Tuesday, 19 July 2011

काश ऐसा हो पाता....!


साढे़ सात बजते न बजते पूरा घर खाली हो जाता है... सब अपने-अपने काम पर निकल जाते हैं और घर में रह जाती है सुगंधा अकेले...। पहाड़ जैसा दिन सामने पड़ा हुआ है और करने के लिए कुछ होता ही नहीं है। घर फिर से 3 बजे गुलजार होगा, तब तक उसे कभी टीवी, तो कभी अखबार-पत्रिकाओं, मोबाइल फोन या फिर किताबों से सिर फोड़ना होता है। तो सुबह साढ़े सात के बाद वह फिर से बिस्तर में घुस जाती है। आज भी कुछ ऐसा ही हुआ। कितनी ही कोशिश करे वो दिमाग की चर्खी को चलने से नहीं रोक पाती। कभी अपने खालीपन का कीड़ा, कभी पिता का स्वास्थ्य तो कभी माँ की चिंता... कभी भाई की चिंता, कभी बच्चों की पढ़ाई, पति का स्वास्थ्य तो कभी यूँ ही खुद का भविष्य...(कभी-कभी वो खुद से सवाल करने लगती है कि क्या जिंदगी यही है, इसी तरह से जाया होने के लिए... या इसका कोई मतलब है, लक्ष्य है....? उसका पति भी उसके इस तरह के सवालों से तंग आ चुका है, लेकिन वो क्या करे!) तो कभी कुछ और... कुछ-न-कुछ तो लगा ही रहता है उसकी जान को...। समझाने को तो वो किसी को भी ये समझा सकती है कि चिंता किसी भी समस्या का हल नहीं है, लेकिन खुद को समझा पाने जितनी समझ पता नहीं कैसे उसमें अभी तक नहीं आ पाई है। तो रात भर एक खलिश उसके नींद के उपर एक पलती झिल्ली सी पड़ी रही और उसकी नींद उसके नीचे कुनमुनाती रही। सुबह का अपना कर्म पूरा कर उसने खिड़कियों के खुले पर्दे खींच दिए। पंखे की स्पीड कम कर दी और चादर तानकर सोने की कोशिश करने लगी। वो झिल्ली अभी भी जहन पर पड़ी हुई है... क्या करे उसका...?
बारिश का मौसम भी कुछ अजीब होता है, पंखा चले तो ठंडा लगता है और बंद कर दें तो गर्मी लगने लगती है, तो जब सुगंधा को चादर में ठंड़ा लगने लगा तो उसने अपने सिर तक कंबल खींच लिया। कमरे में वैसे ही अँधेरा था, सिर तक कंबल खींच लेने से अंदर का अँधेरा औऱ गाढ़ा हो गया, तो अँधेरे और कंबल के गुनगुनेपन का आश्वासन पाकर नींद झिल्ली तोड़कर उपर आ गई। थोड़ी देर के लिए दुनिया और दुनिया की चिंताएँ कंबल के बाहर ही रह गई और सुगंधा सो गई। हल्की झपकी के बाद जब उसने कंबल हटाने के लिए हाथ उठाया तो उसे एक अजीब सी दहशत हुई... उसे लगा जैसे वो अंदर बहुत सुरक्षित है और जैसे ही उसने कंबल हटाया बाहर खड़ी दुनिया उसे झपट लेगी... और वो वहीं साँस रोके लेटी रही..., लेकिन जल्दी ही उसका ये भ्रम भी टूट गया। कलाबाई ने घंटी बजाई, तो उसकी आवाज कंबल को छेदते हुए आ गई... सुगंधा ने उठकर दरवाजा खोला। कंबल को घड़ी करने के लिए हाथ बढ़ाते हुए उसने गहरी साँस ली... – काश ऐसा हो पाता कि कबंल के नीचे का अँधेरा, उसे दुनियादारी से मुक्त और दूर कर पाता...। उसने बहुत एहतियात से कंबल को उठाया जैसे ये उसका सुरक्षा घेरा हो और वो उसे छूकर आश्वास्त होना चाहती हो...।

Sunday, 17 July 2011

....मुझको सन्नाटा सदा लगता है!


वो नहीं जानती है कि उसकी आँखें मुझे उसके सारे हाल की चुगली कर देती है। उसे तो बस ये भ्रम है उसके अंदर का तूफान बे-आवाज आता है और गुजर जाता है, किसी को उसकी खबर नहीं लगती है। मैं भी उसके भ्रम को भ्रम ही रहने देता हूँ। उस दिन भी हम दोनों एक रिसर्च पेपर के लिए नोट्स ले रहे थे, और उसके अनजाने ही उसकी बेचैन तरंगें मुझे लगातार झुलसा रही थी... जला रही थी। बार-बार उसका गहरी साँस लेना... मुझे भी बेचैन कर रहा था, लेकिन पता नहीं कैसी जिद्द में था कि बस... पूछा ही नहीं। ये जानते हुए भी कि वो खुद अपनी बेचैनी का पता कभी नहीं देगी...। हम दोनों के बीच बहुत बातें हुआ करती है, लेकिन बहुत कुछ ऐसा भी होता है, जो अनकहा ही रह जाता है। पता नहीं उसमें से भी कितना हम दोनों समझ पाते हैं और कितना छूट जाता है!
वो एक प्रोजेक्ट से सिलसिले में बाहर जाने वाली थी। उसने कुछ कहा नहीं था, मैंने कुछ पूछा नहीं... सुबह-सुबह जब मैं उसके घर पहुँचा तो वे अपना सामान निकालकर ताला लगा रही थी। मुझे देखकर वह चौंकी नहीं... ऐसे जैसे... वो तो जानती ही थी कि मैं पहुँचूगाँ ही...। बिना कुछ कहे मैंने उसका एयरबेग उठा लिया। वो भी कुछ नहीं बोली और गाड़ी में बैठ गई। वो कहीं और थी... गियर बदलने की मजबूरी के बाद भी... पता नहीं कैसे मैनेज कर लेता हूँ और उसके हाथ पर अपना हाथ रख देता हूँ। वो सूनी आँखों से देखती है, कुछ नमी तैरती है और इशारे से सामने देखने की ताकीद करते हुए फिर कहीं गुम हो जाती है। गाड़ी के जाते ही मुझे लगने लगता है जैसे मैं बहुत थक गया हूँ और अभी यहीं आराम करना चाहता हूँ। खाली स्टेशन पर हाल ही में खाली हुई बेंच पर जाकर बैठ जाता हूँ।

उन तीनों दिन में लगभग हर दिन उससे बात हुई थी, लेकिन कल दिनभर कुछ ऐसा हुआ कि कुछ मैं बिज़ी रहा, कुछ वो और कुछ नेटवर्क... तो बात हो ही नहीं पाई। आज उसे लौटना है।
सुबह से ही जैसे मुझे किसी आहट का इंतजार है। आज मेरी छुट्टी है और दिन भर सामने पसरा है एक लंबे-चौड़े मैदान की तरह... अब मुझे उससे खेलने की स्कील जुटानी है। मोबाइल बजा तो कई बार... लेकिन मेरी चेतना जैसे किसी खास आवाज की राह देख रही है। शाम... जब आधी नींद और पूरी खुमारी के बाद जागा तो आखिर वो आहट सुनाई दी।
कहाँ हो...?
घर पर ही, कब लौटी? – जानते हुए एक बेकार-सा सवाल।
मैं आ रही हूँ। - सारी औपचारिकता को दरकिनार कर धरती-सी उदारता के साथ उसने सूचना दी।

दिन भर तेज धूप रही, लेकिन शाम घिरते ही ना जाने कैसे आसमान पर बादल जमा होने लगे। उसके आने की खुशी में मैंने घर की हर चीज को छूकर देखा... पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लगा कि मेरी ही तरह मेरे घर को भी उसकी आमद का इंतजार है। उसकी ही गिफ्ट की हुई बाँसुरी की सीडी लगाई... और आवाज को बहुत धीमा कर दिया। बॉलकनी में दो कुर्सियाँ और टेबल लगाई, क्योंकि वो जब भी आती है, यहीं आकर बैठती है, बिल्डिंग के पिछले हिस्से में कॉलोनी के बगीचे के ठीक उपर ही है मेरी बॉलकनी...। घर के सारे दरवाजे-खिड़की और पर्दे खोल दिए। वो जब आई तब तक ठंडी हवाएँ चलने लगी थी। उसने पर्स सोफे पर पटका और सीधे बॉलकनी की कुर्सी में जाकर धँस गई। वो अपने टूर के बारे में बता रही थी, मैं उसे सुन रहा था... देख रहा था। अचानक उसकी बेचैन साँस ने मुझे फिर से छुआ, एक सिहरन हुई... वो उठकर अंदर आ गई...। उसने शिकायत-सी की - कितना शोर है!
पार्क में खेलते बच्चों की चिल्लपों के साथ ही आसपास के और भी लोग लगता है कि अच्छे मौसम को लूटने के लिए पार्क में जमा हो गए थे और उन सबकी सम्मिलित आवाजें... नीचे से गुजरते वाहनों का शोर... मुझे भी महसूस हुआ कि वाकई बहुत शोर हो रहा है। वो ड्राइंग रूम के सोफे पर आकर बैठ गई। सोफे की पुश्त पर सिर रखा – ये लाइट और ये म्यूजिक सिस्टम बंद कर सकते हो? – उसने जैसे गुज़ारिश की।
यार... आजकल मैं लाइट और साउंड को लेकर बहुत संवेदनशील हो चली हूँ। मुझे लगता है कितना शोर है आसपास... कितनी आवाजें आ रही है। मुझे रोशनी बेचैन करने लगी है। टीवी, रेडियो, वाहनों यहाँ तक कि पंखे के चलने की आवाज... और कभी-कभी तो घड़ी की सुईयों के सरकने की आवाज तक मुझे बेचैन किए देती है। - उसने अपनी हथेलियाँ खोलकर उँगलियाँ अपने बालों में कस ली। बाहर तेज बारिश होने लगी तो पार्क पूरा खाली हो गया। एक तरह से सारी कृत्रिम आवाजें बंद हो चली थी। वो उठकर बॉलकनी में आ गई।
मैंने उससे पूछा - चाय पिओगी...?
हाँ, नींबू है...?
नींबू चाय पीना है? – मुझे याद आया... उसे पसंद है। उसने कहा कुछ नहीं... बस गर्दन हिलाकर हाँ कर दी।
यूँ भी शाम उतर रही थी और फिर घने बादलों ने रोशनी और भी कम कर दी थी। धीरे-धीरे अँधेरा गाढ़ा होने लगा था। मैं किचन में चाय बनाने चला आया। चाय लेकर लौटा तो लाइट जा चुकी थी। बारिश बहुत तेज होने लगी थी... अब सिर्फ बादलों के बरसने की आवाज के अतिरिक्त और कोई आवाज शेष नहीं थी। स्ट्रीट लाइट की हल्की रोशनी में उसने चाय का गिलास उठा लिया था। उसने बहुत मायूसी से कहा – शोर है दिल में कुछ इतना/ मुझको सन्नाटा सदा (आवाज़) लगता है। बिजली की चमक में उजाले में मैं उसकी आँखों में समंदर उतरते देखता हूँ और खुद को उसमें डूबते पाता हूँ। एक गहरी साँस आती है, मेरा समंदर तो ये भी नहीं जानता है कि कोई उसके खारे पानी में घुट कर मर रहा है।
चाय का सिप लेकर गिलास को दोनों हाथों में थामते हुए वे कहती है – नाइस टी...।

Sunday, 3 July 2011

संघर्ष खुद से....!


मैंने उसे बहुत गहरी नींद से जगाया था। हड़बड़ा कर उठी थी वो... मैंने उसे आदेश-सा दिया, मेरे साथ चल, मुझे तुझसे कुछ बात करनी है...। मैं समझती हूँ कि वो बहुत गहरी नींद में थी, लेकिन मैंने उसकी कलाई को बहुत सख्ती से पकड़ लिया, और घसीटती हुई ही उसे ले जाने लगी थी। रात गहरी थी, सन्नाटा घना... वो अनमनी-सी, समझ नहीं पा रही थी कि मैं उसके साथ ऐसा क्यों कर रही हूँ!
लग तो मुझे भी रहा था कि मैं ये क्या कर रही हूँ? क्यों? का जवाब था मेरे पास, क्योंकि एक खऱाश, खलिश, घुटन मुझे लगातार महसूस हो रही थी और मुझे लगने लगा था कि बस उसकी वजह वो ही है। हम चलते चले जा रहे थे। एकाएक लगा कि एक नदी उग आई है, (तब मेरा विश्वास यकीन में बदल गया कि, मैं सपना देख रही हूँ, क्योंकि नदियाँ क्या ऐसे उगा करती है? सदियों तक पानी बहता है, तब जाकर नदी का रूप लेता है। खैर).... उछलती-कूदती शोर मचाती नदी रात के अँधेरे में थोड़ी और शैतान लगने लगी है। किनारे पर रखे पत्थरों पर हम दोनों ही बैठ गई। मुझे पता नहीं चला कि कब मेरी उँगलियों की पकड़ ढीली हो गई। मेरे चेहरे की सख्ती थोड़ी ढल गई। उसने अब मेरे कंधे पर अपना हाथ रखा – हाँ, बोल...।
मेरी नजर सीधी-काट देने वाली – तू जानती नहीं है क्या?
क्या? – उसका बहुत मासूम-सा सवाल
तू नहीं जानती है कि मुझे कितनी घुटन हो रही है, खुद को मैं कितना उपेक्षित होते हुए देख रही हूँ...! – मैंने तल्ख होकर उससे पूछा था।
उसके चेहरे पर बहुत भोलापन उतर आया... – नहीं, तू क्यों घुटती है, औऱ तेरी उपेक्षा कौन कर सकता है?
तेरी वजह से हो रहा है ये सब... – मैने थोड़ा नर्म होकर उससे कहा। मेरे अंदर कुछ बेतरह सुलग रहा था। - तेरे दिखने ने मेरे होने को खत्म कर दिया है। ये मत समझना कि मैं तुझसे जलती हूँ... – मैंने तीखी बात को अंदर ही ठेल दिया।
बस तू मुझे मुक्त कर दें... मुझे घुटन होने लगी है। ये भौतिकता मुझ से नहीं सधती है। लगातार सतर्कता... जैसे सारी ऊर्जा एक ही जगह जाया हो रही है। - रोकते-रोकते तक कड़वाहट उभर ही आई।
जाया हो रही है? - उसने आहत भाव से पूछा।
हाँ, सारी चेतना जैसे एक ही जगह बह रही है, तेज प्रवाह से... भौतिक होने पर... दैहिक होने पर... मुझे उससे निजात चाहिए। - मैंने जैसे फैसला सुना दिया।
मेरे करने से कहाँ कुछ बदलता है? - उसने अपनी बेबसी जाहिर की। - कितना भी करो, भौतिकता से कहाँ निजात है। कौन हमारे होने तक पहुँच पाता है, या पहुँचना चाहता है! किसके पास है इतनी फुर्सत...? - ना चाहते हुए भी उसकी पीड़ा छलक पड़ी थी।
पता नहीं ये पूरे चाँद की रात का असर है या यूँ ही-सा एक जुनून सवार था, मैं किसी भी कीमत पर हार मानने को राजी नहीं थी। कुछ चाहना अपना भी होता है मेरी जान... – ताना मारा था, मैंने।
तूने कब चाही मुक्ति... तू भी इसमें धँसे रहना चाहती है। आखिर तो किसे पसंद है, हर दिन, हर वक्त की जलन, चुभन, उबलन और बेचैनी...। बाहर सबकुछ खूबसूरत होना बहुत बड़ी राहत है, ये तो तू भी जानती ही है ना...! – उसे घायल करने का कोई मौका नहीं छोड़ रही हूँ। कभी-कभी होता है ना एक तरह का पागलपन सवार... बस ये कुछ ऐसा ही था, जब हम जानते हैं कि ये सरासर पालगपन है, फिर भी उसे जारी रखे रहते हैं, क्यों... ये तो सोचते ही नहीं।
उसकी बड़ी-बड़ी आँखे डबडबाने लगी थी, हालाँकि मेरे अंदर कुछ नर्मा रहा था फिर भी एकदम से नहीं। - जब सब कुछ अच्छा लगे तो फिर क्या ठीक करना और क्यों ठीक करना...?
वो एक तरह से मिन्नत ही कर रही थी – देख मैं भी तो तेरे साथ ही लगी हुई हूँ..। तुझसे अलग कहाँ हो पा रही हूँ? जो जैसा तू चाहती है, वैसा ही मैं भी तो कर रही हूँ। तू बता और क्या करूँ, जो तेरी घुटन कम हो..।
वो उठकर मेरे करीब आ गई। मेरी गोद में सिर रख दिया तो मेरे अंदर कुछ बहुत तेजी से पिघलने लगा। मेरी ऊँगलियाँ उसके बालों में घूमने लगी। मैंने उससे वादा लिया – तू हमेशा मेरे ही साथ रहेगी ना...! मुझे कभी अकेला तो नहीं छोड़ेगी ना...! तू जब बाहर हो जाती है ना, तो मैं बहुत अकेली पड़ जाती हूँ। मैं तेरा भीतर हूँ, चाहे जलता हुआ, उबलता हुआ हूँ, लेकिन तेरे होने का साक्षी और साथी भी... तू जानती है ना...!
उसने सिर उठाया, आँखों में अब भी आँसू थे। सिर हिलाकर हामी की और मुझे कमर से कस लिया। कहीं मेरी आँखें भी भीग गई थी। आँसू को ढ़लकने से बचाने के लिए सिर उठाया तो चाँद का अक्स नदी में नजर आया। यूँ ही एक विचार आया कि चाँद तक खुद को निहारता है, तो फिर इंसान की तो बिसात ही क्या है?

Wednesday, 22 June 2011

कैसा होता, जो यह पैसा न होता !


शायद वो सवाल तब उठा होगा जब पड्डू की दुकान पर उसने 10 पैसे के सिक्के के आकार की गोल-गोल सफेद गोलियाँ काँच की बर्नी में पहली बार देखी होगी। वो गई तो थी 10 पैसे में चार मिलने वाली नारंगी की गोलियाँ लेने, लेकिन उन सफेद गोलियों को देखकर उसका मन बदल गया। लालच आया कि इन सफेद बड़ी-बड़ी गोलियों का स्वाद लेकर देखा जाए, लेकिन पड्डू ने ये कह कर उसे मायूस कर दिया कि ये गोली 10 पैसे में एक ही आएगी। वो उसकी दुकान के उस अनगढ़ पत्थर पर मजबूती से अपने पैर जमाए सोचने लगी कि अब क्या करें?
हाथ में पैसे तो 10 ही है। एक गोली मिलेगी तो उसमें से भाई का भी हिस्सा होगा... मतलब आधी-आधी... ऊँ हूँ... लेकिन... उसने तुरंत निर्णय ले लिया – ठीक है आधी-आधी ही सही। कम-से-कम इस सफेद गोली का स्वाद तो पता चलेगा। ठीक है यही दे दो।
वो गोली लेकर घर आ गई। दोनों के हिस्से में आधी-आधी गोली आई। मीठी और मिंट वाली वो गोली उसे बहुत अच्छी लगी, लेकिन है बहुत महँगी। कहाँ तो नारंगी की गोली 10 पैसे में चार आती है और कहाँ ये 10 पैसे में एक ही देता है... पड्डू ठगता है। किसी ओर दुकान पर पता करूँगी। जब आसपास की दो दुकानों पर भी यही भाव रहा तो उसके मन में बहुत गंभीर सवाल उठा – ये पैसा क्यों है? क्या होता यदि ये पैसा नहीं होता?
उस रात खासी बारिश हो रही थी और घर की लाइट गुल हो चुकी थी... पढ़ाई से मुक्ति थी... इसलिए कल्पना के घोड़े खूब तबड़क-तबड़क करने लगे थे। पता नहीं उसकी ये आदत कब से है कि वो अपने अंदर उठने वाले सवाल कभी बड़ों से नहीं पूछती, खुद ही अपनी छोटी-सी समझ से उत्तर देती रहती। तो उसी ने खुश होकर उत्तर दिया – तो पड्डू से वो कितनी भी और कौन-सी भी गोली लेकर आ सकती।
और पड्डू के पास ये गोलियाँ कहाँ से आती?
अरे ये तो बहुत आसान है। जब पैसा होता ही नहीं, तो पड्डू भी चाहे जितनी गोलियाँ फैक्टरी से ला सकता। और फैक्टरी में क्या गोलियों को बनाने के पैसे नहीं लगते?
कैसे लगते, जब पैसे होते ही नहीं तो फैक्टरी वाले भी तो सारा सामान फोकट में ही लाते। (हालाँकि पैसों की उपस्थिति में पैसों के न होने की कल्पना करना कितना मुश्किल हुआ, ये बस वही बता सकती है... फिर भी...)
साँई फैक्टरी वाले को मुफ्त में जितनी चाहिए उतनी शकर देता, क्योंकि साँई को भी शकर कारखाने से मुफ्त में शकर मिलता। शकर के कारखाने में किसान गन्ना मुफ्त में देता... लेकिन यहाँ एक मुश्किल आ गई – किसान की जरूरत कैसे पूरी होती?
अरे... किसान को भी जो चाहिए, जितना चाहिए सब मुफ्त में ही तो मिलेगा ना...? जब किसान तो अपनी जरूरत का सारा सामान बिना पैसों के मिलेगा तो फिर उसे पैसों की क्या जरूरत होगी? कितना आसान है ना ऐसे जीना? पता नहीं बड़ों ने क्यों पैसे जैसी चीज बनाकर जिंदगी को इतना मुश्किल कर दिया। हर वक्त, हर जरूरत के वक्त ये दीवार की तरह आ खड़ा होता है...!
तर्कों की कड़ी-दर-कड़ी जोड़कर मिले निष्कर्ष पर उसने खुद ही खुद को शाबासी दी और अपनी खोज पर खुश हुई... लेकिन फिर तुरंत ही मायूस होकर उसने फिर सवाल किया – तो फिर पैसे की जरूरत ही क्यों थी?
ये पता नहीं कैसे वो जानती थी कि हर वो चीज जो है या जिसका आविष्कार हुआ है, वो इसलिए है क्योंकि उसकी लोगों को जरूरत है, (तब तक उसने आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है, जैसा कुछ सुना नहीं था) लेकिन वो फिऱ भी इस सवाल का जवाब नहीं दे पा रही थी कि जब बिना पैसों के सारी चीजें बहुत आसान है तो फिर पैसे की ईजाद हुई ही क्यों होगी?
बहुत सालों तक उसके छोटे-से दिमाग में बड़ों की दुनिया का ये गड़बड़झाला नहीं बैठा, वो सोचती तो बहुत थी, लेकिन वो ये जानती थी कि वो बहुत छोटी है और बड़ों की दुनिया बहुत उलझी हुई है, उसके सोचने से कुछ बदलने वाला नहीं है। यूँ ही तो हर बात पर उसे ये सुनने को मिलता था कि – तू छोटी है, तू नहीं समझेगी। या फिर ये बड़ों की बात है, तेरी समझ में नहीं आएगी। जब तू बड़ी हो जाएगी, तब अपने आप समझ आ जाएगी।

बचपन से निकलने के बाद भी बहुत बुनियादी बातें उसकी अकल में नहीं समाती थी, इसीलिए जब सोवियत संघ ढहा तो उसे आत्मिक कष्ट हुआ। उसने बस सुना ही सुना था कि वहाँ हरेक को उसकी जरूरत के हिसाब से घर मिलते हैं और एक ही तरह का कपड़ा बनता है और तमाम तरह की समानता की बातें..., तो फिर बचपन का सवाल दूसरी तरह से आ खड़ा हुआ...। जरूरतें पूरी होती है, फिर भी क्यों लोग असंतुष्ट रहते हैं?

तो साहब उसे ‘पैसा क्यों है?’ ये बात समझ में आ ही गई आखिर... कब? जब उसने खुद कमाना और खर्च करना शुरू किया। तब उसने जाना कि पैसे का आविष्कार जरूरत पूरी करने के लिए नहीं हुआ है, हवस... लालच पूरी करने के लिए हुआ है। आखिर बिना पैसे के ये कैसे तय होगा कि किसकी जरूरत कितनी है? और किसको कितना मिलना चाहिए? जरूरत तो सिर्फ दो जोड़ी कपड़ों की है, लेकिन यदि उसे कपड़ों से अपनी अलमारी भरनी है तो फिर पैसों की जरूरत होगी ना... आखिर तो जरूरत और हवस में बहुत फर्क है ना औऱ इस फर्क को पाटता है ना पैसा... ओ... ओ... अब पैसा नहीं। कम पैसा और ज्यादा पैसा...। औऱ जब ये गिरह खुली तो दुनिया की बहुत सारी गिरहें उसके सामने खुलती चली गई...।

Sunday, 12 June 2011

बस यादें रह जाती है...


पता नहीं कितने बचपन में बीमार रहती थी वो... ताई जी कहती हैं कि बहुत बचपन में तू बहुत बीमार रहती थी। उन दिनों तो आने-जाने के साधन भी नहीं हुआ करते थे। आधी-आधी रात को बारिश पानी में कोई एक छाता पकड़ता था और मैं (ताई जी) तुझे उठाए अस्पताल भागा करती थीं। उसे तो कुछ याद नहीं है। जब से होश संभाला है, छोटे भाई को ही बीमार होते देखती रही है। कभी पीलिया, तो कभी टॉयफॉइड...। और बस पूरा घर जैसे काँपने लगता था। माँ सारा-सारा दिन उसका सिर गोद में लेकर बैठी रहती थी, माँ हटती तो ताई... पापा ऑफिस से छुट्टी ले लिया करते औऱ ताऊजी आधी छुट्टी कर घर आ जाते। वो बस दर्शक बनी देखती रहती... कितना लाड़ करते हैं, सब बीमार बच्चे से... कोई आस उसमें भी जागती। पैंपर शब्द से तब तक वो परिचित नहीं थी। लेकिन पता नहीं कैसी मिट्टी थी, उसकी कि कभी उसका बुखार तक 100 से उपर नहीं जाता था। इस बात का मलाल था उसे... क्या पता आज भी हो...।
उस दिन भी भाई की बीमारी का ग्यारहवाँ दिन था। बुखार उतरता और फिर चढ़ने लगता...। कभी-कभी तो थर्मामीटर अविश्वसनीय छलाँग लगता और बुखार 104 डिग्री या फिर 105 के करीब पहुँच जाता... घर का हरेक सदस्य घबराने लगता, कोई इस डॉक्टर के पास ले जाने की बात करता तो कोई दूसरे...। वो बस दर्शक हुआ करती। आखिरकार डॉक्टर ने सलाह दे ही डाली कि बच्चे को अस्पताल में भर्ती करना पड़ेगा। उन दिनों प्रायवेट अस्पताल बहुत ज्यादा नहीं हुआ करते थे और जो होते थे, उनकी विश्वसनीयता भी नहीं थी, सो सिविल अस्पताल में भाई को भर्ती करा दिया गया। दिन-भर एक-के-बाद एक टेस्ट होते रहे और शाम तक पता चला कि पीलिया तो खैर था ही अब डबल टॉयफॉयड भी हो गया है। बुखार भी उतरते-उतरते ही उतरेगा। माँ उदास होकर भाई के लिए मौसंबी का रस निकाल रही थी। काँच का काँटे वाला कटोरा... मौंसबी को दबा-दबाकर नरम करने के बाद नींबू की तरह उसे बीच में से काटकर उस काँटे वाले उभरे हिस्से पर पूरी ताकत से दबाकर माँ रस निकाल रही थी। नीचे सारा रस इकट्ठा हो रहा था। काँच के ही गिलास पर गीला कपड़ा लगाकर सारा रस उसमें उँड़ेलती, फिर कपड़े को भी पूरी ताकत से निचोड़ देती। ना तो छिलकों में कुछ बचता और न ही कपड़े में जमा कूचे में... सारा रस गिलास में उतर आता और धीरे-धीरे गिलास में रस की मात्रा बढ़ती जाती... वो बड़ी हसरत से गिलास में धीरे-धीरे बढ़ते रस को देखती। उसका मन होता कि छिलकों को उलटाकर आधी कटी निचुड़ी हुई फाँकों को खा ले... लेकिन माँ की झिड़की के डर से बस देखती रहती। माँ का ध्यान भंग हुआ तो उन्होंने आँखों से इशारा किया कि देख लें यदि इसमें कुछ बचा हो तो... फिर जाने क्या सोचकर आखिरी वाली मौसंबी में थोड़ा-सा रस छोड़ दिया और उसने कृतज्ञ होकर माँ की तरफ देखा। रस में ढेर सारा ग्लूकोज डालकर जब भाई के दिया तो वो रोने लगा। वो समझ ही नहीं पा रही थी कि इसमें रोने की क्या बात है? वो कह रहा था मुझे नहीं पीना और सब उसे पुचकार कर और थोड़ा-सा पी लेने की मनुहार करते... एक घूँट पी ले, ऐसा कहकर फुसलाते। उसे बड़ा आश्चर्य़ हुआ कि कोई कैसे फल और जूस के लिए भी इंकार करता होगा। फिर भाई को समझाने के लिए गिलास में से थोड़ा रस किसी कटोरी में डाला कर उसे दे दिया.... कि देख अब कम कर लिया है, अब तो पी ले...।
फल काटकर उसे बहुत मान-मनौव्वल कर खिलाए जाते और वो 10 साल की छोकरी सोचती कि कोई ऐसा बीमार कैसे हो सकता है कि वह फल खाने से ही इंकार कर दे। और फिर खुद से एक वादा करती, यदि वो बीमार हुई तो कभी...कभी... फल खाने से इंकार नहीं करेगी... लेकिन वो ऐसी बीमार कभी हुई ही नहीं। (बाद में जब वो बड़ी हुई तो उसने इजाद किया कि – लड़कियाँ शारीरिक रूप से मजबूत होती है, उन्हें बड़ा करने में माता-पिता को ज्यादा मुश्किलें नहीं आती हैं। भाई ने पहले तो बहुत मजाक उड़ाया फिर एक दिन किसी रिपोर्ट को पढ़कर उसने भी स्वीकार कर लिया कि हाँ लड़कियाँ 'हमारी' तुलना में ज्यादा मजबूत होती है।)

टीवी पर किसी म्यूजिकल रिएलिटी शो को देखते हुए, वो एक-एक कर मौसंबी छील रही है। बस यहीं उसे अपना बचपन याद आ रहा है। न जाने कैसे आँसू उतर आए... जबकि अभी एक सूखी-सी मौसंबी को डस्टबिन के हवाले कर आई है। पता नहीं तब से ही फल उसकी कमजोरी है या फिर उसे पसंद थे, इसलिए उसके अंदर उस तरह से सब कुछ ठहर गया... लेकिन फलों को लेकर उसकी दीवानगी उसके ससुराल में 'विख्यात' है। मौसंबी साफ करके उसने प्लेट टेबल पर रख दी। सभी लोग प्रोग्राम देखते हुए खा रहे हैं। वो भी... लेकिन उसे लगा कि उस दिन अस्पताल में निचुड़ी हुई मौसंबी में जो स्वाद आया था, उसके बाद अब तक नहीं आया... क्यों...?

Sunday, 29 May 2011

इंतजार... उसकी स्लेट के धुलने का...


हर सुबह मैं इस हसरत से जागता हूँ कि आज उसकी स्लेट पर कुछ अपने मन का लिखूँगा और लगभग हर दिन पाता हूँ कि उस पर इतना कुछ घिचपिच होता है कि मेरे लिखने के लिए जगह ही नहीं बचती। कुछ जिद्द तो मेरी भी है कि घिचपिच में मैं अपना कुछ नहीं लिखूँगा...। तो हर दिन यूँ ही जाया हो रही है जिंदगी...। आज भी बहुत गर्म-सी सुबह जब चाय की ट्रे लेकर उसने मुझे जगाया तो आँखों में झुंझलाहट थी... – आज सन्डे है और आज भी मैंने ही चाय बनाई है।
मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया – ठीक है, कल मैं बना दूँगा।
उसके चेहरे का तनाव ढीला हुआ और उसने भी रूठी-सी मुस्कुराहट फैलाई...। आज भी बहुत गर्मी है... है ना..? – थोड़ी देर बाद उसने कहा और मुझसे सहमति चाही। मैंने उसकी तरफ देखा... तुम्हारा सिरदर्द कैसा है? वो और मृदु हो आई, बोली - नहीं सिरदर्द नहीं है, क्या तुम्हें गर्मी नहीं लग रही है?
आज भी पूरी स्लेट घिचपिच है। अखबार पढ़ते हुए पूरे समय वो चुप थी... एक बेचैन चुप...। मैं उसकी बेचैनी को देख रहा था, बरसों-बरस उसे दूर करने की कोशिशें की, अब हारने लगा हूँ। समझ नहीं पाता कि ये क्यों है और कब तक ऐसी ही रहेगी। आम तौर पर उसे देखकर ये अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है कि वो बेचैन है। बेतरह शांति होती है, उसके चेहरे पर, लेकिन मैं जान पाता हूँ कि ये शांति कितनी बाहरी है। - मेरे होंठो का तबस्सुम दे गया धोखा तुझे/ तूने मुझको बाग़ जाना देख ले सेहरा हूँ मैं... कहती हुई-सी, चुनौती देती हुई। वो घर का हर काम एक अद्भुत लय के साथ करती है, लेकिन जैसे ही खुद के साथ खड़ी होती है, सारी लय ऐसे टूट जाती है, जैसे मंत्रमुग्ध हो चुकी संगीत सभा में झटके से सितार का कोई तार टूट जाए। अब वो अपने साथ है, कभी कोई पत्रिका उठाती है, पलटती है, कुछ एकाध पन्ना पढ़ती है... रख देती है। फिर किताबों की रैक की तरफ जाती है, लेकर आती है कोई किताब... कभी कोई पढ़ा हुआ फिक्शन... मुझे लगता है चलो इसे पढ़कर कुछ व्यवस्थित होगी, लेकिन उसके कवर को सहलाती रहती है, फिर कहीं कोई पन्ना खोलकर उसे पढ़ती है और बंद कर फिर से रैक की तरफ लौट जाती है। इस बार उसके हाथ में नॉन फिक्शन है। शायद किसी लेखक की डायरी-सा कुछ। बहुत मनोयोग से पढ़ती है, लेकिन फिर लगता है कि सब कुछ टूट गया है और वो उसे वहीं पटक देती है। अब वो लेटकर छत को ताकने लगी है, कोई टूटा-फूटा संदर्भहीन वाक्य कहती है और फिर चुप हो जाती है। झटके से उठती है... बालों को समेटकर जूड़ा बनाती है – बहुत बेचैनी है, कितनी गर्मी हो रही है। मैं उसे देख रहा हूँ, बहुत बेबसी से उसकी भीतरी बेचैनी को सतह पर आते, जिसे वो लगातार गर्मी के पीछे छुपा रही है।
बहुत देर से अपने म्यूजिक कलेक्शन का ड्रावर खोले बैठी है। कोई सीडी निकाल कर लगाती है। पंकज मलिक का गाना – पिया मिलन को जाना... बजता है। सुनो कैसे सरल शब्दों में कैसी फिलॉसफी कह दी है। - वो अभिभूत होकर कहती है। मैं उसे सुनने लगता हूँ। वाकई! – जग की लाज मन की मौज दोनों को निभाना... सच में अद्भुत...। उसकी आँखों में चमक आ जाती है। मैं देख रहा हूँ धूप-छाँह का खेल... मैं उसकी स्लेट को टटोलता हूँ, लेकिन घिचपिच बरकरार है। एकाएक वो चिढ़कर म्यूजिक सिस्टम बंद कर देती है।
मुझे कुछ बहुत अच्छा खरीदना है... – वो कह रही है।
क्या बहुत अच्छा? - मुझे उम्मीद होती है। शायद कुछ लय बँधे।
कितने दिनों से कुछ अच्छा म्यूजिक, कोई अच्छी किताब नहीं खरीदी।
जो कुछ है तुम्हारे कलेक्शन में वो सब कुछ तुमने सुन-पढ़ लिया है? – मैं उसे चिढ़ाता हूँ।
हाँ, जो कुछ अच्छा था, सब सुन-पढ़ लिया है, अब मुझे कुछ नया चाहिए।
नया... और अच्छा...? – मैं उसे फिर चिढ़ाता हूँ। वो सोचने लगती है।
हाँ, नया और अच्छा...- फिर खुद ही हड़बड़ाती है – नहीं मतलब कुछ बहुत पुराना जो हमारे लिए नया है। मतलब जिसे हमने नहीं सुना-पढ़ा है। हाँ कुछ क्लासिकल और इंस्ट्रूमेंटल तो नया मिल ही सकता है ना...। कुछ ऐसे क्लासिक्स जो हमने नहीं पढ़े हैं।– उसके चेहरे पर चमक लौटती है।
चलो, आज चलते हैं।– मैं कुछ लिखने की कोशिश करता हूँ। बिना स्लेट देखे।
आज... – कुछ मेरे अंदर कौधता है, वो कुछ सोचती है – नहीं, आज नहीं... कौन सन्डे बर्बाद करे। - मैं बुझ जाता हूँ। स्लेट पर अब भी घिचपिच है।

अधूरी नींद में घड़ी देखती है। उठो पाँच बज गए हैं... चाय पिलाओ।
ऊँ... हाँ... दस मिनट...। – मैं गहरी नींद में हूँ, वहीं से जवाब देता हूँ। थोड़ी देर बाद सुबह की झुँझलाहट को खींचकर लाती हुई वो उठाती है। - सुबह भी मैं ही चाय बनाऊँ और दोपहर को भी।
मैं थोड़ा आँखें तरेरता हूँ – मैंने कहा था मैं बनाता हूँ, तुम्हें इतनी क्या जल्दी थी?
हुँ...ह... आधे घंटे से सो रहे हो। दस मिनट पता नहीं कब होते...! – झूठमूठ गुस्सा दिखाती है। जब मैं शरारत से मुस्कुराता हूँ, तब। स्लेट थोड़ी साफ होती दिखती है। वो सारे पर्दे खींच देती है। शाम कमरे में उतर आती है। मैं इशारा करता हूँ, लाईट जला दो...।
अच्छा लग रहा है। - वो खारिज कर देती है। फिर से उठकर म्यूजिक सिस्टम की तरफ बढ़ती है। कोई बहुत पुरानी कैसेट लगाती है। जगजीतसिंह गा रहे होते हैं। - बरसात का बादल का दीवाना है क्या जाने/ किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है। हम दोनों ही डूबने लगे हैं। दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है/ मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है। उसकी स्लेट कुछ-कुछ साफ होते दिख रही है, लेकिन दिन उतर गया है, मैं उदास हो जाता हूँ। मगर उसपर शाम के चढ़े नशे को देखता हूँ, तो कहीं से उम्मीद की किरण झाँकती है।

बाहर निकलते ही ठंडी हवा का झोंका छूकर गुजरता है। हुँ.... शब-ए-मालवा... वो किलकती है। - अच्छा लग रहा है ना...! दिन में तो कितनी गर्मी थी।
चलो... अंत भला तो सब भला। मैं खुद से ही कहता हूँ।
पता है मुझे गर्मी क्यों पसंद है। क्योंकि उसकी शामें और रातें बहुत खुली-खुली लगती है। ऐसी जैसे कि दिन फैलता-पिघलता रात में घुल रहा है। अँधेरे कमरे की खुली हुई खिड़की से बाहर के खुलेपन को दिखाती हुई वो कहती है, - लेकिन फिर भी बारिश तो बारिश है, कब आएगी बारिश... वो बच्चों की-सी विकलता से पूछती है।
पार्श्व में बेगम अख्तर गा रही है – हम तो समझे थे कि बरसात में बरसेगी शराब/ आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया...।
वो फिर किलकती है, मुझे बारिश का बेसब्री से इंतजार है। मैं कहता हूँ – मुझे भी...। सोचता हूँ - क्योंकि बारिश में उसकी स्लेट भी धुल जाएगी और मैं अपने मन का कुछ लिखूँगा, कोई कविता जो उसे परिभाषित करे... फिर खुद ही बुझ जाता हूँ, कर पाएगी क्या कोई...?

Saturday, 14 May 2011

उसकी क़ुर्बत (नजदीकी, निकटता)....


वो अक्सर बंद रहती है, कभी-कभी ही खुलती है। मैं उससे कहना चाहता हूँ कि तुम्हारा खुला होना मुझे अपनी सफलता लगती है, लेकिन कह नहीं पाता हूँ। मुझे लगता है कि वो समझती है कि मैं उसे प्यार करने लगा हूँ, लेकिन वो कभी कुछ नहीं कहती। मैं भी उसे कुछ कह नहीं पाता। जब कभी वो मेरे साथ होती है, मैं उसे जीना चाहता हूँ, पर अक्सर वो मुझे बंद ही मिलती है। बहुत सारी उलझनों के साथ वो मेरे सामने आती है और मैं उसे सुलझाने में ही व्यस्त हो जाता हूँ, ऐसे ही वो लम्हे गुजर जाते हैं। उससे दूर उसका साथ मैं ज्यादा जी पाता हूँ, उसकी यादों को सजाता रहता हूँ, उससे प्यार करता हूँ, उससे बात करता हूँ, खोलकर अपना दिल उसके सामने रख देता हूँ, उससे दूर वो मेरे सामने खुलती है, महकती है, गुलाब और रजनीगंधा की तरह...।
आज उसका फोन आया – क्या कर रहे हो?
मैं कहना चाहता हूँ, तुम्हारी यादों को तरतीब दे रहा हूँ, लेकिन कह नहीं पाता। जवाब देता हूँ – कुछ नहीं... बोलो....।
वो हमेशा सीधे ही सवाल पूछती है। कभी हलो हाय नहीं कहती। पता नहीं वो मुझसे ही ऐसे बात करती है या ये उसका स्टाइल ही है, बिना किसी लाग-लपेट के सीधे काम की बात। पूछती है – फुर्सत है?
मैं सोचता हूँ कितना खड़ा बोलती है। याद आता है, जब वो बंद होती है, तब बहुत विनम्र होती है, बहुत नपी-तुली... उसके शब्दो में ‘संतुलित’...। जब खुलती है तो प्राकृत हो जाती है। हँसी आई थी ये सोचकर कि हमेशा ही उल्टा करती है।
मैं फिर कहता हूँ – बोलो...
वो आदेश देती है - घंटे भर में म्यूजिक प्लेनेट पहुँचो।
मुझे उसका आदेश देना अच्छा लगता है। वो अक्सर कहती है कि – स्त्री शासित होना चाहती है। क्योंकि यही उसका इतिहास रहा है, उसकी आदतों का इतिहास। और हँस पड़ती है। आज मुझे लगा कि कभी-कभी पुरुष भी चाहता है कि कोई उस पर शासन करे। शायद वो भी बदलाव चाहता है। या फिर भारहीन या मुक्त होना चाहता है, हर वक्त निर्णय लेने की दुविधा से...। या फिर किसी को, जिसे वो पसंद करें, शासन करने का अधिकार देना चाहता है। जो भी हो, मेरे मन के किसी कोने ने मुझसे कहा कि आज वो खुली हुई है।
आज मैं उसे बहुत करीने से पाता हूँ। बहुत सारे चटख और खुले रंग की लाइनिंग के कुर्ते के साथ फिरोजी रंग का चूड़ीदार और दुपट्टा... पूरी तरह से फेमिनीन... अक्सर तो वो अपनी ड्रेसिंग को लेकर लापरवाह ही हुआ करती है। आज वो खुली हुई है।
जब हम वहाँ से निकले तो उसके हाथ में बहुत सारी सीडीज थी। वो मेरे साथ बैठी है, मैं जानना चाहता हूँ – अब कहाँ? लेकिन नहीं पूछता, इंतजार करता हूँ, उसके कहने का... वो चुप है। चाभी घूमाता हूँ और एक्सीलरेटर पर पैर रखकर गाड़ी आगे बढ़ा लेता हूँ। फिर से उम्मीद करता हूँ कि वो निर्देश दें, वो अब भी चुप है। मैं उसकी तरफ देखता हूँ, वो सामने देख रही है, निर्विकार... निर्लिप्त... निस्संग...। न वो कहती है और न मैं पूछता हूँ कि – कहाँ? आज वो खुली हुई है।


मेरा म्यूजिक सिस्टम भी जैसे उसी का इंतजार करता है। कभी-कभी तो मुझे उसे हाथ लगाते हुए ही डर लगने लगता है कि कहीं वो मुझे करंट मारकर झटक ही न दें। बस इसी डर से मैं उसे कभी हाथ ही नहीं लगाता हूँ, जब कभी वो आती है, तब वही इसे ऑन करती है, जैसे आज किया। वो एक-एक कर सीडीज खोलती जा रही है। जैसे बच्चे को अपना मनपसंद खिलौना मिलने पर खुशी होती है, बस खुशी का वही रंग उसके चेहरे पर नजर आ रहा है। वो आज खुली हुई है, अक्सर तो वो बंद ही होती है, अपनी उलझनों के दायरों में...। मुझे म्यूजिक की समझ वैसी नहीं है, जरूरी भी क्या है? कोई इंस्ट्रूमेंटल पीस... शायद संतूर बजने लगा है, अच्छा लग रहा है। वो हमेशा की तरह जमीन पर बैठी है और उसका सिर सोफे पर टिका हुआ है। पैर फैलाते हुए पूछती है, क्या पिला रहे हो? मेरा मन किया कि मैं उसका सिर अपनी गोद में रखकर सहलाऊँ, लेकिन पूछता हूँ – क्या पीना चाहती हो?
वो शरारत से मुस्कुराती है, क्या है तुम्हारे पास...? वही सॉफ्ट ड्रिंक्स...
मैं झेंप जाता हूँ। जब मैं लौटता हूँ, तो उसे जमीन पर कुशन लगाते हुए देखता हूँ। वो इशारे से मुझे अपने पास बैठने के लिए बुलाती है। मैं बच्चों की तरह उसकी बात मानकर जमीन पर उस जगह बैठ जाता हूँ, जहाँ पर अभी तक वो बैठी हुई थी। अचानक वो कुशन पर सिर रखकर लेट जाती है। सिर पर उसकी बाँह पड़ी हुई है और दुपट्टा गले में सिकुड़ गया है। उसकी उठती-गिरती साँसें मेरे सीने पर हल्के-हल्के दस्तक दे रही है। उसकी बंद आँखें मुझे उसे देखते रहने की सुविधा दे रही है। मैं उसे चूमना चाहता हूँ, लेकिन... ।
जून उतर रहा है और बादलों की आवाजाही तेज हो गई है। अचानक बादल कड़कते हैं और बिजली गुल हो जाती है। शाम हो रही है और अँधेरा घिर आया है। वो आँखें बंद किए हुए ही कहती है, पर्दे हटाकर खिड़कियाँ खोल दो...। मैं वैसा ही करता हूँ। भूरे बादल कमरे में आ पसरते हैं, उनके बीच उसका चेहरा रह-रहकर कौंध जाता है। वो एक क्षण को आँखें खोलती है, मुझे लगता है कि वो मुझे आमंत्रित कर रही है। मैं उठकर उसके करीब चला जाता हूँ, वो फिर से आँखें बंद कर लेती है। मैंने उससे कभी नहीं कहा कि मैं उससे प्यार करता हूँ, मुझे लगता है कि वो ये समझती है। मैं उस पर झुक जाता हूँ और... पहली बार... उसे चूम लेता हूँ। उसकी आँखें अब भी बंद है। मुझे अक्सर लगता था कि जब कभी मैं उसके करीब जाऊँगा... बहुत करीब... तो सालों से संचित उन्माद से सारे बंधन तहस-नहस कर दूँगा। लेकिन मुझे आश्चर्य होता है कि मैं संयत हूँ – उसकी क़ुर्बत में अजब दूरी है, आदमी हो के खुदा लगता है...। मैं फिर अपनी जगह लौट जाता हूँ। बारिश के पहले की आहट है। हवाएँ सनसनाने लगी है, मुझे महसूस हो रहा है कि वो खुद में गहरे उतर गई है, और मैं यहीं कहीं छूट गया हूँ। एकाएक मैं खुद को फालतू लगने लगता हूँ। चौंकता हूँ उसकी आवाज सुनकर... उसकी आँखें मूँदी हुई है और वो गा रही है – आप ये पूछते हैं दर्द कहाँ होता है/ एक जगह हो तो बता दूँ कि यहाँ होता है...।
उसने कभी बताया था कि अपने बचपन में उसने कुछ दिन संगीत सीखा है, सुना पहली बार। सुर अनगढ़ है लेकिन आवाज दर्द और उसके अहसास से भरी हुई है। वो डूब गई, बहुत गहरे क्योंकि ऐसा लग रहा है कि उसकी आवाज बहुत दूर से आ रही है, आज वो खुली हुई है। मैं अपने मोबाइल का रिकॉर्डर ऑन कर देता हूँ, - आप आए तो सुकूं आप न आए तो सुकूं/ दर्द में दर्द का अहसास कहाँ होता है... दिल को हर वक्त तसल्ली का गुमां होता है/ दर्द होता है, मगर जाने कहाँ होता है।
वो गा रही है, एक-एक कर उसने गज़ल के सारे शेर गाए... मैं आश्चर्य में हूँ, मैंने पहली बार उसे इतना स्थिर, इतना शांत पाया। अब वो चुप है, उसकी आँखें अब तक बंद है। बहुत देर तक मैं उसके बाहर आने का इंतजार करता हूँ। बाहर से आने वाले झोंके के साथ मिट्टी की सौंधी-सी खूशबू अंदर भर आती है। मैं इंतजार करता हूँ, उसके चिहुँकने का, उसे पहली बारिश जो पसंद है... नहीं उसे बारिश ही पंसद है, लेकिन वो नहीं लौटती, शायद वो सो गई है। मैं धीरे से उठता हूँ, बॉलकनी में चला आता हूँ। पर्दा खींचकर मोबाइल में रिकॉर्ड हुई उसकी आवाज सुनता हूँ। सुनते-सुनते खुद भी डूब जाता हूँ। बड़ी-बड़ी बूँदें बरसने लगती है। एक बार फिर उसकी गज़ल खत्म हो जाती है, फिर भी चल रही है, अंदर...। हल्की-हल्की फुहारें लग रही है, मीठा और अच्छा-सा लगने लगा है। मुझे वहम होता है कि पर्दा सरका, मन करता है कि एक बार वहम की तस्दीक कर लूँ, लेकिन नहीं करता। फिर लगता है कि वो मेरे पैरों के पास आकर बैठी है और अपना सिर उसने मेरी गोद में रख लिया है, मैं उसके सिर को थपक रहा हूँ। मैं फिर से तस्दीक करना चाहता हूँ, लेकिन डर के मारे आँखें नहीं खोलता...।
मुझे भी आज पता नहीं कैसे मुक्ति का अहसास हो रहा है, एकदम शांति और भारहीनता, जैसे अंतरिक्ष में होती होगी... । शायद इसलिए कि आज वो खुली हुई है... और मैंने उसके खुले होने को कैद कर लिया है, अपने ज़हन में और अपने मोबाइल में भी...

Tuesday, 10 May 2011

छीजते हम...



कुछ अटका हुआ है, कुछ छूटा तो कुछ भटका हुआ है। बहुत सारा कुछ भूला हुआ याद आता है और बहुत सारा याद रहता-सा भूल जाते हैं। कुछ रिश्ते जो अभी जिंदा हैं, धड़कते हैं और याद दिलाते हैं अपने जीवित होने की... कुछ जो दरक गए हैं, हमारे न चाहते हुए भी... उनकी किरचें बिखरी हुई है, यहीं कहीं... चुभती है, टीसती है, दर्द देती है। नहीं चाहते थे कि कुछ भी टूटे, लेकिन जो अंदर बनता है वो बहुत नाज़ुक होता है, पता नहीं किससे उसे ठेस लग जाए... बहुत एहतियात बरता था, लेकिन बचा नहीं पाए... हम ही कहीं असफल रहे। गहरे पैठे थे वो अंदर कहीं, हम भी नहीं जानते थे कि कितने अंदर तक जा धँसे हैं, कुछ रिश्तों का वजूद जिंदगी से भी पुराना होता है, तो जब वे चटखते हैं तो जैसे जिंदगी की नींव ही हिल जाती है...। जिंदगी उन रिश्तों से नाभिनाल की तरह जुड़ी हुई रहती है, फिर भी कैसे दरक जाते हैं... दुनियादारी....!
वो मजबूत दरख्त-से रिश्ते जब उखड़े तो जैसे तूफान ही आ गया। कितना कुछ बिखरा और तिनके-सा उड़ गया, हमें होश ही नहीं रहा, जब होश आया तो मोटा-मोटी नुकसान तक ही पहुँच पाए, हालाँकि ये बाद में पता चला कि नुकसान इतना ज्यादा था कि उस तूफान को आए अर्सा बीत गया, लेकिन उसकी भरपाई नहीं हो पाई, बल्कि हर याद के साथ वो नुकसान उभर-उभर आता है। अपनी जिद्द और टूटन को संभालते हुए पता नहीं कहाँ क्या खो दिया, अब तक समझ नहीं पाए हैं, जब कभी कच्ची जमीन पर रखा हुआ पैर धसकता है तो याद आता है कि ये भी उसके साथ छिटका है, टूटा है। बहुत नाजुक-सा कुछ बहुत बुरी तरह से क्षत-विक्षत हुआ है, क्या गलत हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ और जो हुआ उसे रोका क्यों नहीं गया, क्या उसे ठीक नहीं किया जा सकता है? अब कुछ नहीं हो सकता है, प्रेम के धागे-सा कुछ चटख गया है। जोड़ा तो है, जतन से लेकिन गाँठ है, उभरी हुई, चुभती हुई।
जब कहीं अंदर कुछ कड़ा मिलता है तो चौंकते हैं, - ये हमारा तो नहीं, लेकिन अंदर है तो हमारा ही होगा। बना हुआ नहीं होगा तो बनता रहा होगा! बहुत कोशिश करने के बाद भी ‘अंतर’ को सख्त होने से नहीं बचा पाए।
पूछते हैं खुद से ही कि कभी मुलायम मखमल रही इस जमीन में ये सख्त पत्थर कहाँ से आ गए? कैसे हो गया इतना सख्त और क्या हो गया इतना कड़ा, हमें पता क्यों नहीं चला? ये उसी नुकसान के अवशेष हैं, जो कभी हुआ था।
जिद्द अब भी है, लेकिन हमारे अंदर ही कुछ ऐसा है जो हमसे भी ज्यादा जिद्दी है। हमारे जिद्द के पत्थर में कहीं दरार ढूँढ कर अंदर बहने लगी है वो रोशनी और हम रोक नहीं पा रहे हैं। वो दिखा रही है – देखो कहाँ-कहाँ से छीजे हो, कितने उथले हुए हो, कितना कम हुए हो, कितना छोटे हुए हो?
जो टूटा है, उसका नुकसान तो खैर है ही, लेकिन अपने अंदर की धड़कती संवेदनाओं के मर जाने की टीस क्या दर्द नहीं देती है...? तो क्या रिश्तों का टूटना महज उतना ही है? दिखता चाहे उतना ही हो, लेकिन दर्द, त्रास और वेदना उससे कई गुना ज्यादा है... टूटने की और खुद के कम होते रहने की भी...।

Sunday, 24 April 2011

नए-पुराने शहर के बीच... कहीं...

तेज गर्मी में शॉपिंग का प्लान... सुनकर ही पसीना आने लगा था, लेकिन जब मामला जिम्मेदारी का हो तो उससे कन्नी नहीं काट सकते हैं। तो ठंडे होते सूरज का इंतजार करते जब बाजार पहुँचे तो गर्मी का अहसास तो पता नहीं कहाँ बिला गया, और बाजार की भीड़ को देखकर खुद के कुछ ज्यादा सुविधाजीवी होने पर लानत-मलामतें भेजी... हम तो खैर मजबूरी में शॉपिंग बैग उठाए हैं, लेकिन लोग शौकिया शॉपिंग कर रहे हैं... क्या मौसम कभी कोई सीमा-रेखा खींच सकता है? दो-तीन घंटे माथापच्ची करने और पूरी तरह से निचुड़ जाने के बाद जब उस चकमक दुकान से बाहर आए तो एक बारगी लगा कि खुले में आ गए, लेकिन एक-दूसरे को ठेलती-ढकेलती और टकराती भीड़, वाहनों से निकलता दमघोंटू धुआँ, गर्मी और तेज चिल्लपों के बीच लगा कि कैसे भी जल्दी से घर पहुँच जाएँ। अपना रास्ता बनाते सरपट दौड़े जा रहे थे, कि एकाएक एक हाथठेले को देखकर रूक गए... कितने बरसों बाद... खिरनी, शहतूत और फालसे... याद आया हाँ, इसी मौसम के तो फल है।
कितने सालों बाद दिखे इस शहर में... बचपन में तो गर्मियों की लंबी-उबाऊ दोपहर, शाम को घर से निकलकर खेलने के इंतजार में खिरनी खाकर चिपकते होंठों और फालसे की बीजों से चारोली निकालते-निकालते ही तो बीतती थी। अपने बड़ों से सुना था कि बच्चों को मौसमी फल जरूर खाने चाहिए, क्यों...? इसलिए कि वे प्रकृति की देन है... छोड़िए भी, ये पुरानी बातें हो चली है। सारे गुजरे जमाने के शगल... नए शहर में रहते हुए कभी याद ही नहीं आया... खिरनी, शहतूत, फालसे और.... बचपन...।

कैरी-पुदीने की चटनी-सा पुराना शहर
एक पतली-सी दीवार के इस-उस ओर बसी दो घनी और खुली दुनिया, पतली सँकरी गलियों में खुलते, नीची चौखट के दरवाजे जिनसे गुजरने के लिए नवाँना पड़ता है सिर... जैसे नवाँया हो किसी मंदिर के सामने... उन दरवाजों से झाँका जा सकता हो घरों के अंदर, ली जा सकती हो, घर में बनाए जा रहे किसी देशी-ठेठ पकवान की खूशबू। सिर जोड़े खड़ी छत की मुँडेंरे... एक छत पर चढ़ो तो चलते-चलते पहुँच जाओ गली की आखिरी छत तक। अपने-अपने घरों के दरवाजों पर खड़ी माँ-भाभियाँ जो एक दूसरे से हँसी-ठिठौली करती है, यहाँ-वहाँ की बातों के बीच रानू-चीनू के जीतू-टीनू से चलते ‘चक्करों’ की बतकही... तो कभी पानी जैसी ‘मामूली’ चीज पर झगड़ भी पड़ती है, फिर कभी चुन्नू-मुन्नू के बीच की दोस्ती की नाजुक-सी डोर के सहारे रिश्तों के सिरों को फिर से लपक लेती है। खिड़कियों से कभी चीनी तो कभी अचार की कटोरियाँ यहाँ से वहाँ होती है। शर्माजी के दरवाजे पर पड़े अखबार को वर्माजी जल्दी उठकर लपक लेते हैं और जब शर्माजी जागते हैं तो वर्माजी के पूरे पढ़ लिए जाने का बड़ी कसक के साथ इंतजार करते हैं, लेकिन किसी भी सूरत में उनके हाथ से अखबार छीन नहीं सकते हैं। किसी एक घर में आए मेहमान की पहुँच गली के सारे घरों तक होती है। यहाँ कुछ भी निजी नहीं है। सबकुछ सबका साझा है, सुख है तो दुख भी।
एक पूरी दुनिया, संस्कृति और जीवन दर्शन है यहाँ... कम हो रहा है, लेकिन अभी भी जिंदा है... यूँ ही कहीं दिख जाता है, शहतूत, खिरनी, फालसे के ठेलों पर तो कभी गोल-गप्पे की रेहड़ी या फिर बर्फ के गोले के खुशनुमा मीठे रंगों सी दुनिया, आत्मीय, खुली हुई, रंग-बिरंगी और स्वादिष्ट, ठीक वैसी, जैसी गर्मियों में स्वाद देती है केरी-पुदीने की चटनी... फिर भी त्याज्य है ये दुनिया, जरा पैसा आया नहीं कि भागते हैं कॉलोनी की तरफ... होना चाहते हैं ‘आधुनिक’, और चाहने लगते हैं प्रायवेसी.... क्यों?
पित्ज़ा, बर्गर-सा नया शहर
‘कॉलोनी’ बचपन में सुने कुछ ऐसे शब्दों में से एक है, जिसका असल अर्थ बहुत सालों बाद, थोड़ा बहुत पढ़ने के बाद समझ आया था। बचपन में तो बस शहर से बाहर बसी बस्तियों के लिए कॉलोनी नाम का इस्तेमाल हुआ करता था। बड़ा ग्लैमरस और एच-एस ... जिससे खौफ भी हुआ करता था। बड़े हुए थोड़ा इतिहास और थोड़ी राजनीति पढ़ी तो समझ आया कि असल में कॉलोनी का मतलब क्या है? .... उपनिवेश.... राजनीतिक रूप से परतंत्र इकाई... जीती हुई टैरेटरी, जिस पर राजनीतिक अधिपत्य है, जैसा 47 से पहले हम थे। आज... आज कॉलोनी मूल शहर/बस्ती से दूर एक नई बस्ती... ज्यादा खुली, ज्यादा आधुनिक, प्राइवेट और बहुत हद तक उदासीन...।
ऐसा शायद हर शहर में ही होता होगा कि एक पुरानी बस्ती होती है और एक नई... उपनिवेश... कॉलोनी। अरे हाँ... यहाँ जो कॉलोनियाँ होती है, वे भी परंपरागत अर्थों में उपनिवेश ही है, यहाँ के मूल निवासी वे वंचित लोग हैं, जो अच्छे दाम के लालच में अपनी जमीन बेचकर या तो कहीं और दूर चले जाते हैं या फिर वहीं कहीं सिमट कर रह जाते हैं। बाहरी लोग यहाँ बसते हैं... वही अधिपत्य...। हाँ तो पुराने शहर से नए शहर की तरफ लौटे तो ये जगह चौंधियाएगी... काँच के शो-रूमों से झाँकती, लुभाती, रंग-बिरंगी चीजें। खुली-चौड़ी सड़कें, इतने खुले-खुले मकान कि एक ही घर में रहने वाले लोग अपनों से इंटरकॉम पर बात करें तो आस-पड़ोस के लोगों से बातें तो खैर यूँ भी यहाँ मीडिलक्लास मेंटेलिटी का पर्याय है। यहाँ पानी तो नहीं हाँ, पैप्सी-कोला-मिरिन्डा की पेट बॉटलें मिल जाएँगी। इमली, फालसा या खरबूजा तो नहीं दिखेगा हाँ, कीवी, किन्नू, चेरी जरूर अपने रंगों से आपको लुभाएँगे। सड़कों पर लोग नहीं होंगे, बस वाहन ही वाहन होंगे (हाँ वाहन तो लोग ही चलाएँगे, पर...)। एक बड़े से घेरे में बने बंद घरों की दीवारों को छेद कर सिर्फ टीवी की आवाजें आएँगी।
दरअसल ये दो दुनिया है, दो संस्कृतियों, दो जीवन दर्शन की तरह.... एक बिदांस, बिना कुंठा के एकदम खुली हुई और दूसरी... हर कदम पर सावधान, अपने अहं को सींचती, अपने में कैद... एक देशी और दूसरी विदेशी... एक अपनी और दूसरी उधार की... ठीक वैसे ही जैसे कि उपनिवेशों की सुविधाएँ, चाहे हम उठाए, लेकिन वो है तो दूसरों की देन ना...!
शायद इसीलिए इस खुशहाल वर्तमान में रहने के बाद भी बार-बार मन लौटता है, अतीत में, बचपन के मौसम में.... इमली, सत्तू, धानी, खिरनी, शहतूत, बेर और गु़ड के स्वाद में... यहाँ मौजूद पित्ज़ा-पास्ता, बर्गर, कीवी, किन्नू और चेरी के स्वाद से ऊबकर... सुविधाओं से अभाव की ओर... व्यक्तिगत से सार्वजनिकता की ओर... तर्क से भावना की ओर... क्या इसे ही जड़ों की तरफ लौटना कहते हैं?

Sunday, 17 April 2011

लहरों के हवाले है मन...


हर वक्त का लड़ाई-झगड़ा अच्छा नहीं है। ये सीख हरेक को अपने बचपन में मिलती रही है और यदि आप घर में बड़े हो तो आपको तो इसके साथ ये भी सुनने को मिलेगा कि तुम बड़े हो ना! समझदार हो, वो बच्चा है या बच्ची है उसकी बात सुन लो...। बड़े होने पर कई बार ऐसा होता है कि हम इसके उलट काम करने लगते हैं और कई बार उसी लीक को पकड़कर आगे का जीवन तय करते हैं। कुछ स्वभाव से लड़ाकू हो जाते हैं और कुछ समझदार...। औऱ कुछ ऐसे भी होते हैं, जो समय-समय पर सुविधानुसार बदलते रहते हैं... जैसे हम...। इसे प्रयोग भी कह सकते हैं और सुविधा भी। यूँ हर वक्त समझौतावादी होना या फिर हर वक्त हथियार लेकर लड़ना दोनों ही प्रवृत्ति ठीक नहीं है। मौका देखकर अपनी रणनीति तय करना ही अक्लमंदी मानी जाती है, लेकिन जब मामला अक्ल तक पहुँचने से पहले ही मन पर अटक जाए तो...? मुश्किलें संभाले नहीं संभलती है।
पता नहीं ये ग्रह-नक्षत्रों के परिवर्तन के प्रति मन की संवेदनशीलता है, रोजमर्रा के जीवन के प्रति उदासीनता या फिर लक्ष्यहीनता से पैदा हुई ऊब है। गर्मी के तपते दिनों और बेचैन करती रातों में अंदर भी कुछ उबलता, तपता-तपाता रहता है। जीवन अपनी गति और प्रवाह के साथ सहज है, लेकिन मन नहीं...। कहीं अटका, कहीं भटका, उदास, निराश और हताश, किसी बिंदू पर टिकता नहीं है, इसलिए हल तक हाथ पहुँचे ये हो नहीं सकता... तो फिर...? क्या किया जाए? सहा जाए या फिर लड़ा जाए...?
सवाल ये भी उठता है कि क्यों हर वक्त हथियार तान कर लड़ने के लिए तैयार रहे। कई बार बिना लड़े भी तो मसले हल होते हैं। तो क्या ऐसे ही हथियार डाल दें? लिजिए संघर्ष से संघर्ष करने के तरीके पर ही संघर्ष शुरू हो गया।
अज्ञेय को पढ़ते हुए लगा कि लड़ा जाए... क्योंकि शोधन करने पर ही परिष्कार हो सकता है। लड़ते रहे.... लड़ते रहे.... ना जीत मिली ना हार। संघर्ष घना होता चला गया। बेचैनी बढ़ती रही, अनिश्चय से पैदा होता तनाव भी... कुछ परिणाम नहीं। कब तक ये संघर्ष, कब तक ये बेचैनी और तनाव, जवाब... मौन। बचपन की सीख याद भी आ गई... हर वक्त का लड़ाई-झगड़ा... फिर फायदा भी क्या है?
कहा ना! प्रयोग करने की आदत है या फिर कह लें सनक... टेस्ट चेंज करने लिए ओशो को पढ़ा तो लगा कि कभी-कभी खुद को छोड़ देना भी काम कर सकता है। छोड़ दिया बहने और डूबने के लिए... देख रहे हैं, किनारे खड़े होकर... मरेंगे नहीं ये विश्वास है। उबरेंगे, कुछ लेकर, कुछ नए होकर...।

Wednesday, 30 March 2011

उगा है गाँठों का झुरमुट


कभी-कभी ऐसे ही बेवजह कुछ उलझ जाता है कि कोई सिऱा पकडाई में ही नहीं आता। सब कुछ सहज होता है, लेकिन कोई गाँठ ऐसे उभर आती है, जैसे वो वहीं थी, कई-कई बरस से, और हमारी नजर ही नहीं पड़ी उस पर और इस बार उस नाराज बच्चे की तरह ऐंठी हुई है, जिसे डाँट दिया हो और उसकी नाराजगी को भूल कर सब लोग काम पर लग गए हो। बहुत देर इंतजार करने के बाद वो कुछ ऐसा करे, जिससे सबका ध्यान उसकी ओर जाए। लेकिन जब ध्यान चला जाए और उसे मनाने के प्रयास किए जाए, तो उसकी अकड़ कम होने की बजाए कुछ और बढ़ जाए। पुरानी गाँठे, पुराने ज़ख्मों की तरह अड़ियल हो जाती है, खुलने में ही नहीं आती है। जितनी कोशिश करो, उतनी ही कड़ी होती चली जाती है।
कुछ ताजा, कुछ भूला-भटका, कुछ कहीं अटका और कुछ जहन में कहीं उलझा... सब मिलकर धमाचौकड़ी कर रहे हैं और हमारे पास सिवा उसे निस्संग होकर देखने के कोई और उपाय ही नहीं हो। एक अच्छे-से दिन के आखिरी सिरे पर उभर आया वो गूमड़... बिना किसी तर्क, बिना किसी कारण के। उभरी हुई गाँठ नजर आ रही है, गीले-उलझे धागों का गुँझलक भी, बस नहीं नजर आ रहा है तो कोई सिरा...। यूँ बेसबब कोई इस तरह से बेचैन होता है क्या? अक्सर अपनी बेचैनी पर इसी तरह के सवाल से रूबरू होते हैं, हो सकता है इस बेचैनी का कोई सिरा कहीं गहरे अतल में अटका हुआ हो, हो सकता है कि इसका कोई सिरा ही न हो, यूँ इस तरह के कयासों का कोई फायदा है क्या?
ये पहली बार नहीं है और शायद आखिरी बार भी नहीं... कभी-कभी इसकी जड़ें कहीं दूर अतीत में जाकर मिलती है तो कभी आज ही में कहीं अटकी हुई और कभी-कभी तो भविष्य का अज्ञात तक आकर इसमें जुड़ जाता है, कितनी ही कोशिश कर लें कि आज को ही देखें... अभी को, इसी पल को, लेकिन हमारी कोशिशों, चाहने और सोचने से परे चलता है ‘अंतर’ का संसार...। यहाँ कोई तर्क, कोई विचार, प्रयास, बहलाना, फुसलाना या फिर बहकाना कुछ भी नहीं चलता है। यहाँ के नियम तो अज्ञात है, लेकिन उल्लंघन पर सजा मिलती है कड़ी। हम ये नहीं कह सकते हैं कि – ‘यहाँ नो इंट्री का साइनबोर्ड नहीं है, ये हमारी गलती नहीं है।’ बस गलती की सजा मिलेगी ही मिलेगी, चाहे हम ये न जाने की गलती क्या है? तो अब सचमुच नहीं पता कि आखिर किस नियम का उल्लंघन हमने किया है, लेकिन सजा भोग रहे हैं। और ये भी नहीं जानते हैं कि सजा की अवधि क्या होगी...

Thursday, 24 March 2011

दर्द का हद से गुज़रना है, दवा हो जाना


पूरे सिर में दर्द की हल्की-पतली चादर-सी फैल गई थी... मैं ये जानती थी कि वो चादर धीरे-धीरे सिकुड़ने लगेगी और एक हिस्से में जमा हो जाएगी... अपनी सिलवटों के साथ, फिर भी मैंने उसे फैले रहने दिया। अक्सर मुझे लगता है कि शरीर और जहन में थोड़े-बहुत दर्द का होना जीने में... या अच्छे से जीने में कोई बड़ी बाधा नहीं है। कभी यूँ भी कि चलिए कुछ तो हुआ है... (हो सकता है ये बचकाना लगे, लेकिन है कुछ ऐसा ही)। इसी दर्द के साथ दिन भर काम चलता रहा। कभी जब कुछ महसूसने की फुर्सत पाई तो लगा कि धीरे-धीरे चादर के सिकुड़ने का क्रम चल रहा है। शाम होते-होते तक सिर के बाँई ओर चादर सिकुड़कर इकट्ठी हो गई थी और दर्द का घनत्व भी बढ़ गया था। फिर थोड़ी देर बाद बाँई कनपटी पर दर्द की हल्की-हल्की दस्तक होने लगी थी, लेकिन जैसे दर्द को महत्वहीन करने की जिद्द-सी सवार हो चली थी, कि उस तरफ से अपना ध्यान ही हटा लिया था।
घर पहुँचने के बाद भी उसे दरकिनार कर सारे जरूरी काम यथावत चलते रहे... यहाँ तक कि टीवी देखना और पढ़ने का क्रम भी बदस्तूर रहा। सिरदर्द है, इसका कोई जिक्र भी नहीं किया, क्योंकि जानती हूँ कि जिक्र होते ही चिंताओं का सिलसिला शुरू हो जाएगा और वो खत्म होगा पेनकिलर पर... आज पता नहीं क्यों पेनकिलर लेने का मन नहीं था। तो रात तक दस्तक की फ्रीक्वेंसी बढ़ गई थी और आघात भी तेज होने लगे थे। एक दिन यूँ ही ये विचार आया था कि क्यों न देखा जाए कि यदि दर्द में दर्दनिवारक नहीं ली जाए तो ये कब तक रहेगा और कैसा रहेगा। गोया कि अपनी या फिर अपने दर्द की परीक्षा ही लेने का विचार चला आया था और आज शायद परीक्षा का मन ही बना चुके थे। जिद्द के शेर की सवारी थी, कई बार आजमा चुकी हूँ, ज्यादातर तो जीती ही हूँ, लेकिन कई बार पटखनी भी खाई है, आज भी यही कवायद...। सारी रात कभी नींद जीती तो कभी दर्द... कभी नींद छा जाती और सब कुछ नीचे चला जाता तो कभी दर्द छा जाता और नींद चली जाती, लेकिन इतना तय है दर्द ने नींद को अपने शिखर तक पहुँचने से रोके रखा, जैसे नींद और दर्द के बीच भी हार-जीत का खेल चल रहा था और जैसा कि होता आया है, जो फिटेस्ट है जीतना तो उसे ही है तो दर्द जीत गया और सुबह होते-न-होते पेनकिलर तक हाथ पहुँच ही गया। आज मिली पटखनी...। इस खटरपटर में राजेश की नींद भी खुल गई और फिर शुरू हुआ चिंता, दुख और झल्लाहट का क्रम... – कबसे था दर्द? जब पता है कि बिना पेनकिलर के दर्द नहीं जाता तो उसे बढ़ने ही क्यों देती हो...? मुझे क्यों नहीं बताया? आदि-आदि... ये भी शगल ही है, जब दवाई ली तो घड़ी देखी- समय क्या हो रहा है? सुबह के पौने पाँच बज रहे थे। अरे हाँ! सबसे महत्वपूर्ण तथ्य ये है कि आज दफ्तर से छुट्टी ली है, मतलब दर्द को सहलाने की लक्जरी की जा सकती थी और वो की गई।
खैर सुबह चाय के कप के साथ रात के दर्द की चर्चा थी। यार, क्यों करती हो ऐसा, जब दर्द शुरू हुआ था, तभी उसका इलाज क्यों नहीं कर लेती हो? लेक्चर चल रहा था और मैं गर्दन झुकाए सुने जा रही थी, आखिर उसके पीछे कोई समझदार तर्क जो नहीं था। जो था वो बेहद बचकानी जिद्द थी... शुमोना ग़ालिब को गा रही थी...
इशरत-ए-कतरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है, दवा हो जाना...।
अचानक बेवकूफ़ाना मासूमियत से भरकर कह डाला – मैं देखना चाहती थी कि वो दर्द कैसा हुआ करता है जो खुद दवा हो जाता है। राजेश ठहाका लगाकर हँसे – पागल... ग़ालिब ने दिल के दर्द की बात कही है, बदन के नहीं...। अब मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं था...।

Friday, 18 March 2011

अरे ! होली के दिन( ही )क्यों पानी बचाएं ….



मीठी-सी खुनक वाली उमंग भरी सुबह थी, चाय का कप और अखबार...। हर सुबह जैसा ही क्रम..., अखबारों में खबरों का स्वरूप भी हर दिन जैसा ही था, लेकिन मन जैसे कुछ और चाह रहा था, तभी तो अखबार पढ़ते-पढ़ते मन में एकाएक गहरी निराशा भर गई। विकीलिक्स के खुलासे, बाचा की मौत का गहराता रहस्य, शहर में अफरा-तफरी, जापान में प्राकृतिक के बाद अब परमाणु आपदा... जो भी पढ़ा सब कुछ नकारात्मक। यूँ ये हर दिन ही होता है, लेकिन किसी दिन यदि मन कुछ उड़ना चाहे, कुछ अच्छा जानना-पढ़ना चाहे तो... तो आज कुछ ऐसा ही हुआ था।
तो अखबारों को एक तरफ सरका दिया और घड़ी के अनुशासन को अनदेखा कर अपनी खिड़की से दिखती दुनिया पर तेजी से नजरें घुमाने लगे...। जितनी चंचलता से मन, उतनी ही गति से आँखें...। विचारों का तेज प्रवाह था और कहीं कोई बंधन नहीं था, गोया कि होली हो... तभी तो लौट कर फिर अखबार की खबरों पर ठहर गए। होली की पृष्ठभूमि में हमारे इलाके के अखबार अभियान चला रहे हैं, पानी बचाओ...। अपने अभियान की गंभीरता को चमकाने के लिए वो दुनिया में पानी की कमी से जुड़ी सूचनाएँ, लेख, चल रही योजनाएँ और आँकड़ों का प्रकाशन कर रहे हैं, औऱ भविष्य की एक भयावह तस्वीर पेश कर रहे हैं, जैसे कि एक होली के दिन यदि पानी का उपयोग किया तो धरती जलविहीन हो जाएगी, अखबारों के सारे प्रयासों, विश्लेषणों और अनुमानों से तो ऐसा लगा कि बस अभी धरती जल जाएगी।
प्रकृति तो होली की तैयारी करती लग रही है। मौसम की खुनक कुछ कम हुई है, चटख रंग के फूल खिलने लगे हैं, पलाश के सिरे दहक रहे हैं, आम पर बौर और नीम पर निंबोली महकने लगी है। बाजार में भी हर तरफ रंग नजर आ रहे है। होलिका और प्रह्लाद के प्रसंग की पृष्ठभूमि में भी होली की कल्पना बस वसंत की विदाई और रबी की फसल पकने की खुशी की अभिव्यक्ति ही लगती है। कारण स्पष्ट है कि नेकी-बदी के इतने गंभीर आख्यान के बाद मस्ती और रंग का समीकरण बड़ा बेमेल-सा लगता है, कुछ जोड़ा हुआ सा... मतलब होलिका दहन अलग और रंगों का त्योहार अलग...।
हो सकता है होली के पीछे और भी कोई पौराणिक आख्यान हो, यूँ कृष्ण का होली से करीबी रिश्ता है और सच पूछो तो उन्हीं का हो सकता है, लोक-गीतों में तो राम से भी है, अब ये अलग बात है कि राम की इमेज हुरियारों के आसपास भी नहीं फटकती है। ऐसा लगता है कि होली की कल्पना किसी मनोवैज्ञानिक ने की होगी। वो यकीनन ट्रेंड मनोवैज्ञानिक तो नहीं ही रहा होगा, लेकिन उसे मानव मन की गहरी समझ होगी, थोड़ा उतर कर सोचो तो लगता है कि होली का मतलब है मस्ती... उमंग, उल्लास... साल भर में एक दिन ‘खालिस’ हो जाने की सुविधा... स्वतंत्रता...। थोड़ा आगे चले तो बेलौस और (माफ किजिए) गैर जिम्मेदार होने की सहूलियत...। साल में एक दिन सारे बंधनों को तोड़कर निर्बंध होने की आजादी, अपने अंदर की विकृति को निकाल फेंकने... व्यक्त करने का दिन... बहा देने की घड़ी (अब चाहे इस पर लेक्चर चलते रहे कि होली को शालीनता से मनाए, लेकिन कहीं न कहीं होली के पीछे यही मनोविज्ञान काम करता है।) तो अब यदि होली में मस्ती नहीं हो लापरवाही नहीं हो तो फिर उत्सव का मतलब ही क्या है? मतलब कि एक होली के लिए ही पानी बचाओ का नारा, बड़ा बेतुका और कृत्रिम-सा लगा... ।
पानी की कीमत करना बच्चों को घुट्टी में पिलाया जाना चाहिए, इसके लिए किसी होली या गर्मी में पानी की किल्लत का मोहताज होने की कतई जरूरत नहीं है। तभी तो बच्चे समझ पाएँगे कि ये समय और जीवन से भी कीमती है, क्योंकि पानी है तो ही जीवन है और जीवन है तो हमारे लिए समय का अस्तित्व...। अरे, अभियान तो ये चलाया जाए कि पानी की कीमत सिर्फ गर्मियों में या उस वक्त ही नहीं समझें जिस वक्त कमी हो, पानी का मूल्य तब ज्यादा समझें जब इफ़रात हो।
तो फिर... होली? अरे... होली मनाए जमकर, लेकिन खुद से एक वादा करें कि पानी को धन से भी ज्यादा किफायत से खर्च करेंगे, सिर्फ तभी नहीं, जब पानी की समस्या हो, तब भी जब अथाह पानी हो।
सभी को होली की शुभकामना

Monday, 7 March 2011

क्रमशः मनाली



मनु-आलय... यानी मनाली
मनु हमारे आदि पुरुष हैं और यहाँ की किंवदंतियों के हिसाब से सृष्टि के प्रलय के बाद मनु अपनी नाव सहित यहीं आकर रूके थे। रूके होंगे... एक तो हिमालय और दूसरा सृष्टि के पुर्नसृजन के लिए इससे बेहतर जगह कोई हो सकती है क्या... यदि प्रलय सिर्फ भारतीय उप-महाद्वीप में ही आया हो तो... ।
अब सृष्टि के पुर्नसृजन के किस्से भारतीय पुराणों, इस्लाम और यहाँ तक कि ईसाईयों में भी एक ही तरह के हैं... हमारे लिए मनु इस्लाम और ईसाईयों के लिए वो नूह हुए... तो मनु मंदिर के बारे में उत्सुकता गहरी थी। साढ़े तीन किमी का रास्ता तय कर जब हम मनु मंदिर के पास पहुँचे तो लगा कि हम हकीकत में उसी काल में आ पहुँचे हैं। गाय-बकरियों के बीच...। यहाँ पहुँच कर एकबारगी विश्वास आ गया कि जरूर मनु महाराज अपनी नाव लेकर यहीं आए होंगे, यहीं उन्हें श्रद्धा भी मिली होगी... लेकिन ईड़ा...? वो तो मैदानी ही होगी... क्यों... चलिए छोड़िए इस बेकार के विचार को...।
धीरे-धीरे लौटने का समय करीब आने लगा था... एक-साथ दो चीजें अंदर चल रही थी, प्रकृति से दूर चले जाने इस सौंदर्य से अलग हो जाने की टीस तो अपने घर लौटने की उत्कंठा... कोई जगह चाहे स्वर्ग-सी सुंदर हो, लेकिन आखिर अपना घर, अपना घर होता है ना... !
तो सबसे खूबसूरत जगह रोहतांग दर्रा ... हम खूबसूरत चीजों को बचाकर रखते हैं खूबसूरत दिनों के लिए... इस बीच दो बार सुन चुके थे कि रोहतांग बंद है, अब तो चार दिन गुजर चुके हैं बर्फ गिरे... अब तो रास्ता खुल ही गया होगा...? लेकिन नहीं... रोहतांग तो गर्मियों में ही खुलता है, अभी बर्फ का मैदान घुमना हो तो सोलांग वैली जाना पड़ेगा।
सोलांग... नमक का मैदान

सोलांग वैली मनाली से मात्र 16 किमी दूर है। वहाँ पेड़-पौधे नहीं है, बस हर तरफ चकाचौंध सफेदी है। जिस दिन हम सोलांग के मैदान पर पहुँचे उस दिन सूरज भी आलस छोड़ कर बाहर आ चुका था। उस बर्फ... नमक के मैदान पर सूर्य की किरणों से जो रिफ्लेक्शन पैदा हो रहा था, उससे परेशानी हो रही थी। वो मैदान असल में मैदान था, नर्म बर्फ में पैर धँस रहे थे, यहाँ स्कीईंग, पैराग्लाईडिंग, आईस स्कूटर और पता नहीं कौन-कौन से खेल चल रहे थे। पर्यटकों का मेला-सा लगा हुआ था। बाजार भी था, लेकिन बर्फ और धूप ने मिलकर आँखों को चौंधिया दिया था। वहाँ रहने से ज्यादा मजेदार वहाँ के फोटो देखना लगा।
... और घर की ओर

अंतिम दिन था... वन विहार होटल के सामने ही था... बाहर से दिखता था कि यहाँ देवदार का जंगल होगा, लेकिन ये अहसास नहीं था कि ब्यास भी यहीं से बहकर निकलती होगी। दिल्ली के लिए बस 3.30 पर थी और इस तरह लगभग आधा दिन था। इसमें मोनेस्ट्री देखी और वन विहार भी। वन विहार देवदार का घना-सा जंगल है और उसके पीछे से ब्यास नदी बह रही है। एक बार फिर पहाड़ से उतरती नदी... ग्रामीण... खालिस... अनगढ़ सौंदर्य... देखने और भोगने को मिला... हूक उठी यदि गर्मी होती तो क्या हमारे स्पर्श के बिना यूँ ही पानी बहता रह सकता था, लेकिन अभी... नहीं हाथ ड़ाल कर देखा था... बर्फ-सा ठंडा पानी थी, गर्मियों की तिस्ता भी याद आई थी, और हाँ पार्वती भी तो...। एकाध और आसपास की जगह देखी और लिजिए बारिश होने लगी। हमें लगा, जैसे हमारा स्वागत हुआ, हो सकता हो वैसी ही विदाई भी हो... मौसम बहुत सर्द हो गया। पिछले नौ दिनों में इतना सर्द नहीं हुआ था। बस में बैठे हुए उसके चलने की दुआ करने लगे थे... जब तक हमारी बस चली तब तक बस बूँदे ही बरस रही थी, बादल नहीं उतरे थे विदाई में...।

Sunday, 6 March 2011

पुनश्चः मनाली

सौंदर्य निरापद नहीं होता





कुनमुनाते हुए जब बाहर निकले तो सूरज हल्के-हल्के मुस्कुरा रहा था। मॉल रोड पर टोनी के चाय के स्टॉल पर पहुँचे तो नजारा ही दूसरा था। बदले मौसम का असर नजर रहा था। पर्यटक तो कम थे लेकिन स्थानीय लोग झुंड के झुंड बनाकर सूरज का स्वागत करते नजर रहे थे... लगा कि इस मौसम में यहाँ के लोग सूरज के निकलने को जरूर उत्सव की तरह मनाते होंगे। जहाँ से गाड़ियाँ आती-जाती हैं, वहाँ से तो बर्फ साफ की जा चुकी थी, लेकिन मनाली मॉल रोड पर वाहनों पर प्रतिबंध है, इसलिए यहाँ तो लोगों से चलने से बर्फ जम चुकी थी, जहाँ से ज्यादा आवाजाही थी, वहाँ बर्फ थो़ड़ी पिघलने भी लगी थी। याक मॉल रोड पर चुके थे और पर्यटक उन पर बैठकर फोटो खिंचवा रहे थे। हर तरफ रौनक नजर रही थी। उष्मा की रौनक...



खाने के बाद मीठी से नींद लेकर जब शाम की चाय के लिए बाहर आए, तो हल्की फुहारें शुरू हो चुकी थी। गर्म चाय का गिलास हाथ में लेकर आसमान की तरफ नजरें उठाई थी, ये जानने के लिए कि आज का इरादा क्या है कि बादलों की चिंदियाँ उतरती नजर आने लगी, छाता खोलकर मॉल रोड के अंतिम सिरे की तरफ बढ़ गए। धीरे-धीरे स्थानीय लोग और पर्यटक सभी गायब होने लगे... बादल अब कतरनों में बरसने लगे। छाते हटा दिए थे, सिर पर रूई की तरह ठहरने लगी थी बर्फ... हथेली में लेने का हौसला दिखाया तो, लेकिन ऊनी दस्तानों के अंदर जब पिघल कर उतरी तो सिहरन दौड़ने लगी... तुरंत हाथ खींच लिए। पागलपन यूँ कि कभी बर्फ समेटे तो कभी समय को थाम लेने की बेतुकी-सी हूक उठे... रंग-बिरंगी दुनिया पर सफेदी छाने लगी थी... धीरे-धीरे सब कुछ सफेद हो गया था, श्वेत, धवल, उज्जवल... तभी एक स्थानीय युवक ने पूछाआपका फोटो ले सकता हूँ?

क्यों नहीं, लेकिन एक शर्त है, आपको भी हमारे फोटो खींचने पड़ेंगे।

जरूर...



फोटो खींचने के दौरान उसका साथी दुकानदार कश्मीरी युवक भी खड़ा हुआ, कहने लगातंग चुके हैं, पिछले बीस दिनों से रोज यही-यही हो रहा है। किसी एक दिन खूब बरस जाए और खत्म हो जाए... ऐसा तो नहीं... रोज-रोज बस यही।

अरे... कहाँ तो हम इसे ही थामने की नामुमकिन-सी इच्छा को दबा रहे हैं और ये तंग चुका है। तभी लगा कि सौंदर्य भी निरापद नहीं होता... ये भी तो आपदा है...

जब तीसरा चक्कर लगाकर लौटे तो देखा कि वो दोनों युवक और उसके साथी खुले से मॉल रोड पर बर्फ से खेल रहे हैं और लगा कि मुश्किलों में भी जिंदगी बहकर ही जाती है। कोई भी क्षण स्थायी सच नहीं होता है, हर क्षण का सच बदलता है... अरे... फिर से वही। ठंड बढ़ने लगी थी, इसलिए अब लौटना तो था ही... खत्म होना भी तो सच है, चाहे जीवन हो, सफर हो या फिर आनंद...

हिडिंबा और आस्था का प्रवाह

ये हम हमेशा करते हैं, कि जहाँ-जहाँ आसानी से चल कर जाया जा सके, वहाँ पैदल ही जाते हैं। कहीं भी पहुँचते ही वहाँ की ट्रेवल गाईड और नक्शा जरूर खरीदते हैं, ताकि उस जगह को थोड़ा ज्यादा जान और समझ सके। तो मॉल रोड से हिडिंबा मंदिर (अब वहाँ तो उसे हिडिंबा देवी मंदिर कहा जाता है, लेकिन हमारे लिए तो वो राक्षसी है ना...!) लगभग डेढ़ किमी दूर है और वहाँ बहुत आराम से पैदल चलकर जाया जा सकता है। बर्फ की सड़क थी और बर्फ के ही पेड़-पौधे... क्लब हाउस जाने वाले रास्ते से बाँई ओर जाने वाली सड़क हिडिंबा देवी मंदिर की ओर जाती है। थोड़ी सीढ़ियाँ भी चढ़नी पड़ती है। मंदिर को देखकर अनायास मनोहर श्याम जोशी और शिवानी के उपन्यासों में वर्णित हिमाचल के मंदिरों की याद गई। बहुत ही साधारण मंदिर, लेकिन उसकी असाधारणता थी, सफेद बर्फ... हर तरफ बस बर्फ ही बर्फ.... टीन की छत वाले लीपे हुए फर्श पर एक तरफ हवन चल रहा था, स्थानीय लोग बड़ी श्रद्धा से अंदर जाकर आराधना कर रहे थे... लगा कि हम भारतीयों के अंदर आस्था किस कदर बहती है कि देवी आराधना के लिए उन्हें तो दुर्गा की दरकार है, सरस्वती या काली की, हिडिंबा भी चलेगी। खैर हमें तो लगा कि यहाँ आकर ही पूरा मनाली घुम लिया। देवदार के पेड़ों पर जमी बर्फ यूँ लग रही थी जैसे ये बर्फ के ही पेड़ हो... वैसे पैदल 3 किमी चलना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है, लेकिन रबर के जूते पहन कर बर्फ में चलना खासा थकाने वाला साबित हुआ। दोपहर में खासी गहरी नींद आई... रात को जब पिघलती बर्फ पर चहलकदमी कर रहे थे, तब आसमान में पूरा चाँद दिखाई दिया... साफ आसमान पर चाँद यूँ लग रहा था जैसे ये भी बर्फ का ही हो...





यहाँ आए तीन पूरे दिन बीत गए थे। अब घुमने में थोड़ी तेजी दिखानी होगी। अगले दिन मणिकर्ण पहुँच गए। कुल्लू... हुड़कचुल्लू (राजेश ने बाद में कुल्लू को देखकर ये कविता लिखी थी) से और 35 किमी दूर मणिकर्ण एक गुरुद्वारा है, लेकिन वहाँ जाने का सबब गंधक के चश्मे हैं। चावल की पोटली लेकर गंधक के पानी में थोड़ी देर रखी... बुलबुले उठाता उबलता प्राकृतिक पानी... धुआँ ही धुआँ... साथ ही पहाड़ों से उतरती पार्वती भी...

जब गुरुद्वारे की तरफ बढ़े तो सीढ़ियाँ चढ़े तो एक बुजुर्ग सरदारजी ने पके चावल की पोटली देखकर अपनी दुकान से एक पोलीथिन दी राजेश को और ये कहकर गले लगा लियाबड़ी दमदार पर्सनेलिटी है साहब आपकी...

अंदर बहुत भीगा-भीगा-सा कुछ बह निकला। हम सौजन्यता वश उनकी दुकान का सामान देखने लगे। एक कड़ा पसंद आया तो उन्होंने सूखे प्रसाद का पाउच भी पकड़ा दिया। जब पैसे दिए तो उन्होंने बहुत अपराध से भरकर कहाअरे मैंने तो आपसे भी दुकानदारी कर ली। आदतन आते इस विचार को हमने झटक दिया कि शायद ये उनकी दुकानदारी का स्टाइल होगा... मानसिक प्रदूषण से कितना और कैसे बचे?

वशिष्ठ मंदिर

लिजिए लगता है कि सारे ही पौराणिक पात्र यहाँ से रिश्ता रखते हैं। हिडिंबा की वजह से भीम तो खैर यहाँ आए ही होंगे... वहीं उपर ही घटोत्कच का भी मंदिर है। महाभारत का मसाला तो है ही रामायण का भी है। वशिष्ठ मंदिर में भी गंधक का चश्मा है, बताने वाले ने बताया कि यहाँ तो पानी में गंधक के क्रिस्टल भी नजर आते हैं, लेकिन वहाँ का फर्श इतना ठंडा था और जूते उतार कर जाने की बाध्यता में हम ये साहस नहीं दिखा सके। गए तो यहाँ ऑटो से लेकिन लौटे पैदल... ब्यास नदी के किनारे-किनारे हायवे से चलते हुए पहाड़ों और उन देवदारों पर जमी बर्फ को निहारते, अभिभूत होते थके-हारे लौटे, लेकिन आनंद लेकर...

कुल्लू... हुड़कचुल्लू

जब से आए हैं तब से ही ये सवाल रह-रहकर परेशान कर रहा था कि मनाली तो खैर बहुत खूबसूरत है, लेकिन इसके साथ कुल्लू क्यों जुड़ता है। जबकि हमारे टैक्सी ड्रायवर ने हमें बताया कि कुल्लू में तो बर्फबारी भी नहीं होती है। तो ये देखने के लिए कि आखिर कुल्लू में क्या है, बहस करते-करते पहुँच गए। कुल्लू पहुँचे तो 6 दिनों में पहली बार फ्रेश ब्लू कलर का आसमान देखा... शायद सूरज के साथ आसमान और निखर जाता हो। और तो कुछ वहाँ था नहीं, सिवा कल-कल करती ब्यास नदी के...