Monday, 15 March 2010

सृष्टि के गर्भाधान का उत्सव गुड़ी पड़वा


फागुन के गुजरते-गुजरते आसमान साफ हो जाता है, दिन का आँचल सुनहरा, शाम लंबी, सुरमई और रात जब बहुत उदार और उदात्त होकर उतरती है तो सिर पर तारों का थाल झिलमिलाने लगता है। होली आ धमकती है, चाहे इसे आप धर्म से जोड़े या अर्थ से... सारा मामला आखिरकार मौसम और मन पर आकर टिक जाता है। इन्हीं दिनों वसंत जैसे आसमान और जमीन के बीच होली के रंगों की दुकान सजाए बैठता है.... अपने आँगन में जब गहरी गुलाबी हो रही बोगनविलिया, पीले झूमर से लटकते अमलतास और सिंदूर-से दहकते पलाश को देखते हैं, तो लगता है कि प्रकृति गहरे-मादक रंगों से शृंगार कर हमारे मन को मौसम के साथ समरस करने में लगी हैं, न जाने कहाँ से ये अनुभूति आती है कि प्रकृति का सारा कार्य व्यापार हमें (इंसानों को) खुश करने के लिए होता है... (हम जानते हैं यह सही नहीं हैं, हमारे, सभ्यता से पहले से ही प्रकृति का यही रंग-रूप रहा होगा...).. और हम खुश हो जाते हैं।
हाँ तो वसंत का आना हमेशा ही मन को उमंग से भर देता है, पता नहीं क्या है, इस मौसम में कि पूरे मौसम में हम आनंद-सागर में खुद को तैरता हुआ महसूस करते हैं। तो फिर क्यों न हमें वसंत भाए? लेकिन इसका संबंध जीवन के दर्शन से भी है, पत्तों का गिरना और कोंपलों के फूटने से पुराने के अवसान और नए के आगमन का संदेश हमें जीवन का अर्थ समझाता है। पतझड़ के साथ ही बहार के आने के अपने गहरे अर्थ हैं। एक साथ पतझड़ और बहार के आने से हम जीवन का उत्सव मना रहे होते हैं, तब कहीं रंग होता है, कहीं उमंग, बस इसी मोड़ पर एक और साल गुजरता है। गुड़ी पड़वा या वर्ष प्रतिपदा के साथ एक नया साल वसंत के मौसम में नीम पर आईं भूरी-लाल-हरी कोंपलों की तरह बहुत सारी संभावनाओं की पिटारी लेकर हमारे घरों में आ धमकता है। जब वसंत अपने शबाब पर है तो फिर इतिहास और पुराण कैसे इस मधुमौसम से अलग हो सकते हैं।
पुराणों में खासतौर पर ब्रह्मपुराण, अर्थववेद और शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख हैं कि गुड़ी पड़वा पर ब्रह्मा ने सृष्टि के सृजन की शुरुआत की थी। तो इस तरह हम गुड़ी पड़वा पर सृष्टि के गर्भाधान का उत्सव मनाते हैं। आखिरकार वसंत को नवजीवन के आरंभ के अतिरिक्त और किसी तरह से, कैसे मनाया जा सकता है? वसंत के संदेश को गुड़ी पड़वा की मान्यता से बेहतर और किसी भी तरह से भला परिभाषित किया जा सकता है?
तो नए साल के लिए आप सभी को ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ....

Sunday, 7 March 2010

अबला और दुर्गा के बीच


महिला दिवस पर सप्लीमेंट निकालने की तैयारी से पहले विभागीय मिटिंग चल रही थी...क्या दिया जा सकता है महिला दिवस पर... सब अपने-अपने विचार रख रहे थे, लेकिन एक बात पर सारे सहमत थे कि सप्लीमेंट में न तो महिला की बुरी स्थिति को लेकर ‘स्यापा’ किया जाएगा और न ही उसकी उपलब्धि को लेकर ‘ढोल’ पीटा जाएगा... कारण साफ है दोनों ही दो विपरित और अतिरेकी ध्रुव हैं और दोनों ही सही नहीं है। इस तैयारी के लिए स्त्री-विमर्श पर अब तक जितना भी पढ़ा गया उसे फिर से खंगाला गया। एक बार फिर यह इत्तेफाक रहा कि फरवरी की हंस का संपादकीय मार्च के पहले सप्ताह में पढ़ा। राजेंद्र यादव धुरंधर बुद्धिजीवी हैं और बहुत सारे मामले में उनसे असहमत होते हुए भी उनकी विचारशीलता और वैचारिक प्रतिबद्धता की कायल हूँ...लेकिन स्त्री विमर्श के मामले में उनकी नीयत को समझ नहीं पाती हूँ... इस बार के संपादकीय में भी उन्होंने इस मुद्दे को छुआ... और इसमें फिर से स्त्री-देह पर जाकर उनकी सुईँ अटक गईं....। अरे भाई जिस दैहिक दासतां के खिलाफ जद्दोजहद की जा रही है, उसमें ही उसे माध्यम कैसे बनाया जा सकता है? यहाँ लड़ाई उसे उसकी दैहिकता से मुक्ति दिला कर उसे व्यक्ति के तौर पर स्थापित करने की है.... खैर.... इस कथित साहित्यिक स्त्री विमर्श का आम स्त्री से कोई लेना-देना नहीं है आम मध्यमवर्गीय महिलाओं की लड़ाई, उसका संघर्ष और उसकी जद्दोजहद... स्त्री-विमर्श नहीं है... स्त्री-विमर्श नामक चिड़िया मात्र साहित्यिक श्रेणी की जुगाली है... यह इससे ज्यादा कुछ नहीं है। साहित्य में स्त्री विमर्श का मामला वैसा ही हुआ कि उसे एक कारा से निकालकर दुसरे पिंजरे में डाल दें.... स्त्री की लड़ाई अपनी दैहिकता से उठ कर मानवीय गुणों से पहचाने जाने की है। उसकी देह और रोजमर्रा में एक ऐसा कारागार है, जो उसे कभी भी मुक्ति नहीं देता... सार्त्र वस्तु के लिए कहते हैं कि – पहले वह होती है, बाद में यह विचार होता है कि वह कैसी है?
वस्तु के लिए तो बाद में यह विचार भी होता है, लेकिन स्त्री के लिए समाज इस विचार की जगह ही नहीं छोड़ता है, यदि वह सुंदर है तो फिर बस वह इतनी ही है... इससे ज्यादा होने पर भी उसे वहीं बंद कर दिया जाता है, क्योंकि समाज के लिए इससे ज्यादा सुविधाजनक और कुछ नहीं होता है। एक बार उसे सौंदर्य का अहसास करा दें फिर वह कुछ होना भी चाहेगी तो नहीं हो पाएगी और यदि वह होगी तो भी पुरुष के किसी काम की नहीं होगी.... आखिर खुद से बेहतर दास किसे पसंद आएगा...। यदि वह बदसूरत है तो फिर वह और कुछ यूँ भी नहीं हो सकती है, क्योंकि उसे उसकी बदसूरती के खाँचे में ही सड़ा दिया जाएगा.... दोनों ही स्थितियों में उसे मानसिक रूप से बीमार बना दिया जाएगा और हाँ खुबसूरती और बदसूरती के सारे मापदंड
पुरुष के बनाए होते हैं... जैसे कि नैतिकता के सारे नियम उसी के हैं। तो फिर उसे मुक्ति कैसे मिलेगी....?
फिर मुद्दा साहित्यिक मुक्ति का नहीं है, हकीकत में ‘मुक्ति’ का है.... रोजमर्रा के शोषण और दलन से मुक्ति का है.... अपने लिए स्थापित मूल्यों से उलट यदि स्त्री व्यवहार करती है तो उसे उसके स्त्रीत्व से ही खारिज कर दिया जाता है, लड़ाई यहाँ से शुरू होती है। हमारी व्यवस्था में उसे या तो देवी के रूप में पूजा जाता है, या फिर कमजोर मानकर उस पर शासन किया जाता है, इन दोनों ही स्थितियों ने स्त्री की सत्ता का जितना नुकसान किया है, उतना और किसी भी व्यवस्था में नहीं हुआ है। हमारी लड़ाई ‘विदेह’ होकर मानव से रूप में स्वीकृत होने की है.... हमारी माँग समानता नहीं न्याय है, हम पूजा नहीं स्वतंत्रता चाहती हैं, प्रशंसा नहीं स्वीकरण चाहतीं है.... हमे सहानुभूति की दरकार नहीं हैं, हमारे होने पर विश्वास हमारी माँग हैं।

Monday, 22 February 2010

ये वक्त गुज़र जाएगा


जब सब कुछ सामान्य और अपनी गति से चलते हुए एकरस हो रहा हो... तब एकाएक कुछ ऐसा हो, जिसकी प्रत्याशा न हो और अनचाहे मेहमान की तरह आ टपके अकेलापन.... तब...? कल शाम से ऐसे ही अकेलेपन से जूझ रहे हैं। रात को सोने तक का सारा वक्त गर्क़ किया टीवी और कम्प्यूटर पर.... कोशिश की, लेकिन पढ़ना भी नहीं भाया...। बहुत सारा समय यूँ ही सामने बिखरा पड़ा... आम दिनों में क्षण-क्षण को झरते हुए देखते और सहेज नहीं पाने की स्थायी कसक के साथ रहते हम आज इतने क्षण यूँ ही आसपास फैले हुए हैं और समझ ही नहीं पा रहे हैं कि इनका आखिर किया क्या जाए? सुबह उठे को चाय के कप के साथ सामने पड़े थे अखबार... सरसरी तौर पर देखा (याद भी नहीं कि क्या देखा) कुछ को पढ़ने की कोशिश भी की.... 'छूटती नहीं है ज़ालिम मुँह से लगी हुई की तरह'... लेकिन फिर यूँ ही एक सवाल मन में सरसराया (ये सवाल शायद पहली बार) दुनिया जहान के बारे में जानकारी पा लेने से क्या बदल जाएगा... और जानने के बाद क्या हो जाएगा...?
सवाल शायद सही नहीं है, हमने बरसों बरस इस जानने की हवस को दिए हैं, अब भी देंगे... लेकिन आज यह है। एकाएक दिमाग को खंगाला तो पाया कि इसमें कितनी बेकार की जानकारी और सूचनाएँ पड़ी है, कुछ ऐसी भी जिसका कभी-कहीं उपयोग नहीं होगा, फिर भी है। एक बार फिर वह चाह जागी कि काश! दिमाग में से भी काम-काम का रख कर बाकी सबको रद्दी की तरह निकाल पाते, लेकिन यहाँ यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। कभी सोचे तो पाएँगें कि हम दुनिया को जितना जानते चले जाते हैं, खुद से उतना ही दूर होते चले जाते हैं। खुद से भागने के लिए ही शायद हम दुनिया को जानते हैं, लेकिन इससे हम हासिल क्या कर पाते हैं? बेकार का उद्वेलन.... उलझन... ज्यादातर बेबसी... औऱ आखिर में एब्सर्ड का अहसास... क्योंकि जो कुछ है, वह है, हम उसे बदलने के लिए कुछ नहीं कर पाते हैं और यदि करेंगे भी तो क्या औऱ कितना बदल पाएँगें? तो फिर इस बेकार की कवायद का क्या मूल्य? सारी दुनियावी चीजों से 'अंतर' न तो बहला है और न बहलेगा, फिर भी हम खुद को सालोंसाल इसी में गर्क़ किए रहते हैं। किस प्रत्याशा से....? हम सब कुछ इसलिए करते हैं कि खुद को खुश रख सके... शायद ऐसी चीजों की खोज करते रहते हैं, जो हमें सबसे ज्यादा खुश रख करें, लेकिन क्या हम ऐसा कर पाते हैं? पूरा जीवन हम इसी प्रयोग को दे देते हैं, और फिर हमारे हाथ क्या आता है? यह महज एक सवाल है, जिसका उत्तर अब तक तो नहीं मिला। यह भी सही है कि कल शायद यह सवाल नहीं होगा.... और कल से फिर हम जानने के जुनून में खाक़ होने लगेंगे... यह सवाल आज है।
हाल ही में एक खूबसूरत एसएमएस आया
अकबर ने बीरबल से कहा - कोई ऐसी बात बताओ, जिसे खुशी में सुनो तो ग़म हो और ग़म में सुनो तो खुशी हो।
बीरबल ने जवाब दिया - ये वक्त गुज़र जाएगा....
कुछ समझे....?

Thursday, 18 February 2010

अंधा कर देने वाली चकाचौंध


अमेरिका से आर्किटेक्चर का कोर्स कर भारत आया लड़का शादी कर रहा था और दुर्भाग्य से हम साग्रह आमंत्रित थे... छुट्टी की शाम को शहर से 20 किमी दूर शादी का वैन्यू था और जाना जरूरी... मन-बेमन था लेकिन पहुँचे। आधा किमी दूर गाड़ी पार्क कर पैदल ही विवाह-स्थल पर पहुँचे तो दुल्हा महँगी शेरवानी-साफा पहने डिजायनर लहँगा और ब्राईडल मेकअप किए अपनी दुल्हन के साथ खड़ा था। सिर पर फूलों की चादर तनी थी आगे ढोली ढोल बजा रहा था और दुल्हे के साथी-भाई मस्ती में नाच रहे थे। अमेरिका से उच्च शिक्षा लेकर आए लड़के के इस रूप को देखकर बेहद-बेहद निराशा हुई।
एक दौर था जब आधुनिकता एक मूल्य था और हर विचारशील युवा उस सबको जो उसकी जिज्ञासा को शांत नहीं कर पाता था, या जो उसके तर्कों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता था, उसे तोड़ने पर उतारू रहता था। हाँ...इसमें कुछ अच्छी चीजें भी पीछे छूट जाती थी, लेकिन हम समझते ही हैं कि गेहूँ से साथ घुन तो पिसता ही है, फिर भी एक दरवाजा तो होता था, जो चेंज फॉर गुड के लिए कम-अस-कम रास्ता तो खोलता ही था, लेकिन अब तो उम्मीदें तक राख में तब्दील होती नजर आ रही है। युवा यदि भेड़चाल का हिस्सा ही होने जा रहे हैं तो फिर जो सड़ रहा है... गया है, उसका क्या होगा, जो खराब हो गया है, उसे धक्का देकर कौन गिराएगा (बकौल नीत्शे)।
------ ------- ------
हमारे शहर में भाजपा का राष्ट्रीय अधिवेशन चल रहा है, और क्षेत्रिय अखबार यूँ ही दीवाने हुए जा रहे हैं। यूँ लग रहा है कि इन दिनों शहर की सारी समस्याएँ, सारी परेशानियाँ छुट्टी पर चली गईं हो। हमने आपत्ति दर्ज कराई तो जवाब मिला कि पाठकों को सूचना दी जा रही है। सूचना....! क्या ये कि नाश्ते में क्या खाया, खाना क्या दिया गया और सोए कैसे.... इस सूचना का कोई औचित्य है? लेकिन क्या करें क्योंकि जो मुद्दे की बात थी, वहाँ तक तो पत्रकार पहुँच ही नहीं पा रहे हैं। तो जो गौण और पूरी तरह से महत्वहीन चीजें थी, उसे ही पाठकों के सामने परोसा दें... फिर इस अधिवेशन का आम जनता से क्या लेना-देना.... पार्टी ऐसे कौन-से निर्णय करने जा रही है जिसका निकट या दूर भविष्य में जनता से कोई संबंध होगा...? ये तो बिल्कुल वैसा है, जैसे लक्ष्मी मित्तल की बेटी की शादी को पूरा मीडिया कवरेज दे... यूँ भी आजकल मीडिया खबरों के साथ काफी समानता का व्यवहार करता है, मामला चाहे आतंकवादी हमलों से जुड़ा हुआ हो या फिर राजनीतिक आयोजन उसी भावना और शिद्दत से कवरेज होता है। खबरें देने वाले इस सवाल को लगता है, कभी उठाते ही नहीं है कि कोई खबर हम क्यों दें? इतना सोचने की फुर्सत ही किसे है? होगी कभी पत्रकारिता की नैतिक जिम्मेदारियाँ, अब तो यह मात्र व्यापार है, साबुन, तेल या फिर टूथपेस्ट बेचने की तरह ही खबरें बेची जाती है। जो क्षमता रखता है, वह इसे बखूबी इस्तेमाल कर सकता है, क्योंकि इसका कोई दीनो-ईमान नहीं है।
------ ------- -------
दोनों ही मामले एक ही निर्ष्कष पर पहुँचाते हैं, हम जड़ होते जा रहे हैं, जबसे दुनिया से मार्क्सवाद (अब आप हँसना चाहे तो हँस ले, लेकिन इसके साथ थोड़ा सा सोच भी लेंगे तो शायद लगेगा कि हाँ सच....हमने भी कितने साल हुए कुछ सोचा नहीं) खत्म हुआ है, तब से लगता है प्रतिक्रिया ही खत्म हो गई है, उसके साथ ही बदलाव की सहज प्रक्रिया भी.... क्योंकि जब प्रतिक्रिया ही नहीं होगी तो फिर बदलाव क्या होगा? हम जो कुछ है, उसे सहज भाव से ग्रहण कर रहे हैं, क्योंकि हममें विरोध करने का माद्दा ही खत्म हो गया है। वो साहस ही नहीं रहा कि हम प्रवाह के विरूद्ध खड़े हों.... बाजार ने जहाँ से भी सवाल आ सकते थे, वो सारे दरवाजे बंद कर दिए हैं। उसने इतनी चकाचौंध पैदा कर दी है, कि समाज अंधत्व की तरह बढ़ रहा है, वह कुंद हो रहा है। इस दुनिया में अब कभी भी, कहीं भी क्रांति नहीं होगी..... क्योंकि हमें लगातार सोने (gold) का जहर दिया जा रहा है, बदलाव की ज्वाला पर पैसों के छींटे मारे जा रहे हैं और इसलिए हमारी आत्मा बौनी होती जा रही है...

Sunday, 14 February 2010

प्रतीकों के बीच गुमा प्रेम


फागुन की गुलाबी-सुनहरी सी सुबह...और रविवार का दिन...हफ्ते भर से प्रेम को लेकर की गई माथापच्ची के बाद आई छुट्टी....। प्रेम को विषय बनाकर उसकी बाल की खाल निकाली.... एंगल ढूँढें ( गोया प्रेम नहीं कोई खबर हो, फिर पत्रकार सिवा एंगेल ढूँढने के और कुछ जानता भी तो नहीं है, उससे न तो इससे ज्यादा की उम्मीद की जाती है और न ही वह इससे ज्यादा करना चाहता है, क्योंकि उसके पास प्रेम-व्रेम जैसी निखालिस भावना को जीने का न तो समय होता है और धैर्य...बाकी चीजें तो खैर....छोड़िए)। कहीं पढ़ा था कि इस दौर में युवा प्रेम नहीं करता, क्योंकि वह दुख नहीं पाना चाहता, अब बताइए प्रेम हो और दुख न हो ये कैसे संभव है तो फिर प्रेम हो ही क्यों? जब प्रेम न हो तो फिर वेलैंटाइन-डे भी क्यों हो? लेकिन इसे तो खैर होना ही था, क्योंकि जो प्रेम नहीं कर पाते, या नहीं करना चाहते हैं, कम से कम यह उन्हें प्रेमजन्य खुशी दिलाने का आभास तो देता ही है, क्योंकि ढ़ेर सारे प्रतीकों के बीच कहीं न कहीं यह गफ़लत पल ही जाती है, कि हाँ यही प्यार है।
दरअसल हम प्रतीकों के दौर में जी रहे हैं। फूल, हीरा, कैंडल-लाइट डिनर, सरप्राइज पार्टी, गिफ्ट, बुके, कार्ड और भी पता नहीं क्या-क्या प्रेम के प्रतीक, धर्म के प्रतीक मंदिर, मस्जिद, गुरु-उपदेशक, कर्मकांड और भी बहुत कुछ, हमारे समाज में हर जीच के प्रतीक हैं, साम्प्रदायिकता के, धर्मनिरपेक्षता के, आध्यात्म के, क्षेत्रियता और अखंडता के सब चीजों के प्रतीक हैं, क्योंकि ये ज्यादा सुविधाजनक हैं। हर तरफ प्रतीक ही प्रतीक... बस नहीं है तो मूल भावना...क्योंकि उसके बिना भी हमारा काम बहुत आराम से चलता है।
प्रेम चाहे हो या न हो वेलैंटाइन-डे आपको उसके प्रदर्शन करने का अवसर देता है, और बिना अहसास के आप प्रेमी हो जाते हैं, दरअसल यह एक आसान रास्ता है, इस जमात का हिस्सा होने का, इसमें आपका कोई योगदान नहीं है, न उन अनजान संत वेलैंटाइन का, सारा किया कराया बाजार का है। आप हैं उसके आसान टारगेट... बाजार तो ढूँढता ही रहता है टारगेट पीपल....आज आप है कल कोई ओर होगा, आज यह दिन है कल कोई ओर दिन होगा। इस बार वेलैंटाइन-डे पर मीडिया ने ज्यादा हंगाना नहीं किया, क्योंकि उसके पास इससे भी ज्यादा हॉट स्टोरी थी, बाल, राज और उद्धव ठाकरे हैं, शरद पँवार है, शाहरूख खान है और है उसकी फिल्म और बचा-खुचा कोटा पूरा किया पुणे बम ब्लास्ट ने...हाँ प्रिंट के पास ज्यादा विकल्प नहीं थे और दुर्भाग्य से रविवार का दिन था तो एक सप्लीमेंट में तो वेलैंटाइन के अतिरिक्त और कुछ जा ही नहीं सकता, भई बाजार की माँग जो हैं।
इस मरे वेलैंटाइन ने प्यार जो नहीं है, उसे वह बना दिया है, और यह जो है, उसे पता नहीं कहाँ गुमा दिया। प्यार एक बहुत व्यक्तिगत और गोपनीय भावना है, जो खुद से भी नहीं कही जाती है, कम से कम हमने तो यही जाना है, यह भी सही है कि पल्ले विच अग दे अंगारे नहीं लुकते हो, लेकिन उसे दुनिया को बताया तो जाता ही नहीं है। यह शब्द नहीं है, लेकिन बाजार ने उसे महज शब्द बना दिए हैं। प्यार अनिर्वचनीय है, लेकिन यहाँ तो तमाम प्रतीकों से इसे वर्णनीय बना दिया गया है। इस दौर ने प्रतीकों को अहम बना दिया है और इसके पीछे की भावना को कहीं उड़ा दिया है। प्यार के लिए एक दिन... कितना हास्यास्पद है, जो जीवन है, उसके लिए एक दिन...! क्या भेड़ चाल है। इसे किसी भी दिन कहो, दिल एक जैसा ही धड़कता है, डर भी वैसा ही लगता है। तो फिर एक विशेष दिन क्यों हो... यदि प्यार किया है तो कोई भी दिन हो, क्या फर्क पड़ता है।
तो उनके लिए जिन्हें प्यार को महसूस करने, व्यक्त करने और जीने के लिए किसी वेलैंटाइन-डे की जरूरत है, उन्हें हैप्पी वेलैंटाइन-डे और उनके लिए जिनके लिए प्यार ही जीवन है, पूरे जीवन के लिए ढेरों-ढेर शुभकामनाएँ....क्योंकि प्यार प्रतीकों के सहारे नहीं किया जाता है, प्यार हो जाता है....यह होता है, बस....।

Sunday, 31 January 2010

क्या है हम ....?


रविवार की छुट्टी....हाथ पसारे खड़ा खुला-खुला सा दिन... लिहाफ का भला लगने वाला गुनगुनापन...मीठी सरसराती वासंती बयार...खिड़की से उड़कर अंदर आते धूप के कतरे....मखमली-सा अहसास...उन्माद के तूफान के गुज़र जाने के बाद की शांति...पार्श्व में गुलाम अली का गाना...गर्दिश-ए-दौरा का शिकवा था मगर इतना न था....फिर से अहसासों का समंदर लहराने लगा...बस एक ही रात में ये कायापलट....!
कल रात चाँद पृथ्वी के सबसे पास....अमूमन जितना रहता है उससे 50 हजार किमी करीब था (खगोलीय भाषा में पेरिजी)...खूब बड़ा...साफ शफ़्फ़ाक...सफेद और चमकीला चाँद...देखा तो लगा देखते ही रहें.....लेकिन उसके पहले के बेचैनी....ऊब...त्रास और तकलीफ से भरे...बेहद उदास-से वे दिन...क्या है यह सब...? पता नहीं कब का पढ़ा-सुना याद आ गया कि पूरे चाँद की रातों में दुनिया में सबसे ज्यादा आत्महत्याएँ होती है...खुद के अंदर की बेचैनी का सबब कहीं यह चाँद तो नहीं....एक विचार और अब खुद हो गए 'अंडर-ऑब्जर्वेशन'...क्या चाँद का असर है...? ज्योतिषी कहते हैं कि जिसमें भी जल तत्व की प्रधानता होती है...वह चाँद बढ़ने से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता...बिल्कुल ऐसा तो नहीं फिर भी इससे मिलता-जुलता सा ही कुछ मार्सेल या फिर शायद जैस्पर्स ने कहा था (शब्दशः याद नहीं...वो कभी भी नहीं रह पाता है...सिर्फ भाव है) कि इस पूरी सृष्टि में इंसान का होना धूल के एक कण के समान है।
हम खुद से सवाल पूछे कि जब हमारे मन पर, हमारे तन पर, व्यवहार, परिस्थितियों और आखिरकार जीवन पर हमारा नियंत्रण नहीं है तो फिर हम है क्या चीज़....हम क्यों हैं? इस सृष्टि में हमारे होने से क्या बदला है और हमारे नहीं होने से क्या बदल जाएगा...हमारे होने का यहाँ कोई मतलब नहीं है...तो फिर हमारा होना इतना महत्वपूर्ण कैसे हैं? हमारे कर्म, विचार, आचार, सिद्धांत, जीवन, उपलब्धि, असफलता, सुख-दुख, संबंध, भावना, इच्छा, सपने, अनुभव इस सबका मतलब क्या है?
फिर सवाल...सवाल और सवालों का ढेर...। जब हम इस सृष्टि में अंदर और बाहर के न जाने किन-किन तत्वों से प्रभावित, नियंत्रित होते रहते हैं, तो क्या हम खुद को एक इकाई कह सकते हैं...? फिर हम सिर्फ 'हम' बचे भी हैं? और बचे भी है तो कितने...कहाँ....? फिर हमारे 'अहं' का, 'अहंकार' का कोई वजूद है, क्या वजूद होना चाहिए...? क्योंकि हम तो कुछ हैं ही नहीं....हमारा सारा 'अहं' धूल का मात्र एक कण......बस...। एक बार फिर से सोचें हम क्या हैं और यदि 'हम' कुछ भी नहीं है तो फिर क्यों हैं? यहाँ तो सवालों का अंबार है और जवाब.....!
कोई नहीं.......

Tuesday, 19 January 2010

हवाओं में महका बसंत


इस बार न तो कोयल कूकी, न बयार बही, न आम बौराया और न ही पलाश दहका....बहुत दबे पाँव बसंत आया...दिन-रात की तीखी खुनक के बीच दोपहर थोड़ी बहुत मुलायम हो रही है। आहट सुनाई पड़ रही है...वह अभी आया तो नहीं ही है, बस कहीं किसी पलाश पर बसंत की छाया दिखती है, बाकी तो बस हरे-कच पत्तों के साथ बसंत की प्रतीक्षा में है। बुधवार को सरस्वती पूजन के साथ ही बसंत उत्सव मनाना शुरू कर देगा। शहरों में तो सिर पर तने आसमान को देखना तक जहाँ एक घटना होती हो, वहाँ पलाश के दहकने को कहाँ ढूँढा जाएँ... फिर भी बसंत का आना एक घटना है। हम चाहे उसे ना देखें, ना महसूस करें, हवाएँ उसका पता देती है। सूरज के आने से सुनहरा होता आसमान...हल्की हवा से उड़ती पीली धूल....डूबते सूरज की किरणों से सतरंगी होता आसमान और रात के खुलते जूड़े में टँके सितारों का झरना...क्या ये सब बसंत का संदेश नहीं है? जब संदेश आ ही गया तो वह कहाँ रूकने वाला है, आएगा ही, चाहे एक-दो दिन इंतजार के बाद आए...आज तो हम बुद्धि, मेधा और सृजन की देवी सरस्वती को मनाए...बेहतर, सुंदर और मंगलकारी दुनिया को रचने का साहस पाएँ.....जिएँ....प्रकृति के आनंदोत्सव को मनाएँ, उसे प्यार करें, उसे बचाए...तभी तो बसंत के आने का.......वर्षा, ग्रीष्म, शरद और शिशिर को पहचान पाने के संकेत पाएँगें...फिलहाल तो सिंदूर-सी सुबह, सरसों की फूलों सी पीली दोपहर, गुड़हल सी लाल-सुर्ख शाम और सुरीली सुरमई रात का स्वागत करें....बसंत को गाएँ, गुनगुनाएँ....मनाएँ...।

Wednesday, 13 January 2010

मकर संक्रांति की शुभकामना


माघ का मध्य है...पारंपरिक रूप से सर्दी की विदाई का समय आ पहुँचा है। अब यदि क्लाइमेट चेंज का असर हो तो हो सकता है लगातार सींक होता जा रहा सर्दी का मौसम थोड़ा-सा फैल जाए और होली तक अपने पंडाल को खींच ले जाए.....लेकिन....हमेशा ऐसा नहीं होता है। फिर यदि ऐसा हुआ तो वैज्ञानिक इसे हिमयुग की शुरूआत कहने लगेंगे। जैसा कि दो साल पहले जब जनवरी के तीसरे सप्ताह से शुरू हुई सर्दी फरवरी के अंत तक चली और इसी दौरान पूरे यूरोप में भी भारी बर्फबारी हुई थी। असल में प्रकृति हमारे लिए अभी भी एक बड़ा रहस्य है। तभी तो कभी कहा जाता है कि पृथ्वी गर्म हो रही तो कभी माना जाने लगता है कि हिमयुग की शुरूआत हो रही है।
खैर विज्ञान हमारे विचार का विषय नहीं है। थोड़ी खुनक भरी रात है, आसपास से आ रहे लोहड़ी के खनक भरे उल्लास की ताल है....तो तिल के सिंकने की तेज खुशबू भी.... चाहे हम जानें या न जानें....त्योहार का उल्लास सुबह के मुखड़े पर नजर आ ही जाता है। कल धरती एक नए एंगल से सूरज का सामना करेगी। कल से सूरज कुछ ज्यादा उदात्त होगा... सुबह सुनहरी, दिन रेशमी और शाम सतरंगी होगी....रात थोड़ी सिकुड़ेगी....सूरज उत्तरायण जो होगा....। थोडा़ मौसम भी करवट लेगा....प्रकृति अपना आवरण बदलेगी... शहरों में तो आसमान ही नहीं देखा जाता है, लेकिन कस्बों और गाँवों में मकर संक्रांति पर आसमान के विस्तृत कैनवास पर रंग-बिरंगी पतंगों का मेला सजेगा.... ऊँगलियों की ताल पर पतंगें थाप देंगी। बच्चे पतंगों के लोच के साथ किलकारी मारेंगे...।
मकर संक्रांति हिंदुओं का एकमात्र ऐसा पर्व होगा, जिसका खगोलीय महत्व तो है, लेकिन इससे कोई पौराणिक आख्यान नहीं जुड़ा हुआ है। सूर्य की आराधना का यह पर्व सृष्टि के कल्याण की कामना से मनाया जाता है। यदि हम आस्तिक हैं तब भी और नहीं है तब भी सूर्य के जीवित देवता होने से इंकार नहीं किया जा सकता है। एक बार फिर से विज्ञान की शरण....क्योंकि यह हमें बताता है कि सृष्टि में एक ऐसा दौर भी रहा है, जिसे हिमयुग कहा जाता है। संक्षेप में ऊर्जा है तभी तो जीवन है....। सूरज हमारे जीवन का आधार है, उसकी धुरी, कारण और केंद्र भी है। सूर्य प्रारंभ है....दिन का...जीवन का....। तो उसकी आराधना के साथ मानव कल्याण की कामना करें...। सभी को मकर संक्रांति, पोंगल, लोहड़ी, संकरात संक्षेप में सूर्य के उत्तरायण होने की शुभकामना....

Monday, 28 December 2009

रेट्रोस्पेक्शन



गुजरते साल का आखिरी रविवार....ठिठके, उदास और पीले-से शिशिर की एकाकी और बेचैन-सी दोपहर...सुबह-शाम मौसम में थोड़ी तीखी-सी खुनक...दिसंबर गुजरने को है, लेकिन मौसम वैसा ही मुलायम बना हुआ है, जैसा बसंत से थोडा़ पहले हुआ करता है। कभी-कभी उत्तर से आती हवाएँ ही कुछ सिहराती है, बाकी तो सब कुछ ठीक-ठाक है। यूँ यह इकहरे दिन, छुटकी-सी शाम और फैलती-पसरती रात का मौसम है, लेकिन मौसम ही गुल है, बाकी सब है।
एक और साल गुजर रहा है, क्या पाया और क्या खोया का हिसाब करने का मौसम है। समय अपनी गति से प्रवाहित है, वह न नया है न ही पुराना.....वह तो हमेशा वही है जो वह है, बस समाज बदलता है, नया होता है। हमने सुविधा के लिए समय को सेकंडों, मिनटों, घंटों, दिनों, सप्ताहों, महीनों, सालों, दशकों और फिर शताब्दियों में बाँटा है। समय तो कहीं बँधा ही नहीं रूका ही नहीं, वह हमारे होने से पहले से है और हमारे बाद भी होगा, वैसा ही नूतन....वैसा ही प्रवाहित.....सतत....हम बस उसके खाँचों को ही टटोलते रहते हैं।
खैर तो फिर एक साल गुजर गया। एक पूरा साल....365 दिन और 12 महीने सूक्ष्म होने लगे तो लम्हों तक का हिसाब देना पड़ेगा....किसे....किसी को भी नहीं...बस खुद को ही....कह सकते हैं सिर्फ जुगाली है, पाना और खोना क्या है? लेकिन दुनिया में है तो फिर कुछ इसकी परिपाटी का भी तो पालन करें। तो बैठे है फुर्सत के समय को ऊपर से खड़े होकर देखने के लिए। जब हम किसी मकान या भवन की तीसरी मंजिल पर खड़े होकर देखते हैं तो बड़े निर्लिप्त होकर....क्योंकि हम ऊपर होते हैं और घटनाएँ नीचे....ठीक वैसे ही....गुजरे साल को उसके अंतिम सिरे पर खड़े होकर देखना है....निर्लिप्त, उदासीन और बहुत हद कर तटस्थ होकर...। तभी तो हिसाब हो पाएगा खोने और पाने का...इन श़ॉर्ट कुछ करने का....।
तो 2009 में दो यात्राएँ की, कुछ कहानियाँ लिखी ( दो-एक प्रकाशित भी हुईं), ब्लॉग पर 60 पीस (रेट्रोस्पेक्शन 61 वाँ)
लिखे और एक नया ब्लॉग शुरू किया। निराश भी हुईं और उदास भी, नाराज भी और उदात्त भी....खुश भी हुई और सुख को भी महसूस किया, पढ़ा भी....लिखा और सोचा भी....सुना भी.....फिर भी कुछ रह गया। शायद कुछ रह जाना ही जीने का सहारा है, क्योंकि यदि सब कुछ हो गया तो फिर जीएँ क्यों? जीने का मतलब तो करना है, सपने देखना उन्हें पाने की कोशिश करना तो फिर कर्म से कहाँ निजात है? अपने सूत्रों वाले ब्लॉग में मैंने सूत्र दिया था कि ''हम कर्म करने के लिए अभिशप्त हैं'' और कई सारे पाठकों ने इस पर आपत्ति की...। कहने वालों ने इसे निराशावादी दृष्टि भी कहा...लेकिन थोड़ा रूके पूर्वाग्रहों को छोड़े और फिर सोचें कि क्या यह सच नहीं है?
यदि हम कर्म नहीं करें तो फिर क्या करें? हम विकल्पहीन है।कर्म
अच्छा या बुरा....हो सकता है, लेकिन कर्म के होने को किसी भी सूरत में रोका नहीं जा सकता है। तो फिर हुए ना अभिशप्त....! खैर तो एक पूरा साल गुजर गया, हम अब भी प्रवाह में हैं, उसका हिस्सा है, समय उदासीन है तटस्थ है, हमारे कर्मों का गवाह है, वह कोई निर्णय नहीं देता है सिर्फ देखता है, हमें करते, सहते, भोगते और जीते हुए। वह अपनी मस्ती में है और हम जूझ रहे हैं सपनों को हकीकत में बदलने के लिए....देखें कहाँ पहुँचते हैं।
तो फिर गुजरे साल के अच्छे से गुजर जाने की और नए साल में सपनों के पूरा होने की शुभेच्छा के साथ.....ये औपचारिकता....
सभी को नए साल की शुभकामना.....

Thursday, 10 December 2009

असंतुष्ट सुकरात की तलाश में....


फिर से एक मुश्किल दौर....सब कुछ सामान्य है शायद इसलिए.....ऐसे ही समय में अक्सर जेएस मिल याद आ जाते हैं.....जिनका लिखा हुआ हम अपने यूनिवर्सिटी के दिनों में दोस्तों के बीच दोहराया करते थे। बेंथम के सिद्धांत के विरूद्ध उन्होंने अपने विचार देते हुए कहा था कि -- It is better to be a dissatisfied man than a satisfied pig and it is better to be a dissatisfied SOCRATES than a satisfied fool...और हर उस दोस्त का मजाक उड़ाते थे जो संतुष्ट होकर जीता था। इन दिनों बहुत कुछ 'सेटिस्फाईड फ़ूल' जैसे हालात है, लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्योंकि एक बेचैनी और खुद के चुक गए होने का अहसास शिद्दत से हो रहा है। दूसरों के सामने खुद को सिद्ध करने की चुनौती हमेशा नहीं होती है, लेकिन खुद को खुद के सामने सिद्ध करने की चुनौती हमेशा सवार होती है। कभी भी खुद को इससे आज़ाद नहीं पाया है। उस पर तुर्रा ये कि ओशो का 'बैठो! कहीं जाना नहीं है' भी अपनी ओर खींचता है। अब तक इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके हैं कि आखिर जीने के सिद्धांत क्या होने चाहिए....ये भटकाव और अनिश्चितता है, जिससे बड़ी यातना शायद कोई और नहीं होती है....इसीलिए मुश्किल औऱ भी भारी हो जाती है। लगातार-लगातार ये अहसास कि बस अंदर सब कुछ खत्म हो चला है.....खासा बेचैन कर रहा है।
इसे रचनात्मक रूग्णता का नाम भी दिया जाता है, जब कोई विचार, कोई सृजन....कोई नई बात ज़हन में नहीं उभरती है और एक यही बात बेचैन कर देने के लिए काफी होती है। कुछ नया....कुछ नया....क्यों नहीं आ रहा है। हालाँकि बहस तो 'कुछ नया' शब्दावली पर भी की जा सकती है, क्योंकि विज्ञान यह सिद्ध कर चुका है कि इस दुनिया में नया कुछ भी नहीं है, लेकिन दूसरे के लिए नहीं खुद अपने लिए तो हो ही सकता है। आप तो यह भी कह सकते हैं कि ये भी क्या 'पीस' है....कुछ लिखने के लिए नहीं हो तो कुछ भी लिख दें....लेकिन आप जरा ये भी बताएँ कि इस बेचैनी को दूर करने का उपाय क्या है?

Tuesday, 1 December 2009

तस्वीर-सा सुंदर गोवा....


गतांक से आगे
जब हम हुए समंदर के पड़ौसी


इस बार सोच ही लिया था कि कुछ भी हो जाए समंदर को रखेंगे आँखों के सामने....खुशकिस्मती कि जगह मिल भी गई ऐसी...बीच पर ही मिली एक कॉटेज....यहाँ दिन के किसी भी पल में समंदर अपने होने को भूलने नहीं देता है। जैसे-जैसे रात गहराती है उसका जोश उफान पर आने लगता है और उसे देखकर उसके आसपास रहने वालों का भी....दिन भर समंदर के साथ मस्ती करते रहने के बाद भी थकान का नामोनिशान नहीं होता और शाम होते-होते ही बीच जश्न की तैयारियाँ शुरू कर देता है। हर ओर मदहोश कर देने वाली मद्धम रोशनी....हल्का संगीत लहरों के संगम और हवाओं की शहनाई के बीच पक्षियों का वोकल....कुल मिलाकर नशा....काजू फैनी से भी ज्यादा नशा....होता है। देर रात तक बीच पर हलचल....कोई पानी में ही, कोई किनारे पर बैठा है...तो कोई आती-जाती लहरों के साथ गीली हुई रेत के बिस्तर पर टहल रहा है। रेत पर फैलता-सिकुड़ता पानी.....आती हुई तेज लहर से लौटती थकी हुई लहर का टकराना और उससे पैदा हुआ संगीत....क्या है ऐसा जिसे छोड़ा जा सकता है?
सुबह-सुबह पूर्व दिशा से नारियल के पेड़ों के पीछे से निकलता सूरज समंदर के कैनवॉस पर कई रंग बिखेर जाता है और वो....वो इस सबसे बेखबर कर्मरत योगी की तरह बस अपना काम करता जाता है। सूरज जब उसके बिल्कुल उपर अपना अक्स समंदर के आईने में देखता है उस समय....उसमें मौज करने वाले पानी में उतर चुके होते हैं...। सूरज की किरणें लहरों के टकराने से उछलती बूँदों पर पड़ती है तो यूँ लगता है कि समंदर में असंख्य हीरे की कनी बिखरी हुई है। साफ...खारा पानी...जैसे-जैसे गहरे में जाओ लहरों का वेग हमें किनारे की ओर फेंकता जाता है। दिन चढ़ते-चढ़ते सूरज के तेज और समंदर के आवेग के बीच संघर्ष होने लगता है....यदि आप समंदर के साथ है तो वह आपको हारने नहीं देगा...लेकिन यदि आपने उसका साथ छोड़ा तो सूरज आपको बैठने नहीं देगा.....देर तक कोई-न-कोई तो समंदर के साथ बना ही रहता है।

शाम को जब सूरज समंदर की आगोश में ही सोने जाता है जब यूँ लगता है कि यहाँ पानी नहीं चाँदी का वरक फैला हुआ है और कहीं से भी जरा-सी रोशनी पड़ी नहीं कि वह झिलमिलाने लगता है। बीच का दिन तो शाम से जवान होना शुरू होता है। हर कहीं मद्धम रोशनी और हल्के संगीत के बीच सुरूर के लिए जाम लिए पर्यटक किनारे बने रेस्टोरेंट में बैठे हुए दिन भर की थकान को नशे से धोते हुए लगते हैं। देर रात तक बीच पर पार्टी चलती रहती है। अँधेरे में पानी तो दिखाई नहीं देता बस सुनाई देती है उसकी आवाज... आधी रात को भी यदि समंदर को देखने पहुँचो तो कोई न कोई वहाँ बना हुआ मिलता है...। दिन भर में 8 से 10 फीट पीछे जाता पानी चाँद दिखने पर फिर से अपने शबाब पर आ जाता है और किनारे को भरने का प्रयास करता है....रात में जब सब कुछ ख़ामोश हो जाता है तब....समंदर अपने पूरे उफान पर आता है...उस दिन जब आँखें मलते-मलते सुबह पाँच बजे बीच पर पहुँचे तो एकबारगी लहरों के शोर से दिल जोर से धड़क गया...डर-सा लगा....फिर धीरे-धीरे सूरज के निकलने पर समंदर का सौंदर्य निखरने लगा और डर....वो जाता रहा।
सोचा था कि समंदर के पड़ौसी होकर हम उसे जान पाएँगें...लेकिन कौन किसी को जान सका है....फिर चार-छह दिन में वह भी प्रकृति के इस विस्तार को....नहीं जान सके और प्यासे ही हमें लौटना पड़ा।


वैश्विक गाँव: पलोलेम
यहाँ पर्यटक विदेशों इस्त्राइल, रोमानिया, इटली, जर्मनी, अमेरिका और इंग्लैंड कहाँ से नहीं आए हुए थे। तो व्यापार करने के लिए देश के हर कोने के लोग मिले....राजकुमार मनाली से, सुनील नैनीताल से, तनवीर कश्मीर से, शर्मा परिवार दिल्ली से, एजाज लखनऊ और विनयप्रताप सिंह भोपाल से तो कमाल बिहार से व्यापार करने के लिए पलोलेम आया है। कुछ लोग तो ऐसे भी मिले जो सीजन के 6 महीने गोवा में और फिर पहाड़ों के सीजन में मनाली या फिर लद्दाख पहुँच जाते हैं। यहाँ बीच, काजू फैनी, उन्मुक्तता और नारियल के पेड़ों के अतिरिक्त यदि कुछ गोवन था तो वह सी-फूड....मछली और प्रॉन....लेकिन खालिस वैष्णवों को वेज फूड ढूँढ़ने में खासी मशक्कत करनी पड़ी...फिर पीना नहीं है तो कोई भी पार्टी आपके लिए नहीं है। खैर साहब....यहाँ तो मामला प्रकृति के सौंदर्य के बीच खुद के पास होने का था, इसलिए ये तो कोई मसले नहीं थे....।
आने के बाद दो दिन बीत गए....कपड़ों और सामानों से अब भी रेत झर रही है, पैरों में लहरों का आवेग अब महसूस होता है....रात को समंदर का हरहराना और दिन भर कौवों की काँव-काँव अब भी सुनाई देती है। दो मंजिला मकान की बॉलकनी यहाँ भी मचान पर बनी हट का भ्रम देती है। पहाड़ों और समंदर को छोड़कर आने के बाद भी इस पठार में उसकी हरारत महसूस हो रही है। बस यहाँ का मौसम भी यदि वहाँ पर्यटन पर चला जाता तो उस जगह से लौटना वाकई मुश्किल होता....सही है कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता....बस...।

तस्वीर-सा सुंदर गोवा...


समंदर के साथ ही दिन-रात, सुबह-शाम हर एक पल बिताने की योजना बनाकर हम गोवा घूमने निकले थे, लेकिन दो दिन हमने मडगाँव (जहाँ हमने ट्रेन छोड़ी) में ही बिता दिए। मडगाँव गोवा का दूसरा सबसे बड़ा शहर....लेकिन ये क्या.....मडगाँव तो देश के किसी भी शहर-सा एक आम-सा शहर है, यहाँ 'गोवा' जैसा कुछ भी नज़र नहीं आया। गोवा का नक्शा खरीदने के लिए दुकान पर पहुँचे तो जैसा कि आमतौर पर होता है पूछ बैठे कौन-सा 'बीच' अच्छा है....जवाब मिला पलोलेम....सोच लिया जाकर एक बार देख लें....फिर सोचेगें....।
इस बीच गोवा टूरिज्म के टूरिंग पैकेज के तहत साउथ गोवा का टूर किया जो बेहद निराशाजनक रहा...आखिर किसी भी जगह को खाने नहीं आए हैं....घूमने, जीने और महसूस करने आए हैं। टूर में कोलवा और मीरामार बीच को मात्र स्पर्श किया और लग गया कि उस दो किलोमीटर लंबे बीच से अच्छे नहीं है बड़े-बड़े बीच तो अगले ही दिन पहुँच गए पलोलेम बीच.....।
कुछ गोवा प्रदेश
गोवा का इम्प्रेशन.... काजू फैनी....नारियल...और उन्मुक्त जीवन से ज्यादा नहीं आता है, लेकिन यह सिर्फ इतनी ही नहीं है। गोवा पर जैसे प्रकृति ने प्रेम की बारिश की है....जहाँ देखो वहाँ हरियाली.....नारियल....कटहल....नीलगिरी....और हाँ सागौन....लाल मिट्टी के बीच हरे पत्तों से सजे लैंडस्कैप में यदि कुछ कम हो सकता था तो वह थे पहाड़....लेकिन यहाँ तो वह भी है। गोवा के बिग फुट म्यूजियम में परशुराम की एक झाँकी बनी हुई है। गाइड ने बताया कि यहाँ माना जाता है कि सह्याद्रि पर्वत से परशुराम ने अरब सागर में जो तीर चलाया था उससे जो जमीन निकली उस पर गोवा और केरल बसा हुआ है। माइथोलॉजी पर हमेशा से संदेह रहा है क्योंकि हम उसे इतिहास नहीं मान पाते हैं, फिर भी गोवा को देखकर तो यही लगता है कि परशुराम के तीर से निकली जमीन ही हो सकता है गोवा....हर तरफ पेड़ ही पेड़.....घरों की छत को भी पेड़ों के बीच ही ढूँढना पड़ता है। पूर्व की तरफ सह्याद्रि पर्वत शृंखला और पश्चिम की तरफ अरब सागर का विस्तार और दोनों के बीच बसा गोवा....अद्भुत....शब्दातीत सुंदर....।



सौंदर्य का साकार रूप : पलोलेम बीच
मुम्बई में जूहू और दमन के बीचेस को देखने के बाद निष्कर्ष ये निकाला था कि बीच पर सिर्फ पानी होता है.....नज़रों की सीमा तक...पानी ही पानी....हरहराता हुआ पानी...लहरों पर लहरें और लहरें....लहरें.....लहरें और बस लहरें......लहरों की हवाओं के साथ जुगलबंदी कुल मिलाकर सी.....सैंड.....और सन.....लेकिन यहाँ एक और चीज जुड़ी....और वह है नारियल के पेड़....पेड़ न कहो....जंगल....और सजगता इतनी कि चाहे रिसोर्ट बना हो या फिर रेस्टोरेंट.....यदि नारियल का पेड़ है तो उसके आसपास निर्माण होगा....पेड़ किसी भी सूरत में कटेगा नहीं....बस इसी एक सजगता ने पलोलेम बीच को सुंदर तस्वीर-सा सुंदर बनाया हुआ है। पूर्व की तरफ नारियल का घना बाग-सा.....और उसके बीच बनी अस्थायी मचान-सी 'हट'...पश्चिम की तरफ जलतरंग बजाता समंदर.....उसमें उभरे छोटे-छोटे टापू....जहाँ नज़र दौड़ाओ....वहाँ प्रकृति मुस्कुराती हुई हमें अभिभूत करती है....यहाँ आकर एक बार फिर से अहसास होता है कि सौंदर्य प्रकृति से बाहर हो ही नहीं सकता है। शायद इसी वजह से यहाँ आकर हर कोई उन्मुक्त हो जाता है....खुद के करीब और दुनिया से दूर होता चला जाता है।


क्रमश:

Friday, 20 November 2009

१० दिन के लिए अर्धविराम....!


मावठा रूका तो....धूप का हाथ पकड़कर गहरी खुनक साथ चली आई...तब से धूप और खुनक दिन भर आँख मिचौली खेलती रहती हैं और शाम होते-होते धूप तो थक कर घर चली जाती है, लेकिन खुनक रात होते ही जवान हो जाती है....। मन रूखा-रूखा बना हुआ है, कितनी ही कोशिश की उसे मनाने की, लेकिन उसका रूखापन बरकरार है, आखिरकार सारी कोशिशें ही छोड़ दी और लग गए तैयारी में.... आखिर घूमने जो जाना है.....कुछ दिन खुद के साथ....सब कुछ को छोड़कर प्रकृति के राग-रंग, आमोद, सृजन और गीत को सुनने-देखने और उसी में डूब जाने के लिए, आखिरकार शहर में रहकर यही तो नहीं मिलता है। कुछ दिन....हाँ शायद हफ्ता दस दिन दुनियादारी से दूर खुद को प्रकृति की संगत में रखकर देखें तो शायद हर दिन की दौड़..... और कड़ुवाहट से सामंजस्य करने की ताकत पाएँ.....बस इतना ही... लौट कर कुछ 'मैं' और कुछ गोआ के अनुभवों के साथ फिर होऊँगी आपके सामने तब तक के लिए....बाय....।

Saturday, 14 November 2009

कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता


नवंबर में अगस्त सी बारिश हो रही है। पिछले पाँच छः दिनों से लगातार यूँ लग रहा है जैसे बारिश का ही मौसम हो.....। अमूमन इस महीने दीपावली होती है, लेकिन इस बार दीपावली-दशहरे से फारिग हो चुके लोगों को नवंबर ने सावन जैसी सौगात दी। गीला-गीले से दिन पर रूमानी-सी रातों के इस दौर में जब खिड़की के उस ओर मौसम का शहद रच-रचकर रिस रहा हो....छुट्टी भी हो (कारण कुछ भी हो, बीमारी ही सही) तो क्या उसे हथेलियों में समेट लेने की इच्छा नहीं होनी चाहिए....? लेकिन नहीं हुई....। मावठा है....लेकिन क्या एक सप्ताह तक लगातार गिरते देखा है कभी...फिर अगहन में.... पौष में गिरता है, माघ में गिरता है, लेकिन इस माह.... प्रकृति को भी उच्शृंखलता सूझती है कभी-कभी.... किस मौसम के आने का समय हो और कौन आ टपके बिल्कुल सरप्राइज...खैर यही तो बदलाव है...खुशी है, जीवन है वरना इस दुनिया में रखा क्या है?
पारदर्शी शीशों वाली बड़ी-सी काँच की खिड़की के उस ओर आसमान उमड़ रहा है हम वाइरल के लिहाफ में दुबके उस शहद से रिसने को नहीं झेल पाने के दुख के साथ बेसुध पड़े हैं। पोर्च का झूला....कॉफी का कप... सुरीली बंदिशें या फिर मीठी गजलें....सब कुछ हो सकता था, लेकिन कुछ नहीं है। हवा में उड़ा-उड़ा सा तन है और भाँग की हल्की-सी खुनक में डूबा सा मन है, जिसमें कुछ भी नहीं चल रहा था और कुछ भी नहीं हो रहा था। बस मौसम यूँ ही गुजर रहा था और हम उसकी तरफ पीठ कर सो रहे थे.....सच ही तो है कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता....कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता। कारण कुछ भी हो....बीमारी हो.... चाहे तो किस्मत ही कह लें.....आखिरकार जब सवाल हो और जवाब न हो तो ईश्वर और सब कुछ करने के बाद भी मनचाहा न हो तो....जी हाँ किस्मत है...।

Sunday, 8 November 2009

...कि मैं जमीन के रिश्तों से कट गया यारों...


एक बड़े शहर में रहने के अपने सुख और अपने दुख हैं....कह सकते हैं कि कोई भी सुख निरपेक्ष नहीं होता है या फिर बहुत आशावादी हैं तो यूँ भी कह सकते हैं कि दुख अपने साथ कोई-न- कोई उपहार लेकर आता है...कोई फर्क नहीं अलबत्ता....। हाँ तो एक साफ सफेद छुट्टी पर सामाजिकता निभाने की कालिख लगा दिन उगा... अब चूँकि छुट्टी के दिन घर से निकलना ही है तो क्यों नहीं बकाया दो-तीन काम भी हाथ के साथ कर लिए जाए, यही सोचकर घर से जल्दी निकले और इत्तफाक यूँ कि दोनों ही काम समय से पहले पूरे हो गए और आयोजन शुरू होने में घंटा आधा घंटा बचा हुआ है.....अब इस समय को कहाँ बिताएँ...तभी रास्ते में मॉल दिखा.... चलो समय काटने का इंतजाम तो हो ही गया.... मॉल इसके सिवाय और किस काम आएँगें?
पता नहीं अभी तक वहाँ क्यों नहीं पहुँच पाए कि मॉल से कुछ खरीदा जाए...जब कभी इस विचार के साथ वहाँ गए....एकाएक खुद में बसा कर्ता भाव लुप्त हो जाता और निकल आता दृष्टा.....और जब वो देखता है तो बड़ी हिकारत से....कि अरे! तुम्हारे इतने बुरे दिन आ गए हैं कि तुम यहाँ से खरीदी कर रहे हो?(खैर ये आज का सच है भविष्य के लिए कोई दावा नहीं है।) तो किसी भी सूरत में मॉल से खरीदी करने की कभी हिम्मत ही नहीं जुटा पाए। तो समय काटने के उद्देश्य से उस लक-दक मॉल में घुस गए.... वहाँ जगह-जगह युवाओं को खड़े और बातें करते देखते हुए एकाएक उनपर दया आई और सहानुभूति भी हुई..... लगा कि शहर में रहने वाले युवा कितने बेचारे हैं....एकाएक मिरिक (दार्जिलिंग) में झील के किनारे चीड़ के पेड़ों के बीच धमाचौकड़ी करते बच्चों को देखकर सतह पर आ गई ईर्ष्या की याद उभर आई......लगा कि ये युवा साधन संपन्नता में क्या खो रहे हैं, नहीं जानते.....। वे महँगे परफ्यूमों और डियो की तीखी या भीनी खुश्बू तो बता सकते हैं, लेकिन रातरानी, जूही और चमेली का रात में गमकना....रजनीगंधा का भीगा-भीगा सा भीनापन और केतकी की पागल कर देने वाली खुश्बू को नहीं जानते हैं, वे तोहफे में जरूर एक दूसरे को बुके देते होंगे, लेकिन डाली पर लगे गुलाब के सौंदर्य को उन्होंने शायद ही देखा होगा। वे एसी के सूदिंग मौसम में काम करते हैं, लेकिन पौष की सर्द रात और उसमें गिरते मावठे के मजे से शायद ही वाकिफ हों.... वे नहीं जानते जेठ की तपन का मजा और भादौ की घटाघोर में भीगने का आनंद क्या है?
महँगे म्यूजिक सिस्टमों और आईपॉड में बजते पसंदीदा सुलभ संगीत से तो वाकिफ है, लेकिन अलसुबह पंचम सुर में गाती चिड़ियो...... खूब ऊँचाई से गिरते झरनों का गान और आसमान के खुले हुए नलों से आती बौछारों की ध्वनि का मतलब शायद ही जानते होंगे। मॉल की लकदक रोशनी को तो जीते हैं, लेकिन पूरे चाँद की रात की चादर पर पसरी मादक चाँदनी के जादू और रहस्य का मजा शायद ही कभी पाते हो....कितना अजीब है ना, जो हमें सहज ही में हासिल है, वो लगातार दुर्लभ हो रहा है.....और इसे हम तरक्की समझ रहे हैं। हम जिसे वरदान समझ रहे हैं, दरअसल वहीं जमीन से कटने की सजा है। ये तो मात्र छोटे संकेत हैं, लेकिन इसके पीछे का संदेश बड़ा अर्थवान है। एक बार यूँ ही कहीं बातों-बातों में मुँह से निकल गया था कि पूरी दुनिया से क्रांति की संभावनाओं का अंत हो चला है। बहुत दिनों तक अनायास निकली इस बात की जड़ों को टोहती रही थी, लेकिन सिरा नहीं पकड़ पाई थी। तभी गोर्की की माँ पढ़ते हुए उसकी जड़ से साक्षात्कार हुआ था, उसमें लिखा था कि---
अगर बच्चों के खाने में ताँबा मिलाते रहो तो हड्डियों की बाढ़ मारी जाती है, लेकिन किसी आदमी को सोने का जहर दिया जाता है, तो उसकी आत्मा बौनी रह जाती है-टुच्ची, गंदी और बेजान, रबर की उन गेंदों की तरह जो बच्चे पाँच-पाँच कोपेक में खरीदते हैं।
इसी के साथ एक शेर याद आया....हमेशा की तरह शायर का नाम याद नहीं आ रहा है, फिर भी ये शेर आज के युवाओँ के लिए मौजूं है----मिली हवाओं में उड़ने की वो सजा यारों/ कि मैं जमीन के रिश्तों से कट गया यारों..... तो आज बस इतना ही....।

Friday, 30 October 2009

मैं....


जिम्मेदारी....शौक और जरूरत को अपनी पूरी ऊर्जा और पूरी क्षमता से सजाने की ज़िद्द.....दिन की चेतना के हर एक मिनट का अर्थ तलाशते...हर एक क्षण को अर्थवान बनाने का जुनून....आसमान पर हीरे से लिखी इस इबारत के बाद भी कि जीवन की कोई अर्थवत्ता नहीं है...जन्मे हैं तो जीना है...और मरने के बाद कुछ नहीं होगा....ये ज़िद्द और जुनून बीमारी का रूप लेने लगी है। कभी दूसरे के समक्ष खुद के होने को तो कभी खुद अपने ही सामने खुद को सिद्ध करने की सनक...कहाँ ले जा रही है.....? और क्यों है ये सब....इसका जबाव कभी नहीं मिला....।
होंगे किसी के दिल और दिमाग अलग यहाँ तो कब दिल कहता है और कब दिमाग तय ही नहीं होता..... भागते समय के सिरे को पकड़ने की बेतुकी कोशिश और उसमें अर्थ के रंग भरने की नामुमकिन सी कवायद का कहीं कोई अंत नजर नहीं आता है। कुछ है जो लगातार बेचैन किए रहता है। एकाएक जीवन की अर्थहीनता का बोध जाता रहता है और सिद्ध होते रहने की चुनौती सवार हो जाती है। बस इस सबमें ही सहजता और सरलता कहीं कुचल कर दम तोड़ देती है। पता नहीं कब कहाँ और कैसे ये सब कुछ छूट गया है और ऐसा छूटा है कि कहीं इसके निशान ही नहीं मिलते। गहरी यातना का दौर है....उपर से सब कुछ सरल और सहज दिखती जमी हुई बर्फ के नीचे बहता लावा नजर नहीं आता है, लेकिन जलाता तो है ही ना....!
अच्छ से जीना शायद ज्यादा जरूरी है, अच्छे से लिखने या कुछ रचने के.....लेकिन सब कुछ को तरतीब से करने के भँवर में जो बुरे फँसे हैं उनका क्या किया जा सकता है? क्या हो सकता है इसका इलाज.....।

Sunday, 18 October 2009

.....अवसाद के बीच



दीपावली गुजर गई...रात भर पटाखों के शोर के बीच दिनभर की थकान ने आँखों में नींद भर दी...और सुबह उठे तो उत्सव गुजर चुका था और गुजर चुका था उसका उत्साह.... अब थी छुट्टी....खाली बर्तन-सी बजती हुई....कोई योजना नहीं और कोई तैयारी नहीं....फूटे हुए पटाखों के कचरे से पटी पड़ी सूनी गलियाँ......उनींदा अलसाया दिन....बच्चे भी जैसे उत्सव के बाद के अवसाद के शिकार नजर आ रहे हैं.....।
अपने सिस्टम पर बैठी मैं कुछ लिखने का प्रयास कर रही हूँ और पीछे राजन-साजन मिश्र का तराना तन नादिर दिर दिन तन तेना तान.....चल रहा है। सोचती हूँ अवसाद का भी अपना आनंद है। कुछ ठंडा....कुछ मीठा....शांत-सा.....। उत्साह गुजर चुका है और बच गए हैं, कुछ सवाल। ज्वार के उतर जाने के बाद किनारे पर रह गए कचरे जैसा...कुछ...। हर साल दीपावली आती है और पूरे साल भर निर्लिप्त से होकर बिताने के बाद त्यौहार की तैयारियों में आकंठ डूब जाते हैं हम....। मन-मस्तिष्क को डूबो देते हैं, उस प्रवाह में जो हमारे आसपास से गुजर रहा है.....और हो जाते हैं उसका हिस्सा....फिर वह प्रवाह सबको अलग-अलग छोड़ देता है अपने-अपने अहसासों की नियति के साथ.....सामूहिकता गुम हो जाती है हम रह जाते हैं अपने पास.....निखालिस स्व के लिए...लेकिन क्या उसे सहना आसान है?
सवाल उठता है, कि इस सबका हासिल क्या है? इस एक दिन से क्या, कितना और कैसा बदलता है। अगले दिन से वही एहसास वहीं यांत्रिकता, वही एकांतता....यूँ तो आजकल हम उत्सव की सामूहिकता को भी नितांत एकांतिकता से मनाते हैं। हमारे अंदर बाहर इस आनंदोत्सव से क्या बदलता है? मात्र वक्ती तौर पर हम बदलता है फिर वही हो जाते हैं.....फिर इस बेकार के हल्ले का क्या मतलब है? कहीं कोई सुसंगति नहीं, कोई अर्थ ही नहीं..... जरूरत नहीं है कि क्या कि अब सोचा जाए कि हम त्यौहारों को तरतीब दें, विचार करें कि अपने आनंद को कोई आकार दें, अर्थ दें, खुद से बाहर जाकर देखें....जीएँ......जीने को आयाम दें, कुछ बदलने का विचार ही करें....क्या पता किसी दिन हम विचार को क्रिया में परिणित करने की स्थिति में ही आ जाए...। किसी भी नए और सद् विचार का स्वागत है, शायद ब्लॉगिंग ही बूँद भर बदलाव का माध्यम बन सके। इस उम्मीद के साथ सभी को बधाईयों के सैलाब में सार्थकता ढूँढने के लिए शुभकामना....ऑफकोर्स.....खुद मेरे लिए भी.....।
दीपावली और नए साल की हार्दिक-हार्दिक शुभकामना.....।

Friday, 16 October 2009

गुम हो चुकी लड़की.....अंतिम कड़ी


गतांक से आगे
शाम पाँच बजे ही रिज़वान ने मुझे उसके अपार्टमेंट के नीचे छोड़ा... जब निकलना हो तो मुझे फोन कर लेना... और नहीं तो....---कहकर बात अधूरी छोड़ कर आँख मारी।
मुझे अच्छा नहीं लगा।---मैंने रूखाई से कहा, मैं पहुँच जाऊँगा, यू डोंट वरी।
नीली कैप्री और पिंक टाइट टी-शर्ट पहने उसने दरवाजा खोला...वेलकम।
खुला-खुला सा हॉल.... जिसमें सामने ही नीचे मोटा गद्दा लगा हुआ था और उसपर ढेर सारे कलरफुल कुशन पड़े हुए थे। आमने-सामने बेंत की दो-दो कुर्सियाँ और बीच में बेंत की ही ग्लास टॉप वाली सेंटर टेबल पर नकली फूलों से सजा गुलदान....। उसकी प्रकृति और स्वभाव के बिल्कुल विपरीत...खिड़की तो नहीं दिखी, लेकिन गद्दे के पीछे वॉल-टू-वॉल भारी पर्दे पड़े हुए थे। वह अंदर से पानी लेकर आई। सुनाओ....
मैं क्या सुनाऊँ, तुम सुनाओ....कैसा चल रहा है?
बस चल रहा है।
थोड़ी देर हम अतीत से सूत्र पकड़ने की कोशिश में ख़ुद में डूब गए...कोई सिरा ही पकड़ में नहीं आ रहा था। तभी कहा--तुम बहुत बदल गई हो....।
हाँ तुम जिस लड़की की बात कर रहे हो वह एक छोटे शहर की मिडिल क्लास वैल्यूज के सलीब को ढोती लड़की थी, जो कुछ भी नहीं थी.....जिसे देख रहे हो, वह मैट्रो में रहती और ग्लैमर वर्ल्ड में काम करती है, जहाँ लैग पुलिंग है, थ्रोट कटिंग...कांसपिरेसी और इनसिक्योरिटी है....यहाँ तक पहुँचना ही काफी नहीं है, यहाँ पर टिके रहना ज्यादा मुश्किल है। 'कुछ नहीं' होने से 'कुछ' हो जाने का सफर बहुत तकलीफदेह होता है। बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है, फिर पता नहीं क्या सच है, जो छूट जाता है, वहीं सबसे ज्यादा अहम होता है या फिर जो अहम होता है, वहीं छूट जाता है, हर उपलब्धि की कीमत चुकानी होती है...यह कीमत उनके लिए ज्यादा होती है, जो संवेदनशील हैं....नहीं तो सफलता का नशा सिर चढ़कर बोलता है.... वह थोड़ी देर रूकी थोड़ी उदास हो गई...फिर मुस्कुराते हुए बोली--- तुम तो इसे बेहतर तरीके से जानते हो...--- लंबी फ़लसफ़ाना बात करने के बाद वह अक्सर उसका ऐसे ही समापन करती है।
फिर दोनों ख़ामोश हो गए....। इस बार चुप्पी उसने तोड़ी-- अच्छा बोलो क्या खाओगे?
जो फटाफट बन जाए...।
खिचड़ी....? अरे नहीं... मैंने तुम्हें बुलाया है और डिनर में खिचड़ी खिलाऊँगी? कुछ और सोचो।
चलो कहीं बाहर चलकर खाएँ.... बिल तुम दे देना...- मैंने प्रस्ताव रखा।
उसने वीटो कर दिया।---- नहीं, हम यहीं ऑर्डर कर देते हैं, इज दैट ओके....?
उसने फोन कर आठ बजे खाने का ऑर्डर कर दिया। तब तक कॉफी और कुछ स्नैक्स ले आई।
अच्छा, लिखने के लिए इनपुट्स क्या होते हैं, तुम्हारे....?
प्रायमरी आइडिया होता है, बस उसके बाद तो जिस दिशा में व्यूवर चाहता है, कहानी चलती जाती है, इट्स बोरिंग... नो क्रिएटिविटी एट ऑल....।
फिर तुम....! हाउ कैन यू वर्क....?
मैं... मैं एक नॉवेल लिख रही हूँ, तकरीबन पूरा होने आया। आई मस्ट फाइंड सम क्रिएटिविटी आउट ऑफ माय जॉब टू सेटिस्फाई मायसेल्फ.....अदरवाइज नो वन कैन सेव मी टू कमिट स्यूसाइड....--उसकी आँखों में कुछ भयावह-सा उभरा...।
एंड नॉवेल ऑन....?
यू नो, जो उस छोटे शहर से लाई हूँ, उसी को अदल-बदल कर पका रही हूँ। जिस दिन वो सब खत्म हो जाएगा, लौटना पड़ेगा या फिर यहीं कहीं दफ़्न होना पड़ेगा। इन सालों में मैंने जाना है कि मैट्रोज या बड़े शहर कुछ प्रोड्यूज नहीं कर पाते हैं, दे आउटसोर्स इच एंड इवरीथिंग.....इवन इमेजिनेशन....क्रिएटिविटी एंड ओरिजनलिटी ऑलसो....। सारे लोग जो इस शहर के आकाश में टिमटिमा रहे हैं, वे सभी छोटे शहरों से रोशनी लेकर आए हैं, इस शहर को जगमगाने के लिए....। अभी इस पर विचार करना या रिसर्च करना बाकी है कि ऐसा क्यों होता है, क्या बहुत सुविधा ये सब कुछ मार देती है या फिर समय की कमी इस सबको लील जाती है....?
मैं उसे बोलते देख रहा हूँ और सोच रहा हूँ.... कि मैंने अपने जीवन से अब तक क्या सीखा....? किस मोती को मैं अपने में उतर कर लेकर आया....क्या उसने सच नहीं कहा था कि कभी ख़ुद के साथ भी रह कर देखो....!
अब मेरे सवाल चुक गए हैं....मेरा उत्साह मर गया है, वो मुझे बहुत दूर जाती हुई दिख रही है। एक आखिरी बात जो उस शाम मैंने उससे कही थी---- मैंने तुम्हें जब भी इमेजिन किया मुझे मौसमों का इंतजार करती लड़की के तौर पर तुम याद आई....क्या अब भी तुम मौसमों का इंतजार करती हो....?
उसकी आँखों में नमी तैरी....उन भारी पर्दों की ओर इशारा करते हुए उसने कहा-- इन पर्दों के उस पार मौसम आकर निकल जाते हैं, न मैं कभी इन्हें हटाती हूँ, न कभी वे ही मुझसे मिलने अंदर आए....मुझे डर कि कहीं मैं उनमें उलझकर फिर से आम न हो जाऊँ और वे.... उन्होंने तो कभी किसी को खींचा ही नहीं जब हम सहज होते हैं तो उनके प्रवाह में बह जाते हैं, लेकिन जब हमसे सहजता छिनती है तो फिर सबसे पहले वे हमें किनारे पर छोड़ देते हैं।
सब कुछ बहुत बोझिल हो गया। मैंने उसके हाथ पर अपना हाथ रखा.... वह काँपी फिर स्थिर हो गई और देखती रही, उसकी आँखों में एकसाथ बहुत कुछ उमड़ा और मुझे लगा कि पहले ही हमारे रास्ते कभी एक नहीं थे, अब तो दिशाएँ ही अलग हो गई है। पहले उसका वैसा होना मुझे भाता था, मेरा होना सार्थक लगता था, लेकिन अब.... मैं वहीं हूँ और वो बहुत दूर जा चुकी है, बल्कि यूँ कहूँ कि वह गुम हो चुकी है।
----------------------------------------------------------
मैं रिज़वान के साथ लौट रहा हूँ.....वह बहुत खुश है, मैं उसके साथ उदास हूँ, क्यों? कोई कारण दिखता नहीं। उसने कार में म्यूजिक सिस्टम ऑन कर दिया। फिर से ग़ुलाम अली गा रहे हैं---
फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा न था
सामने बैठा था मेरे और वो मेरा न था...
गाड़ी चल रही थी। ठंडी हवा हल्के-हल्के से सहला रही थी और ये मुम्बई की सड़क चले जा रही थी......चले जा रही थी.....।
समाप्त

Wednesday, 14 October 2009

गुम हो चुकी लड़की....छठी कड़ी


गतांक से आगे....
प्लेन से उतर कर एयरपोर्ट पर आते ही रिज़वान दिखाई दे गया जोर-जोर से तख़्ती हिलाता हुआ। मैं तेजी से उसकी तरफ पहुँचा तो वह तपाक से गले लग गया। मैंने हँसते हुए कहा-- वहाँ जर्मनी में भी तुम ऐसे ही मिले थे मुझे तख़्ती हिलाते हुए, तब मैं तुम्हें और तुम मुझे नहीं जानते थे....लेकिन आज ये क्यूँ? अब तो हम दोनों एक दूसरे को जानते हैं।
उसने हँस कर कहा--- दुनिया की भीड़ में कहीं तुम मुझे अनदेखा न कर दो, इसलिए...।
रिज़वान से मैं जर्मनी में ही मिला था, वहाँ वह कंपनी का काम मुझे हैंडओवर कर हिंदुस्तान लौट रहा था, उसके ही फ्लैट में फिर अगले पाँच साल मैं रहा था। मुझे 15 दिन की छुट्टी मिली थी, फिर बैंगलूरू ज्वाइंन करना है। आज तो पहुँचा ही हूँ.... कल हेडऑफिस रिपोर्ट करूँगा, फिर घर चला जाऊँगा....। रिज़वान मुझे अपने सातवीं मंजिल स्थित फ्लैट में पहुँचाकर ऑफिस चला गया और कह गया कि सात बजे आऊँगा.... फिर पार्टी में चलेंगे।
फ्रेश होकर खाना खाया थोड़ी देर टीवी देखा फिर लगा कि नींद आ रही तो सो गया। शाम को रिज़वान ने ही उठाया, वह पाँच बजे ही आ धमका...। दोनों ने चाय पी इधर-उधर की बातें की, फिर उसने पार्टी में जाने की बात कही, मैंने उससे कहा-- तुम चले जाओ, मैं यहीं रहूँगा।
उसने इसरार किया।--- मेरी गर्लफ्रैंड की बर्थ-डे पार्टी है, चल मजा आएगा तुझे।
मैंने रहस्य से उसकी ओर देखा... पहली या....!
वह मुस्कुराया- नहीं दुसरी....
पहली का क्या हुआ....?
चली गई स्टेट्स...।
और ये क्या करती है?
शी इज स्ट्रगलर एक्ट्रेस...एकाध टीवी सीरियल में छोटा-मोटा काम मिला है।
शादी करने का इरादा है?
करना तो चाहता हूँ, लेकिन वह नहीं चाहती है।
क्यों...?
कहती है अभी मैंने किया ही क्या है? फिर डर भी लगता है, अभी तो वह स्ट्रगल कर रही है, सक्सेसफुल हो जाने के बाद क्या वह मुझ जैसे प्रोफेशनल के साथ रहना पसंद करेगी....? फिर सोचता हूँ, यदि वह हम आज शादी कर लें और उसके सक्सेस होने के बाद हम निभा नहीं पाए तो....? इसलिए फिलहाल तो कुछ भी नहीं सोच रहा हूँ.... बस लाइफ इंजाय कर रहा हूँ। चल तैयार हो, बहुत हो चुकी बातें...., अभी तो तुझे चार दिन और रूकना पड़ेगा। यह कहने के लिए मल्टीनेशनल है... काम तो सरकारी गति से ही होता है यहाँ।
पार्टी हॉल में तेज रोशनी....तेज संगीत के बीच रिज़वान ने शब्दा और कुछ और दोस्तों से मिलवाया, फिर मैंने उससे पार्टी इंजाय करने का कहकर ड्रिंक लिया और एक कोना पकड़ लिया। आते-जाते, नाचते-हँसते एक दूसरे से मिलते बतियाते लोगों को देखते हुए मेरी नजर एक लड़की पर ठहर गई... वह डांस फ्लोर पर थी.... लगा कि इसे मैं जानता हूँ। पता नहीं कैसे उसने भी मुझे देखा और आश्चर्य से मेरी ओर देखकर हाथ हिलाया और मेरे सामने आकर खड़ी हो गई।
कब आए हिटलर के देश से....?---उसी तरह के तेवर से पूछा।
हिटलर का देश...!--- मैंने हँस कर कहा।- अब तो वो लोग भी उससे पीछा छुड़ाना चाहते हैं, तुम क्यों उन बेचारों के पीछे पड़ी हो?
मैंने उसे इस बीच देखा...लड़कों की तरह कटे हुए बाल... गहरा मेकअप और काले रंग के स्ट्रेप टॉप के साथ उसी रंग का टाईट स्कर्ट और पेंसिल हील.... बहुत बदली और अपरिचित लगी वह मुझे।
इतिहास से कभी भी भागा नहीं जा सकता....वो गाना नहीं सुना... आदमी जो कहता है, आदमी जो करता है जिंदगी भर वो दुआएँ पीछा करती है....संदर्भ से समझना... खैर तुम क्या गाना-वाना समझो तुम तो औरंगज़ेब हो....।--- उसने कहा।
अरे, पहले हिटलर, फिर औरंगज़ेब....क्या इन दिनों बहुत इतिहास पढ़ रही हो....तुम तो साहित्य की स्टूडेंट थी।
दुनिया में कुछ भी साहित्य से बाहर नहीं है, खैर हम फिर से नहीं झगड़ेंगे। तुम यहाँ कब आए....?
आज ही, और तुम यहाँ क्या कर रही हो?
बस यूँ ही सीरियल लिख रही हूँ, तुम ठहरे कहाँ हो?
रिज़वान के घर... दो-एक दिन में घर जाऊँगा।
क्यों नहीं तुम कल मेरे साथ डिनर करो.... बातें करेंगे। कुछ इतिहास याद करेंगे।
बिना कुछ सोचे मैंने उसे डिनर के लिए हाँ कर दी।
क्रमशः



निवेदनः इस लंबी कहानी को शुरू किया था तो इसका रंग-रूप कुछ दूसरा था....लेकिन पहली ही कड़ी के बाद मुझे यह अहसास हो गया था कि यह कहानी मैं नहीं लिख रही हूँ......यह मुझसे लिखवाई जा रही है। पात्रों को खड़ा करते ही वे मेरी गिरफ्त से बाहर हो गए और अपने-अपने रास्ते चल पड़े। इसलिए यह वैसी नहीं बन पाई जैसी मैं इसे बनाना चाहती थी। अब चूँकि अगली कड़ी में इस कहानी का समापन होने जा रहा है, मै अपने उन पाठकों से जो इसे लगातार पढ़ रहे हैं, निवेदन करना चाहूँगी कि, अब तक की कहानी को पढ़ने में उनके मन में जो चित्र बने हैं, उस आधार पर अपने कमेंट में वे यह बताएँ कि इसका अंजाम उनकी नजर में क्या हो सकता है? इस बात के लिए निश्चिंत रहें कि इससे कहानी के अंत पर कोई फर्क नहीं पड़ने जा रहा है। इस सारी कवायद का उद्देश्य मात्र मेरा लेखक (मात्र शब्द है, यहाँ भाव नहीं है) होने को रेटिंग देना है।

गुम हो चुकी लड़की....पाँचवी कड़ी


गतांक से आगे..
दीपावली मना चुकने के बाद परीक्षा की तैयारी का दौर शुरू हो चुका था....। शामें हल्की-हल्की ठंडक लेकर आने लगी थी। दोस्त के यहाँ सुबह से शाम तक पढ़ने के बाद देर शाम घर लौट रहा था कि गली के मुहाने पर मैंने उसे बदहवास हाल में पाया। दुपट्टा और टखने की तरफ से फटी हुई सलवार, कुहनी छिल गई और कलाई से खून टपक रहा था। उसके काईनेटिक के फुट रेस्ट पर लटके पालीथिन भी रगड़ गई थी और उसमें से सामान झाँक रहा था.... मैंने घबराकर पूछा--- क्या हुआ....?
उसके आँसू ही निकल आए.... पालीथिन बैग में पैर फँस गया और गिर गई...।
और ये कलाई में से खून क्यों निकल रहा है....?---खून देखकर मैं घबरा गया था। अपने जेब से रूमाल निकाल कर कलाई को बाँधा।
पता नहीं शायद कोई काँच का सामान टूट कर चुभ गया हैं।
मैंने अपनी गाड़ी वहीं खड़ी की और उसकी गाड़ी पर उसे बैठाया और घर छोड़ा.... जब अपनी गाड़ी लेकर घर पहुँचा तो माँ वहाँ जा चुकी थी।
चाची ने उसे पानी पिलाया और दीवान पर लेटा दिया। उसकी कटी हुई कलाई की ड्रेसिंग करते हुए बड़बड़ाई।--इस लड़की के मारे तो नाक में दम है। घर में इतने कप पड़े हैं, फिर भी चाय पीने के लिए इसे गिलास चाहिए।
गिलास....!---एकसाथ माँ और मैं दोनों ने पूछा...।
हाँ और नहीं तो क्या... कहती है कि सर्दी में काँच के गिलास में चाय पीना अच्छा लगता है। --- चाची ने कहा।
लेकिन अभी दीपावली पर ही तो हम दोनों काँच के गिलास लेकर आए थे...।-- माँ ने चाची से कहा।
वो तो गर्मी में शरबत पीने के गिलास है। सर्दी में चाय पीने के लिए नहीं है। सर्दी में तो लंबे और सँकरे गिलास होने चाहिए चाय के लिए....।--- अब तक वह स्वस्थ हो चुकी थी, इसलिए मासूमियत से बोली।
मुझे हँसी आ गई...तो वह चिढ़ कर बोली.... तुम्हें को कुछ समझ में आता नहीं है। सर्दी में चाय ज्यादा गरम चाहिए और चौड़े कप में जल्दी ठंडी हो जाती है, फिर उसकी क्वांटिटी भी अच्छी चाहिए... इसलिए काँच के गिलास चाहिए चाय के लिए....तुम तो निरे बुद्धु हो....।
कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं उसे सोचने लगा हूँ....। कभी-कभी तो यूँ भी भ्रम होता है कि मैं उसे जीने ही लगा हूँ। सब कुछ करता हूँ, तब वह मेरे आसपास नहीं होती है, लेकिन जब वह दिखती है तो फिर मेरे वजूद पर ऐसे होती है, जैसे जिस्म पर कपड़े.... फबते और लिपटे हुए-से....।

क्रमशः

Monday, 12 October 2009

गुम हो चुकी लड़की....चौथी कड़ी



गतांक से आगे
दो दिन से लगातार बारिश हो रही है..... घर से बाहर निकलने की भी मोहलत नहीं मिली। इन दिनों में सर्फिंग-चेटिंग...... मेलिंग-कालिंग.....टीवी और मूवीज सब कुछ हो चुका और अब बुरी तरह से ऊब गया हूँ....। अपने कमरे की खिड़की से बाहर की ओर देख रहा था कि माँ ने बताया कि वो बीमार है।
जब मैं उसके कमरे में पहुँचा तो वह सो रही थी, उसकी टेबल पर कबीर की साखी किताब पड़ी हुई थी। मैं चुपचाप कुर्सी पर जाकर बैठ गया। वह गहरी नींद में थी। उसकी आँखों की कोरों से कानों तक सूखे हुए आँसुओं के निशान थे। बहुत धीमी आवाज में गुलाम अली की गज़ल --- सो गया चाँद, बुझ गए तारे, कौन सुनता है ग़म का अफसाना.... चल रही थी। रोते-रोते सोए बच्चे की तरह ही उसने नींद में सिसकारी भरी। यूँ लगता है कि उसके अवचेतन पर कोई गहरी चोट हो....। मैंने वह किताब उठा ली और उसे उलटने पलटने लगा। तभी चाची कमरे में आ गई....अभी उठी नहीं।
हाँ गहरी नींद में है।
उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा तो वह चौंक कर उठ गई।
बेटा देख तुझसे मिलने कौन आया है।-- चाची ने कहा और वे हमारे बीच से सरक गई।
अरे.... कब आए..... मुझे उठाया क्यों नहीं।- उसने बीमार आवाज में पूछा।
तुम तो घोड़े बेचकर सो रही थी, मैंने आवाज भी लगाई, लेकिन तुम उठी ही नहीं।-- मैंने झूठ बोला।---क्या हुआ, क्या प्यार का ओवरडोज हो गया?--मैंने चिढ़ाया।
उसके चेहरे पर बहुत बारीक मुस्कुराहट आई।-- प्यार का कभी भी ओवरडोज नहीं होता, तुम नहीं समझोगे.....।
तभी चाची फिर से कमरे में आ गईं। --बेटा तुम्हारे दूसरे डोज का समय हो गया है।
न...हीं....--उसने बच्चों की तरह ठुनकते हुए कहा।
नहीं बेटा दवा नहीं लोगी तो ठीक कैसे होओगी?
उन्होंने उसके हाथ में पानी और दवाई दे दी और चली गईं। वह बहुत देर तक दवाइयों की तरफ देखती रही। मैंने पूछा कब से बीमार हो?
कल रात को तेज बुखार आया फिर उतर गया, फिर सुबह आया अब ठीक है।
चाची ने मेरे हाथ में चाय का कप और उसे दूध का गिलास थमाया और फिर चली गईं।
अब कैसा लग रहा है?
ठीक हूँ, बल्कि हल्का लग रहा है। --उसने चेहरे पर आए पसीने को पोंछते हुए कहा।-- यू नो बीमार होकर अच्छे होना बिल्कुल वैसा है, जैसे पुनर्जन्म हो....। सब कुछ नया-नया.... अच्छा लगता है।
इस बीमारी ने उसकी आवाज की चंचलता को गुम कर दिया .... ऐसा लग रहा था, जैसे आवाज बहुत अंदर से आ रही हो, ठहरी.... गंभीर और शांत। उसका चेहरा भी एकदम धुला-पुछा और सौम्य लग रहा था। उसने खिड़की की तरफ देखा... तो, क्या करते रहे दो दिन....? बारिश हो रही है घर से बाहर तो जा ही नहीं पाए होगे?
हाँ यार... सब कुछ करके भी समय नहीं कट रहा था।
उसने चिढ़ाया, क्यों....तुम्हारा इंटरनेट और ये वो... क्या काम नहीं कर रहे हैं? खुद से भागने के तो तमाम साधन है.... कम पड़ गए क्या? कभी खुद के पास ही बैठ कर देखो... हमेशा क्या अपने से भागना।--उसने आँखें मूँद ली।
मैं उसे देख रहा था, वो एकाएक बहुत बड़ी-बड़ी सी लगी....। मैं उसे सह नहीं पाया... और कबीर की शरण में हो लिया।
सुनो, तुम मुझे रजनीगंधा के बल्ब ला दोगे...?---उसने आँखें खोलकर पूछा।
रजनीगंधा के बल्ब....! कहाँ मिलेंगे....?
किसी भी नर्सरी में या फिर बीज की दुकान में। मैं चाहती हूँ कि इस सर्दी में घर के हर कोने में रजनीगंधा महके....।
मुझे उसकी आँखों में महकते रजनीगंधा दिखने लगे थे।
क्रमशः

Sunday, 11 October 2009

गुम हो चुकी लड़की




गतांक से आगे....


उस दिन जोर-जोर से आँधी चलने लगी और बादल घुमड़ आए.... मैं दरवाजे-खिड़कियों को बंद करन के लिए बाहर आया तो वह सामने थी.....चलो थोड़ा घूमकर आते हैं....उसने प्रस्ताव दिया।
पागल हो क्या....? मौसम खराब हो रहा है...। --मैंने कहा। तभी पानी बरसने लगा।
लगता है इस बार मानसून जल्दी आ गया है।
तुम पागल हो...यह मानसून नहीं है, यह मावठे की बारिश है। कभी जेठ में मानसून आता है....!
उसे बारिश में भीगते देखा तो मैंने कहा--भीग रही हो अंदर आ जाओ...बीमार हो जाओगी...।
वह हँसी..कोई प्यार से बीमार होता है क्या?
मैंने उसे आश्चर्य से देखा-- प्यार...
हाँ वेबकूफ.... ये आसमान का प्यार है जो बरस रहा है और तुम्हारे जैसे उल्लू घर में दुबके बैठे हैं। चलो घूमकर आते हैं।--- फिर उसकी रट शुरू हो गई।
मैं उसके साथ हो लिया। रास्ते में वह गड्ढों के पानी में छपाक-छपाक कर बच्चों-सी किलकारी मारती रही। बूँदों को दोनों हथेलियों के कटोरों में इकट्ठा कर पानी को मुझ पर उछालती रही। उस वक्त मुझे लगा जैसे वो कोई छोटी बच्ची हो और मैं उसका गार्जियन.... मैं उसे ये और वो करने के लिए मना करता रहा है और वह बच्चों जैसी शैतानी कर हँसती रही.....। मुझे एकाएक अपना होना बड़ा और महत्वपूर्ण लगने लगा। मेरे मन में अज्ञेय के शेखर ने सिर उठा लिया हो जैसे।
कई दिनों से सुन रहे हैं कि इस बार मानसून जल्दी आएगा। बादल तो गहरा रहे थे....लेकिन लगा नहीं था कि इतनी जल्दी बारिश होने लगेगी। अभी रास्ते में ही था कि बारिश आ गई। वो मुझे फिर से सड़क पर भीगती मिली....। मुझे हँसी आ गई। मैं घर पहुँचा तो उसने पूछा चाय पिओगे...?
तुम बनाओगी....
हाँ बढ़िया चाय.... तेज अदरक की तुर्श स्वाद वाली चाय....एक बार पी लोगे तो लाइफ बन जाएगी।
ये कहाँ से लाई....?
बस.... एकरसता बोर करती है, बदलाव करते रहना चाहिए। आ रहे हो....!-- उसने चुटकी बजाकर जैसे ऐसे पूछा जैसे चेतावनी दे रही हो।
मैंने कहा--कपड़े बदल कर आता हूँ।
घर पहुँचा तब तक वह कपड़े बदल चुकी थी। बालों को तौलिये से पोंछते हुए बोली-- बैठो... चाय बनाती हूँ।
मैंने उसे चिढ़ाया--- अभी तक चाय बनी ही नहीं, चाय है या बीरबल की खिचड़ी?
उसने आँखें तरेरी... मैंने भी कपड़े बदले हैं, फिर बाल तुम्हारी तरह थोड़े ही है एक बार पोंछ लो तो बस सूख ही जाएँगें।
मुझे आश्चर्य हुआ हम-दोनों बचपन से साथ-साथ है फिर भी कभी मेरा ध्यान इस ओर क्यों नहीं गया कि उसके बाल खासे खूबसूरत हैं। दरअसल मैंने कभी नहीं पाया कि वह लड़की है और मैं लड़का.... शायद उसने भी कभी नहीं सोचा होगा...तभी तो वह मुझसे इतनी बेझिझक है, एकाएक मैं उसे नजरों से तौलने लगा....और फिर खुद ही अपराध बोध से भर गया। पता नहीं कितनी देर बाद उसने मेरी आँखों के सामने चुटकी बजाकर मुझे सचेत किया।
कहाँ हो....! चाय...।
चाय वाकई अच्छी बनी थी, गले में तेज अदरक का स्वाद उतर रहा था, रहा नहीं गया, तुम तो अच्छी चाय बना लेती हो, सीख रही हो..... बहू-बेटियों के गुण....।-- जानता हूँ कि वह भड़केगी और वही हुआ।
ऐ......आगे से कभी ये कहना नहीं.....।
क्रमशः

Friday, 9 October 2009

गुम हो चुकी लड़की



गतांक से आगे....

देर शाम जब मैं गर्मी से घबरा कर छत पर आया तो उसे देखकर याद आया कि मैं उसे बहुत दिनों बाद देख रहा हूँ। सफेद कुर्ते पर हल्के गुलाबी रंग का दुपट्टा पड़ा हुआ था। अपने बालों को उसने बड़ी बेतरतीबी से उपर बाँध लिया था। उसकी छत की मुँडेर पर फिलिप्स का ट्रांजिस्टर जोर-जोर से मौसम आएगा, जाएगा प्यार सदा मुस्काएगा, गा रहा था। उसकी पीठ मेरी ओर थी और हम दोनों ही आसमान से फिसलते सूरज को देख रहे थे। बहुत देर तक वह यूँ ही खड़ी रही। पता नहीं क्यों मुझे लगा कि वह थोड़ी उदास है, जबकि मैंने उसका चेहरा नहीं देखा था। झुटपुटा उतर आया था। छत पर लगे हुए बिस्तरों पर वह लेट गई और आसमान को देखने लगी..... मैंने जोर से आवाज लगाई- बिल्लो.... और मुँडेर की आड़ में बैठ गया। वह उठकर आई और बहुत थकी हुई आवाज में बोली- मुझे मालूम था तुम ही होगे, तुम क्या कर रहे हो छत पर...?
क्यों मैं छत पर नहीं आ सकता?-- मैंने पूछा।
नहीं तुम्हें तो यह मौसम सड़ा हुआ लगता है ना, तो एसी में बैठो ना.... अभी थोड़ी ना ठंडी हवा चल रही है।
मैंने उसे खुश करने के लिए कहा-- मैंने सोचा क्यों न मैं भी तुम्हारी तरह गर्मी से बातें करूँ।
लेकिन वह और भी उदास हो गई, बोली- तुमसे नहीं होगा। उसके लिए तुम्हें 'मैं' होना पड़ेगा, वो नहीं हो सकता.....एक गहरी निःशब्दता दोनों के बीच की जगह में फैल गई....... अँधेरे में मैं उसे देख नहीं पाया.....फिर वह बुदबुदाई..... होना भी मत....बहुत बुरा है 'मैं' होना।
पता नहीं थोड़े-थोड़े दिनों में वह ऐसी क्यों हो जाती है? कोई दुख जैसा दुख नहीं है उसके जीवन में फिर भी गाहे-ब-गाहे वह उदास हो जाती है। यूँ कोई उसकी उम्र भी नहीं है उदास होने की, लेकिन फिर भी। एक दिन जब वह खुश थी मैंने उससे यूँ ही पूछ लिया था--तुम थोड़े-थोड़े दिनों बाद ऐसी अजीब-सी क्यों हो जाती हो?
वह जोर से खिलखिलाई थी- मैंने कहीं सुना था कि लड़कों को उदास लड़कियाँ रहस्यमयी लगती है, इसलिए वे उन लड़कियों से पट जाते हैं.... लेकिन देखती हूँ तुम्हें तो कोई फर्क ही नहीं पड़ता।
मैं जानता था कि वह मुझे बहला रही है, फिर भी मुझे हँसी आ गई।
क्रमशः

Thursday, 8 October 2009

गुम हो चुकी लड़की


दिसंबर जा रहा था..... वो गुजरते साल का एक और छोटा-सा दिन था...... गुलमोहर के पेड़ के नीचे धूप और छाह से बुने कालीन पर वो मेरे सामने बैठी थी। उसके सिर और कंधों पर धूप के चकते उभर आए थे..... मोरपंखी कुर्ते पर हरा दुपट्टा पड़ा था......कालीन की बुनावट को मुग्ध होकर देखती उस लड़की ने एकाएक सिर उठाया और उल्लास से कहा- बसंत आने वाला है। केसरिया दिन और सतरंगी शामें.....नशीली-नशीली रातें, रून-झुन करती सुबह.... नाजुक फूल..... हरी-सुनहरी और लाल कोंपलें.....ऐसा लगता है, जैसे प्रकृति हमें लोक-गीत सुना रही है।
हल्की सी हवा से उड़कर गुलमोहर के पीले छोटे पत्ते जैसे सिर और बदन पर उतर आए थे। मैंने उसे चिढ़ाया-- और फिर आ जाएगा सड़ा हुआ मौसम.....। उसकी आँखें बुझ गई.....। मैंने फिर से जलाने की कोशिश की.... जलते दिन और बेचैन रातों वाली गर्मी..... न घूम सकते हैं, न सो सकते हैं, न ठीक से खा सकते हैं और न ही अच्छा पहन सकते हैं। बस दिन-पर-दिन जैसे-तैसे काटते रहो....।
उसने प्रतिवाद किया- मुझे पसंद है। नवेली दुल्हन की तरह धीरे-धीरे चलता सूरज..... पश्चिम की ओर मंथर होकर उतरता सूरज, लंबी होती शाम.... बर्फ को गोले....मीठे गाने..... हल्के रंग....दिन की नींद, रातों में छत पर पड़े रहकर तारों से बातें करते हुए जागना....मुझे सब पसंद है।
और उस दिन..... वो बाजार में बसंती रंग का दुपट्टा ढूँढते हुए मिली थी। बसंत पंचमी पर केसरिया और मेहरून रंग के सलवार कुर्ते पर वही खरीदा हुआ दुपट्टा डाले घऱ आई थी। उसके पूरे बदन से बसंत टपक रहा था। माँ ने उसे गले लगाया कितनी सुंदर लग रही है.... मेरी तरफ देखकर मेरी सहमति चाही मैंने भी आँखों से हामी भर दी, लेकिन उसने नहीं देखा।
अपने दोस्तों से मिलकर जब मैं घर लौटा तो वह गली के बच्चों के साथ बर्फ के गोले वाले का ठेला घेरे खड़ी थी। पलटी तो मैं अपनी गाड़ी खड़ी कर रहा था। उसने मुझे देखकर हाथ हिलाया और मुस्कुराई.....गोला मेरी तरफ कर इशारा किया--खाओगे?
मैंने इंकार में सिर हिलाया तो उसने बुरा सा मुँह बना कर ऐसे भाव दिए जैसे गोला नहीं खाया तो मेरा जीना ही बेकार है।
क्रमशः

Monday, 21 September 2009

ब्रूस अल्माइटी और गॉड



तुम्हारे लिए ईश्वर क्या है?
कॉफी के कोको पावडर वाले झाग को चम्मच से सिप करती लड़की से विश्वविद्यालय के कैंटीन में बैठे लड़के ने पूछा।
इस एकाएक पूछ गए प्रश्न ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया। थोड़ी देर सोचने के बाद लड़की ने कहा। --ही इज लाइक पेरेंट टू मी....।
मतलब....?
मतलब जिससे मैं शिकायत कर सकूँ....डिमांड और जिद्द कर सकूँ..... रूठ सकूँ और अपने अभाव बता सकूँ, उन्हे दूर करने की गुजारिश कर सकूँ और अपने दुखड़े कह सकूँ।
बस...?
हाँ।
कॉफी पी चुकने के बाद अपने कप को टेबल पर रखते हुए लड़के ने बहुत सहानुभूति से कहा तुम्हारा ईश्वर तो बहुत बेचारा है। लड़की ने बहुत आहत होकर उसे देखा..... बेचारा क्यों?
बेचारा इसलिए कि तुम और तुम्हारे जैसे अनगिनत लोग उसके साथ वैसा ही कुछ करते होंगे, लेकिन वह बेचारा अपनी पीड़ा किससे कहता होगा?
वह ईश्वर है उसे कोई दुख नहीं होता है।- लड़की ने कप रखकर कुर्सी से उठते हुए कहा।
क्या वह मानवेत्तर है?- लड़के ने उसी गंभीरता से उससे प्रश्न किया।
हाँ वह देवता है।
तो क्या तुम यह कहना चाहती हो कि देवताओं को कोई दुख नहीं होता। दुख वहाँ नहीं होता मैडम, जहाँ कोई मानवीय भावना और संवेदना नहीं होती, और यदि ऐसा होता है तो वह न मानव होता है और न ही देवता.... वह तो.....।-- उसने अपनी बात अधूरी ही रहने दी। फिर कहना शुरू किया कि --- तुम्हारे इंद्र का सिंहासन विश्वामित्र की तपस्या से डगमगाने लगा तो उसने मेनका को विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए भेजा था। यदि हम ये माने तुम्हारे कथित ईश्वर देवता की श्रेणी के हैं तब भी उनके पास सुख-दुख, गर्व-अहंकार, असुरक्षा और तमाम मानवीय कमजोरी और भावनाएँ होंगी, तो फिर वह दुख से कैसे बच सकता है?
फागुन की शाम दोनों सूर्य के डूबने की दिशा की ओर ही बढ़ रहे थे। लड़की गुम हो गई थी डूबते सूरज की निष्कलुष मासूमियत और उदारता में.....। ये लड़की का सबसे पसंदीदा समय है। अपने सूरज से विदा होते दिन की उदासी के स्वागत के लिए वह अपने कमरे की सारी खिडकियों और दरवाजों को खोल देती है, जिससे धीरे-धीरे उदास साँवलापन उसके कमरे में आश्रय पा सके। फिर धीरे-धीरे घना होता अंधेरा..... उसे अच्छा लगता है, क्योंकि उसमें कुछ भी और नहीं होता......बस खुद के होने का अशरीरी अहसास होता है। न दुनिया और न अहसास-ए-दुनिया.....। रोशनी में भटकाव होता है.... अंधेरे में एकाग्रता। वह किसी से भी इन बातों को नहीं कहती क्योंकि उसे डर है कि तमसो मा ज्योतिर्गमय की संस्कृति में अंधेरे के प्रति इस तरह का दर्शन कहीं उसे उपहास का पात्र न बना दे....।
15 साल बाद
एक 'सी' सिटी में वह लड़की अपने घर के सामने ढेर सारे शॉपिंग बैग संभाले कार से उतरी। उस लड़के ने जो कि अब उसका पति है उससे कहा कि बाकी बचे हुए बैग्स मैं ले आऊँगा, तुम जाओ....। अपने घर के ड्राईँग रूम में सारे शॉपिंग बैग्स फैला कर वह लड़की देख रही है। अचानक वह उदास हो गई... क्यों..... उसे लगा कि इतने सारे बैग्स के बीच वह कुछ छोड़ आई है, कुछ उससे छूट गया है, फिसल गया है..... उसे खुद पर अचरज हुआ.... जीवन में जिस चीज को उसने अभाव माना था, वो सब मिट गए हैं, वह वो सब कुछ कर सकती है, जो वह शुरू से करना चाहती थी.... फिर भी सब कुछ वैसा नहीं है जिसकी उसने कभी कल्पना की थी.... फिर....! वो सब कुछ मृग तृष्णा थी....? लगा कि ईश्वर ने देर से ही सही उसकी सारी इच्छाएँ पूरी की, फिर कहाँ क्या रिक्त रह गया.... अब वह और क्या चाहती है? तभी वह लड़का भी अंदर आ गया और उसने फैले बैग्स के साथ कुछ और बैग्स रख दिए। उस लड़की की तरफ प्यार से देखते हुए पूछा....खुश....! उसने अपनी आँखों में आए आँसूओं को छुपाते हुए हाँ में सिर हिला दिया.... समझीं कि लड़के ने नहीं देखे, लेकिन उसने देख लिए थे, क्या हुआ.... उसने हँसते हुए लड़की के सामने अपनी बाँहें फैला दी.....और लड़की उसके सीने में अपना सिर गड़ाकर सिसकियाँ भर कर रोने लगी.....। वह कार्तिक की शाम थी.... दीपावली अब करीब थी और लड़की ने मन भर शॉपिंग की थी। लड़की समझ नहीं पाई कि वह क्यों रोई.... लड़का शायद जानता था कि वह क्यों रोई...?
टीवी पर ब्रूस अल्माइटी फिल्म आ रही थी। ब्रूस एक टीवी रिपोर्टर है और लगातार अपनी असफलता से दुखी है, उसे नौकरी से निकाल जा चुका है और वह निराश है, तभी उसके पेजर पर एक मैसेज आता है कि उसे यदि नौकरी की जरूरत है तो वह इस पते पर मिले....। वह उस जगह पहुँचता है, एक बड़ी सी बिल्डिंग में जहाँ कोई नहीं और कुछ भी नहीं होता है, वहाँ एक सज्जन सफाई करते हुए मिलते हैं। थोड़ी देर बाद... वे उसे बताते हैं कि वे गॉड है ब्रूस को विश्वास नहीं होता, वे उसे कुछ चमत्कार दिखाते हैं, फिर उसे विश्वास होता है।
गॉड उसे अपनी शक्तियाँ देते हैं और कहते हैं कि इनके उपयोग दूसरों की भलाई के लिए ही करना है। शक्तियाँ मिलते ही ब्रूस के सपनों को पंख लग जाते हैं और वह तमाम ऊलजुलूल हरकतें करने लगता है, लेकिन शक्तियाँ मिलते ही एकाएक उसे बहुत सारी आवाजें भी सुनाई देने लगती है। जब वह फिर से गॉड से मिलता है तो वह उन आवाजों का जिक्र करता है। गॉड बताते हैं कि वे सारी रिक्वेस्ट की आवाजें है। और यह पूरी दुनिया से नहीं बल्कि सिर्फ बफेलो स्टेट के ही लोग है। ब्रूस एक सिस्टम बनाता है, जिसके तहत उसे कम्प्यूटर पर सारी रिक्वेस्ट मिलती है। रिक्वेस्ट इतनी ज्यादा होती है कि ब्रूस के पास पढ़ने का धैर्य भी नहीं होता है, इसलिए वह सभी को यस कर देता है।
लड़की को पहली बार 15 साल पहले लड़के द्वारा कही गई बात का मतलब समझ में आता है। ईश्वर बहुत बेचारा है, क्योंकि उसके उपर कोई नहीं है, वह अपनी परेशानी किसी से शेयर नहीं कर सकता है। उसे एकाएक ईश्वर से सहानुभूति होने लगी....। लड़का पूरी तन्मयता से फिल्म देख रहा है और लड़की उसे देखते हुए सोच रही है कि क्या उसे याद है कि कभी उसने मुझसे कहा था कि तुम्हारा ईश्वर बेचारा है।

Tuesday, 15 September 2009

हिंदी दिवसः कसीदा और मर्सिया

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" href="http://www.chitthajagat.in/?claim=l9j35zexakju&ping=http://amitaneerav.blogspot.com/">चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" alt="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagatping.png" border=0>



हिंदी दिवस की बरसी मना ली, (यूँ बरसी का शाब्दिक अर्थ बरस से जुड़ता है, लेकिन हमारी परंपरा में इसक शब्द का उपयोग शुभ के लिए नहीं किया जाता है... और यहाँ इसका प्रयोग उसी प्रतीकात्मकता के साथ हुआ है।), कुछ ने हिंदी की प्रसार और लगातार उसकी अच्छी स्थिति को लेकर कसीदे पढ़े तो कुछ ने बदहाली के लिए मर्सिया पढ़ा.... कहीं सप्ताह तो कहीं पखवाड़े का आयोजन किया जा रहा है..... किसी ने दिन मना कर ही अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली। इस पूरे समय में हिंदी को लेकर अखबारों में लेख और टीवी पर चर्चाएँ सुनी गई....किसी के अनुसार बाजारीकरण ने हिंदी के प्रसार-प्रचार में बड़ी भूमिका निभाई है तो कोई हिंदी के हिंग्लिश होने से खफ़ा है। कुल मिलाकर हर साल जो होता है, इस बार भी वही हुआ... फिर भी हिंदी की राष्ट्रभाषा के तौर पर क्या हैसियत है, इस पर सवाल उठाया जाना जरूरी है क्योंकि सवाल होंगे तो ही तो जवाब होंगे।

एक तरफ हिंदी को बाजार ने हाथोंहाथ लिया है.... इसलिए नहीं कि बाजार को इसकी वैज्ञानिकता से प्यार है या फिर हमारी राष्ट्रभाषा होने से आस्था थी, यह बाजार की मजबूरी है... उसे अपना माल ग्राहकों की भाषा में ही बेचना पड़ेगा, यह कोई हमारी भाषा से मुरव्व़त का मामला नहीं है।

हाँ मनोरंजन के माध्यमों में हिंदी की पकड़ ने जरूरी थोड़ी बहुत आशा जगाई है, लेकिन असल मामला है रोजगार पाने का.... जो भाषा रोजगार दिलाने में सक्षम है, बस वही जीवित रह पाएगी...इसमें हिंदी अंग्रेजी से बहुत पीछे नजर आती है, हिंदी की जरूरत है, लेकिन एक वैकल्पिक भाषा के तौर पर.... अंग्रेजी की जानकारी जरूरी है। अनुभव कहते हैं कि आप कुछ नहीं जानते और सिर्फ अंग्रेजी जानते हैं तो आपके सामने अवसरों का भंडार है, लेकिन यदि आप बहुत कुछ जानते हो और अंग्रेजी नहीं जानते हो तो आपका कुछ भी जानना बेकार है। हिंदी भाषी क्षेत्र में हिंदी के दैनिक अखबार में काम करते हुए भी लगभग हर दिन अंग्रेजी से भिड़ंत होती है, ट्रेनिंग के दौरान हर दिन हिंदी से अंग्रेजी और अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद की मशक्कत यह साबित करती है कि मात्र हिंदी के ज्ञान से ही जीवन की नैया पार नहीं लगाई जा सकती है। इसलिए जरूरत इस बात है कि अब शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी ही कर दिया जाए.... क्योंकि अब मामला सम्प्रेषण से आगे जाकर जीवन-शैली, रहन-सहन और उससे भी उपर समाज की समता और विषमता तक पहुँच गया है, तभी तो मजदूर भी अपने बच्चे को हिंदी में नहीं पढ़ाना चाहता है, क्योंकि वह यह जानता है कि मात्र हिंदी पढ़कर वह बेहतर जिंदगी नहीं जी पाएगा। इसलिए अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा कम-अस-कम इस विषमता को कुछ तो कम किया जा सकेगा और फिर इसमें ही प्रतिभा का आकलन भी हो पाएगा, फिलहाल तो वो प्रतिभाशाली है जो अंग्रेजी बोल पाता है.... आप यकीन करें या ना करें.....!


Sunday, 13 September 2009

खबरों की चिता पर रोटी सेंकते समाचार माध्यम



सूचना क्रांति के इस दौर में समाचार माध्यम संकट से गुजर रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट दोनों के सामने ही अस्तित्व बचाने का संकट खड़ा हुआ है। यह संकट पाठक या दर्शक को उतना नहीं दिखता जितना इस उद्योग के कर्ताओं के समक्ष खुलता है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में यह टीआरपी की शक्ल में और प्रिंट में सर्क्यूलेशन की शक्ल में विद्यमान है। और इस संकट ने इसकी गुणात्मकता को बढ़ाने की बजाय कम कर दिया है। आर्थिक उदारवाद का सिद्धांत तो यह कहता है कि प्रतिस्पर्धा से गुणवत्ता बढ़ती है, लेकिन समाचार माध्यमों में इसका ठीक उलटा हो रहा है और उस पर तुर्रा ये कि कहा ये जा रहा है कि पाठक और दर्शक आजकल यही पसंद करते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक में 24 घंटे नई खबरें देने का और प्रिंट में ताजी खबरें देने के संकट के बीच प्रिंट में दोहरी मुश्किल है, एक अपनों के ही बीच में प्रतिद्वंद्विता और दूसरा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से प्रतिस्पर्धा... दोनों ही स्तर पर खुद को स्थापित करना और फिर बनाए रखना एक दुश्कर टास्क बनता जा रहा है। पाठक फिलहाल तो बस न्यूज और व्यूवज का फर्क ही समझता है और यदि आम पाठक की बात करें तो वह तो बेचारा अखबारों की मैनुपिलेटेड दुनिया को ही सच समझता है। इन दिनों चूँकि अखबार ताजा खबरें दे पाने की चुनौतियों से लड़ रहे हैं, ऐसे में न्यूज और व्यूवज के बीच एक और चीज पनपी है जिसे स्टोरी कहते हैं..... अब पाठकों की समझ में यह नहीं आता कि ये स्टोरी क्या बला है, लेकिन हाँ पत्रकार जानता है कि ये स्टोरी क्या कमाल की चीज है। ये स्टोरी एक पत्रकार को फर्श से उठाकर अर्श तक पहुँचा देती है। ये खबर के एंगेल को बदलती है और फिर इसमें उससे जुड़े विशेषज्ञों से कुछ सनसनीखेज जानकारी ली जाती है और तैयार हो जाती है स्टोरी...। न इसके कुछ आगे सोचने की जरूरत है और न ही पीछे.... दरअसल दिनों-दिन समाचार माध्यमों की दुनिया भयावह होती जा रही है, इसमें कोई सोच, कोई जिम्मेदारी, कोई दूरदृष्टि नजर नहीं आती.... गलाकाट स्पर्धा के दौर में यदि नजर आती हो तो मात्र किसी भी तरह से आगे निकलने की हड़बड़ी..... व्यक्तिगत भी और संस्थागत भी.....और इसके लिए आसान और शॉर्टकट है सनसनी फैलाना...... स्वाइन फ्लू के ही मामले को ले लिजिए...., जितने लोग इस बीमारी से अब तक मरे उससे ज्यादा लोग एक दिन में सड़क दुर्घटना में मर जाते हैं....फिर अभी अखबारों और टीवी चैनलों के लिए यह एक ऐसा मुद्दा था, जिसे कई दिनों तक भुनाया गया। फिर अखबारों के लिए इतना ही काफी नहीं था इसमें बर्ड फ्लू और भी न जाने कौन-कौन से फ्लू का तड़का लगाया और तैयार हो गई एक सनसनाती अखबारी रैसिपी....इसके लिए पत्रकार को ज्यादा कुछ नहीं करना पड़ता.... किसी डॉक्टर से इस सिलसिले का एक बयान दो और छाप दो... अखबार में इसके लिए उसे क्रेडिट भी मिलेगा... ना तो वह पत्रकार यह सोचेगा कि इसका इम्पैक्ट क्या होगा और न ही इसके इम्पैक्ट पर चयन प्रक्रिया में विचार किया जाएगा। इसका परिणाम... बीमारी से दहशत.....क्योंकि आज भी दूरदराज का पाठक इस दुनिया से दूर है और वह इसकी सच्चाई पर विश्वास करेगा। स्वाइन फ्लू से पहले मुम्बई हमलों के दौरान भी टीवी चैनलों ने जिस तरह का कवरेज दिखाया था, उसने हमारे इलक्ट्रॉनिक मीडिया की जिम्मेदारी और भूमिका पर सवाल उठाए थे...। सवाल यह है कि इस माध्यम में आए अधकचरी समझ और गैर-गंभीर लोग इसे कितना समृद्ध कर पाएँगें। फिर इस क्षेत्र में आने वाले नौजवानों से बात करें तो समझ में आएगा कि क्यों जर्नलिज्म का स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है। सारे नए लोग इस क्षेत्र में इसलिए आना चाहते हैं, क्योंकि यहाँ पॉवर है....कॉटेक्टस हैं... ग्लैमर है.... बस.... न इससे ज्यादा की उनको जरूरत है और ही कुछ इससे ज्यादा सोचना है। तो अब इस सबमें खबरें कहाँ है? यहाँ खबरों की चिता है और उसपर सिंकती मीडिया की रोटियाँ है। खबरों से तथ्यपरकता तो न जाने कहाँ चली गई और इसमें आ गया एंगेल..... अभी तक ये बीमारी सिर्फ इतिहास लेखन तक ही सीमित थी अब इसने समाचार माध्यम को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है। कभी-कभी तो समझ में नहीं आता कि इस माध्यम में काम करने वाले नए लोग ऑब्जेक्टिवीटी और सब्जेक्टिवीटी में फर्क भी समझते हैं या नहीं?

Monday, 7 September 2009

मैंने जो संग तराशा वो खुदा हो बैठा



इन दिनों अखबार में और ई-पेपर में दोनों ही जगह राशिफल देखा जा रहा है...... अस्थिर मानसिक स्थिति में अमूमन यही होता है... इन दिनों भी... यह पता होने के बाद भी कि कभी भी ये सच नहीं हुई..... कम-अस-कम शुभ होने की सूचना तो बिल्कुल भी नहीं.... फिर भी देखी जा रही है..... क्यों? हम खुद से उपर किसी को चाहते हैं .... कि अपनी असफलता, दुख, कमी या अभाव का ठीकरा उसके सिर फोड़ सके.... उसे भाग्य कह लें, ईश्वर कह लें या फिर बहुत वैज्ञानिक होकर परिस्थिति......।
एक बार फिर से भगवतीचरण वर्मा की चित्रलेखा सामने है और लगभग तीसरी दफा पढ़ रही हूँ.... हर बार कोई नया अर्थ मिलता है.... इस बार फिर से.... इसी में कहा गया है कि जिस ईश्वर की हम पूजा करते हैं, उसे हमीं ने बनाया है। इसी तरह की बात कामू की किताब रिबेल में पढ़ी थी---The conception of GOD is the only thing for which man can not be forgiven. दरअसल ईश्वर की हमें जरूरत है, इसलिए वह है.... एक बार पहले भी शायद मैंने लिखा था कि जब तक एक भी सवाल जिंदा है ईश्वर का होना जिंदा है....।
इस तरह से हम 'उसके' होने को कम नहीं कर रहे हैं, महत्व को बढ़ा रहे हैं। इसे प्रतीकात्मक तौर पर हम प्रतिमा के निर्माण और फिर उसके विसर्जन से भी समझ सकते हैं। गणपति की प्रतिमा या फिर दुर्गा प्रतिमा का मिट्टी से निर्माण, स्थापना, प्रतिष्ठा और फिर विसर्जन के पीछे वही सच काम करता है जिसे कामू ने शेख सादी के हवाले से कोट किया है, लेकिन क्या इतना ही...? हमें अपनी असफलता के लिए ही नहीं अपनी खुशी के लिए भी ईश्वर के विचार की जरूरत है। क्योंकि उस विचार की धूरी के आसपास ही सब कुछ घूमता है..... आनंद भी....। तभी तो मार्क्स ने धर्म को अफीम कहा है... जिसके नशे में हैव्स नॉट अपनी सारी दुख तकलीफों को भूल जाता है.... कभी देखें गणपति के जुलूस या नीचली बस्ती में हो रहे नवरात्र उत्सव को.....उन झूमकर नाचते गाते लोगों के शरीर अभावों की चुगली करेंगे लेकिन चेहरों से टपकता उल्लास उस सबको झूठ साबित कर देगा....तो भौतिक चीजें झूठ है और आनंद ही सबसे बड़ा सच है.... एक बार फिर से ब्रह्म सत्य और जगत मिथ्या....? ये शंकर के दर्शन का अति साधारणीकरण हो सकता है, लेकिन हम स्थूल दुनिया के बाशिंदे तो दर्शन को ऐसे ही समझ सकते हैं.... नहीं ये मजाक नहीं है। दरअसल हर कीमत और हर हाल में परमानंद ही सच है... फिर वो प्रार्थना से मिले या फिर शराब से....लेकिन फिर पाप-पुण्य.... अरे भई यही तो चित्रलेखा भी नहीं समझ पाई.... ना श्वेतांक, न विशालदेव और न ही महाप्रभु रत्नांबर तो फिर हम-तुम किस.....?

Tuesday, 1 September 2009

जीना इसी का नाम है



फिर से एक मुश्किल दौर... हरदम भागना.... हर पल को पकड़ कर निचोड़ लेने की बेकार और असफल-सी कोशिश... पता नहीं किस बात की जल्दी... कभी-कभी ये किसी मानसिक समस्या का लक्ष्ण लगता है। हर क्षण को अर्थपूर्ण बनाने के चक्कर में लगातार खुद से दूर...। किसी काम को करने से क्या मिलेगा जैसा प्रश्न हमेशा उठता है (नहीं ये मिलना भौतिक नहीं है, इसलिए ज्यादा घबराने की वजह भी नजर नहीं आती)। कुछ भी हल्का-फुल्का नहीं चाहिए... गहरा विचार, गंभीर लेखन, डूबोने वाला संगीत, गहरी नींद....गहरी अनुभूतियों से पगे पल(जबकि अनुभूतियों तक पहुँचने के लिए धीरज की जरूरत होती है। इस तरह की दौड़ तो झड़ी लगी बारिश की तरह है जो होती तो बहुत तेज है, लेकिन जब पानी ठहरता ही नहीं है तो फिर उतरेगा कैसे? गहरे उतरने के लिए तो उसका रिसना जरूरी है, और इसके लिए बादलों का धीमे-धीमे झरना.... फिर...?) हर पल कुछ ना कुछ करना..... सुनना, सोचना, लिखना, पढ़ना, काम करना, नौकरी करना, सोना....लेकिन इन सबमें हम कहाँ है? हम सबकुछ में खो रहे हैं। घड़ी की सुई पकड़े धीरे-धीरे सरक रहे हैं और समय को हाथ से छूटते देख रहे हैं....महसूस नहीं कर पा रहे है, कभी रूककर समय के सरकने और खुद के बहने को महसूस करने की फुर्सत नहीं पाते या ऐसा करना ही नहीं चाहते, क्योंकि कहीं पढ़ा था कि --- इनर हमेशा इन्टॉलरेबल होता है.....। तो क्या खुद से भागकर कुछ पाया जा सकता है? हाँ बहुत कुछ.... बल्कि यूँ कहे कि खुद से भाग कर ही पाया जा सकता है, जो चाहो....यदि याददाश्त ठीक है तो युंग ने कहा था कि दुनिया का सारा सृजन खुद से भागने की प्रक्रिया है, या फिर शायद ये मेरा ही ईजाद किया सूत्र है, लेकिन ये हमेशा सही लगता है। फिर खुद के पास रहने की इस तड़प का क्या मतलब है? क्या ये पलायन है या फिर तमाम अर्थहीनता की तीखी चेतना.... स्थूल और सुक्ष्म दुनिया में बारी-बारी से डूबने-तैरने का दौर.... भौतिकता और आध्यात्मिकता की साझी भूख.... अंदर और बाहर को भरने और जानने के बीच संतुलन को साधने का प्रयास...जिंदा रहने और जीने के बीच की खूबसूरत संगत.....! शायद जीना इसी का नाम है।
---------------------------------------------------------------------------------------------
इसी छीजते जाते जीवन में किसी गहरी अनुभूति के पल में फिर से सूत्र के मोती हाथ आए हैं।
# एक ही समय में कई सच होते हैं, जो एक-दूसरे के विपरीत होते हैं।
# रोना भी सृजन करना ही है।
# सौन्दर्य हमेशा दुर्गम होता है।
# जीवन के हर क्षेत्र में चढ़ाव मुश्किल और ढ़लान आसान होती है।