्यादातर तो ये होना अच्छा ही लगता है। यदि मन का हो जाए तो सातवें आसमान पर होते हैं, नहीं हो तो भी कुछ दिन दुखी होकर भी जो है, उसी में मन लगाने लगते हैं और होने का उत्सव जीवन भर मनाते हैं। होना नशा है.... गहरा..... जीने का सहारा भी, इसलिए होना जरूरी है, लेकिन कभी-कभी मन यूँ भी करता है, काश ये होना थोड़े दिन के लिए ही स्थगित हो जाए.... होने की चेतना, उसका अहसास हवा हो जाए..... रूह भाप बनकर उड़ जाए, जहन बादल होकर बरस जाए.... बदन रेत की तरह भुरभुरा जाए.... और हम होने से न-कुछ हो जाए।
ग़ाल़िब ने लिखा था
न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता
डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता
अभी हम इस दर्शन में नहीं पड़ रहे हैं कि खुदा के होने से पहले क्या था, और खुदा के न होने पर क्या होगा? यहाँ मामला अपनी संवेदनाओं का, अपनी चाहतों का है तो बेचारे खुदा को क्यों घसीटे? हाँ तो चाहते हैं, न हों...... उस प्रेम की गली में गर्क़ हो जाए जो बहुत सँकरी है.... जिसमें या तो हम हो या फिर वो..... फिर हम ही रल जाए, गल जाएँ, खत्म हो जाए.... लेकिन.... अपने होने के भारी-भरकम अहसास को कहाँ लेकर जाएँ? फिर कुछ हो जाने के बाद भी क्या है? कोई खुशी.... कोई संतुष्टि.... कोई अर्थ नहीं है.... तो फिर क्या यही सही है
रास आया नहीं तस्कीन का साहिल कोई
फिर मुझे प्यास के दरिया में उतारा जाए

Sunday, 18 April 2010

मैं ही कश्ती हूँ, मुझीं में है समंदर मेरा




निदा फ़ाज़ली का शेर है
हर घड़ी खुद से उलझना है मुकद्दर मेरा
मैं ही कश्ती हूँ, मुझीं में है समंदर मेरा
बस कुछ ऐसे ही हाल है, इन दिनों.... ऊब के साथ अरूचि का संयोग है, न सूफी पसंद आ रहा है, न गज़लें, न शास्त्रीय.... न फिक्शन भा रहा है, न फैक्चुअल... न फिलॉसफी और न ही लिट्रेचर.... न दौड़ना अच्छा लग रहा है न ही रूकना... बैठना.... क्या करें कुछ समझ ही नहीं आ रहा है। कहाँ जाना है, क्यों जाना है और पहुँच कर क्या करना है, ऐसे सवाल फिर से उछल रहे हैं। हर सुबह ऊब के साथ शुरू होती है, हर दिन एक-सा क्यों है? इस सवाल से दिन शुरू होता है, काम के दौरान यह सवाल ओझल तो हो चुका होता है, लेकिन उसके होने का अहसास बना रहता है और फुर्सत पाते ही वह फिर लहराने लगता है। कोई काम करना नहीं भा रहा है। यूँ लगता है दिन बस गुजार रहे हैं। सपनों की मौत हो जाने से शायद ऐसी त्रासद स्थिति बन जाती है। जीवन से अपेक्षा खत्म हो जाए... चाहना स्थगित हो जाए और आकर्षण कहीं गुम हो जाए तो.... यूँ भी गाहे-ब-गाहे सवाल तो उठता ही है, कि जो कुछ है जीते जी ही है, मरने के बाद क्या है? तो फिर बहुत सारा कुछ करने से हासिल क्या है? हमारे बाद यदि महफिल में अफसाने बयां होंगे तो हमारे लिए क्या है?
हमारे होने का मतलब क्या है? हम नहीं हों तो भी इस दुनिया में क्या बदल जाएगा? फिर से वैसे ही सवाल.... उलझाव घना है, और दुनिया के चलते चले जाने पर गहरा आश्चर्य भी.... क्यों है इतनी दौड़.... क्या सवालों की आग यहीं सुलगती है और कहीं नहीं, यदि कहीं और भी सुलगती है तो उसकी लपटें क्यों नहीं दिखती.... ? क्यों नहीं समझ पातें कि ये दुनिया ऐसी और हम वैसे क्यों हैं?
सवाल वही है.... जवाब नहीं है.... होगा, ऐसी कोई उम्मीद भी नहीं हैं..... बस लेकिन क्या करें कि समझ नहीं पाते हैं। शायद ये थोड़ा मुश्किल है किसी ओर के लिए समझना, क्योंकि
ये अक्ल वाले नहीं एहले दिल समझते हैं
कि क्यूँ शराब से पहले वज़ू जरूरी है

Monday, 29 March 2010

ट्रेडमिल पर सभ्यता...



सप्ताह की शुरुआत में ज्यादातर काम रविवार को आए अखबारों और पत्रिकाओं को देखने का ही होता है... इस तरह से अपने दिमाग में कुछ और कूड़ा जमा हो जाता है..., लेकिन ये बेवजह नहीं होता है, क्योंकि इन सूचनाओं से ही किसी विचार तक पहुँचा जाता है। तो एक तरह से यह एक अच्छी एक्सरसाइज ही है। खैर... तो सप्ताह का पहला गर्म दिन... पत्रिकाओं का ढेर... अंग्रेजी में हाथ थोड़ा तंग है, इसलिए पहले वहीं से शुरुआत... एक अंग्रेजी साप्ताहिक पत्रिका की एक छोटी-सी स्टोरी पर नजर गई। इंटरनेशनल अडाप्शन को केंद्र में रखकर कुछ सूचनाएँ और बहुत सारी आशंकाएँ.... इंटरनेशनल अडाप्शन के गोरखधंधे के पीछे ह्युमन ट्रैफिकिंग की चर्चा और इसी के मद्देनजर यह सूचना कि दुनिया भर के 13 देशों में इंटरनेशनल अडाप्शन को प्रतिबंधित कर दिया गया है।
जब भी हम घर से निकलते हैं, तो आसपास नजरें दौड़ाते चलते हैं, यूँ लगता है कि हमारी तरह हरेक जल्दी में है। सबको कहीं न कहीं पहुँचना होता है, न सिर्फ पहुँचना होता है, बल्कि जल्दी पहुँचना होता है, लगता है कि हर जगह जल्दी पहुँचने की प्रतिस्पर्धा सी है। यह जल्दी पहुँचना दरअसल इस दौर का एक सांकेतिक लक्षण है... इसके पीछे बहुत गहरे संदर्भ है। हम एक दूसरे के कंधों पर और यदि जरूरत हुई तो लाशों पर भी पैर रखकर आगे बढ़ते जाएँगें। आखिर को यदि डार्विन का survival of the fittest ही हमारा मूल्य है तो फिर यह तो होना ही हुआ ना! तो आखिर हम सभ्यता नुमा एक गर्व के साथ यहाँ तक पहुँचे तो हैं, लेकिन हमारे मूल्य तो वही है, हमारा लक्ष्य भी वही है तो उस मूल्य और लक्ष्य को लेकर हम पहुँच भी कहाँ सकते हैं?
ऐसे ही एक सवाल उठा कि हम (मानवीय सभ्यता ने कितना सफर तय किया) कितना चले.... लेकिन पहुँचे कहाँ? कहीँ पहुँचे भी है या वहीं खड़े हुए हैं। फ्रायड ने अपने विश्लेषण में कहा था कि भय, भूख और सेक्स से इंसान संचालित होता है। जहाँ तक मेरी समझ जाती है, भूख का संदर्भ भूख (hunger) से ही लिया गया होगा, क्योंकि फ्रायड आखिर में मनःविश्लेषक ही थे, भविष्यदृष्टा तो नहीं ही थे। वे शायद ही समझ पाए होंगे कि भविष्य में भूख का संदर्भ बहुत व्यापक होगा.... इतना कि उससे बाहर और कुछ नहीं होगा... हकीकत में भूख (hunger) छोड़कर.... बाकी सब कुछ भूख का हिस्सा ही होगा। इतिहास फ्रायड के विश्लेषण को सही सिद्ध करता है, वह बताता है कि सभ्यता के प्रारंभ में इन्हीं तीनों संवेगों के चलते, युद्ध भी हुए, हिंसा भी और परिवार भी आगे बढ़े... हमारे ज्ञान-विज्ञान के प्रत्येक स्तर पर सभ्यता के विकास को लेकर बहुत सारी स्थापनाएँ हैं, सिद्धांत है.... आखिरकार हम प्रगति की राह के राही हो गए...। भूख का अस्तित्व अब भी है.... फ्रायड की भूख पता नहीं, किस-किस रूप में कहाँ-कहाँ छुपी हुई है, लेकिन इसका भी स्वरूप सभ्यता की शुरुआती भूख की तरह का नहीं बचा है। इतिहास सभ्यता के इस सफर पर इन तीनों पर विजय पाने और नियंत्रित करने के मिशन पर रहा है, ( यूँ तो यह भी कहा जा सकता है कि दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये खयाल अच्छा है), क्योंकि सभ्यता के प्रारंभिक दौर के बाद का सारा इतिहास... इससे उबरने के बाद एक नई तरह की भूख (हवस) को पूरा करने का रहा है।
बरसों बरस हमने इस गफलत में निकाल दिए कि हमने पृथ्वी अब रहने लायक बना ली है। हमने मानव की आदिम प्रवृत्तियों पर विजय पा ली है। हम बर्बर दौर से निकल गए है, इसके उदाहरण के तौर पर हम तरक्की के सारे पैमानों को रखते हैं, लेकिन फिर भी कहीं कुछ रह जाता है, कुछ अटक जाता है, जो हमसे पूछता है कि क्या हम वाकई उस बर्बर दौर से निकल आए हैं या फिर अपने आसपास इसका मात्र आभास पैदा कर लिया है।
देखिए ना... अपनी हवस को पूरा करने के लिए हम क्या-क्या कर सकते हैं? किसी की हत्या इसका आखिर उदाहरण है, लेकिन वह हर जगह मौजूद है, तो फिर हम आदिम दौर से कितना आगे आए हैं? इंसान मूलतः तो वही है, वहीं है, क्योंकि हम यदि उससे थोड़ा भी आगे बढ़े होते तो फिर कानून और पुलिस की व्यवस्था कहीं तो अप्रासंगिक होती, कहीं तो इसकी जरूरत कम होती.... बजाए इसके कम होने के यह तो लगातार बढ़ती ही जा रही है। तो एक कृत्रिम संतोष के साथ कि हम सभ्य हो गए हैं, हम लगातार भुलावे में हैं। लाखों साल के सफर के बाद भी इंसान के तौर पर हम वहीं है। विज्ञान, तकनीक, कला और संस्कृति ने चाहे तरक्की कर ली हो, लेकिन इंसान अब तक अपनी बर्बरता से मुक्ति नहीं पा सका है। अब तक वह अपनी भूख को समेटे हुए सभ्य होने का दिखावा कर रहा है। या यह कि अब उसने अपनी भूख को इतना फैला लिया है कि उसकी ज़द में सब कुछ आ गया है और मजे की बात यह है कि उसने इस एक भूख को इतने नाम दे दिए हैं कि उसे पहचान पाना भी मुश्किल हो रहा है। बात तो महज इतनी सी ही है कि सभ्यता लाखों साल से ट्रेडमिल पर है, वह वहाँ से एक सूत भर भी आगे नहीं गई है, हाँ लेकिन लगातार ट्रेडमिल पर होने से वह पतली हो चली है....thin….thin….thiner
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कुछ दिन पहले एक एसएमएस आया...चूँकि इसका मतलब अंग्रेजी में ज्यादा असरदार नजर आया तो जस का तस.... आपके लिए
A world wide survey conducted by the U N. The only question asked was – Would u please give your honest opinion about solutions to the food shortage in the rest of the world? The survey was a huge failure, because in AFRICA they didn’t know what FOOD meant, in INDIA they didn’t know what HONEST meant, in EUROPE they didn’t know what SHORTAGE meant, in CHINA they didn’t know what OPINION meant, in MIDDLE EAST they didn’t know what SOLUTION meant, in SOUTH AMERICA they didn’t know what PLEASE meant and in AMERICA they didn’t know what the REST OF THE WORLD meant.
क्या ट्रेडमिल पर सभ्यता के प्रकाश में इस एसएमएस के कुछ निहितार्थ खुलते हैं?

Thursday, 25 March 2010

बुरे से अच्छा हो तो भी मुश्किल..... बदलाव


जीवन में बहु प्रतिक्षित बदलाव आया , लेकिन फिर भी पसरी हुई है गहरी उदासीनता... विचार नहीं, विचारहीनता भी नहीं...मगर कुछ तो है जिसे नहीं होना चाहिए ...। दौड़ थमी, रफ्तार पर ब्रेक लगा, चुनौती मद्धम हो गई...। चाहा हुआ पाया....संतोष होना था, नहीं हुआ...सतह पर काई की तरह जमी हुई है उदासीनता...। कोई बहुप्रतिक्षित परिवर्तन उदासीन कर देगा पता नहीं था। कहीं पढ़ा था - change is not made without inconvenience even from worst to better.... जब असहयोग आंदोलन अपने चरम पर था, तब एक छोटी-सी घटना को कारण बताकर गाँधीजी ने आंदोलन वापस लेने की घोषणा की तो दूसरे लोगों की ही तरह नेहरूजी ने भी निराश होकर कहा था कि-- इस तरह से होता है दुनिया का अंत...विस्फोट से साथ नहीं रिरियाकर...। कभी-कभी यूँ महसूस होता है कि सिर्फ दुर्घटनाएँ ही एकाएक घटती है, बाकी जीवन सामान्य होता है, बिना उत्तेजना के... रूके हुए पानी की तरह, जिसमें
कभी-कभी बहती हवा... थोड़ा स्पंदन पैदा कर देती है... बस..।
कभी-कभी अपना होना कई सवाल और कई संदेह पैदा करता है। कहीं कोई मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट या फिर कोई केमिकल लोचा जैसा कुछ तो नहीं है?...कुछ भी हो जाए सहजता दुर्लभ ही हो। सृजनात्मकता हो तो भी ऊब से निजात नहीं....ऊब मनचाहा पा लेने से तो असंतोष मनचाहा न मिल पाने से... मनचाहा मिल जाने के बाद भी असंतोष खुद से आँखें नहीं मिला पाने का... कभी-कभी यूँ लगता है कि अपनी मुश्किलों को व्यक्त करने के लिए शब्द तक का अकाल हो गया है... या शायद एक-ही से सवाल... रूप बदल-बदल कर आते रहते हैं... इन दिनों असंतोष कुछ नया नहीं कर पाने का, कुछ नया रच नहीं पाने का.....क्या है, जो लगातार बहता है, लावे की तरह....। इन दिनों एक विचार यूँ भी आता रहता है कि जब एक दिन सबकुछ छोड़कर चल ही देना है तो फिर सारे खटकर्म करने का मतलब क्या है? कुछ पा लिया या कुछ छूट गया... आखिर किसको हिसाब देना हैं... कौन-सा बहीखाता है? घुम-फिर कर वही प्रश्न हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है, कुछ भी करने का हासिल क्या है, अर्थहीनता की तीखी चेतना है या फिर खुद के चुके जाने का संदेह...कुछ तो है जो बेचैन किए रहता है। इस बेचैनी का कोई आकार भी नहीं, कोई स्रोत भी नहीं.... कि उसे दुनियावी चिमटे से पकड़कर जीवन से उसे अलग कर दें या फिर उस जगह से
जहाँ से ये बहकर या रिसकर आ रही है, वहीं लगा दें सीमेंट और उसे ही बूर दें...। क्यों है ये जीवन के साथ.... या कि यही है जीवन का अर्थ... कोरी अर्थहीनता.... सब कुछ का एक दिन बेमतलब... बेकार हो जाना.... क्या यही है जीवन?

Monday, 15 March 2010

सृष्टि के गर्भाधान का उत्सव गुड़ी पड़वा


फागुन के गुजरते-गुजरते आसमान साफ हो जाता है, दिन का आँचल सुनहरा, शाम लंबी, सुरमई और रात जब बहुत उदार और उदात्त होकर उतरती है तो सिर पर तारों का थाल झिलमिलाने लगता है। होली आ धमकती है, चाहे इसे आप धर्म से जोड़े या अर्थ से... सारा मामला आखिरकार मौसम और मन पर आकर टिक जाता है। इन्हीं दिनों वसंत जैसे आसमान और जमीन के बीच होली के रंगों की दुकान सजाए बैठता है.... अपने आँगन में जब गहरी गुलाबी हो रही बोगनविलिया, पीले झूमर से लटकते अमलतास और सिंदूर-से दहकते पलाश को देखते हैं, तो लगता है कि प्रकृति गहरे-मादक रंगों से शृंगार कर हमारे मन को मौसम के साथ समरस करने में लगी हैं, न जाने कहाँ से ये अनुभूति आती है कि प्रकृति का सारा कार्य व्यापार हमें (इंसानों को) खुश करने के लिए होता है... (हम जानते हैं यह सही नहीं हैं, हमारे, सभ्यता से पहले से ही प्रकृति का यही रंग-रूप रहा होगा...).. और हम खुश हो जाते हैं।
हाँ तो वसंत का आना हमेशा ही मन को उमंग से भर देता है, पता नहीं क्या है, इस मौसम में कि पूरे मौसम में हम आनंद-सागर में खुद को तैरता हुआ महसूस करते हैं। तो फिर क्यों न हमें वसंत भाए? लेकिन इसका संबंध जीवन के दर्शन से भी है, पत्तों का गिरना और कोंपलों के फूटने से पुराने के अवसान और नए के आगमन का संदेश हमें जीवन का अर्थ समझाता है। पतझड़ के साथ ही बहार के आने के अपने गहरे अर्थ हैं। एक साथ पतझड़ और बहार के आने से हम जीवन का उत्सव मना रहे होते हैं, तब कहीं रंग होता है, कहीं उमंग, बस इसी मोड़ पर एक और साल गुजरता है। गुड़ी पड़वा या वर्ष प्रतिपदा के साथ एक नया साल वसंत के मौसम में नीम पर आईं भूरी-लाल-हरी कोंपलों की तरह बहुत सारी संभावनाओं की पिटारी लेकर हमारे घरों में आ धमकता है। जब वसंत अपने शबाब पर है तो फिर इतिहास और पुराण कैसे इस मधुमौसम से अलग हो सकते हैं।
पुराणों में खासतौर पर ब्रह्मपुराण, अर्थववेद और शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख हैं कि गुड़ी पड़वा पर ब्रह्मा ने सृष्टि के सृजन की शुरुआत की थी। तो इस तरह हम गुड़ी पड़वा पर सृष्टि के गर्भाधान का उत्सव मनाते हैं। आखिरकार वसंत को नवजीवन के आरंभ के अतिरिक्त और किसी तरह से, कैसे मनाया जा सकता है? वसंत के संदेश को गुड़ी पड़वा की मान्यता से बेहतर और किसी भी तरह से भला परिभाषित किया जा सकता है?
तो नए साल के लिए आप सभी को ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ....

Sunday, 7 March 2010

अबला और दुर्गा के बीच


महिला दिवस पर सप्लीमेंट निकालने की तैयारी से पहले विभागीय मिटिंग चल रही थी...क्या दिया जा सकता है महिला दिवस पर... सब अपने-अपने विचार रख रहे थे, लेकिन एक बात पर सारे सहमत थे कि सप्लीमेंट में न तो महिला की बुरी स्थिति को लेकर ‘स्यापा’ किया जाएगा और न ही उसकी उपलब्धि को लेकर ‘ढोल’ पीटा जाएगा... कारण साफ है दोनों ही दो विपरित और अतिरेकी ध्रुव हैं और दोनों ही सही नहीं है। इस तैयारी के लिए स्त्री-विमर्श पर अब तक जितना भी पढ़ा गया उसे फिर से खंगाला गया। एक बार फिर यह इत्तेफाक रहा कि फरवरी की हंस का संपादकीय मार्च के पहले सप्ताह में पढ़ा। राजेंद्र यादव धुरंधर बुद्धिजीवी हैं और बहुत सारे मामले में उनसे असहमत होते हुए भी उनकी विचारशीलता और वैचारिक प्रतिबद्धता की कायल हूँ...लेकिन स्त्री विमर्श के मामले में उनकी नीयत को समझ नहीं पाती हूँ... इस बार के संपादकीय में भी उन्होंने इस मुद्दे को छुआ... और इसमें फिर से स्त्री-देह पर जाकर उनकी सुईँ अटक गईं....। अरे भाई जिस दैहिक दासतां के खिलाफ जद्दोजहद की जा रही है, उसमें ही उसे माध्यम कैसे बनाया जा सकता है? यहाँ लड़ाई उसे उसकी दैहिकता से मुक्ति दिला कर उसे व्यक्ति के तौर पर स्थापित करने की है.... खैर.... इस कथित साहित्यिक स्त्री विमर्श का आम स्त्री से कोई लेना-देना नहीं है आम मध्यमवर्गीय महिलाओं की लड़ाई, उसका संघर्ष और उसकी जद्दोजहद... स्त्री-विमर्श नहीं है... स्त्री-विमर्श नामक चिड़िया मात्र साहित्यिक श्रेणी की जुगाली है... यह इससे ज्यादा कुछ नहीं है। साहित्य में स्त्री विमर्श का मामला वैसा ही हुआ कि उसे एक कारा से निकालकर दुसरे पिंजरे में डाल दें.... स्त्री की लड़ाई अपनी दैहिकता से उठ कर मानवीय गुणों से पहचाने जाने की है। उसकी देह और रोजमर्रा में एक ऐसा कारागार है, जो उसे कभी भी मुक्ति नहीं देता... सार्त्र वस्तु के लिए कहते हैं कि – पहले वह होती है, बाद में यह विचार होता है कि वह कैसी है?
वस्तु के लिए तो बाद में यह विचार भी होता है, लेकिन स्त्री के लिए समाज इस विचार की जगह ही नहीं छोड़ता है, यदि वह सुंदर है तो फिर बस वह इतनी ही है... इससे ज्यादा होने पर भी उसे वहीं बंद कर दिया जाता है, क्योंकि समाज के लिए इससे ज्यादा सुविधाजनक और कुछ नहीं होता है। एक बार उसे सौंदर्य का अहसास करा दें फिर वह कुछ होना भी चाहेगी तो नहीं हो पाएगी और यदि वह होगी तो भी पुरुष के किसी काम की नहीं होगी.... आखिर खुद से बेहतर दास किसे पसंद आएगा...। यदि वह बदसूरत है तो फिर वह और कुछ यूँ भी नहीं हो सकती है, क्योंकि उसे उसकी बदसूरती के खाँचे में ही सड़ा दिया जाएगा.... दोनों ही स्थितियों में उसे मानसिक रूप से बीमार बना दिया जाएगा और हाँ खुबसूरती और बदसूरती के सारे मापदंड
पुरुष के बनाए होते हैं... जैसे कि नैतिकता के सारे नियम उसी के हैं। तो फिर उसे मुक्ति कैसे मिलेगी....?
फिर मुद्दा साहित्यिक मुक्ति का नहीं है, हकीकत में ‘मुक्ति’ का है.... रोजमर्रा के शोषण और दलन से मुक्ति का है.... अपने लिए स्थापित मूल्यों से उलट यदि स्त्री व्यवहार करती है तो उसे उसके स्त्रीत्व से ही खारिज कर दिया जाता है, लड़ाई यहाँ से शुरू होती है। हमारी व्यवस्था में उसे या तो देवी के रूप में पूजा जाता है, या फिर कमजोर मानकर उस पर शासन किया जाता है, इन दोनों ही स्थितियों ने स्त्री की सत्ता का जितना नुकसान किया है, उतना और किसी भी व्यवस्था में नहीं हुआ है। हमारी लड़ाई ‘विदेह’ होकर मानव से रूप में स्वीकृत होने की है.... हमारी माँग समानता नहीं न्याय है, हम पूजा नहीं स्वतंत्रता चाहती हैं, प्रशंसा नहीं स्वीकरण चाहतीं है.... हमे सहानुभूति की दरकार नहीं हैं, हमारे होने पर विश्वास हमारी माँग हैं।

Monday, 22 February 2010

ये वक्त गुज़र जाएगा


जब सब कुछ सामान्य और अपनी गति से चलते हुए एकरस हो रहा हो... तब एकाएक कुछ ऐसा हो, जिसकी प्रत्याशा न हो और अनचाहे मेहमान की तरह आ टपके अकेलापन.... तब...? कल शाम से ऐसे ही अकेलेपन से जूझ रहे हैं। रात को सोने तक का सारा वक्त गर्क़ किया टीवी और कम्प्यूटर पर.... कोशिश की, लेकिन पढ़ना भी नहीं भाया...। बहुत सारा समय यूँ ही सामने बिखरा पड़ा... आम दिनों में क्षण-क्षण को झरते हुए देखते और सहेज नहीं पाने की स्थायी कसक के साथ रहते हम आज इतने क्षण यूँ ही आसपास फैले हुए हैं और समझ ही नहीं पा रहे हैं कि इनका आखिर किया क्या जाए? सुबह उठे को चाय के कप के साथ सामने पड़े थे अखबार... सरसरी तौर पर देखा (याद भी नहीं कि क्या देखा) कुछ को पढ़ने की कोशिश भी की.... 'छूटती नहीं है ज़ालिम मुँह से लगी हुई की तरह'... लेकिन फिर यूँ ही एक सवाल मन में सरसराया (ये सवाल शायद पहली बार) दुनिया जहान के बारे में जानकारी पा लेने से क्या बदल जाएगा... और जानने के बाद क्या हो जाएगा...?
सवाल शायद सही नहीं है, हमने बरसों बरस इस जानने की हवस को दिए हैं, अब भी देंगे... लेकिन आज यह है। एकाएक दिमाग को खंगाला तो पाया कि इसमें कितनी बेकार की जानकारी और सूचनाएँ पड़ी है, कुछ ऐसी भी जिसका कभी-कहीं उपयोग नहीं होगा, फिर भी है। एक बार फिर वह चाह जागी कि काश! दिमाग में से भी काम-काम का रख कर बाकी सबको रद्दी की तरह निकाल पाते, लेकिन यहाँ यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। कभी सोचे तो पाएँगें कि हम दुनिया को जितना जानते चले जाते हैं, खुद से उतना ही दूर होते चले जाते हैं। खुद से भागने के लिए ही शायद हम दुनिया को जानते हैं, लेकिन इससे हम हासिल क्या कर पाते हैं? बेकार का उद्वेलन.... उलझन... ज्यादातर बेबसी... औऱ आखिर में एब्सर्ड का अहसास... क्योंकि जो कुछ है, वह है, हम उसे बदलने के लिए कुछ नहीं कर पाते हैं और यदि करेंगे भी तो क्या औऱ कितना बदल पाएँगें? तो फिर इस बेकार की कवायद का क्या मूल्य? सारी दुनियावी चीजों से 'अंतर' न तो बहला है और न बहलेगा, फिर भी हम खुद को सालोंसाल इसी में गर्क़ किए रहते हैं। किस प्रत्याशा से....? हम सब कुछ इसलिए करते हैं कि खुद को खुश रख सके... शायद ऐसी चीजों की खोज करते रहते हैं, जो हमें सबसे ज्यादा खुश रख करें, लेकिन क्या हम ऐसा कर पाते हैं? पूरा जीवन हम इसी प्रयोग को दे देते हैं, और फिर हमारे हाथ क्या आता है? यह महज एक सवाल है, जिसका उत्तर अब तक तो नहीं मिला। यह भी सही है कि कल शायद यह सवाल नहीं होगा.... और कल से फिर हम जानने के जुनून में खाक़ होने लगेंगे... यह सवाल आज है।
हाल ही में एक खूबसूरत एसएमएस आया
अकबर ने बीरबल से कहा - कोई ऐसी बात बताओ, जिसे खुशी में सुनो तो ग़म हो और ग़म में सुनो तो खुशी हो।
बीरबल ने जवाब दिया - ये वक्त गुज़र जाएगा....
कुछ समझे....?

Thursday, 18 February 2010

अंधा कर देने वाली चकाचौंध


अमेरिका से आर्किटेक्चर का कोर्स कर भारत आया लड़का शादी कर रहा था और दुर्भाग्य से हम साग्रह आमंत्रित थे... छुट्टी की शाम को शहर से 20 किमी दूर शादी का वैन्यू था और जाना जरूरी... मन-बेमन था लेकिन पहुँचे। आधा किमी दूर गाड़ी पार्क कर पैदल ही विवाह-स्थल पर पहुँचे तो दुल्हा महँगी शेरवानी-साफा पहने डिजायनर लहँगा और ब्राईडल मेकअप किए अपनी दुल्हन के साथ खड़ा था। सिर पर फूलों की चादर तनी थी आगे ढोली ढोल बजा रहा था और दुल्हे के साथी-भाई मस्ती में नाच रहे थे। अमेरिका से उच्च शिक्षा लेकर आए लड़के के इस रूप को देखकर बेहद-बेहद निराशा हुई।
एक दौर था जब आधुनिकता एक मूल्य था और हर विचारशील युवा उस सबको जो उसकी जिज्ञासा को शांत नहीं कर पाता था, या जो उसके तर्कों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता था, उसे तोड़ने पर उतारू रहता था। हाँ...इसमें कुछ अच्छी चीजें भी पीछे छूट जाती थी, लेकिन हम समझते ही हैं कि गेहूँ से साथ घुन तो पिसता ही है, फिर भी एक दरवाजा तो होता था, जो चेंज फॉर गुड के लिए कम-अस-कम रास्ता तो खोलता ही था, लेकिन अब तो उम्मीदें तक राख में तब्दील होती नजर आ रही है। युवा यदि भेड़चाल का हिस्सा ही होने जा रहे हैं तो फिर जो सड़ रहा है... गया है, उसका क्या होगा, जो खराब हो गया है, उसे धक्का देकर कौन गिराएगा (बकौल नीत्शे)।
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हमारे शहर में भाजपा का राष्ट्रीय अधिवेशन चल रहा है, और क्षेत्रिय अखबार यूँ ही दीवाने हुए जा रहे हैं। यूँ लग रहा है कि इन दिनों शहर की सारी समस्याएँ, सारी परेशानियाँ छुट्टी पर चली गईं हो। हमने आपत्ति दर्ज कराई तो जवाब मिला कि पाठकों को सूचना दी जा रही है। सूचना....! क्या ये कि नाश्ते में क्या खाया, खाना क्या दिया गया और सोए कैसे.... इस सूचना का कोई औचित्य है? लेकिन क्या करें क्योंकि जो मुद्दे की बात थी, वहाँ तक तो पत्रकार पहुँच ही नहीं पा रहे हैं। तो जो गौण और पूरी तरह से महत्वहीन चीजें थी, उसे ही पाठकों के सामने परोसा दें... फिर इस अधिवेशन का आम जनता से क्या लेना-देना.... पार्टी ऐसे कौन-से निर्णय करने जा रही है जिसका निकट या दूर भविष्य में जनता से कोई संबंध होगा...? ये तो बिल्कुल वैसा है, जैसे लक्ष्मी मित्तल की बेटी की शादी को पूरा मीडिया कवरेज दे... यूँ भी आजकल मीडिया खबरों के साथ काफी समानता का व्यवहार करता है, मामला चाहे आतंकवादी हमलों से जुड़ा हुआ हो या फिर राजनीतिक आयोजन उसी भावना और शिद्दत से कवरेज होता है। खबरें देने वाले इस सवाल को लगता है, कभी उठाते ही नहीं है कि कोई खबर हम क्यों दें? इतना सोचने की फुर्सत ही किसे है? होगी कभी पत्रकारिता की नैतिक जिम्मेदारियाँ, अब तो यह मात्र व्यापार है, साबुन, तेल या फिर टूथपेस्ट बेचने की तरह ही खबरें बेची जाती है। जो क्षमता रखता है, वह इसे बखूबी इस्तेमाल कर सकता है, क्योंकि इसका कोई दीनो-ईमान नहीं है।
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दोनों ही मामले एक ही निर्ष्कष पर पहुँचाते हैं, हम जड़ होते जा रहे हैं, जबसे दुनिया से मार्क्सवाद (अब आप हँसना चाहे तो हँस ले, लेकिन इसके साथ थोड़ा सा सोच भी लेंगे तो शायद लगेगा कि हाँ सच....हमने भी कितने साल हुए कुछ सोचा नहीं) खत्म हुआ है, तब से लगता है प्रतिक्रिया ही खत्म हो गई है, उसके साथ ही बदलाव की सहज प्रक्रिया भी.... क्योंकि जब प्रतिक्रिया ही नहीं होगी तो फिर बदलाव क्या होगा? हम जो कुछ है, उसे सहज भाव से ग्रहण कर रहे हैं, क्योंकि हममें विरोध करने का माद्दा ही खत्म हो गया है। वो साहस ही नहीं रहा कि हम प्रवाह के विरूद्ध खड़े हों.... बाजार ने जहाँ से भी सवाल आ सकते थे, वो सारे दरवाजे बंद कर दिए हैं। उसने इतनी चकाचौंध पैदा कर दी है, कि समाज अंधत्व की तरह बढ़ रहा है, वह कुंद हो रहा है। इस दुनिया में अब कभी भी, कहीं भी क्रांति नहीं होगी..... क्योंकि हमें लगातार सोने (gold) का जहर दिया जा रहा है, बदलाव की ज्वाला पर पैसों के छींटे मारे जा रहे हैं और इसलिए हमारी आत्मा बौनी होती जा रही है...

Sunday, 14 February 2010

प्रतीकों के बीच गुमा प्रेम


फागुन की गुलाबी-सुनहरी सी सुबह...और रविवार का दिन...हफ्ते भर से प्रेम को लेकर की गई माथापच्ची के बाद आई छुट्टी....। प्रेम को विषय बनाकर उसकी बाल की खाल निकाली.... एंगल ढूँढें ( गोया प्रेम नहीं कोई खबर हो, फिर पत्रकार सिवा एंगेल ढूँढने के और कुछ जानता भी तो नहीं है, उससे न तो इससे ज्यादा की उम्मीद की जाती है और न ही वह इससे ज्यादा करना चाहता है, क्योंकि उसके पास प्रेम-व्रेम जैसी निखालिस भावना को जीने का न तो समय होता है और धैर्य...बाकी चीजें तो खैर....छोड़िए)। कहीं पढ़ा था कि इस दौर में युवा प्रेम नहीं करता, क्योंकि वह दुख नहीं पाना चाहता, अब बताइए प्रेम हो और दुख न हो ये कैसे संभव है तो फिर प्रेम हो ही क्यों? जब प्रेम न हो तो फिर वेलैंटाइन-डे भी क्यों हो? लेकिन इसे तो खैर होना ही था, क्योंकि जो प्रेम नहीं कर पाते, या नहीं करना चाहते हैं, कम से कम यह उन्हें प्रेमजन्य खुशी दिलाने का आभास तो देता ही है, क्योंकि ढ़ेर सारे प्रतीकों के बीच कहीं न कहीं यह गफ़लत पल ही जाती है, कि हाँ यही प्यार है।
दरअसल हम प्रतीकों के दौर में जी रहे हैं। फूल, हीरा, कैंडल-लाइट डिनर, सरप्राइज पार्टी, गिफ्ट, बुके, कार्ड और भी पता नहीं क्या-क्या प्रेम के प्रतीक, धर्म के प्रतीक मंदिर, मस्जिद, गुरु-उपदेशक, कर्मकांड और भी बहुत कुछ, हमारे समाज में हर जीच के प्रतीक हैं, साम्प्रदायिकता के, धर्मनिरपेक्षता के, आध्यात्म के, क्षेत्रियता और अखंडता के सब चीजों के प्रतीक हैं, क्योंकि ये ज्यादा सुविधाजनक हैं। हर तरफ प्रतीक ही प्रतीक... बस नहीं है तो मूल भावना...क्योंकि उसके बिना भी हमारा काम बहुत आराम से चलता है।
प्रेम चाहे हो या न हो वेलैंटाइन-डे आपको उसके प्रदर्शन करने का अवसर देता है, और बिना अहसास के आप प्रेमी हो जाते हैं, दरअसल यह एक आसान रास्ता है, इस जमात का हिस्सा होने का, इसमें आपका कोई योगदान नहीं है, न उन अनजान संत वेलैंटाइन का, सारा किया कराया बाजार का है। आप हैं उसके आसान टारगेट... बाजार तो ढूँढता ही रहता है टारगेट पीपल....आज आप है कल कोई ओर होगा, आज यह दिन है कल कोई ओर दिन होगा। इस बार वेलैंटाइन-डे पर मीडिया ने ज्यादा हंगाना नहीं किया, क्योंकि उसके पास इससे भी ज्यादा हॉट स्टोरी थी, बाल, राज और उद्धव ठाकरे हैं, शरद पँवार है, शाहरूख खान है और है उसकी फिल्म और बचा-खुचा कोटा पूरा किया पुणे बम ब्लास्ट ने...हाँ प्रिंट के पास ज्यादा विकल्प नहीं थे और दुर्भाग्य से रविवार का दिन था तो एक सप्लीमेंट में तो वेलैंटाइन के अतिरिक्त और कुछ जा ही नहीं सकता, भई बाजार की माँग जो हैं।
इस मरे वेलैंटाइन ने प्यार जो नहीं है, उसे वह बना दिया है, और यह जो है, उसे पता नहीं कहाँ गुमा दिया। प्यार एक बहुत व्यक्तिगत और गोपनीय भावना है, जो खुद से भी नहीं कही जाती है, कम से कम हमने तो यही जाना है, यह भी सही है कि पल्ले विच अग दे अंगारे नहीं लुकते हो, लेकिन उसे दुनिया को बताया तो जाता ही नहीं है। यह शब्द नहीं है, लेकिन बाजार ने उसे महज शब्द बना दिए हैं। प्यार अनिर्वचनीय है, लेकिन यहाँ तो तमाम प्रतीकों से इसे वर्णनीय बना दिया गया है। इस दौर ने प्रतीकों को अहम बना दिया है और इसके पीछे की भावना को कहीं उड़ा दिया है। प्यार के लिए एक दिन... कितना हास्यास्पद है, जो जीवन है, उसके लिए एक दिन...! क्या भेड़ चाल है। इसे किसी भी दिन कहो, दिल एक जैसा ही धड़कता है, डर भी वैसा ही लगता है। तो फिर एक विशेष दिन क्यों हो... यदि प्यार किया है तो कोई भी दिन हो, क्या फर्क पड़ता है।
तो उनके लिए जिन्हें प्यार को महसूस करने, व्यक्त करने और जीने के लिए किसी वेलैंटाइन-डे की जरूरत है, उन्हें हैप्पी वेलैंटाइन-डे और उनके लिए जिनके लिए प्यार ही जीवन है, पूरे जीवन के लिए ढेरों-ढेर शुभकामनाएँ....क्योंकि प्यार प्रतीकों के सहारे नहीं किया जाता है, प्यार हो जाता है....यह होता है, बस....।

Sunday, 31 January 2010

क्या है हम ....?


रविवार की छुट्टी....हाथ पसारे खड़ा खुला-खुला सा दिन... लिहाफ का भला लगने वाला गुनगुनापन...मीठी सरसराती वासंती बयार...खिड़की से उड़कर अंदर आते धूप के कतरे....मखमली-सा अहसास...उन्माद के तूफान के गुज़र जाने के बाद की शांति...पार्श्व में गुलाम अली का गाना...गर्दिश-ए-दौरा का शिकवा था मगर इतना न था....फिर से अहसासों का समंदर लहराने लगा...बस एक ही रात में ये कायापलट....!
कल रात चाँद पृथ्वी के सबसे पास....अमूमन जितना रहता है उससे 50 हजार किमी करीब था (खगोलीय भाषा में पेरिजी)...खूब बड़ा...साफ शफ़्फ़ाक...सफेद और चमकीला चाँद...देखा तो लगा देखते ही रहें.....लेकिन उसके पहले के बेचैनी....ऊब...त्रास और तकलीफ से भरे...बेहद उदास-से वे दिन...क्या है यह सब...? पता नहीं कब का पढ़ा-सुना याद आ गया कि पूरे चाँद की रातों में दुनिया में सबसे ज्यादा आत्महत्याएँ होती है...खुद के अंदर की बेचैनी का सबब कहीं यह चाँद तो नहीं....एक विचार और अब खुद हो गए 'अंडर-ऑब्जर्वेशन'...क्या चाँद का असर है...? ज्योतिषी कहते हैं कि जिसमें भी जल तत्व की प्रधानता होती है...वह चाँद बढ़ने से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता...बिल्कुल ऐसा तो नहीं फिर भी इससे मिलता-जुलता सा ही कुछ मार्सेल या फिर शायद जैस्पर्स ने कहा था (शब्दशः याद नहीं...वो कभी भी नहीं रह पाता है...सिर्फ भाव है) कि इस पूरी सृष्टि में इंसान का होना धूल के एक कण के समान है।
हम खुद से सवाल पूछे कि जब हमारे मन पर, हमारे तन पर, व्यवहार, परिस्थितियों और आखिरकार जीवन पर हमारा नियंत्रण नहीं है तो फिर हम है क्या चीज़....हम क्यों हैं? इस सृष्टि में हमारे होने से क्या बदला है और हमारे नहीं होने से क्या बदल जाएगा...हमारे होने का यहाँ कोई मतलब नहीं है...तो फिर हमारा होना इतना महत्वपूर्ण कैसे हैं? हमारे कर्म, विचार, आचार, सिद्धांत, जीवन, उपलब्धि, असफलता, सुख-दुख, संबंध, भावना, इच्छा, सपने, अनुभव इस सबका मतलब क्या है?
फिर सवाल...सवाल और सवालों का ढेर...। जब हम इस सृष्टि में अंदर और बाहर के न जाने किन-किन तत्वों से प्रभावित, नियंत्रित होते रहते हैं, तो क्या हम खुद को एक इकाई कह सकते हैं...? फिर हम सिर्फ 'हम' बचे भी हैं? और बचे भी है तो कितने...कहाँ....? फिर हमारे 'अहं' का, 'अहंकार' का कोई वजूद है, क्या वजूद होना चाहिए...? क्योंकि हम तो कुछ हैं ही नहीं....हमारा सारा 'अहं' धूल का मात्र एक कण......बस...। एक बार फिर से सोचें हम क्या हैं और यदि 'हम' कुछ भी नहीं है तो फिर क्यों हैं? यहाँ तो सवालों का अंबार है और जवाब.....!
कोई नहीं.......

Tuesday, 19 January 2010

हवाओं में महका बसंत


इस बार न तो कोयल कूकी, न बयार बही, न आम बौराया और न ही पलाश दहका....बहुत दबे पाँव बसंत आया...दिन-रात की तीखी खुनक के बीच दोपहर थोड़ी बहुत मुलायम हो रही है। आहट सुनाई पड़ रही है...वह अभी आया तो नहीं ही है, बस कहीं किसी पलाश पर बसंत की छाया दिखती है, बाकी तो बस हरे-कच पत्तों के साथ बसंत की प्रतीक्षा में है। बुधवार को सरस्वती पूजन के साथ ही बसंत उत्सव मनाना शुरू कर देगा। शहरों में तो सिर पर तने आसमान को देखना तक जहाँ एक घटना होती हो, वहाँ पलाश के दहकने को कहाँ ढूँढा जाएँ... फिर भी बसंत का आना एक घटना है। हम चाहे उसे ना देखें, ना महसूस करें, हवाएँ उसका पता देती है। सूरज के आने से सुनहरा होता आसमान...हल्की हवा से उड़ती पीली धूल....डूबते सूरज की किरणों से सतरंगी होता आसमान और रात के खुलते जूड़े में टँके सितारों का झरना...क्या ये सब बसंत का संदेश नहीं है? जब संदेश आ ही गया तो वह कहाँ रूकने वाला है, आएगा ही, चाहे एक-दो दिन इंतजार के बाद आए...आज तो हम बुद्धि, मेधा और सृजन की देवी सरस्वती को मनाए...बेहतर, सुंदर और मंगलकारी दुनिया को रचने का साहस पाएँ.....जिएँ....प्रकृति के आनंदोत्सव को मनाएँ, उसे प्यार करें, उसे बचाए...तभी तो बसंत के आने का.......वर्षा, ग्रीष्म, शरद और शिशिर को पहचान पाने के संकेत पाएँगें...फिलहाल तो सिंदूर-सी सुबह, सरसों की फूलों सी पीली दोपहर, गुड़हल सी लाल-सुर्ख शाम और सुरीली सुरमई रात का स्वागत करें....बसंत को गाएँ, गुनगुनाएँ....मनाएँ...।

Wednesday, 13 January 2010

मकर संक्रांति की शुभकामना


माघ का मध्य है...पारंपरिक रूप से सर्दी की विदाई का समय आ पहुँचा है। अब यदि क्लाइमेट चेंज का असर हो तो हो सकता है लगातार सींक होता जा रहा सर्दी का मौसम थोड़ा-सा फैल जाए और होली तक अपने पंडाल को खींच ले जाए.....लेकिन....हमेशा ऐसा नहीं होता है। फिर यदि ऐसा हुआ तो वैज्ञानिक इसे हिमयुग की शुरूआत कहने लगेंगे। जैसा कि दो साल पहले जब जनवरी के तीसरे सप्ताह से शुरू हुई सर्दी फरवरी के अंत तक चली और इसी दौरान पूरे यूरोप में भी भारी बर्फबारी हुई थी। असल में प्रकृति हमारे लिए अभी भी एक बड़ा रहस्य है। तभी तो कभी कहा जाता है कि पृथ्वी गर्म हो रही तो कभी माना जाने लगता है कि हिमयुग की शुरूआत हो रही है।
खैर विज्ञान हमारे विचार का विषय नहीं है। थोड़ी खुनक भरी रात है, आसपास से आ रहे लोहड़ी के खनक भरे उल्लास की ताल है....तो तिल के सिंकने की तेज खुशबू भी.... चाहे हम जानें या न जानें....त्योहार का उल्लास सुबह के मुखड़े पर नजर आ ही जाता है। कल धरती एक नए एंगल से सूरज का सामना करेगी। कल से सूरज कुछ ज्यादा उदात्त होगा... सुबह सुनहरी, दिन रेशमी और शाम सतरंगी होगी....रात थोड़ी सिकुड़ेगी....सूरज उत्तरायण जो होगा....। थोडा़ मौसम भी करवट लेगा....प्रकृति अपना आवरण बदलेगी... शहरों में तो आसमान ही नहीं देखा जाता है, लेकिन कस्बों और गाँवों में मकर संक्रांति पर आसमान के विस्तृत कैनवास पर रंग-बिरंगी पतंगों का मेला सजेगा.... ऊँगलियों की ताल पर पतंगें थाप देंगी। बच्चे पतंगों के लोच के साथ किलकारी मारेंगे...।
मकर संक्रांति हिंदुओं का एकमात्र ऐसा पर्व होगा, जिसका खगोलीय महत्व तो है, लेकिन इससे कोई पौराणिक आख्यान नहीं जुड़ा हुआ है। सूर्य की आराधना का यह पर्व सृष्टि के कल्याण की कामना से मनाया जाता है। यदि हम आस्तिक हैं तब भी और नहीं है तब भी सूर्य के जीवित देवता होने से इंकार नहीं किया जा सकता है। एक बार फिर से विज्ञान की शरण....क्योंकि यह हमें बताता है कि सृष्टि में एक ऐसा दौर भी रहा है, जिसे हिमयुग कहा जाता है। संक्षेप में ऊर्जा है तभी तो जीवन है....। सूरज हमारे जीवन का आधार है, उसकी धुरी, कारण और केंद्र भी है। सूर्य प्रारंभ है....दिन का...जीवन का....। तो उसकी आराधना के साथ मानव कल्याण की कामना करें...। सभी को मकर संक्रांति, पोंगल, लोहड़ी, संकरात संक्षेप में सूर्य के उत्तरायण होने की शुभकामना....

Monday, 28 December 2009

रेट्रोस्पेक्शन



गुजरते साल का आखिरी रविवार....ठिठके, उदास और पीले-से शिशिर की एकाकी और बेचैन-सी दोपहर...सुबह-शाम मौसम में थोड़ी तीखी-सी खुनक...दिसंबर गुजरने को है, लेकिन मौसम वैसा ही मुलायम बना हुआ है, जैसा बसंत से थोडा़ पहले हुआ करता है। कभी-कभी उत्तर से आती हवाएँ ही कुछ सिहराती है, बाकी तो सब कुछ ठीक-ठाक है। यूँ यह इकहरे दिन, छुटकी-सी शाम और फैलती-पसरती रात का मौसम है, लेकिन मौसम ही गुल है, बाकी सब है।
एक और साल गुजर रहा है, क्या पाया और क्या खोया का हिसाब करने का मौसम है। समय अपनी गति से प्रवाहित है, वह न नया है न ही पुराना.....वह तो हमेशा वही है जो वह है, बस समाज बदलता है, नया होता है। हमने सुविधा के लिए समय को सेकंडों, मिनटों, घंटों, दिनों, सप्ताहों, महीनों, सालों, दशकों और फिर शताब्दियों में बाँटा है। समय तो कहीं बँधा ही नहीं रूका ही नहीं, वह हमारे होने से पहले से है और हमारे बाद भी होगा, वैसा ही नूतन....वैसा ही प्रवाहित.....सतत....हम बस उसके खाँचों को ही टटोलते रहते हैं।
खैर तो फिर एक साल गुजर गया। एक पूरा साल....365 दिन और 12 महीने सूक्ष्म होने लगे तो लम्हों तक का हिसाब देना पड़ेगा....किसे....किसी को भी नहीं...बस खुद को ही....कह सकते हैं सिर्फ जुगाली है, पाना और खोना क्या है? लेकिन दुनिया में है तो फिर कुछ इसकी परिपाटी का भी तो पालन करें। तो बैठे है फुर्सत के समय को ऊपर से खड़े होकर देखने के लिए। जब हम किसी मकान या भवन की तीसरी मंजिल पर खड़े होकर देखते हैं तो बड़े निर्लिप्त होकर....क्योंकि हम ऊपर होते हैं और घटनाएँ नीचे....ठीक वैसे ही....गुजरे साल को उसके अंतिम सिरे पर खड़े होकर देखना है....निर्लिप्त, उदासीन और बहुत हद कर तटस्थ होकर...। तभी तो हिसाब हो पाएगा खोने और पाने का...इन श़ॉर्ट कुछ करने का....।
तो 2009 में दो यात्राएँ की, कुछ कहानियाँ लिखी ( दो-एक प्रकाशित भी हुईं), ब्लॉग पर 60 पीस (रेट्रोस्पेक्शन 61 वाँ)
लिखे और एक नया ब्लॉग शुरू किया। निराश भी हुईं और उदास भी, नाराज भी और उदात्त भी....खुश भी हुई और सुख को भी महसूस किया, पढ़ा भी....लिखा और सोचा भी....सुना भी.....फिर भी कुछ रह गया। शायद कुछ रह जाना ही जीने का सहारा है, क्योंकि यदि सब कुछ हो गया तो फिर जीएँ क्यों? जीने का मतलब तो करना है, सपने देखना उन्हें पाने की कोशिश करना तो फिर कर्म से कहाँ निजात है? अपने सूत्रों वाले ब्लॉग में मैंने सूत्र दिया था कि ''हम कर्म करने के लिए अभिशप्त हैं'' और कई सारे पाठकों ने इस पर आपत्ति की...। कहने वालों ने इसे निराशावादी दृष्टि भी कहा...लेकिन थोड़ा रूके पूर्वाग्रहों को छोड़े और फिर सोचें कि क्या यह सच नहीं है?
यदि हम कर्म नहीं करें तो फिर क्या करें? हम विकल्पहीन है।कर्म
अच्छा या बुरा....हो सकता है, लेकिन कर्म के होने को किसी भी सूरत में रोका नहीं जा सकता है। तो फिर हुए ना अभिशप्त....! खैर तो एक पूरा साल गुजर गया, हम अब भी प्रवाह में हैं, उसका हिस्सा है, समय उदासीन है तटस्थ है, हमारे कर्मों का गवाह है, वह कोई निर्णय नहीं देता है सिर्फ देखता है, हमें करते, सहते, भोगते और जीते हुए। वह अपनी मस्ती में है और हम जूझ रहे हैं सपनों को हकीकत में बदलने के लिए....देखें कहाँ पहुँचते हैं।
तो फिर गुजरे साल के अच्छे से गुजर जाने की और नए साल में सपनों के पूरा होने की शुभेच्छा के साथ.....ये औपचारिकता....
सभी को नए साल की शुभकामना.....

Thursday, 10 December 2009

असंतुष्ट सुकरात की तलाश में....


फिर से एक मुश्किल दौर....सब कुछ सामान्य है शायद इसलिए.....ऐसे ही समय में अक्सर जेएस मिल याद आ जाते हैं.....जिनका लिखा हुआ हम अपने यूनिवर्सिटी के दिनों में दोस्तों के बीच दोहराया करते थे। बेंथम के सिद्धांत के विरूद्ध उन्होंने अपने विचार देते हुए कहा था कि -- It is better to be a dissatisfied man than a satisfied pig and it is better to be a dissatisfied SOCRATES than a satisfied fool...और हर उस दोस्त का मजाक उड़ाते थे जो संतुष्ट होकर जीता था। इन दिनों बहुत कुछ 'सेटिस्फाईड फ़ूल' जैसे हालात है, लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्योंकि एक बेचैनी और खुद के चुक गए होने का अहसास शिद्दत से हो रहा है। दूसरों के सामने खुद को सिद्ध करने की चुनौती हमेशा नहीं होती है, लेकिन खुद को खुद के सामने सिद्ध करने की चुनौती हमेशा सवार होती है। कभी भी खुद को इससे आज़ाद नहीं पाया है। उस पर तुर्रा ये कि ओशो का 'बैठो! कहीं जाना नहीं है' भी अपनी ओर खींचता है। अब तक इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके हैं कि आखिर जीने के सिद्धांत क्या होने चाहिए....ये भटकाव और अनिश्चितता है, जिससे बड़ी यातना शायद कोई और नहीं होती है....इसीलिए मुश्किल औऱ भी भारी हो जाती है। लगातार-लगातार ये अहसास कि बस अंदर सब कुछ खत्म हो चला है.....खासा बेचैन कर रहा है।
इसे रचनात्मक रूग्णता का नाम भी दिया जाता है, जब कोई विचार, कोई सृजन....कोई नई बात ज़हन में नहीं उभरती है और एक यही बात बेचैन कर देने के लिए काफी होती है। कुछ नया....कुछ नया....क्यों नहीं आ रहा है। हालाँकि बहस तो 'कुछ नया' शब्दावली पर भी की जा सकती है, क्योंकि विज्ञान यह सिद्ध कर चुका है कि इस दुनिया में नया कुछ भी नहीं है, लेकिन दूसरे के लिए नहीं खुद अपने लिए तो हो ही सकता है। आप तो यह भी कह सकते हैं कि ये भी क्या 'पीस' है....कुछ लिखने के लिए नहीं हो तो कुछ भी लिख दें....लेकिन आप जरा ये भी बताएँ कि इस बेचैनी को दूर करने का उपाय क्या है?

Tuesday, 1 December 2009

तस्वीर-सा सुंदर गोवा....


गतांक से आगे
जब हम हुए समंदर के पड़ौसी


इस बार सोच ही लिया था कि कुछ भी हो जाए समंदर को रखेंगे आँखों के सामने....खुशकिस्मती कि जगह मिल भी गई ऐसी...बीच पर ही मिली एक कॉटेज....यहाँ दिन के किसी भी पल में समंदर अपने होने को भूलने नहीं देता है। जैसे-जैसे रात गहराती है उसका जोश उफान पर आने लगता है और उसे देखकर उसके आसपास रहने वालों का भी....दिन भर समंदर के साथ मस्ती करते रहने के बाद भी थकान का नामोनिशान नहीं होता और शाम होते-होते ही बीच जश्न की तैयारियाँ शुरू कर देता है। हर ओर मदहोश कर देने वाली मद्धम रोशनी....हल्का संगीत लहरों के संगम और हवाओं की शहनाई के बीच पक्षियों का वोकल....कुल मिलाकर नशा....काजू फैनी से भी ज्यादा नशा....होता है। देर रात तक बीच पर हलचल....कोई पानी में ही, कोई किनारे पर बैठा है...तो कोई आती-जाती लहरों के साथ गीली हुई रेत के बिस्तर पर टहल रहा है। रेत पर फैलता-सिकुड़ता पानी.....आती हुई तेज लहर से लौटती थकी हुई लहर का टकराना और उससे पैदा हुआ संगीत....क्या है ऐसा जिसे छोड़ा जा सकता है?
सुबह-सुबह पूर्व दिशा से नारियल के पेड़ों के पीछे से निकलता सूरज समंदर के कैनवॉस पर कई रंग बिखेर जाता है और वो....वो इस सबसे बेखबर कर्मरत योगी की तरह बस अपना काम करता जाता है। सूरज जब उसके बिल्कुल उपर अपना अक्स समंदर के आईने में देखता है उस समय....उसमें मौज करने वाले पानी में उतर चुके होते हैं...। सूरज की किरणें लहरों के टकराने से उछलती बूँदों पर पड़ती है तो यूँ लगता है कि समंदर में असंख्य हीरे की कनी बिखरी हुई है। साफ...खारा पानी...जैसे-जैसे गहरे में जाओ लहरों का वेग हमें किनारे की ओर फेंकता जाता है। दिन चढ़ते-चढ़ते सूरज के तेज और समंदर के आवेग के बीच संघर्ष होने लगता है....यदि आप समंदर के साथ है तो वह आपको हारने नहीं देगा...लेकिन यदि आपने उसका साथ छोड़ा तो सूरज आपको बैठने नहीं देगा.....देर तक कोई-न-कोई तो समंदर के साथ बना ही रहता है।

शाम को जब सूरज समंदर की आगोश में ही सोने जाता है जब यूँ लगता है कि यहाँ पानी नहीं चाँदी का वरक फैला हुआ है और कहीं से भी जरा-सी रोशनी पड़ी नहीं कि वह झिलमिलाने लगता है। बीच का दिन तो शाम से जवान होना शुरू होता है। हर कहीं मद्धम रोशनी और हल्के संगीत के बीच सुरूर के लिए जाम लिए पर्यटक किनारे बने रेस्टोरेंट में बैठे हुए दिन भर की थकान को नशे से धोते हुए लगते हैं। देर रात तक बीच पर पार्टी चलती रहती है। अँधेरे में पानी तो दिखाई नहीं देता बस सुनाई देती है उसकी आवाज... आधी रात को भी यदि समंदर को देखने पहुँचो तो कोई न कोई वहाँ बना हुआ मिलता है...। दिन भर में 8 से 10 फीट पीछे जाता पानी चाँद दिखने पर फिर से अपने शबाब पर आ जाता है और किनारे को भरने का प्रयास करता है....रात में जब सब कुछ ख़ामोश हो जाता है तब....समंदर अपने पूरे उफान पर आता है...उस दिन जब आँखें मलते-मलते सुबह पाँच बजे बीच पर पहुँचे तो एकबारगी लहरों के शोर से दिल जोर से धड़क गया...डर-सा लगा....फिर धीरे-धीरे सूरज के निकलने पर समंदर का सौंदर्य निखरने लगा और डर....वो जाता रहा।
सोचा था कि समंदर के पड़ौसी होकर हम उसे जान पाएँगें...लेकिन कौन किसी को जान सका है....फिर चार-छह दिन में वह भी प्रकृति के इस विस्तार को....नहीं जान सके और प्यासे ही हमें लौटना पड़ा।


वैश्विक गाँव: पलोलेम
यहाँ पर्यटक विदेशों इस्त्राइल, रोमानिया, इटली, जर्मनी, अमेरिका और इंग्लैंड कहाँ से नहीं आए हुए थे। तो व्यापार करने के लिए देश के हर कोने के लोग मिले....राजकुमार मनाली से, सुनील नैनीताल से, तनवीर कश्मीर से, शर्मा परिवार दिल्ली से, एजाज लखनऊ और विनयप्रताप सिंह भोपाल से तो कमाल बिहार से व्यापार करने के लिए पलोलेम आया है। कुछ लोग तो ऐसे भी मिले जो सीजन के 6 महीने गोवा में और फिर पहाड़ों के सीजन में मनाली या फिर लद्दाख पहुँच जाते हैं। यहाँ बीच, काजू फैनी, उन्मुक्तता और नारियल के पेड़ों के अतिरिक्त यदि कुछ गोवन था तो वह सी-फूड....मछली और प्रॉन....लेकिन खालिस वैष्णवों को वेज फूड ढूँढ़ने में खासी मशक्कत करनी पड़ी...फिर पीना नहीं है तो कोई भी पार्टी आपके लिए नहीं है। खैर साहब....यहाँ तो मामला प्रकृति के सौंदर्य के बीच खुद के पास होने का था, इसलिए ये तो कोई मसले नहीं थे....।
आने के बाद दो दिन बीत गए....कपड़ों और सामानों से अब भी रेत झर रही है, पैरों में लहरों का आवेग अब महसूस होता है....रात को समंदर का हरहराना और दिन भर कौवों की काँव-काँव अब भी सुनाई देती है। दो मंजिला मकान की बॉलकनी यहाँ भी मचान पर बनी हट का भ्रम देती है। पहाड़ों और समंदर को छोड़कर आने के बाद भी इस पठार में उसकी हरारत महसूस हो रही है। बस यहाँ का मौसम भी यदि वहाँ पर्यटन पर चला जाता तो उस जगह से लौटना वाकई मुश्किल होता....सही है कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता....बस...।

तस्वीर-सा सुंदर गोवा...


समंदर के साथ ही दिन-रात, सुबह-शाम हर एक पल बिताने की योजना बनाकर हम गोवा घूमने निकले थे, लेकिन दो दिन हमने मडगाँव (जहाँ हमने ट्रेन छोड़ी) में ही बिता दिए। मडगाँव गोवा का दूसरा सबसे बड़ा शहर....लेकिन ये क्या.....मडगाँव तो देश के किसी भी शहर-सा एक आम-सा शहर है, यहाँ 'गोवा' जैसा कुछ भी नज़र नहीं आया। गोवा का नक्शा खरीदने के लिए दुकान पर पहुँचे तो जैसा कि आमतौर पर होता है पूछ बैठे कौन-सा 'बीच' अच्छा है....जवाब मिला पलोलेम....सोच लिया जाकर एक बार देख लें....फिर सोचेगें....।
इस बीच गोवा टूरिज्म के टूरिंग पैकेज के तहत साउथ गोवा का टूर किया जो बेहद निराशाजनक रहा...आखिर किसी भी जगह को खाने नहीं आए हैं....घूमने, जीने और महसूस करने आए हैं। टूर में कोलवा और मीरामार बीच को मात्र स्पर्श किया और लग गया कि उस दो किलोमीटर लंबे बीच से अच्छे नहीं है बड़े-बड़े बीच तो अगले ही दिन पहुँच गए पलोलेम बीच.....।
कुछ गोवा प्रदेश
गोवा का इम्प्रेशन.... काजू फैनी....नारियल...और उन्मुक्त जीवन से ज्यादा नहीं आता है, लेकिन यह सिर्फ इतनी ही नहीं है। गोवा पर जैसे प्रकृति ने प्रेम की बारिश की है....जहाँ देखो वहाँ हरियाली.....नारियल....कटहल....नीलगिरी....और हाँ सागौन....लाल मिट्टी के बीच हरे पत्तों से सजे लैंडस्कैप में यदि कुछ कम हो सकता था तो वह थे पहाड़....लेकिन यहाँ तो वह भी है। गोवा के बिग फुट म्यूजियम में परशुराम की एक झाँकी बनी हुई है। गाइड ने बताया कि यहाँ माना जाता है कि सह्याद्रि पर्वत से परशुराम ने अरब सागर में जो तीर चलाया था उससे जो जमीन निकली उस पर गोवा और केरल बसा हुआ है। माइथोलॉजी पर हमेशा से संदेह रहा है क्योंकि हम उसे इतिहास नहीं मान पाते हैं, फिर भी गोवा को देखकर तो यही लगता है कि परशुराम के तीर से निकली जमीन ही हो सकता है गोवा....हर तरफ पेड़ ही पेड़.....घरों की छत को भी पेड़ों के बीच ही ढूँढना पड़ता है। पूर्व की तरफ सह्याद्रि पर्वत शृंखला और पश्चिम की तरफ अरब सागर का विस्तार और दोनों के बीच बसा गोवा....अद्भुत....शब्दातीत सुंदर....।



सौंदर्य का साकार रूप : पलोलेम बीच
मुम्बई में जूहू और दमन के बीचेस को देखने के बाद निष्कर्ष ये निकाला था कि बीच पर सिर्फ पानी होता है.....नज़रों की सीमा तक...पानी ही पानी....हरहराता हुआ पानी...लहरों पर लहरें और लहरें....लहरें.....लहरें और बस लहरें......लहरों की हवाओं के साथ जुगलबंदी कुल मिलाकर सी.....सैंड.....और सन.....लेकिन यहाँ एक और चीज जुड़ी....और वह है नारियल के पेड़....पेड़ न कहो....जंगल....और सजगता इतनी कि चाहे रिसोर्ट बना हो या फिर रेस्टोरेंट.....यदि नारियल का पेड़ है तो उसके आसपास निर्माण होगा....पेड़ किसी भी सूरत में कटेगा नहीं....बस इसी एक सजगता ने पलोलेम बीच को सुंदर तस्वीर-सा सुंदर बनाया हुआ है। पूर्व की तरफ नारियल का घना बाग-सा.....और उसके बीच बनी अस्थायी मचान-सी 'हट'...पश्चिम की तरफ जलतरंग बजाता समंदर.....उसमें उभरे छोटे-छोटे टापू....जहाँ नज़र दौड़ाओ....वहाँ प्रकृति मुस्कुराती हुई हमें अभिभूत करती है....यहाँ आकर एक बार फिर से अहसास होता है कि सौंदर्य प्रकृति से बाहर हो ही नहीं सकता है। शायद इसी वजह से यहाँ आकर हर कोई उन्मुक्त हो जाता है....खुद के करीब और दुनिया से दूर होता चला जाता है।


क्रमश: