उस सुबह, जबकि थोड़ी फुर्सत थी और मन खुला हुआ, यूँ ही पूछ लिया – क्या तुम्हारे बचपन में संघर्ष थे।
संघर्ष... नहीं... किस तरह के...?
मतलब स्कूल पहुँचने के लिए लंबा चलना पड़ा हो या फिर रोडवेज की बस से स्कूल जाना पड़ा हो या लालटेन की रोशनी में पढ़ना पड़ा हो! – मैंने स्पष्ट किया।
हाँ, जब बच्चे थे, तब रोडवेज की बसों से स्कूल जाया करते थे, बाद में जब बड़े हुए तो साइकल से जाने लगे। लेकिन इसमें संघर्ष कहाँ से आया? ये तो मजेदार था।
तुम्हारा स्कूल कितना दूर था? यही कोई सात-आठ किमी... तो इतनी दूर साइकल चला कर जाते थे। - आखिर मैंने संघर्ष का सूत्र ढूँढ ही लिया।
ऊँ...ह तो क्या? दोस्तों के साथ साइकल चलाते हुए मजे से स्कूल पहुँचते थे और लौटते हुए मस्ती करते, रास्ते में पड़ती नदी में नहाते, बेर, इमली, शहतूत, अमरूद तोड़ते खाते घर लौटते थे। वो तो पूरी मस्ती थी।
तो फिर बचपन के संघर्ष कैसे हुआ करते हैं? – ये सवाल पूछ तो नहीं पाई, लेकिन बस अटक गया।
ननिहाल में जबकि सारे बच्चे गर्मियों में इकट्ठा हुआ करते थे, पानी की बड़ी किल्लत हुआ करती थी। १०-१२ फुट गहरा गड्ढा खोदकर पाइप लाइन खोली जाती, एक व्यक्ति वहाँ से पानी भरता और उपर खड़े व्यक्ति को देता, वो टंकी के आधे रास्ते तक पहुँचाता वहाँ से दूसरा उसे थाम लेता, ओलंपिक की मशाल की तरह, फिर वो उस व्यक्ति के हाथ में थमाता जो जरा हाईटेड टंकी के पास एक स्टूल पर पानी डालने के लिए खड़ा हुआ करता था। हर सुबह जल्दी उठकर पानी भरने के इस यज्ञ में हरेक बच्चा अपनी समिधा देने के लिए तत्पर... इसके उलट माँ के घर पर पाइप यहाँ से वहाँ किया और पानी भर लिया जाता था, जब कुछ किया ही नहीं जाए तो फिर मजा किस चीज में आए...!
पापा बताते रहे हैं, हमेशा से अपने स्कूल के दिनों के बारे में। लाइट नहीं हुआ करती थी, उन दिनों तो या तो कभी रात में स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर पढ़ते थे या फिर मोमबत्ती या लालटेन की रोशनी में। स्कूल की फीस वैसे तो ज्यादा नहीं थी, लेकिन वो जमा करना भी भारी हुआ करता था सो फीस माफ कराने के लिए चक्कर लगाते थे। कहीं होजयरी की फेक्टरी में जाकर बुनाई कर पैसा कमाते थे।
उन दिनों भी कबड्डी , खो-खो, टेबल-टेनिस खेलते थे, तैराकी करते थे और दोस्तों के साथ सारे मजे करते थे। उनके बचपन के किस्सों को याद करते हुए लगता है कि ये कैसे मान लिया था - कि असुविधा में इंसान खुश नहीं रह सकता है? वे जब बताते थे कि किस तरह वे आधी-आधी रात तक दोस्तों के साथ आवारागर्दी किया करते थे, भाँग खाने के उनके क्या अनुभव थे। कॉलेज के एन्यूएल फंक्शन से लेकर गर्मियों की रातें और दिन में सारा-सारा दिन नदी में तैरना...। बताते हुए कैसे उनकी आँखें चमकती हैं, लगता है जैसे वो कहते हुए अपना बचपन रिकलेक्ट कर रहे हैं। और हम कैसी हसरत से उनके बचपन को विजुवलाइज करते रहते हैं।
.... और हमारा बचपन.... पानी-बिजली की इफरात, कपड़ों की कोई कमी नहीं। फीस की चिंता क्या होती है, पता नहीं। पढ़ने के लिए किताबें तो ठीक, ट्यूशन टीचर तक की व्यवस्था थी (चाहे लक्ष्य किसी की मदद करना रहा हो)। स्कूल सारे पाँच सौ कदमों से लेकर आठ सौ कदम के फासले पर हुआ करते थे। च्च... कोई संघर्ष, कोई अभाव, कोई असुविधा नहीं। कॉलेज तक यही स्थिति बनी रही। हाँ यूनिवर्सिटी जरूर घर से ९-१० किमी दूर थी। शुरुआत में टेम्पो से ही आया-जाया करते थे... याद आता है लौटते हुए अक्सर दोस्तों के साथ ठिलवई करते हुए आधे से ज्यादा रास्ता पैदल ही तय किया जाता था, जब तक कि ज्यादातर दोस्तों के घर आ जाया करते थे, तो क्या वो संघर्ष था!
बाद के सालों में जब कभी बारिश की रातों में बिजली गुल हुआ करती थी, तब जरूरत न होने पर भी मोमबत्ती या फिर लालटेन की रोशनी में पढ़ा करती थी, आज सोचती हूँ क्यों? शायद ये सोचकर कि हम भी अपने बचपन में संघर्ष के कुछ दिन `इंसर्ट` करके देखें। सच में बड़ा अच्छा लगता था, लगता था कि पापा के स्ट्रीट लाइट की रोशनी में पढ़ने के ‘संघर्ष’ में कुछ हिस्सा हमने भी बँटा लिया...। हालाँकि ऐसा कुल जमा ४-६ बार ही हुआ होगा।
अरे हाँ याद आया। एक बार सिंहस्थ के दौरान शहर में पानी की किल्लत हुई… घर में लगे नगरनिगम के नलों से पानी आना बंद हो गया। मोहल्लों के बोरिंगों से कनेक्शन लेकर पानी की सप्लाई की जाती, उसका भी समय तय और परिवार का हरेक सदस्य अपनी-अपनी क्षमता से बर्तन लेकर लाइन में हाजिर... हँसी-ठिठौली करते, कभी-कभी झगड़ते हुए भी पानी लेकर आना, लगता कि कुछ महत्त किया जा रहा है, किया गया। तो फिर बात वही.... क्या असुविधा संघर्ष है! और क्या सुविधा में ही सुख है...!
Wednesday, 23 May 2012
Monday, 21 May 2012
Sunday, 13 May 2012
.... यहाँ सबके सर पे सलीब है
एक संघर्ष चल रहा है या फिर ... ये चलता ही रहता है, लगातार हम सबके भीतर... मेरे-आपके। इसका कोई सिद्धांत नहीं, कोई असहमति नहीं, कोई समर्थक नहीं, कोई विरोधी नहीं। कोई दोस्त नहीं, कोई दुश्मन भी नहीं। मेरे औऱ मेरे होने के बीच या फिर मेरे चाहने और न कर पाने के बीच। अपने आदर्श और अपने यथार्थ के बीच, बस संघर्ष है, सतत, निःशब्द, गहरा, त्रासद... न जाने कितने युगों से चलता है, चल रहा है, चलेगा। न इसमें कभी कोई जीतेगा और न ही कोई हारेगा। ये युद्ध भी नहीं है, जिसका परिणाम हो, ये बस संघर्ष है, बेवजह, बेसबब, लक्ष्यहीन, इसीलिए इससे निजात नहीं है। ये संघर्ष है आदिम और सभ्य मान्यताओं के बीच, ख्वाहिशों और मर्यादाओं के बीच...। हर मोड़ पर खड़ा होता है, हर वक्त एक चुनौती है, हर वक्त इस संघर्ष से बचा ले जाने का संघर्ष है। यूँ ही-सा एक विचार आता है – ‘हम वस्तु हो जाने के लिए ... एक विशिष्ट ढाँचे में ढ़लने के लिए अभिशप्त है।’ सार्त्र जागते हैं, लेकिन कोई हल वो भी नहीं दे पाते हैं। पता नहीं क्यों लगता तो ये है कि ये संघर्ष हरेक का नसीब है, लेकिन कोई इस तरह लड़ता, लहूलुहान होता नजर नहीं आता...! तो क्या मैं आती हूँ?
क्या कोई ये जान पाता है, कोई कभी ये जान पाएगा कि लगातार हँसते-मुस्कुराते, सँवरते-चमकते से मानवीय ढाँचे के भीतर कोई संग्राम लड़ा जा रहा है, अनंत काल से और लड़ा जाता रहेगा अनंत काल तक...। आप चाहें तो कह सकते हैं, हवा में तलवार घुमाने जैसा कोई जुमला, लेकिन यहाँ तलवार भी कहाँ है। बस एक रणक्षेत्र है और दोनों ओर लहूलुहान होती ईकाईयाँ... भौतिक नहीं है, दिखायी नहीं देती, इसलिए न सहानुभूति है और न ही करूणा। बस अनुभूत होती है, उसे ही जिसके भीतर ये लड़ा जा रहा है। चाहे कोई कितना भी अपना हो, उस पीड़ा तक नहीं पहुँच पाता जो होती है, जो साक्षात टीसती है, रिसती है। शायद इसीलिए कहा जाता है कि दुख को समझना अलग बात है और दुख को महसूस करना अलग। मेरा दुख मेरा और तुम्हारा दुख, तुम्हारा है। तुम्हारे और मेरे दुख के बीच कोई संवाद नहीं है, कोई पगडंडी नहीं है, कोई सेतु, कोई सिरा नहीं है। तुम्हें मेरे दुख और उससे उत्पन्न दर्द का अंदाजा नहीं हो सकता है, ठीक वैसे ही तुम्हारी पीड़ा की कोई बूँद मुझ तक पहुँच नहीं पाती।
कोई किसी के रण का भागीदार हो भी कैसे सकता है, कोई भी एक वक्त में दो-दो संघर्ष का हिस्सेदार कैसे हो सकता है... उम्मीद भी क्यों हो – मैं किसे कहूँ मेरे साथ चल/ यहाँ सबके सर पे सलीब है।
.... और हरेक को अपनी-अपनी सलीब खुद ही ढोनी पड़ती है :-c
Saturday, 28 April 2012
यादों के फूल...
तू समझती क्यों नहीं, पूरी दुनिया से लड़ता-भिड़ता रहता हूँ, बस तेरे ही सामने घुटनों के बल होता हूँ। - आखिरकार उसने बहुत हताशा में भर कर लड़की से कहा था। लड़की ने उसके सिर पर हाथ घुमा कर उसके बालों को बिखेर दिया और मुस्कुरा दी। वो जानती तो है, लेकिन मानती नहीं है। लड़की को उसका तू कहना बहुत भाता है, उसे लगता है जैसे वो उस लड़के का ही विस्तार है... जब कभी लड़का गुस्से में उसे तुम कहता है तो उसे लगता है कि लड़के ने उसे काट दिया है खुद से...।
लड़की बिना वजह लड़ती रहती है... ये लड़के को लगता है, लेकिन लड़की को लगता है कि हमेशा वही वजह होता है झगड़े की... वो तो कितनी लीस्ट डिमांडिग है... उसकी तो कोई डिमांड ही नहीं है। बस हर वक्त मुस्कुराते रहो इतना ही तो चाहती है, लेकिन लड़का हर वक्त झगड़ता है, कभी कुछ तो कभी कुछ। फिर जब उसे गुस्सा आता है तो वो इतना कुछ कहता है कि लड़की एकदम चुप हो जाती है। दोनों दो सिरों पर हैं एक बेहद गुस्सैल और दूसरी बेहद संवेदनशील...। बस हर दिन एक डर के साथ शुरू होता है, पता नहीं आज किस बात पर झगड़ेंगे दोनों... झगड़ते हैं, लेकिन रहते भी साथ ही हैं।
लड़का कहता है तुम्हारे साथ मैं हर जगह यादों के बीज डाल देना चाहता हूँ। जब कभी हम या फिर तुम मेरे बिना इन जगहों पर आओ तो तुम्हें यादों के फूल खिले हुए नजर आए, तभी तो लायब्रेरी की सीढ़ियों पर हग करता है और फ्लैट की लिफ्ट को बीच में रोककर स्मूच...। दोस्तों के बीच आँखें बचाकर कमर में चिकोटी काट देता है तो मम्मी-पापा के सामने दुस्साहस करते हुए आय लव यू कह जाता है। कैंपस में पगडंडियों पर उसे उठा लेता है... कभी कैंटीन में गिरे उसके रूमाल को चूम लेता है तो कभी उसके छोड़े कॉफी मग को उसी तरफ से सिप करता है, जहाँ से लड़की ने किया था।
वो लड़की से बार-बार पूछता है ‘शादी करेगी मुझसे!’ और लड़की हर बार मुस्कुरा देती है। एक रात लड़की को ये सपना आता है कि वो उससे बहुत डरते हुए पूछ रही है ‘शादी करेगा मुझसे!’ सपना सुनकर लड़का बहुत देर तक खिलखिलाता है और फिर उसे बाँहों में लेकर चूम लेता है।
आज पता नहीं लड़के को कैसा फील हो रहा है, लड़की की रिसर्च की एप्लीकेशन मंजूर हो गई है और उसे रिसर्च के लिए यूके जाना है। लड़का उदास भी है और खुश भी। वो जानता है कि लड़की कुछ करना चाहती है, लेकिन वो ये नहीं जान पाता है कि लड़की गहरी दुविधा में है। वो लड़के से कहती है, - मैं सोचती हूँ कि रिसर्च का विचार ही मुझे छोड़ देना चाहिए। लेकिन लड़का जानता है, उसके सपने हैं, महत्वाकांक्षा है। लड़का कहता है उससे – ‘मैं तुम्हें प्यार करता हूँ तुम्हारे जीवन में हर्डल नहीं बनूँगा, तुम्हारे जीवन का आकाश बना रहूँगा..., जिसमें तुम्हें उड़ने की पूरी सुविधा होगी।’
लड़की चिढ़ाती है – ‘यदि भटक गई तो...!’
लड़का कहता है – ‘भटक कर कहाँ जाओगी... अपने आकाश में ही रहोगी।’
लड़की की आँखें भर आती है। वो तय करती है कि अपने आकाश को निराश नहीं करेगी, उड़ती रहेगी उसमें ही ताउम्र। देर रात तक दोनों सेलिब्रेट करते हैं और पार्टी मनाते हैं, लड़की कहती है उसे थोड़ी-सी ‘पीनी’ है। लड़का हँसता है, ठीक है आज तू पी... मैं तुझे संभालूँगा। वो नहीं पीता, इसलिए नहीं कि वो पीने के बाद लड़की को नहीं संभाल सकता है, बल्कि इसलिए कि पीने के बाद लड़की के सामने भावुक न हो जाए।
लड़की के जाने के दिन जैसे-जैसे करीब आ रहे थे, लड़के की उदासी बढ़ने लग गई थी। जाने के एक दिन पहले लड़की उससे मिलना चाहती थी, उसे हग करना चाहती थी। दिन भर वो उसे फोन लगाती रही मैसेज करती रही लेकिन लड़के का फोन या तो बंद मिला या फिर उसने उठाया ही नहीं। उसने लड़की के मैसेज का भी जवाब नहीं दिया। लड़की दिन भर रूआँसी-रूआँसी रही। उसकी यादों की संदूक पर उपेक्षा का ताला मुँह चिढ़ाता रहा। उसे एक भयानक खयाल आया – ‘ये प्लेन क्रेश हो जाए और वो मर जाए तो उसे ये जरूर महसूस होगा कि जाने वाले की ऐसी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए।’
फिर खुद ही शर्मिंदा हुई, कि ये वो क्या सोच रही है!
लड़की बिना वजह लड़ती रहती है... ये लड़के को लगता है, लेकिन लड़की को लगता है कि हमेशा वही वजह होता है झगड़े की... वो तो कितनी लीस्ट डिमांडिग है... उसकी तो कोई डिमांड ही नहीं है। बस हर वक्त मुस्कुराते रहो इतना ही तो चाहती है, लेकिन लड़का हर वक्त झगड़ता है, कभी कुछ तो कभी कुछ। फिर जब उसे गुस्सा आता है तो वो इतना कुछ कहता है कि लड़की एकदम चुप हो जाती है। दोनों दो सिरों पर हैं एक बेहद गुस्सैल और दूसरी बेहद संवेदनशील...। बस हर दिन एक डर के साथ शुरू होता है, पता नहीं आज किस बात पर झगड़ेंगे दोनों... झगड़ते हैं, लेकिन रहते भी साथ ही हैं।
लड़का कहता है तुम्हारे साथ मैं हर जगह यादों के बीज डाल देना चाहता हूँ। जब कभी हम या फिर तुम मेरे बिना इन जगहों पर आओ तो तुम्हें यादों के फूल खिले हुए नजर आए, तभी तो लायब्रेरी की सीढ़ियों पर हग करता है और फ्लैट की लिफ्ट को बीच में रोककर स्मूच...। दोस्तों के बीच आँखें बचाकर कमर में चिकोटी काट देता है तो मम्मी-पापा के सामने दुस्साहस करते हुए आय लव यू कह जाता है। कैंपस में पगडंडियों पर उसे उठा लेता है... कभी कैंटीन में गिरे उसके रूमाल को चूम लेता है तो कभी उसके छोड़े कॉफी मग को उसी तरफ से सिप करता है, जहाँ से लड़की ने किया था।
वो लड़की से बार-बार पूछता है ‘शादी करेगी मुझसे!’ और लड़की हर बार मुस्कुरा देती है। एक रात लड़की को ये सपना आता है कि वो उससे बहुत डरते हुए पूछ रही है ‘शादी करेगा मुझसे!’ सपना सुनकर लड़का बहुत देर तक खिलखिलाता है और फिर उसे बाँहों में लेकर चूम लेता है।
आज पता नहीं लड़के को कैसा फील हो रहा है, लड़की की रिसर्च की एप्लीकेशन मंजूर हो गई है और उसे रिसर्च के लिए यूके जाना है। लड़का उदास भी है और खुश भी। वो जानता है कि लड़की कुछ करना चाहती है, लेकिन वो ये नहीं जान पाता है कि लड़की गहरी दुविधा में है। वो लड़के से कहती है, - मैं सोचती हूँ कि रिसर्च का विचार ही मुझे छोड़ देना चाहिए। लेकिन लड़का जानता है, उसके सपने हैं, महत्वाकांक्षा है। लड़का कहता है उससे – ‘मैं तुम्हें प्यार करता हूँ तुम्हारे जीवन में हर्डल नहीं बनूँगा, तुम्हारे जीवन का आकाश बना रहूँगा..., जिसमें तुम्हें उड़ने की पूरी सुविधा होगी।’
लड़की चिढ़ाती है – ‘यदि भटक गई तो...!’
लड़का कहता है – ‘भटक कर कहाँ जाओगी... अपने आकाश में ही रहोगी।’
लड़की की आँखें भर आती है। वो तय करती है कि अपने आकाश को निराश नहीं करेगी, उड़ती रहेगी उसमें ही ताउम्र। देर रात तक दोनों सेलिब्रेट करते हैं और पार्टी मनाते हैं, लड़की कहती है उसे थोड़ी-सी ‘पीनी’ है। लड़का हँसता है, ठीक है आज तू पी... मैं तुझे संभालूँगा। वो नहीं पीता, इसलिए नहीं कि वो पीने के बाद लड़की को नहीं संभाल सकता है, बल्कि इसलिए कि पीने के बाद लड़की के सामने भावुक न हो जाए।
लड़की के जाने के दिन जैसे-जैसे करीब आ रहे थे, लड़के की उदासी बढ़ने लग गई थी। जाने के एक दिन पहले लड़की उससे मिलना चाहती थी, उसे हग करना चाहती थी। दिन भर वो उसे फोन लगाती रही मैसेज करती रही लेकिन लड़के का फोन या तो बंद मिला या फिर उसने उठाया ही नहीं। उसने लड़की के मैसेज का भी जवाब नहीं दिया। लड़की दिन भर रूआँसी-रूआँसी रही। उसकी यादों की संदूक पर उपेक्षा का ताला मुँह चिढ़ाता रहा। उसे एक भयानक खयाल आया – ‘ये प्लेन क्रेश हो जाए और वो मर जाए तो उसे ये जरूर महसूस होगा कि जाने वाले की ऐसी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए।’
फिर खुद ही शर्मिंदा हुई, कि ये वो क्या सोच रही है!
Wednesday, 25 April 2012
यादों की रहगुज़र, रहगुज़र-सी यादें
साल भर में यही कुछ दिन हुआ करते हैं, जब वो खुद हो जाती है... वरना तो अंदर से बाहर की तरफ तनी रस्सी पर नट-करतब करते हुए ही दिन और जिंदगी गुजर रही होती है। कभी संतुलन बिगड़ जाता है, गिरती है, दर्द-तंज सहती है, असफल होती है और फिर उठकर करतब दिखाने लगती है। कभी-कभी सोचती है, क्या सबको यही करना होता है। क्या अंदर-बाहर के बीच हरेक के जीवन में इतनी ही दूरी हुआ करती है? हरेक को उसे इसी तरह पाटना होता है...? या ये उसी का अज़ाब है...! उसे अक्सर लगता है कि खुद को ही अच्छे से नहीं जाना जा सकता है तो हम दूसरों को कैसे जान सकते हैं? और कैसे, किसी के प्रति जजमेंटल हो जाया करते हैं? आखिर हम किसी की मानसिक और भावनात्मक बुनावट को कितना जानते है? इंसान तो अपने परिवेश में ही घड़ा जाता है ना...! हम उसकी जरूरत और परिवेश पर विचार किए बिना ही, उसे सही-गलत कैसे ठहरा सकते हैं...?
दो स्तरों पर लगातार विचार चल रहे थे... पता नहीं कमरा कैसा होगा? इंटरनेट पर बुकिंग करवाने पर यही होता है... गाड़ी ने बाहर छोड़ दिया था... कुली ने जब लगेज उठाया तो असीम ने उसे पहियों पर खींचने के लिए हैंडल खोलकर दे दिया...। चढ़ाव पर लगेज की गड़घड़ की तेज आवाज के बीच सारे विचार अटक गए। जैसे ही लगेज की गड़घड़ आवाज रूकी, गहरी शांति फैल गई...। जब कमरे में पहुँचे तो पूर्व की तरफ खुलती बड़ी-सी खिड़की से धूप की रोशनी में धुँधलाते पहाड़ नजर आए... सारी कुशंकाएँ भी धुँधला गई। अटेंडर ने पानी रखा, असीम ने चाय लाने के लिए कहा तो वो चला गया। असीम ने सूटकेस खोलकर कपड़े निकाले और बाथरूम चला गया। वो कमरे में अकेली हो गई। तेज साँस खींची... जैसे उस शांति को भीतर भर लेना चाहती हो। खिड़की के पास रखी कुर्सी पर जाकर बैठ गई। इतनी शांति पता नहीं कितने सालों से नहीं मिली उसे... जब बाहर सबकुछ शांत होता है, तब भीतर अशांति चलती है, बाहर-भीतर शांति हो... ये कभी-कभी ही तो होता है।
इस बार फिर से घूमने के लिए मसूरी इसलिए ही तो चुना है, कि घूमने की हवस ना हो... यहाँ का चप्पा-चप्पा देखा हुआ है। पिछली बार आए थे, तब भी लगभग हफ्ते भर यहाँ रहे थे, इस बार भी इतना ही लंबा टूर है। शांति से रहने, पढ़ने, महसूस करने और खुद से संवाद करने का लक्ष्य लेकर ही तो दोनों यहाँ आए हैं। और उसके लिए इससे बेहतर और कौन-सी जगह होगी...।
चाय बनाने, खाना-नाश्ता, लांड्रीवाला, माली, सब्जीवाला, मैकेनिक, बाथरूम का टपकता नल, बदरंग हुए जा रहे पर्दे... गर्द जमी हुई टेबल और अस्त-व्यस्त किताबों को व्यवस्थित करने का अटका पड़ा काम... म्यूजिक सिस्टम को ठीक करवाना और इंटरनेट कनेक्शन का बंद हो जाना... बूटिक से कपड़े उठाना और गाड़ी में फ्यूज डलवाने जैसे सारे रूटीन से भरकर ही तो यहाँ आए हैं। अपनी दुनिया न हो तो दुनियादारी भी वैसी नहीं होती है। सोचा तो था कि बस दिन भर कमरे में ही रहेंगे... लेकिन पहले दिन उसे साध नहीं पाए...। लगा कि पहले उस सबको रिकलेक्ट कर लिया जाए जो पिछली बार यहाँ छूट गया था। दिन भर दोनों उन निशानों को इकट्ठा करने में लगे रहे जो पिछली बार जगह-जगह छोड़े थे, छूट गए थे। यहाँ कॉफी पिया करते थे, और यहाँ से सॉफ्टी लिया करते थे...। यहाँ की फोटो है और यहाँ के एकांत में... तुम्हें पता है... यहाँ पहले कुछ दुकानें हुआ करती थी। हाँ और ये एंटीक की दुकान... तब भी वैसी ही थी... जरा भी नहीं बदली। और यहाँ से आडू खरीदा करते थे, याद है हमने पहली बार जाना था कि असल में आडू का स्वाद कैसा होता है! मैदानों में हम तक जो पहुँचते हैं, वो तो बस फल ही है... स्वाद तो यहाँ के आडुओं में हुआ करता है। और लीची का शर्बत... कितनी खूबसूरत बॉटल में मिलता था! यहाँ तुम थककर रो पड़ी थी और यहाँ हमने झगड़ा किया था...। और फिर मनाने के लिए चॉकलेट खरीदी थी यहाँ से... । यहाँ मेंहदी बनवाई थी... कितनी स्मृतियाँ हैं यहाँ हर जगह बिखरी हुई...। उसे लगा कि ये भी रिलेक्स होने का एक तरीका है।
देर रात जब थककर कमरे पर पहुँचे थे तो जैसे 10 साल पुरानी स्मृतियों को जिंदाकर लौटे थे। ठंड बढ़ गई थी, मोटे ब्लैंकेट और फिर उस पर रजाई... इतना वजन कि सारे बदन को आराम महसूस होने लगा। आखिर दिन भर चल-चलकर ही तो बीते हुए दिनों को इकट्ठा किया था। असीम तो थककर सो गए थे, लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी। अँधेरा और शांति... शांति इतनी कि उससे सन्नाटे को दहशत होने लगे... स्मृतियों से ध्वनियाँ चुन-चुनकर लाता रहा मन... ना तो कुत्तों के भौंकने की आवाज थी और ना ही झींगुर की... इतनी गाढ़ी शांति में उसे साँस लेना भी गुनाह लग रहा था, यूँ लग रहा था जैसे ये जादू, जिसके लिए वो लगातार तरसती रही है टूट जाएगा, भंग हो जाएगा...। उसी जादू में उसे नींद आ गई। असीम की बड़बड़ से उसकी नींद खुली थी – यार इतनी रात लाईट जलाकर क्या कर रही हो...?
उसने आँखें खोली तो खिड़की से तेज रोशनी आ रही थी... – जरा उठकर देखो, खुद सूरज तुम्हारे कमरे में आकर जल रहा है...। – उसने असीम को गुदगुदाकर कहा।
ओह... क्या टाईम हुआ होगा...! – कहकर असीम ने टेबल पर से घड़ी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि उसने असीम का हाथ खींच लिया। - सूरज निकल आया है... क्या ये कम है!
पता है, इस कमरे में इस बड़ी-सी खिड़की के अलावा और सबसे खूबसूरत क्या है...?
खुद कमरा...
ऊँ हू... इसमें घड़ी नहीं है...। – खुलकर हँसी थी वो... असीम लपका था, उसकी तरफ। वो जानता था कि उसने ये क्यों कहा था।
छोड़ दो सब... मोबाइल, घड़ी, लैपटॉप, दिन-रात का खयाल... बस घुलने ही आए हैं, हम यहाँ... - हवाघर की बेंच पर बैठी थी... भुट्टा खाते हुए... - और हाँ महँगा-सस्ता भी... – और शरारत से मुस्कुराई थी।
कभी खुद की बुद्धि को विश्राम देकर, दूसरों की नीयत पर भी विश्वास किया करो... दुनिया का हर आदमी घात लगाकर तुम्हारी प्रतीक्षा नहीं कर रहा है।
हर वक्त खुद को लादे हुए घूमती हो, थक नहीं जाती हो...! मुक्त करो खुद को... आजाद हो जाओ... किसी दिन बुद्धिमान और खूबसूरत नहीं लगोगी तो आसमान टूटकर गिर नहीं जाएगा...।
हाहाहा... आसमान तो है ही नहीं... टूटकर गिरेगा क्या खाक...!
है कैसे नहीं... सिर उठाकर देखो, तुम्हारे दुपट्टे के रंग का है... । –असीम ने दुपट्टे के कोने को अपनी ऊँगलियों में लपेट लिया था।
ये मैंने नहीं कहा है, तुम्हारा साईंस ही कहता है।
तुम्हें क्या दिखता है? जरा आसमान की तरफ सिर उठाकर देखो... साईंस को छोड़ो
मुझे दिखता है आसमान, मेरे दुपट्टे के रंग का... जिस पर बादल है, तुम्हारी शर्ट के रंग के...
तो बस... वो है... पता है तथ्य जीवन को जटिल बना देते हैं...।
तथ्य या फिर सत्य...!
नहीं... तथ्य... सत्य तो कुछ है ही नहीं।
दिन-पर-दिन गुजर गए... सुबह, दोपहर, शाम और रात... दुनिया और दुनियादारी से दूर... भटकाव, अपेक्षा, उलझन, दबाव और तमाम जद्दोजहद से दूर पंछी की तरह उन्मुक्त दिन उड़ गए, हवा हो गए। अब... अब लौटना है... कोई भी वक्त चाहे अच्छा हो या बुरा, लंबा टिक जाता है तो रूटीन हो जाता है। घर लौटने की कल्पना भी उत्साह भर रही थी। हरिद्वार से ही रिजर्वेशन है... एक दिन पहले ही दोपहर वहाँ पहुँच गए थे।
बहती हुई गंगा को छुए बिना कैसे लौटा जा सकता है!
बहती नदी जादू होती है
बहाकर लाती है ना जाने क्या-क्या
ले जाती है ना जाने क्या-क्या
माना कि बहना ही जीवन है
लेकिन
नदी-सा बहना
खुशी भी है और
त्रास भी...
क्योंकि बहना चुनाव हो तो
ठीक
अगर मजबूरी हो तो...?
तो... तो... त्रास, देखो गंगा को, लोग अपनी आस्था के जुनून में क्या-क्या बहाते जा रहे हैं। संध्या-आरती का समय था, हर की पौड़ी पर आरती के लिए मजमा इकट्ठा था। बाकी घाटों पर लोग एक दोने में फूल और दीया लेकर गंगा में प्रवाहित कर रहे थे... क्या ये सारा कूड़ा नहीं है?
असीम ने आँखों से डपटा था – तुम आस्था पर सवाल कर रही हो...!
मैं सिर्फ जानना चाह रही हूँ।
हाँ ये भी कूड़ा है। - असीम ने गंगा के ठंडे पानी में पैर डालते हुए कहा था
तो क्या किसी को ये जरा भी खयाल नहीं आता है कि कितना साफ पानी बह रहा है और उसमें ये कूड़ा क्यों बहाया जा रहा है? क्या सरकारें भी नहीं सोचती...! – गहरी वितृष्णा से भरकर उसने कहा था।
तुम फिर से तर्क पर आ रही हो...
ये तर्क है...? ये आस्था है, सौंदर्य-बोध है... छोड़ों।
दोनों अलग-अलग किनारों पर जा बैठे थे। असीम कैमरे से आसपास को खंगाल रहा था। वो बस बैठी थी... तेज लहरों को एकटक देखते हुए...। धारा का वेग उसकी चेतना को भी बहा ले जा रहा था। वो अचानक खड़ी हुई... घाट की पहली सीढ़ी पर पैर रखा... फिर दूसरी... फिर तीसरी... लहरों ने उसे कमर तक भिगो दिया था उसने बेखयाली में जंजीर को छोड़कर चौथी सीढ़ी की तरफ कदम बढ़ाया ही था कि खयाल लौट आया – ये क्या कर रही थी तू...?
उसने जंजीर पकड़कर आसपास नजरें दौड़ाई, असीम थोड़ी दूर जाकर फोटो ले रहा था... कोई भी उसकी तरफ नहीं देख रहा था। यदि ये बेखयाली और नीचे की सीढ़ियों की तरफ ले जाती तो...! उसे खुद से ही वहशत होने लगी...। वो लौट आई थी अपनी चेतना में... यदि भीतर का ये आवेग लहरों के हवाले कर देता उसे तो...! यदि वो बह जाती तो निश्चित ही कहीं दूर उसकी लाश मिलती... या शायद वो भी नहीं... क्योंकि बहाव तो क्रूर होता है... निर्मम भी...। उसने अपनी दुनिया में नजरें दौड़ाई... उसके न होने से किसकी दुनिया में फर्क आता... सबकी दुनिया भरी-पूरी है... सिवाय असीम के... सिर्फ असीम की दुनिया ही सूनी होती... उसे अचानक असीम पर लाड़ आया। वो अब भी पहली सीढ़ी पर खड़ी थी। असीम लौट आया था... चलें, सुबह जल्दी उठना है।
उसने झुककर अंजुरी में गंगा को भरा और अपने सिरपर उँढेल लिया...। ऐसा आवेग कभी आता नहीं है, उसने हाथ जोड़े तो ना जाने क्यों आँसू उमड़ आए... पलट कर चप्पल पहनी और असीम का हाथ थामे हुए भीड़ में से रास्ता बनाते दोनों लौट आए...।
दो स्तरों पर लगातार विचार चल रहे थे... पता नहीं कमरा कैसा होगा? इंटरनेट पर बुकिंग करवाने पर यही होता है... गाड़ी ने बाहर छोड़ दिया था... कुली ने जब लगेज उठाया तो असीम ने उसे पहियों पर खींचने के लिए हैंडल खोलकर दे दिया...। चढ़ाव पर लगेज की गड़घड़ की तेज आवाज के बीच सारे विचार अटक गए। जैसे ही लगेज की गड़घड़ आवाज रूकी, गहरी शांति फैल गई...। जब कमरे में पहुँचे तो पूर्व की तरफ खुलती बड़ी-सी खिड़की से धूप की रोशनी में धुँधलाते पहाड़ नजर आए... सारी कुशंकाएँ भी धुँधला गई। अटेंडर ने पानी रखा, असीम ने चाय लाने के लिए कहा तो वो चला गया। असीम ने सूटकेस खोलकर कपड़े निकाले और बाथरूम चला गया। वो कमरे में अकेली हो गई। तेज साँस खींची... जैसे उस शांति को भीतर भर लेना चाहती हो। खिड़की के पास रखी कुर्सी पर जाकर बैठ गई। इतनी शांति पता नहीं कितने सालों से नहीं मिली उसे... जब बाहर सबकुछ शांत होता है, तब भीतर अशांति चलती है, बाहर-भीतर शांति हो... ये कभी-कभी ही तो होता है।
इस बार फिर से घूमने के लिए मसूरी इसलिए ही तो चुना है, कि घूमने की हवस ना हो... यहाँ का चप्पा-चप्पा देखा हुआ है। पिछली बार आए थे, तब भी लगभग हफ्ते भर यहाँ रहे थे, इस बार भी इतना ही लंबा टूर है। शांति से रहने, पढ़ने, महसूस करने और खुद से संवाद करने का लक्ष्य लेकर ही तो दोनों यहाँ आए हैं। और उसके लिए इससे बेहतर और कौन-सी जगह होगी...।
चाय बनाने, खाना-नाश्ता, लांड्रीवाला, माली, सब्जीवाला, मैकेनिक, बाथरूम का टपकता नल, बदरंग हुए जा रहे पर्दे... गर्द जमी हुई टेबल और अस्त-व्यस्त किताबों को व्यवस्थित करने का अटका पड़ा काम... म्यूजिक सिस्टम को ठीक करवाना और इंटरनेट कनेक्शन का बंद हो जाना... बूटिक से कपड़े उठाना और गाड़ी में फ्यूज डलवाने जैसे सारे रूटीन से भरकर ही तो यहाँ आए हैं। अपनी दुनिया न हो तो दुनियादारी भी वैसी नहीं होती है। सोचा तो था कि बस दिन भर कमरे में ही रहेंगे... लेकिन पहले दिन उसे साध नहीं पाए...। लगा कि पहले उस सबको रिकलेक्ट कर लिया जाए जो पिछली बार यहाँ छूट गया था। दिन भर दोनों उन निशानों को इकट्ठा करने में लगे रहे जो पिछली बार जगह-जगह छोड़े थे, छूट गए थे। यहाँ कॉफी पिया करते थे, और यहाँ से सॉफ्टी लिया करते थे...। यहाँ की फोटो है और यहाँ के एकांत में... तुम्हें पता है... यहाँ पहले कुछ दुकानें हुआ करती थी। हाँ और ये एंटीक की दुकान... तब भी वैसी ही थी... जरा भी नहीं बदली। और यहाँ से आडू खरीदा करते थे, याद है हमने पहली बार जाना था कि असल में आडू का स्वाद कैसा होता है! मैदानों में हम तक जो पहुँचते हैं, वो तो बस फल ही है... स्वाद तो यहाँ के आडुओं में हुआ करता है। और लीची का शर्बत... कितनी खूबसूरत बॉटल में मिलता था! यहाँ तुम थककर रो पड़ी थी और यहाँ हमने झगड़ा किया था...। और फिर मनाने के लिए चॉकलेट खरीदी थी यहाँ से... । यहाँ मेंहदी बनवाई थी... कितनी स्मृतियाँ हैं यहाँ हर जगह बिखरी हुई...। उसे लगा कि ये भी रिलेक्स होने का एक तरीका है।
देर रात जब थककर कमरे पर पहुँचे थे तो जैसे 10 साल पुरानी स्मृतियों को जिंदाकर लौटे थे। ठंड बढ़ गई थी, मोटे ब्लैंकेट और फिर उस पर रजाई... इतना वजन कि सारे बदन को आराम महसूस होने लगा। आखिर दिन भर चल-चलकर ही तो बीते हुए दिनों को इकट्ठा किया था। असीम तो थककर सो गए थे, लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी। अँधेरा और शांति... शांति इतनी कि उससे सन्नाटे को दहशत होने लगे... स्मृतियों से ध्वनियाँ चुन-चुनकर लाता रहा मन... ना तो कुत्तों के भौंकने की आवाज थी और ना ही झींगुर की... इतनी गाढ़ी शांति में उसे साँस लेना भी गुनाह लग रहा था, यूँ लग रहा था जैसे ये जादू, जिसके लिए वो लगातार तरसती रही है टूट जाएगा, भंग हो जाएगा...। उसी जादू में उसे नींद आ गई। असीम की बड़बड़ से उसकी नींद खुली थी – यार इतनी रात लाईट जलाकर क्या कर रही हो...?
उसने आँखें खोली तो खिड़की से तेज रोशनी आ रही थी... – जरा उठकर देखो, खुद सूरज तुम्हारे कमरे में आकर जल रहा है...। – उसने असीम को गुदगुदाकर कहा।
ओह... क्या टाईम हुआ होगा...! – कहकर असीम ने टेबल पर से घड़ी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि उसने असीम का हाथ खींच लिया। - सूरज निकल आया है... क्या ये कम है!
पता है, इस कमरे में इस बड़ी-सी खिड़की के अलावा और सबसे खूबसूरत क्या है...?
खुद कमरा...
ऊँ हू... इसमें घड़ी नहीं है...। – खुलकर हँसी थी वो... असीम लपका था, उसकी तरफ। वो जानता था कि उसने ये क्यों कहा था।
छोड़ दो सब... मोबाइल, घड़ी, लैपटॉप, दिन-रात का खयाल... बस घुलने ही आए हैं, हम यहाँ... - हवाघर की बेंच पर बैठी थी... भुट्टा खाते हुए... - और हाँ महँगा-सस्ता भी... – और शरारत से मुस्कुराई थी।
कभी खुद की बुद्धि को विश्राम देकर, दूसरों की नीयत पर भी विश्वास किया करो... दुनिया का हर आदमी घात लगाकर तुम्हारी प्रतीक्षा नहीं कर रहा है।
हर वक्त खुद को लादे हुए घूमती हो, थक नहीं जाती हो...! मुक्त करो खुद को... आजाद हो जाओ... किसी दिन बुद्धिमान और खूबसूरत नहीं लगोगी तो आसमान टूटकर गिर नहीं जाएगा...।
हाहाहा... आसमान तो है ही नहीं... टूटकर गिरेगा क्या खाक...!
है कैसे नहीं... सिर उठाकर देखो, तुम्हारे दुपट्टे के रंग का है... । –असीम ने दुपट्टे के कोने को अपनी ऊँगलियों में लपेट लिया था।
ये मैंने नहीं कहा है, तुम्हारा साईंस ही कहता है।
तुम्हें क्या दिखता है? जरा आसमान की तरफ सिर उठाकर देखो... साईंस को छोड़ो
मुझे दिखता है आसमान, मेरे दुपट्टे के रंग का... जिस पर बादल है, तुम्हारी शर्ट के रंग के...
तो बस... वो है... पता है तथ्य जीवन को जटिल बना देते हैं...।
तथ्य या फिर सत्य...!
नहीं... तथ्य... सत्य तो कुछ है ही नहीं।
दिन-पर-दिन गुजर गए... सुबह, दोपहर, शाम और रात... दुनिया और दुनियादारी से दूर... भटकाव, अपेक्षा, उलझन, दबाव और तमाम जद्दोजहद से दूर पंछी की तरह उन्मुक्त दिन उड़ गए, हवा हो गए। अब... अब लौटना है... कोई भी वक्त चाहे अच्छा हो या बुरा, लंबा टिक जाता है तो रूटीन हो जाता है। घर लौटने की कल्पना भी उत्साह भर रही थी। हरिद्वार से ही रिजर्वेशन है... एक दिन पहले ही दोपहर वहाँ पहुँच गए थे।
बहती हुई गंगा को छुए बिना कैसे लौटा जा सकता है!
बहती नदी जादू होती है
बहाकर लाती है ना जाने क्या-क्या
ले जाती है ना जाने क्या-क्या
माना कि बहना ही जीवन है
लेकिन
नदी-सा बहना
खुशी भी है और
त्रास भी...
क्योंकि बहना चुनाव हो तो
ठीक
अगर मजबूरी हो तो...?
तो... तो... त्रास, देखो गंगा को, लोग अपनी आस्था के जुनून में क्या-क्या बहाते जा रहे हैं। संध्या-आरती का समय था, हर की पौड़ी पर आरती के लिए मजमा इकट्ठा था। बाकी घाटों पर लोग एक दोने में फूल और दीया लेकर गंगा में प्रवाहित कर रहे थे... क्या ये सारा कूड़ा नहीं है?
असीम ने आँखों से डपटा था – तुम आस्था पर सवाल कर रही हो...!
मैं सिर्फ जानना चाह रही हूँ।
हाँ ये भी कूड़ा है। - असीम ने गंगा के ठंडे पानी में पैर डालते हुए कहा था
तो क्या किसी को ये जरा भी खयाल नहीं आता है कि कितना साफ पानी बह रहा है और उसमें ये कूड़ा क्यों बहाया जा रहा है? क्या सरकारें भी नहीं सोचती...! – गहरी वितृष्णा से भरकर उसने कहा था।
तुम फिर से तर्क पर आ रही हो...
ये तर्क है...? ये आस्था है, सौंदर्य-बोध है... छोड़ों।
दोनों अलग-अलग किनारों पर जा बैठे थे। असीम कैमरे से आसपास को खंगाल रहा था। वो बस बैठी थी... तेज लहरों को एकटक देखते हुए...। धारा का वेग उसकी चेतना को भी बहा ले जा रहा था। वो अचानक खड़ी हुई... घाट की पहली सीढ़ी पर पैर रखा... फिर दूसरी... फिर तीसरी... लहरों ने उसे कमर तक भिगो दिया था उसने बेखयाली में जंजीर को छोड़कर चौथी सीढ़ी की तरफ कदम बढ़ाया ही था कि खयाल लौट आया – ये क्या कर रही थी तू...?
उसने जंजीर पकड़कर आसपास नजरें दौड़ाई, असीम थोड़ी दूर जाकर फोटो ले रहा था... कोई भी उसकी तरफ नहीं देख रहा था। यदि ये बेखयाली और नीचे की सीढ़ियों की तरफ ले जाती तो...! उसे खुद से ही वहशत होने लगी...। वो लौट आई थी अपनी चेतना में... यदि भीतर का ये आवेग लहरों के हवाले कर देता उसे तो...! यदि वो बह जाती तो निश्चित ही कहीं दूर उसकी लाश मिलती... या शायद वो भी नहीं... क्योंकि बहाव तो क्रूर होता है... निर्मम भी...। उसने अपनी दुनिया में नजरें दौड़ाई... उसके न होने से किसकी दुनिया में फर्क आता... सबकी दुनिया भरी-पूरी है... सिवाय असीम के... सिर्फ असीम की दुनिया ही सूनी होती... उसे अचानक असीम पर लाड़ आया। वो अब भी पहली सीढ़ी पर खड़ी थी। असीम लौट आया था... चलें, सुबह जल्दी उठना है।
उसने झुककर अंजुरी में गंगा को भरा और अपने सिरपर उँढेल लिया...। ऐसा आवेग कभी आता नहीं है, उसने हाथ जोड़े तो ना जाने क्यों आँसू उमड़ आए... पलट कर चप्पल पहनी और असीम का हाथ थामे हुए भीड़ में से रास्ता बनाते दोनों लौट आए...।
Saturday, 14 April 2012
उम्र की नोटबुक
साफ़-शफ्फ़ाफ़
कोरे-करारे सफ़ों की
नोटबुक-सी है उम्र
हर पन्ने पर
जिंदगी करती चलती है
हिसाब
सुख-दुख, झूठ-सच
सही-गलत, मान-अपमान
नैतिक-अनैतिक, सफलता-असफलता
और ना जाने किस-किसी चीज का
लिखती जाती है
सफ़ों-पर-सफ़े
करती जाती है खत्म
उम्र को जैसे
और भरी हुई नोटबुक
अख़्तियार कर लेती है
एक दिन
शक्ल रद्दी की...
Saturday, 7 April 2012
कई मायनों में इंसान से बेहतर है जानवर....
सुबह जल्दी उठ पाओ तो दिन कितना संभावनाओं भरा हो जाता है... कोई टुकड़ा अपने लिए भी बचाया जा सकता है, किसी में सपने भरे जा सकते हैं और किसी हिस्से को बस यूँ ही हवाओं में उड़ाया भी जा सकता है... उस सुबह का वो ऐसा ही खास समय था। अखबार आस-पास सरसरा रहे थे, लेकिन विचार शून्यता की ही-सी स्थिति थी। निर्विकार भाव से आँखें हरेक चीज का जायजा ले रही थी, लेकिन इसमें न तो कुछ पा लेने की जल्दी थी न कुछ ठीक करना था और न ही कोई उद्विग्नता थी.... चाय के कप, अभी-अभी पढ़कर छोड़े पन्ने-पन्ने रखे हुए अखबार... खुली हुई चादरें, टेबल पर नई सीडी के रैपर, मुँह खोले पड़ा लैपटॉप और रात को पढ़ते-पढ़ते उल्टी कर रख छोड़ी किताब सिरहाने पड़ी थी। खिड़की से रोशनी आ रही थी और अलस्सुबह की हल्की ठंडक भी... हर चीज जैसे उसी जगह के लिए बनी हुई थी। इस वक्त ना तो किसी तरह की कोई हड़बड़ी थी, न आगे की योजना थी, वक्त जैसे हवा में उड़ाने के लिए ही बचा हुआ था। यूँ ही विचार तंद्रा की तरह थे कि खिड़की की फ्रेम पर गिलहरी उछल-कूद करती नजर आई। तंद्रा भंग हो गई... नजरें टिक गईं। बँटने के लिए ही तो रोशनी और दिन हुआ करता है। अचानक वो कूलर पर नजर आई। उसके मुँह में कपड़े का छोटा-सा टुकड़ा था, जिसे वो कूलर के अंदर डालने की कोशिश कर रही थी। करीब 40-45 सेकंड तक वो उस कोशिश में लगी रही... उसी दौरान एक और गिलहरी वहाँ आ गई। फिर दोनों बाहर की तरफ से उस कपड़े को अंदर ठेलने की कोशिश करती रहीं... ये क्रम भी 10-12 सेकंड तक चलता रहा। जो गिलहरी कपड़ा लेकर आई थी, वो अचानक उस कपड़े और दूसरी गिलहरी को छोड़कर चली गई। शायद दोनों इस बात से मुत्तमईन हो गई थीं कि कपड़ा अटक गया है और अब गिरेगा नहीं... कितने कौशल से दोनों ने उस कपड़े को अटका दिया था। बहुत कौतूहल था उन गिलहरियों की गतिविधियाँ को लेकर, एकबारगी ये विचार आया कि क्यों नहीं इसे कैमरे से शूट कर लिया जाए...! लेकिन कुछ सोचकर इस विचार को स्थगित कर दिया और नजरें पूरी तरह से वहीं गड़ा दी...। दूसरी गिलहरी और थोड़ी देर तक कपड़े को अंदर डालने की कोशिश करती रही... फिर एकाएक वो कूलर के अंदर घुस गई और उसने अंदर से उस कपड़े को खींच लिया... मैं हतप्रभ... कितनी योजना, कितना सामंजस्य... कितनी समझ, कितना प्यार... और कितनी बुद्धि। विचारों के प्रवाह को जैसे एक झटका लगा था। बचपन में ही सुना था कि इंसान और जानवर के बीच का एकमात्र फर्क ये है कि इंसान के पास बुद्धि होती है, कहा किसी बड़े ने था सो मानना ही था...। मान लिया, भूल गए कि बारिश से पहले चींटियाँ अपना खाना जमा करती है, क्यों ऐसा होता है जिस रास्ते से घुस कर बिल्ली को खाने-पीने के लिए मिलता है, वो बार-बार उसी रास्ते का इस्तेमाल करती है। भूल गए कि हमारे बुजुर्गों ने अपने जीवन के कई सारे अनुभव जीव-जंतुओं के व्यवहार से ही वेरीफाई किए हैं। जानवरों के व्यवहार का अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं ने 1958 में जापान के एक द्वीप पर एक मादा बंदर को आलूओं को धोकर खाते देखा था, बाद के सालों में उन्होंने ये पाया कि वहाँ के बंदरों की अगली पीढ़ी के बच्चों ने भी इसी पद्धति को अपनाया... तो क्या मादा बंदर का नवाचार उसकी बुद्धि का पता नहीं देता है? और क्या उसका अनुसरण जंतुओं में बुद्धि का पता नहीं देती है... ! याद आता है माँ का कहा कि काली चींटी काटती नहीं है। इसलिए बहुत बचपन में दोनों हाथों की पहली ऊँगलियों औऱ अंगूठों को जोड़कर काली चींटी के इर्दगिर्द पाननुमा घेरा बना लेते... वो लगातार घेरे से निकलने का रास्ता ढूँढती रहती, कई बार वो हाथ पर चढ़ भी जाती है। कभी इस खेल को आगे बढ़ाने के लिए जरा सा रास्ता निकालते तो वो खट से उससे बाहर निकलने की जुगत लगा लेती... तो फिर ये कैसे कहा जा सकता है कि जीव-जंतुओं के पास बुद्धि नहीं होती...? बाद में अलग-अलग अनुसंधानों ने भी ये सिद्ध किया कि जीव-जंतुओं में भी बुद्धि होती है, प्यार, संवेदना, समझ, अपनापन सब कुछ होता है...। भाषा भी होती है, अब ये हमारे ज्ञान की सीमा है कि हम ना तो उनकी भाषा समझ पाते हैं और न हीं उनके बीच के आपसी संबंधों को...। तो फिर हम कैसे कह सकते हैं कि हम इंसानों के पास कुछ ऐसा है जो अतिरिक्त है... जैसे बुद्धि...! लेकिन सही है, कुछ तो है जो इंसानों के पास प्रकृति की हर सजीव देन से ज्यादा है... जाहिर है, तभी विकास भी है, विनाश भी और असंतुलन भी...। दरअसल इंसान के पास नकारात्मक बुद्धि है। हवस, ईर्ष्या, हिंसा, क्रोध, द्वेष, स्वार्थ और लालच जिसके स्वभाव का हिस्सा है, और जो अपनी हवस और अहम की पूर्ति के लिए प्रकृति, जीव-जंतुओं और अपने सहोदरों को बेवजह भी नुकसान पहुँचाता है। तो जो कुछ विकास-विनाश, प्रसार-फैलाव है, जो इस लालच और हवस की ही देन है, तो हुआ ना इंसान ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति...:-(
Saturday, 31 March 2012
पिद्दी से हम... !
गर्मी बस शुरू हुई ही है, लेकिन लगता है जैसे देरी की सारी कोर-कसर पूरी कर लेगी। घर-दफ्तर का तनाव, गर्मी, रात की टूटी-फूटी, अधूरी-सी नींद से जो होना था, वो हुआ... माइग्रेन...। कामवाली काम छोड़ गई तो दर्द को सहलाने की लक्जरी की न तो सहूलियत थी और न ही गुंजाईश... काम निबटाकर टीवी के सामने आसन जमाकर खाना-खाने बैठे तो हाल ही में खोजे मूवी चैनल पर फिल्म चल रही थी, नोईंग...। फिल्म का नायक जोनाथन अपनी एस्ट्रोफिजिक्स की क्लास में थ्योरी ऑफ डेटरमिनिज्म एंड थ्योरी ऑफ रेनडमनेस की चर्चा कर रहा था। थ्योरी ऑफ डेटरमिनिज्म से मतलब है कि हरेक चीज तयशुदा है, और इसलिए हर चीज का कोई-न-कोई मतलब है। इसके उलट है थ्योरी ऑफ रेनडमनेस... इसके अनुसार किसी भी चीज का कोई मतलब नहीं है और ये सृष्टि पूरी तरह से इत्तफाक पर चल रही है। आँखें दर्द और टीवी की बदलती रोशनी से तन रही थी, लगातार सो जाने की इच्छा होने लगी थी, लेकिन फिल्म की शुरुआत ही इतनी शानदार लगी कि फिल्म छोड़कर सो जाने का विचार ही बुरा लगा था। आखिर तो फिल्म की शुरुआत में ही हमारी मुठभेड़ एक सिद्धांत, एक विचार से हुई है और बस इसीलिए तो पूरी दुनिया के कार्य-व्यापार में लगे रहते हैं... लेकिन हमारा शरीर हमारी इच्छाओं का गुलाम नहीं होता है, तो बड़े बेमन से ये सोचते हुई वहाँ से उठ खड़े हुए कि जब फिल्म की शुरुआत में ही ‘कुछ’ मिल गया है तो फिर मलाल किस बात का...! दर्द था, थोड़ी नींद और थोड़ी जाग्रति भी थी... कुल मिलाकर मस्तिष्क का कोई हिस्सा चैतन्य था...। वहाँ रोशन थी वो रात जब ना तो एस्ट्रोफिजिक्स था ना फिजिक्स का पी ही था, बस था तो एक अनगढ़-सा विचार... एक सवाल और बहुत सारी उद्विग्नता...। यदि हमारा होना तयशुदा है तो फिर हमसे जुड़ी हर चीज तय है... फिर हमारे करने, होने का मतलब ही नहीं है कुछ...। और यदि हम इत्तफाक से हैं तब भी हम क्या है? बस महज एक इत्तफाक... । जरा दूर से देखें तो लगता है कि सृष्टि के इस विराट में हमारी हस्ती ही क्या है...? महासागर में एक बूँद-सी... तो क्या बूँद और क्या उसका वजूद...। ये महासागर अनंतकाल से है और अनंतकाल तक रहेगा, उसमें हमारा आना और जाना ठीक वैसा है, जैसा किसी एक फूल का खिलना और फिर सूखकर बिखर जाना... अनगिनत बूँदों में एक का होना न होना... कोई फर्क पड़ता है, यदि न हो तो... ! यदि सृष्टि के विकास-क्रम की दृष्टि से देखें तो शायद इतना भी नहीं... तो फिर हमें हमारा सब-कुछ इतना बड़ा क्यों लगने लगता है... ? क्या वाकई हम इतने ही हैं...! यदि हम इतने ही है तो फिर हमारा पूरा जीवन क्या है... क्या है हमारे संघर्ष-उपलब्धि, दुख-सुख, रिश्ते-नाते, जीवन-मृत्यु, उदात्तता-क्षुद्रता, प्यार-नफरत, ... क्या है, क्यों हैं और इनके होने का अर्थ क्या है? या तो ये सब इत्तफाक है या फिर ये बेवजह है...। दोनों ही स्थितियों में हमारे ‘स्व’ का अर्थ क्या होगा...? यदि ये इत्तफाक है तो फिर हम खुद भी इत्तफाक हैं और इत्तफाक की अपनी सत्ता क्या है? वो तो बस इत्तफाक से ही है ना... फिर हमारे होने के गुरूर की कोई वजह होनी ही नहीं चाहिए... और यदि ये बेवजह है तो फिर हमारा वजूद ही बेवजह है... तो इससे जुड़ी हर चीज बेवजह है। तो फिर ये स्वत्व-बोध तक बेवजह है... फिर कैसे इंसानी सुख-दुख सृष्टि से उपर, उससे भारी हो जाते है...? और क्यों...? शायद हममें उस विराट संरचना को देख पाने की काबिलियत, लियाकत ही नहीं है, इसीलिए हम अपने दुख-सुख में ही डूबे रहते हैं, या फिर चूँकि हममें ये कूव्वत नहीं है, इसलिए इन्हीं में डूबे रहना हमारे लिए श्रेयस्कर है... ! हम इतने ही हैं, सृष्टि की संरचना में होना ही महज हमारा एक योगदान है, हम इसमें न कुछ जोड़ते हैं और न ही कम कर सकते हैं। यही निराशा है, यही हमारे स्व की सीमा, यही बेबसी है और यही है हमारी क्षुद्रता... :-c
Friday, 23 March 2012
नवीन का स्वागत है...

पतझड़ और वसंत साथ-साथ आते हैं। प्रकृति की इस व्यवस्था के गहरे संकेत-संदेश हैं। अवसान-आगमन, मिलना-बिछड़ना, पुराने का खत्म होना-नए का आना... चाहे ये हमें असंगत लगते हों, लेकिन हैं ये एक ही साथ...। एक ही सिक्के के दो पहलू, जीवन का सत् और सार दोनों ही... वसंत ऋतु का पहला हिस्सा पतझड़ का हुआ करता है... पेड़ों, झाड़ियों, बेलों और पौधों के पत्ते सूखते हैं, पीले होते हैं और फिर मुरझाकर झड़ जाते हैं। उन्हीं सूखी, वीरान शाखाओं पर नाजुक कोमल कोंपले आनी शुरू हो जातीं हैं, यहीं से वसंत ऋतु अपने उत्सव के चरम पर पहुँचती है।
फागुन और चैत्र वंसत के उत्सव के महीने हैं। इसी चैत्र के मध्य में जब प्रकृति अपने शृंगार की... सृजन की प्रक्रिया में होती है। लाल, पीले, गुलाबी, नारंगी, नीले, सफेद रंग के फूल खिलते हैं। पेड़ों पर नए पत्ते आते हैं और यूँ लगता है कि पूरी की पूरी सृष्टि ही नई हो गई है, ठीक इसी वक्त हमारी भौतिक दुनिया में भी नए का आगमन होता है। नए साल का ... यही समय है नए के सृजन का, वंदन, पूजन और संकल्प का... जब सृष्टि नए का निर्माण करती है, आह्वान करती है, तब ही सांसारिक दुनिया भी नए की तरफ कदम बढ़ाती है। इस दृष्टि से गुड़ी पडवा के इस समय मनाए जाने के बहुत गहरे अर्थ है। पुराने के विदा होने और नए के स्वागत के संदेश देता ये पर्व है, प्रकृति का, सूरज का, जीवन, दर्शन और सृजन का। जीवन-चक्र का स्वीकरण, सम्मान और अभिनंदन और उत्सव है गुड़ी पड़वा। तो हम भी प्रकृति के इस उत्सव को मनाएँ... सूरज का अभिनंदन करें और गर्मियों का स्वागत करें, आखिर जीवन भी तो एक तरह का ऋतु-चक्र है... सुख-दुख, धूप-छाँह, सर्दी-गर्मी का... गुड़ीपड़वा पर आनंद-वर्षा हो... बस यही है शुभकामना...
Friday, 16 March 2012
जीवन का रहस्य.... रंग

होली गुजरे चार दिन हो चुके हैं, लेकिन मालवा-निमाड़वासियों का जैसे मन ही नहीं भरता होली के गुलाल-अबीर से, तभी तो चौथे दिन रंगपंचमी मनाते हैं और गुलाबी-हरा-नीला-काला-सुनहरी रंग पोते हुए रंग-बिरंगी होकर पूरी दुनिया को रंगीन करने निकल पड़ते हैं।
जहाँ होली को पूरी शालीनता और सभ्यता से सूखे रंगों के साथ मनाते हैं, वहीं रंगपंचमी पर जैसे साल भर की मस्ती का कैथार्सिस होता है। कोई भी रंग चलेगा... रंगने के लिए भी कोई भी चलेगा और लगाने के लिए भी। मस्ती का आलम यूँ होता है कि बाजार-सड़क तक रंगीन हो जाया करती है। इसी दिन गेर निकालने की परंपरा है... परंपरा क्या है सामूहिक मस्ती का आयोजन है। खूब रंग-गुलाल साथ लिए... बड़ी-बड़ी मिसाइलों से सबपर उड़ाते पूरे माहौल को रंगमय करते चलता बड़ा-सा हुजूम... और इसमें शामिल होते जाते और... और.... और.....।
अपने बचपन में गेर में बनेठी घुमाते बच्चों और युवाओं को देखा करते थे, अब इसका स्वरूप सिर्फ जुलूस की तरह हो चला है। या फिर जैसे रंगों की बारात... हर तरफ रंग, मस्ती, बेखयाली, तरंग, नशा... बस। बेतरतीब रंगों से रंगोली की रचना होती है, और गुजरने के बाद सड़कें उस अनगढ़ रंगोली से जैसे मौसम की मस्ती-मिजाजी का भी पता देती है.... जिस जगह से ये गेर या अब इसे फाग यात्रा नाम दे दिया गया है गुजरती है ऐसा लगता है जैसे पूरी कायनात को रंगने निकली हो...। शामिल होने वाला मस्त देखने वाला भी मस्त... बस ऐसा लगने लगता है कि ये मस्ती ही स्थायी हो जाए, क्योंकि यही तो रहस्य है, सार है... जीने का, जीवन का....।
Thursday, 8 March 2012
त्योहार पर तफरीह...
छोटी और मीठी इच्छाएँ अक्सर पूरी होने में बहुत समय लगाती है। ऐसा शायद इसलिए हो कि ये मन के उस कोने से पैदा होती है, जहाँ हमारे बचपन का कब्जा हुआ करता है और बड़े होने के बाद हम सबसे पहला काम ये करते हैं कि अपने बचपने के विस्तार को हर हाल में रोक देना चाहते हैं... ठीक वैसे ही जैसे शीत-युद्ध के दौरान अमेरिका ने सोवियत संघ के प्रसार को रोकने के लिए उसकी चारों तरफ से घेराबंदी करने की कोशिश की थी, लेकिन हम हमेशा ही अमेरिका की तरह सफल हो जाएँ ये जरूरी तो नहीं... :-) तो कभी ड्रायवर की छुट्टी तो कभी पार्किंग की समस्या या फिर कभी दफ्तर से समय पर न निकल पाने का बहाना नहीं तो फिर दिन भर काम करने के बाद बाहर न निकल पाने की मनस्थिति... कोई न कोई कारण तो बनता ही था त्योहार पर बाहर न निकलने का... लेकिन इस बार बचपने ने फिर से सिर उठाया। वो बचपन जो ताऊजी के हाथों में हाथ डालकर होली की एक शाम पहले शहर भर में घूमा करता था। खासतौर पर गोपाल मंदिर की वो होली, जिसमें ताईजी के रिश्ते के भाई (कन्हैया भाई) राधा-कृष्ण की बड़ी-सी रंगोली बनाया करते थे। यूँ उसमें रंगोली के अलावा देखने के लिए कुछ और होता नहीं था, लेकिन मौसम, मन और बाजार में बिखरते होली के रंग बस यूँ ही त्योहार का अहसास दे दिया करते थे और लगता था कि हाँ त्योहार बस इतने ही तो होते हैं...।
इस बार भी जैसे दो दिन पहले ये संकल्प लिया जा चुका था कि कुछ भी हो जाए, इस बार होल्करों की होली जलती देखेंगे ही...। काम समय से पहले निबटाने के चक्कर में कुछ भी पढ़ा-उढ़ा नहीं... जल्दी-जल्दी काम निबटा लिया और जाने के लिए सामान समेट ही रहे थे कि लीजिए काम आ गया... जल्दी-जल्दी उसे पूरा किया और घर पहुँचे... लेकिन देर वहाँ भी हो गई। गिरते-पड़ते जब राजबाड़ा पहुँचे तो होल्करों की होली में से तो धुँआ निकलता मिला... थोड़ी निराशा हुई... लेकिन फिर भी यूँ लगा कि जैसे इस वक्त घर से निकल आए ये बड़ी उपलब्धि है। आजकल घर से निकलते हैं तो कैमरा साथ रखते हैं... पता नहीं कौन-सा क्षण सहेजने की इच्छा हो जाए... तो अंदर की आवारगी अपने असली रंग में आ गई... बंद होते बाजार के सिरे नापते रहे। होली के रंग, पिचकारी, बच्चों की किलकारी, फल-मिठाइयों की खुश्बू और रंग के उमंग को बिखेरते चेहरे... जब किसी कोने में जलने के लिए सजी होली का फोटो ले रहे थे तो कमेंट मिला – ‘बड़ा अजीब लग रहा है, ऐसा लग रहा है जैसे कोई विदेशी हर छोटी-बड़ी चीज का फोटो खींच रहा है।‘ हम थोड़े सकुचा गए... हाँ, हो सकता हो, लोग सोचें कि शक्ल-सूरत और रहन-सहन से तो खाँटी देशी है, लेकिन बीहैव ऐसे कर रही है, जैसे विदेशी हो... कैमरा बंद करके अंदर रख लिया। हालाँकि मन कुलबुलाता रहा... जलती, जलने के लिए सजी होली, रंग, पिचकारी के फोटो ले चुके थे... शराब की एक दुकान पर बड़ी भीड़ देखी और बाहर लटका एक बैनर… जिस पर लिखा था – ‘कल दुकान बंद रहेगी।‘ मन किया एक क्लिक मार ही लें... लेकिन कैमरा अंदर ही पड़ा रहा। आवारगी चलती रही... बाजार के एक सिरे से दूसरे सिरे तक... । इस वक्त कहीं भी होली जलती नहीं मिलेगी, या तो जल चुकी है या फिर सुबह मुँहअँधेरे जलेगी। याद आया, इस शहर में पहले-पहल आकर जहाँ रहे थे, वहाँ अभी जलना बाकी होगी... वहीं चलते हैं। जिया वक्त पीछा नहीं छोड़ता है... :-)। उस कॉलोनी का भी पूरा चक्कर लगा लिया, अभी लोग इकट्ठा हो रहे थे और होलिका-दहन में अभी वक्त था, पेड़ से पीठ टिकाकर उस पूरे माहौल को जज़्ब करने लगे। तभी एक सज्जन आए, कहा – ‘हम चाहते हैं कि इस बार होली की पूजा पाँच जोड़े करें तो आप...।‘ बाकी की बात हमारी समझ पर छोड़ दी... और हमने समझ भी ली...। वो दूसरे चार जोड़ों के जुगाड़ के लिए चले गए... आज तक पूजा-पाठ जैसे कर्मकांड से दूर रहे हम दोनों के लिए ये धर्मसंकट का मामला था, हमने राय दी – ‘निकल लेते हैं, उन्हें कोई दूसरा जोड़ा मिल जाएगा।‘ जवाब मिला – ‘नहीं, इसे भी एक अनुभव की तरह लेते हैं।’ ये सोचकर कि हम कितने अजीब लगेंगे, पूजा करते हुए एक बच्चे को कैमरा पकड़ा दिया, उसने भी पूरी जिम्मेदारी से अपना काम किया। पूजा के दौरान पूजा में शामिल एक कपल के पतिदेव नारियल फोड़ने के लिए झुके तो झन्न से एक बोतल गिरी और फूट गई... वो थोड़ा सिटपिटाए और तुरंत वो बोतल उठाकर फेंक आए, उसके बिखरे शीशों को किसी और ने समेटा। ये इतनी जल्दी-जल्दी में हुआ कि कुछ ज्यादा समझ नहीं आया, लेकिन होलिका के पास बोतल के फूटने से जो द्रव गिरा उसकी खुश्बू (!) ने दिमाग की बत्ती जला दी...। वो तो खैर पूजा करते रहे। पूजा खत्म हुई होलिका दहन कर दिया गया। घर लौटते हुए हम सोच रहे थे कि काश हम उस दुकान का फोटो ले पाते तो हमारी इस पोस्ट के लिए बहुत काम आता... :-(
Sunday, 12 February 2012
पाँच गज़लों का फासला

दिन बड़ा ही अजीब-सा गुजरा था। बेवजह ही बहस हो गई, वो भी महिलाओं की हमारे समाज में दशा और दिशा पर...। यूँ तो महिलाओं को और महिलाओं के दुख कम नहीं है, लेकिन हम पढ़ी-लिखी महिलाओं को अपने दुख का अहसास बड़ी शिद्दत से होता है। हालाँकि ये भी जरूरी नहीं है कि हर पढ़ी-लिखी महिला को हो... सुशील होने का तमगा शायद हर चीज से बड़ा होता होगा... तभी तो... या फिर ग्रूमिंग ही इस तरह से होती है कि उनकी जिंदगी से जुड़ी छोटी-छोटी बातें बहुत महत्वहीन होती है, या फिर उनका ‘स्व’ दुनिया की बाकी सारी छोटी-बड़ी बातों की तुलना में बहुत महत्वहीन होता हो.... तो बात तो महज इतनी सी थी कि महिलाओं को ये तय करना चाहिए कि उनके जीवन की प्राथमिकताएँ क्या हो...? परिवार या फिर वो खुद...। गोया कि उनका होना ही उनके पारिवारक जीवन की सबसे बड़ी बाधा हो.... :-( । नहीं, बहस ऐसे नहीं शुरू हुई थी, लेकिन खत्म इसी नोट पर हुई। इसके बीच इस बात का अहसास भी कि आपका होना समाज के लिए कितना ही अहम क्यों न हो.... हमारे लिए नहीं है, हमारे साथ की शर्तें जैसी हैं, वैसी ही रहेंगी.... इसमें फेरबदल की सूत भर भी गुंजाइश नहीं है, आपको सूट नहीं करता है तो बेहतर है आप शादी ही न करो....। देर तक दिमाग झनझनाता रहा.... फिर दिमाग से इस बात को झटकने की कोशिश भी की, ये सोचकर कि जिस ‘बेचारी’ महिला के लिए मैं बहस कर रही हूँ, शायद उसे तो अपनी स्थिति से कोई शिकायत ही नहीं है और फिर वो बेचारी तो ये जानती तक नहीं है कि कोई एक कितनी शिद्दत से उनके लिए लड़ रहा है... तो फिर सारा उद्वेलन तो बेकार ही है ना...! लेकिन जो कुछ अस्तव्यस्त हुआ है उसे तो व्यवस्थित होने में समय लगेगा ना... इस बीच अपने भी ‘औरत’ होने की बेचारगी फिर उभर आई...। और साथ ही सार्त्र याद आ गए, जो कह गए कि – ‘प्यार में प्रिय पात्र को वस्तु बनाने का षडयंत्र रचा जाता है।‘ काम तो था, लेकिन उद्विग्नता ने एकाग्रता छिन ली थी और आज का काम कल पर छोड़कर घर की राह पकड़ ली थी। स्थिर करने के लिए म्यूजिक प्लेयर ऑन कर लिया था। दफ्तर से घर तक का फासला पाँच गजलों का है, यदि रास्ते के तीनों सिग्नल क्लियर हो तो... नहीं हो तो आधी गज़ल का फासला और बढ़ जाता है।
शुरुआत ही बहुत उदास-सी गज़ल कितनी राहत है दिल टूट जाने के बाद से हुई थी.... गाड़ी रिवर्स की फिर गियर बदला और आगे बढ़ा दी। शाम हो चली थी, बसंत के लिहाज से मौसम थोड़ा ज्यादा ठंडा था। बंद खिड़की से गाड़ी चलाने का अनुभव ठीक सनग्लास लगाने जैसा होता है, इसलिए बहुत मजबूरी के अतिरिक्त गाड़ी का ड्राइविंग सीट वाला शीशा खुला ही होता है। देखना जो आसान होता है। मन तो किया कि कहीं किसी सुनसान में गाड़ी खड़ी करके एक गहरी साँस ली जाए और चीखकर रो लिया जाए... लज़्ज़ते सजदा-ए-संगे दर क्या कहें/ होश ही कब रहा सर झुकाने के बाद... रूलाने के लिए काफी था, लेकिन हाय रे शहर की मजबूरियाँ...। लगा बड़ा मौजूं शेर है... ‘बिचारी’ औरतों के लिए.... । सर झुका लिया है तो अब होश में आने से बाज़ आ जाओ....।
चौराहे पर अगली लेन में जाने के लिए गाड़ी रूकी तो देखा तीन छोटे बच्चे गर्म कपड़े पहने एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए सड़क पार कर रहे हैं। लगा कि ये फोटो का विषय हो सकता है, मोबाइल के कैमरे को ऑन करने से पहले ही तीनों गाड़ी के पास से निकल गए और पीछे खड़ी गाड़ी का कर्कश हॉर्न चीख पड़ा.... अशआर मेरे यूँ तो जमाने के लिए हैं.... गज़ल शुरू हो चुकी थी....। कितनी अच्छी कंपोजिशन है, किसकी होगी और ये मुकेश ने ज्यादा गज़लें क्यों नहीं गाई.... कुछ और बेहतर मिलता सुनने के लिए.... पीछे छूट गया था दिन... अभी घर आगे था... फिलहाल तो सफर था। सोचो तो बड़ी चीज है तहजीब बदन की/ वरना तो बदन आग बुझाने के लिए हैं.... शेर कितना खूबसूरत है, लेकिन ये जांनिसार अख्तर के दौर का सच है... अब तो ये पुराना हो गया है। क्या वाकई कोई चीज कालजयी हो सकती है....? कल रात कागज़ के फूल एक बार फिर देखने की कोशिश करने के दौरान उठा सवाल फिर से टकराया... हर रचना का अपना समय होता है, समाज और समाज के मूल्य बदलते ही रचना की प्रासंगिकता भी बदल जाती है। याद आया सुबह आते हुए गाना चल रहा था – एक मुद्दत से तमन्ना थी तुम्हें छूने की... क्या ये आज का सच हो सकता है? जिस दौर में भौतिकता परम धर्म हो....!
सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं.... चल रही थी। इत्तफाक से दूसरे सिग्नल पर गाड़ी रोकनी पड़ी... चिढ़ तब आई, जब राइट साइड जाने वाली गाड़ी भी लेफ्ट साइड वाली लेन में खड़ी थी और सिग्नल चालू होते ही, उसकी हड़बड़ी अपनी लेन मे पहुँच जाने की थी, इस हड़बड़ी में वो तो निकल गया और सिग्नल फिर से ऑफ हो गया। गज़ल का आखिरी शेर चल रह था, देखिए मेरी पज़ीराई को अब आता है कौन/ लम्हा भर को वक्त की दहलीज पर आया हूँ मैं... कहाँ से आते हैं ये अहसास और ये अशआर... हताशा की एक लहर, उपर की तरफ चढ़ने लगी। और फिर गुलाम अली ने सरगम शुरू कर दी, दुखती रग में और दर्द उभर आया...। अबकी जैसे ही सिग्नल क्लियर हुआ, तुरंत गाड़ी आगे बढ़ा ली, हालाँकि लेफ्ट साइड से आने वाली सड़क से राइट जाने वाले वाहनों ने आधा रास्ता रोके रखा था, फिर भी हम तो निकल गए... लगा कि सारी दुनिया ही हड़बड़ी में है। वैसे भी अक्सर जब हमें जल्दी होती है तो लगता है कि सारी दुनिया ही आज जल्दी में हैं।
तब तक दिल को ग़म-ए-हयात गवारा है इन दिनों/ पहले जो दर्द था, वही चारा है इन दिनों शुरू हो गई थी। चित्रा की आवाज चाहे जगजीत के साथ सूट नहीं करती हो, लेकिन उनकी गज़लों में भी दर्द तो उभरता ही है...। एकाएक ये तलब उठी कि ये गाड़ी मेरे कमरे में तब्दील हो जाए... ठंडा, अँधेरा-सा कमरा... नए-पुराने, याद आते और भूले हुए, मजाज़ी और हक़ीक़ी सारे दर्द-तकलीफें धुआँ-धुआँ होकर कमरे में बिखर जाए और ऐसे ही दम घुट जाए... इससे बेहतर मौत और क्या हो सकती है...? लेकिन अचानक मौत की याद क्यों आई है...। तीसरा और अंतिम सिग्नल... बस बंद हुआ ही जा रहा था कि हमने गाड़ी को रफ्तार दे डाली। बिना रूके अपनी राह हो लिए... हरिहरन शुरू हो चुके थे, तब तक... खुद को बेहतर है सराबों में भटकता देखूँ/ वरना वो प्यास है मर जाऊँ तो दरिया देखूँ। बस ऐसे ही मौत की याद आई थी। लगा कि सब कुछ एक दिन खत्म हो जाना है, प्रेम-घृणा, अच्छाई-बुराई, सफलता-असफलता, पाप-पुण्य, तेरा-मेरा, खुशी-दुख... रिश्ते-नाते और सारी भौतिकताएँ... एकाएक बड़ी राहत लगी। ठीक वैसे, जैसे एक दिन सब कुछ ठीक हो जाएगा... लगा कि बस थोड़ा ही तो सहना है। हालाँकि बहुत बेवकूफाना है, लेकिन बहुत राहत देने वाला था ... एक दिन मैं इस सबसे आजाद हो जाऊँगी, जो आज मुझे तकलीफ दे रहा है... मुक्त... स्वच्छंद...। थोड़ा-सा जाम लगा था... तो जाहिर है कि छठी गज़ल शुरू होनी ही है। आशा का आलाप-सा खत्म हुआ और ... रूदाद-ए-मोहब्बत क्या कहिए/ कुछ याद रही कुछ भूल गए.... सारी उद्विग्नता, बेचैनी, हड़बड़ाहट, चिढ़ और गुस्सा सब कुछ झर गया-सा महसूस हुआ... लगा कि मरने के बाद शायद ऐसी ही मुक्ति का अहसास होगा... :-) हल्कापन हवा में भी महसूस हुआ... घर आ गया था।
Thursday, 15 December 2011
ज़हन और दिल पर क़ाबिज बाज़ार

रात को कितनी ही जल्दी क्यों न करें सोते-सोते 11.30 हो ही जाती है, लिहाजा सुबह जब नींद खुलती है तो सूरज खिड़कियों पर दस्तक दे रहा होता है। कुमारजी श्याम बजा बाँसुरिया सुना रहे होते हैं और चाय के प्याले के साथ सुबह के अखबार हुआ करते हैं, जिनमें ज्यादातर निगेटिव खबरें होती हैं...। लगभग हर सुबह का यही क्रम हुआ करता है। और हर दिन की शुरुआत अखबारों में छपी खबरें और विज्ञापन देखते-देखते मन के उद्विग्न हो जाने से होती है। यूँ लगता है कि या तो दुनियाभर में बस सब कुछ गलत ही गलत हो रहा है या फिर लगता है कि हमारे आसपास बस अभाव ही अभाव है... सुबह पूरी तरह नकारात्मकता से पगी हुई, तो दिनभर का आलम क्या होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
अच्छा खासा बड़ा, खुला, रोशन और हवादार घर है, लेकिन अखबार में छपने वाले फ्लैट के लुभावने विज्ञापन अहसास दिलाते हैं कि साहब आपके पास तो वॉकिंग जोन, स्विमिंग पुल, कम्युनिटी हॉल वाली टाउनशिप में कोई फ्लैट नहीं है औऱ यदि वो नहीं है तो फिर आपके जीवन में एक बड़ा अभाव है। स्लिमिंग सेंटर के विज्ञापनों में एक हड्डी की मॉडल देखकर लगता है कि कमर और पेट पर कितनी चर्बी चढ़ रही है और ब्यूटी पार्लरों के विज्ञापन चेहरे पर उम्र के निशान दिखाने लगते हैं किसी कॉस्मेटिक सर्जन के विज्ञापन पढ़कर चेहरे की सामान्य बनावट में कमी नजर आने लगती है और कभी लगता है कि यदि डिंपल होता तो शायद चेहरा खूबसूरत होता... किसी सेल का विज्ञापन घरेलू सामानों के अभाव को तो कपड़ों के विज्ञापन नए डिजाइन, पैटर्न आदि के कपड़ों का अभाव अलग तरह के मन को उदास करता है, टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन, म्यूजिक सिस्टम, गाड़ी, एयरकंडीशनर, मोबाइल, लैपटॉप आदि यदि नए भी खऱीदे हो तो लगता है कि टेक्नॉलॉजी पुरानी हो गई है। तो चाहे घऱ के किसी भी कोने पर नजर डालों बस कमियाँ ही कमियाँ नजर आती हैं...। यूँ लगता है जैसे जीवन में कमियों के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं। कभी-कभी तो विज्ञापन ये भ्रम तक दे डालते हैं कि हो ना हो, हमें कोई-न-कोई बीमारी जरूर है। और ये सिलसिला रूकता ही नहीं, अखबार से शुरू होकर दफ्तर तक और दफ्तर से घर लौटकर रात को टीवी देखने तक ये बदस्तूर जारी रहता है।
घर से दफ्तर के बीच एक पूरा लंबा-चौड़ा बाजार पसरा हुआ है जिनमें सामानों की शक्ल में अलग-अलग आकार-प्रकार-रंग और पदार्थों के सपने टँगे होते हैं। आते-जाते ये सपने आँखों में उतर जाते और जिंदगी बस इन्हीं सपनों के इर्द-गिर्द चक्कर काटती सी लगती है। चौराहे के सिग्नल पर जब गाड़ी खड़ी थी, तभी पास में मायक्रा आकर रूकी... कितनी खूबसूरत गाड़ी है...! एक ठंडी आह निकली। शो-रूम पर हर दिन आते-जाते मेजेंटा रंग की ड्रेस पर ध्यान अटकता और हर दिन वो सपना जमा होता चला जाता है, बल्कि हर दिन कोई नया सपना साथ आता है। इनमें से कई पूरे किए, लेकिन ये फेहरिस्त कम होने का नाम ही नहीं लेती। इंटरनेट पर सर्फ करो तो पेंशन प्लान से लेकर गर्ल फॉर डेंटिंग तक और डायमंड ज्लैवरी से लेकर निवेश के विकल्पों को सुझाने वाले विज्ञापन... टीवी पर डिटर्जेंट से लेकर कोल्ड ड्रिंक तक और टीवी से लेकर बैंकिंग तक हर चीज का विज्ञापन शाम का समय खा जाता है... गोया बस हर जगह बाजार लगा हुआ है, खरीदो-बेचो... खरीदो-बेचो...।
कभी-कभी तो अपना आप भी बाजार का ही हिस्सा लगने लगता है। आखिर तो किसी भी वक्त खुद को बाजार से बाहर निकाल पाने की मोहलत ही नहीं मिलती है। हर वक्त कोई न कोई जरूरत की चीज याद आती है, कोई न कोई कमी, कोई न कोई सपना... क्या हम उपभोक्ता संस्कृति के प्रतिनिधि उदाहरण हैं? कभी-कभी तो लगता है कि सोते-जागते, हँसते-गाते, खाते-पढ़ते... पूरे समय दिमाग पर बाजार ही हावी रहता है। हो भी क्यों न...! यदि हम घर पर भी रहे तो अखबार, टीवी और इंटरनेट हर जगह बाजार पसरा मिलता है। लगता है कि एक पल को भी बाजार से मुक्ति नहीं है। देखते ही देखते बाजार न सिर्फ हमारे घरों तक आ पहुँचा है, बल्कि इसने हमारे उपर कब्जा कर लिया। अब बस खऱीदने और पुरानी चीजों को निकालने के अतिरिक्त और कोई विचार होता ही नहीं है, लगता है कि बस खऱीदो-बेचो, खऱीदो-बेचो यही है जीवन का ध्येय...।
दिसंबर मध्य में जब सर्दी ने अपनी आमद दर्ज करवा दी है। रात में हल्की धुँध-सी महसूस होती है और रजाई की गर्माहट शिराओं को और मेहंदी हसन की किसी अँधेरी खोह से आती आवाज में – मेरी आहों में असर है कि नहीं, देख तो लूँ... के तल दिमाग के तंतु जब शिथिल होने लगे, तब एक होशमंद विचार कौंधा कि बाजार असल में होश पर ही नहीं, बल्कि जहन और दिल तक पर काबिज़ हो गया है तभी एक सवाल उठा तो क्या बाजार से मुक्ति नहीं हैं?
जवाब मेरे पास नहीं है, क्या आपके पास है!
Friday, 11 November 2011
अभिभूत करते लोग... पार्ट – 1

आजकल मुझे वो चीजें अभिभूत करती है, जो हकीकत में कुछ है ही नहीं। चमचमाती गाड़ियाँ, खूबसूरत कपड़े, महँगे गैजेट्स, चौंधियाती पार्टियाँ, खूबसूरत चेहरे, डुबाता संगीत या फिर गहरी किताबें अभिभूत नहीं करती। करते हैं जमीन से जुड़े लोग, स्वार्थ को दरकिनार कर दूसरों के लिए सुविधा जुटाते, हँसते हुए संघर्ष करते, अपने दुख-दर्द को बहुत करीने से सहेजते-सहते, सीखने के लिए खुले हुए, नया करने के लिए राह बनाते-निकालते लोग, छोटे-छोटे, नाजुक और मासूम-से जैस्चर्स और मीठे-मीठे रिश्ते... कहीं ठहर जाते हैं, भीतर और उस तरह उतरते चले जाते हैं जैसे बारिश की फुहारों का पानी उतरता रहता है जमीन के अंदर.... गहरे.... गहरे और गहरे...। अजीब है, लेकिन है... इन दिनों ऐसा ही कुछ अभिभूत करता है। पिछले कुछ दिनों से कुछ ऐसे ही लोग आसपास से गुजर रहे हैं और जीने का उनका तरीका, परिस्थितियों से लड़ने का साहस और जीवट मेरी यादों की किताब में दर्ज हो रहे हैं, उनके जीवन के गहरे अर्थ खुलते हैं और नया जीवन दर्शन भी मिलता है।
दीपक - वो हमारे घर पुताई करने के लिए आया था। रैक की किताबों को बहुत गौर से देख रहा था। यूँ ही पूछ लिया पढ़ते हो...। उसने बड़ी विनम्रता से नजरें झुकाकर गर्दन हाँ में हिला दी। हमने बड़े आश्चर्य से फिर से अपना सवाल दोहराया – पढ़ते हो?
इस बार उसने बहुत आत्मविश्वास से हमारी आँखों में आँखें डालकर जवाब दिया – हाँ... पढ़ रहा हूँ।
उसके विनम्र आत्मविश्वास ने हमें चौंकाया – कौन-सी क्लास में...?
10 वीं में – उसने जवाब दिया।
कौन से स्कूल में ...?
उसने शहर के एक बड़े प्राइवेट स्कूल का नाम लिया...। हमने अपनी आँखों को थोड़ा फैलाया... – उसकी फीस तो बहुत ज्यादा है।
हाँ...- अबकी उसने आत्मविश्वास से मुस्कुरा कर जवाब दिया – तभी तो छुट्टी-छुट्टी काम करके फीस जमा करता हूँ। पिता मजदूरी करते हैं, वो हमें रोटी देते हैं। फीस की उम्मीद उनसे नहीं की जा सकती है। पढ़ना चाहता हूँ, इसलिए अपनी फीस का इंतजाम मुझे खुद ही करना चाहिए। बस... टुकड़ों-टुकड़ों में थोड़ा-थोड़ा काम करके साल भर में इतना पैसा जमा कर लेता हूँ कि स्कूल की फीस निकल जाए।
तीन दिन उसने बहुत मेहनत और लगन से काम किया। उसके काम का तरीका देखकर महसूस हुआ कि ये काम उसके पढ़ने के जुनून का हिस्सा है और उसके जुनून का इंप्रेशन भी...। वो काम कर जा चुका है, लेकिन जीवन के अनुभवों पर उसका नक्श हमेशा के लिए अंकित हो गया।
लक्ष्मी – पता नहीं कैसे वो हमारी झोली में आ गिरी थी। हरफनमौला... यूँ काम तो करती थी खाना बनाने का, लेकिन जो काम बताओ उसे पूरे उत्साह से अंजाम देती थी। खाना बनाने से लेकर कपड़ों को ठीक करना, छोटा-मोटा सामान खरीद कर ला देना, बालों में मेंहदी लगा देना या फिर मौका-बे-मौका फेशियल ही कर देना। दीपावली की सफाई की कल्पना तो उसके बिना की ही नहीं जा सकती थी। पिता मंडी में हम्माली करते हैं और माँ प्राइवेट स्कूल में खाना बनाती है। वो खाना बनाने का काम इसलिए करती है ताकि पैसा जमा करके ब्यूटीशियन का कोर्स कर सकें। अभी उसका टारगेट पूरा नहीं हुआ था... भागती हुई हमारे यहाँ खाना बनाने आती थी, यहीं से ट्रेनिंग के लिए... शाम को ट्रेनिंग से लौटते हुए घर आकर खाना बनाती थी और फिर अपने घर जाकर खाना बनाती थी। पिछले दिनों बस का इंतजार करते हुए मिली तो बिल्कुल बदली हुई...। धूप से बचने के लिए आँखों पर काला चश्मा था, जींस पर कुर्ता और छाता लेकर खड़ी थी। हमने पहचान कर लिफ्ट दी तो उसने बताया कि जहाँ उसने ट्रेनिंग की वहीं पर नौकरी भी करने लगी है। महीने भर की तनख्वाह के साथ ही हर फेशियल पर कमीशन अलग...। वो खुश है, क्योंकि उसने अपनी राह तलाशी और मंजिल भी पाई है।
यूँ ये लिस्ट बहुत लंबी है, लेकिन फिलहाल इसमें सिर्फ दो ही लोगों को शामिल किया है। जैसे-जैसे लिखती जाऊँगी इसे विस्तार दूँगी। चूँकि हरेक किरदार अपने-आप में एक पूरी कहानी कहता है, इसलिए ये जरूरी नहीं है कि इसे शृंखलाबद्ध तरीके से ही लिखा जाए। इसलिए इस कड़ी में बस इतना ही... अगली कब होगी, कहा नहीं जा सकता...।
Sunday, 6 November 2011
रास्ते में यूँ ही...!

अपनी गाड़ी खराब होने के दौरान बस के समय को साधने और किसी वजह से बस छूट जाने के बाद बस या ऑटो का इंतजार करना कैसा होता है, ये वो ही समझ सकता है, जिसे ये करना पड़े। जब कभी ऐसा होता तो लगता कि काश कोई महिला अपनी टू-व्हीलर या फिर कार में हमें मुख्य सड़क तक लिफ्ट दे दें, माँगना अपने राम को कभी आया ही नहीं। किसी को अपनी कोई चीज ही दी हो, चाहे उपयोग करने के लिए, उधार (ये तो सिर्फ पैसा ही दिया जाता है) या फिर उपहार में... जरूरत पड़ने पर माँगने में जैसे हमारी ही जान निकल जाती है, तो अब खड़े हुए बस या ऑटो का इंतजार करेंगे, लेकिन लिफ्ट... वो तो नहीं होना। ऐसे ही किसी समय में ये तय किया कि अब अपनी गाड़ी में हम उन महिलाओं और लड़कियों को लिफ्ट देंगे जो हमारे जाने के रास्ते में कहीं भी जाना चाहेंगी। दी तो लड़कों-पुरुषों को भी जा सकती है, लेकिन इसमें बड़ा झंझट है... कई सारे पेंच हैं।
हुआ ये कि जिस दिन ये तय किया उसके बाद कभी ऐसा मौका आ ही नहीं पाया। कभी हम निकले तो बस सामने खड़ी थी, जिसमें चढ़ने के लिए कॉलेज-यूनिवर्सिटी जाती लड़कियाँ इंतजार कर रही थी, तो कभी पूरे परिवार के साथ महिला खड़ी थी, तो कभी एकसाथ इतनी लड़कियाँ खड़ी बतिया रही थी कि उन सारी की सारी को गाड़ी में बैठाने की गुँजाइश ही नहीं थी, कुछ और नहीं तो खुद हमें ही इतनी हड़बड़ी होती थी कि गाड़ी रोककर ये पूछना तक समय जाया करना लगता कि – कहाँ जाना है, मैं छोड़ देती हूँ। देखिए नीयत भी हो, इच्छा भी... लेकिन नसीब...! उसका क्या...?
पता नहीं सब कुछ बड़े आराम से करने, सुबह की पूरी दिनचर्या को विलासिता के साथ शब्दशः निभाने और फेसबुक पर लपककर जुगाली करने के बाद भी जल्दी तैयार हो गई। लगा कि आज गाड़ी को भी थोड़ा दुलरा दिया जाए। धूप खासी थी फिर भी कपड़े का एक झटका इधर मारा, एक झटका उधर मारा और ऊब होने लगी तो लगा कि सेल्फ मारे और चलें काम पर। भई देर से जाओ तो शर्मिंदा होओ... जल्दी जाने में कैसी शर्म...? वहाँ पहुँचकर थोड़ा पढ़ने का समय ज्यादा मिल जाएगा। तो दफ्तर के लिए निकल पड़े। आज... हुई मन की...। मुख्य सड़क पर एक दुबली-पतली, छोटे कद की लड़की जींस-टीशर्ट पहने, सिर सहित मुँह को स्कार्फ से ढँके खड़ी थी... हमने गाड़ी रोकी और फिल्म चढ़े दूसरी तरफ वाले शीशों के अंदर से झाँका... लेकिन लड़की ने तो कोई भाव ही नहीं दिया। हम थोड़े आहत हुए, लेकिन तुरंत ध्यान आया... उस बेचारी दिखाई ही नहीं दे रहा होगा... तो थोड़ा झुककर शीशा उतारा... – कहीं छोड़ दूँ? आवाज तो क्या पहुँच रही होगी... बस उसने ही कुछ अपने से समझ लिया... वो करीब आई... मुस्कुराई और कुछ बुदबुदाई। जैसे उसने मेरी बात बिना सुने समझ ली... मैंने भी समझ ली...। दरवाजा खोला और वो अंदर आ बैठी। थोड़ी सकुचाई-सी वो बैठी रही...मैंने पूछा पढ़ती हो (क्योंकि स्कार्फ से चेहरा ढँका होने पर उसका स्टेट्स कि काम करती है या पढ़ रही है, पता नहीं चलता है, फिर बात करने के लिए कोई तो बात हो...)?
उसने कहा – हाँ।
मैंने पूछा – कहाँ?
उसने जवाब दिया – जीडीसी...
ओह तो फिर तो मैं तुम्हें वहाँ तक छोड़ सकती हूँ। वो तो मेरे ऑफिस के रास्ते में ही है। - मैंने उत्साह में आकर कहा।
उसने कहा – मुझे लगा कि आपको दूसरी तरफ जाना होगा।
कहाँ रहती हो से लेकर, क्या पढ़ रही हो तक की सारी बातें हुई। मैंने उसका नाम भी पूछा, लेकिन उसने सिर्फ मेरा सरनेम पूछा और ब्राह्मण पाकर कुछ खुश भी हुई (स्कार्फ बँधे होने की वजह से उसका चेहरा नहीं देख पाई, लेकिन उसकी आवाज की चहक से मुझे ऐसा अनुमान हुआ)। एक-दो बार मन हुआ कि उससे कहूँ कि अब तो गाड़ी के अंदर हो, स्कार्फ हटा सकती हो... लेकिन कह नहीं पाई। उसका कॉलेज आ चुका था, अब तक भी उसने स्कार्फ नहीं हटाया था। गाड़ी रूकी तो उसने कहा – थैंक्स मैम, नाइस टू मीट यू...।
मैंने भी उसे कहा – सेम हियर... बाय। वो कॉलेज के अंदर चली गई और मैं अपने रास्ते... । विचार चल रहा था, यही लड़की यदि अगली बार कहीं मिली, चाहे स्कार्फ के साथ या फिर बिना स्कार्फ के... मैं उसे नहीं पहचान पाऊँगी...। फिर सवाल उठा कि मैं उसे पहचानना ही क्यों चाहती हूँ। कभी... दिखे तो लगे कि किसी दिन इस लड़की को मैंने उसके कॉलेज छोड़ा था...। फिर प्रतिप्रश्न – और ऐसा क्यों चाहती हो...? कोई जवाब नहीं मिला...। फिर इन कबाड़ से सवाल जवाब में से एक नायाब निष्कर्ष निकला। ‘अच्छा ही हुआ जो लड़की ने अपना स्कार्फ नहीं हटाया। यदि भविष्य में वो कहीं मिली तो पहचान का कोई चिह्न ही नहीं होगा, मेरे पास इससे ये अहसास भी नहीं होगा कि कभी इसे इसके कॉलेज तक लिफ्ट दी थी...कोई बेकार का अहंकार भाव नहीं उभरेगा... वाह!’ कुछ ऐसा लगा जैसे बाल कटवाने पर, या फिर हर दिन ले जाने वाले बैग की सफाई कर बेकार चीजों को निकाल दिया हो, या फिर कमरे या अलमारी की सफाई कर कबाड़ निकाल दिया हो और सब कुछ हल्का, खुला-खुला और बड़ा-बड़ा-सा लग रहा हो।
फिर विचार उठा, लेकिन वो तो मुझे पहचानती है ना...! हाहाहा.... तो ये उसकी समस्या है:-)
Wednesday, 2 November 2011
ताजमहल और उसका सपना…

बच्चों की भीड़ के बीच माँ उसे लेकर घर लौट रही थी। माँ ने उससे उसका बैग लेने की कोशिश की तो उसने माँ का हाथ झटक दिया। मेरे दोस्त मेरा मजाक उड़ाते हैं...- उसने बड़ी मासूमियत से मुँह फुलाकर माँ से कहा। माँ ने उसे हल्के से छेड़ा – क्यों...?
कहते हैं कि ये तो अभी भी बच्चा ही है, इसे लेने इसकी मम्मी आती है, इसकी मम्मी इसका बैग लेकर आती है... और... – माँ ने मुस्कुराते हुए कहा – इसमें क्या है? अभी तू बच्चा ही तो है।
उसने फिर मुँह फुला लिया। वो कहना चाहता है माँ से कि अब मैं खुद से घर आ सकता हूँ। मुझे घर का रास्ता याद है, लेकिन कह नहीं पाता, क्योंकि एक दिन ऐसे ही अकेले घऱ के लिए निकलते हुए जब वो सड़क क्रॉस कर रहा था तो स्कूटर की चपेट में आ गया था। सिर में चोट लगी थी औऱ स्कूटर वाले अंकल उसका ड्रेसिंग करवा कर उसे जब घर छोड़ने गए तो घर में कोहराम मचा हुआ था। स्कूल छूटे घंटा भर हो गया था औऱ वो घर नहीं पहुँचा था, बस पापा पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाने के लिए निकल ही रहे थे। उस दिन के बाद से उसे हर दिन माँ ही स्कूल छोड़ती औऱ माँ ही लेने जाती थी। छोड़ते समय तो यूँ भी कोई विकल्प नहीं हुआ करता था, लेकिन स्कूल छूटते में कई बार ऐसा हुआ कि यूनिफॉर्म में एक ही उम्र के बच्चे जब स्कूल से छूटते तो उस भीड़ में माँ उसे पहचान नहीं पाती और वो माँ की नजर बचाकर निकल जाता। माँ बहुत देर तक स्कूल के गेट पर खड़ी रहती, फिर जब स्कूल खाली हो जाता और बड़े बच्चे (वो बड़ी क्लास के स्टूडेंट्स को यही कहता था) आने लगते तब माँ स्टॉफ रूम में जाती और तफ्तीश करती। निराश होकर घर लौटती तो उसे वो घर पर खेलता हुआ मिलता। उसके बाद से माँ वहाँ खड़ी होती है, जहाँ से बच्चों को लाइन से छोड़ा जाता। फिर भी कई बार वो गफलत में माँ की नजर बचाकर निकल ही जाता।
खाना खाते हुए वो माँ से पूछता है – आज आपने मेरे टिफिन में मीठे भजिए नहीं रखे थे?
रखे थे, तूने खाए नहीं क्या?
नहीं थे... सिर्फ अचार-पराँठा ही था। - उसने जोर देकर कहा। लेकिन माँ कैसे भूल सकती है... माँ ने तो खुद तले थे...। माँ को खुटका होता है, कहीं उसका टिफिन कोई और तो नहीं खा रहा है। माँ सोचने लगती है... कल जाकर इसकी क्लास टीचर से शिकायत करनी पड़ेगी। वो मीठे भजिए भूलकर अपने साथ खाना खाती बहन को बताने लगता है - आज है ना मोटी मैडम को धीरज ने पीछे से चॉक मारा और नाम जितेंद्र का ले दिया। उस बेचारे को मार पड़ी।
बहन पूछती है आज तेरी मैडम ने क्या पढ़ाया...?
वो दाल-चावल में शक्कर मिलाते हुए कहता है – आज है ना ताजमहल के बारे में बताया। वो कितना सुंदर है, मैंने उसका फोटो देखा है किताब में... बहुत सुंदर, एकदम सफेद झक्क...। अचानक वो मचल कर माँ से कहता है – मम्मी मुझे एक बार ताजमहल दिखा दो ना...।
माँ भी उसका मन रखने के लिए कह देती है – हाँ दिखा देंगे। और काम में व्यस्त हो जाती है। पता नहीं कैसे उसका ये कहना, बहन के अंदर कहीं खुभ जाता है। वो देर तक इस चीज का हिसाब लगाती रहती है कि यदि हम चारों ताजमहल देखने गए तो कितना पैसा लगेगा, हाँलाकि उसे ना तो इस बात की जानकारी थी कि वहाँ जाएँगें कैसे और टिकट कितना होगा, बस यूँ ही अनुमान लगा रही थी... 200 रु. पर हेड... लेकिन हम दोनों तो छोटे हैं ना। तो हमारी तो आधी टिकट लगेगी, मतलब 200 में तो हमारे दोनों का आना-जाना हो जाएगा। आठ सौ रु. में मम्मी-पापा का आना जाना। वहाँ ठहरेंगे कहाँ...? फिर ठहरने के लिए भी तो पैसा चाहिए होगा...। बहुत माथापच्ची करने के बाद उसका हिसाब बैठा ज्यादा से ज्यादा पाँच हजार रु....। पापा क्या इतना पैसा भी खर्च नहीं कर सकते। पता नहीं कैसे ये बात आई-गई हो गई। फिर एकाध बार ताजमहल का जिक्र हुआ तो उसने बहुत अनुनय से माँ से कहा... माँ बस एक बार दिखा लाओ ना ताजमहल...। उसका अनुनय बहन के मन में गाँठ की तरह पड़ गया। जीवन चलता रहा, वक्त गुजरता रहा। यादें धुँधला गई, सपने कहीं बिला गए।
हालाँकि फतेहपुर सीकरी और आगरा उसके टूर का हिस्सा नहीं था, लेकिन इतिहास से फेसिनेटेड आदित्य ने अपने प्रोफेसरों को एक दिन वहाँ रूकने के लिए मना ही लिया। एक तो बिना किसी विघ्न के यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट टूर से लौट रहे थे, दूसरा फंड भी कुछ बच रहा था, इसलिए पहले फतेहपुर सीकरी और फिर आगरा पहुँचे थे। ताजमहल में घुसते हुए उसे बहुत रोमांच हो रहा था... लेकिन लंबा रास्ता पार कर जैसे ही वह उस भव्य, खूबसूरत और झक्क सफेद ताजमहल के सामने जाकर खड़ी हुई, पता नहीं कैसे कोई स्मृति उड़कर उसके सामने आ गई और उसके मन में हूक उठी...। बचपन नजरों के सामने कौंध गया और उसे अपना नन्हा-सा भाई माँ से अनुनय करता याद आया – माँ एक बार ताजमहल दिखा दो...। उफ्...! कितनी छोटी-सी ख्वाहिश थी। फिर ताजमहल को वो वैसे देख नहीं पाई, अंदर भी गई... पीछे भी और फोटो भी खिंचे-खिंचवाए... लेकिन कुछ कसकता-सा रह गया उसके मन में।
जिंदगी की राह में ऐसे मकाम आने लगे/ छोड़ दी मंजिल तो मंजिल के पयाम आने लगे... गज़ल चल रही थी उसके मोबाइल में। यूँ ताजमहल देखने का उसका सपना नहीं था। पता नहीं ये उसके साथ ही होता है या फिर सबके साथ होता होगा कि सपनों की ऊँचाई उतनी ही होती है, जितनी ऊँची नजर जाती हो...। तो एक बार फिर वो ताजमहल के सामने वाली पत्थर की उस फेमस बेंच पर बैठकर फोटो खिंचवा रही थी, जो ये भ्रम देती है कि ताजमहल हमारी ऊँगली की टिप के नीचे हैं। फिर से भाई का वो सपना उड़कर उसके करीब आकर, उससे सटकर बैठ गया और बहुत मासूमियत से उससे पूछ रहा है कि तुझे तो भाई का सपना याद है, क्या उसे याद है कि उसने भी ये सपना देखा था...!
Wednesday, 26 October 2011
पता होता है तो घर खो जाता है...!

तथ्य तो ये है कि कार्तिक आधी उम्र जी चुका है, लेकिन सत्य यह है कि अभी तक तो क्वांर ही नहीं बीता... तो निष्कर्ष यूँ कि जरूरी नहीं है कि जो तथ्य हो वो सत्य हो ही और ये भी जरूरी नहीं है कि जो सत्य हो, उसमें तथ्य हो ही... ऊ हूँ... बात जरा मुश्किल हो रही है। थोड़ा आसान करके समझें... दीपावली से पहले सारे आर्थिक सर्वेक्षण ये गा रहे हैं कि देश में गरीबी कम हुई है लेकिन करीब बन रही कॉलोनी के सारे चौकीदार साल की इस सबसे अँधियारी रात को एक-एक दीए से रोशन करने की कोशिश में लगे हैं... कारण... इससे ज्यादा तेल जलाने की उनकी कुव्वत भी नहीं है और साहस भी नहीं है... तो तथ्य ये कि गरीबी कम हो रही है और सत्य ये कि गरीब तो वहीं के वहीं है, वैसे के वैसे ही... अभी भी कुछ समझ नहीं आ रहा है, छोड़िए... कुछ और बात करते हैं।
हाँ तो कार्तिक की खुनकभरी सुबह-शाम चाय का गर्म प्याला अभी तक खुले में ही मजा दे रहा है। सुबह की चाय अखबार की उबाऊ और अवसाद देने वाली खबरों के साथ और शाम की चाय आखिरी सिरे पर दिन भर की जुगाली के साथ...। तो उस शाम हमारी चाय में परिवार के और लोग भी शामिल हुए... तमाम दुनिया जहान की बातों के बीच न जाने कहाँ से वो रहस्यमयी खुशबू सरसराती हुई घुस गई... अरे... ये तो रातरानी की खुशबू है, हमने आश्चर्य जताया, लेकिन हमने तो अभी तक रातरानी लगाई ही नहीं, तो फिर ये खुशबू कहाँ से आ रही है। हमारे आसपास बहुत किफायती लोग रहते हैं, ना तो जमीन बेकार छोड़ी और न ही किसी मुँडेर पर कोई गमला नजर आता है... पानी की भी किफायत और जमीन की भी... पैसों की तो खैर है ही...। तो फिर ये खुशबू कहाँ से आ रही है...? घर के आसपास लगे पौधों में जाकर सरसरी तौर पर देख भी लिया, लेकिन शाम के धुँधलके और पेड़-पौधों के गुँजलक में क्या रातरानी दिखे, फिर जब अभी तक लगाई ही नहीं है तो होने का तो सवाल ही नहीं उठता है।
किचन में सिंकती रोटी के साथ फिर से वही मादक और जंगली-सी सुगंध... रात के खाने के बाद टहलते हुए भी फिर वही... उफ्...! अब तो कॉलोनी छोड़कर सड़क पर टहलो तो वहाँ भी... जैसे वो सुगंध हमारा ही पीछा कर रही है। मुश्किल ये है कि दिन के उजाले में वो खुशबू नहीं होती कि उस बेल का पता मिले और शाम के धुँधलके में जब खुशबू का पता होता है तो वो घर ही खो जाता है। पिछले 15 दिनों से यही लुकाछिपा का खेल चल रहा है, लेकिन न रातरानी की खुशबू हारी और न ही हमें जीत मिली... फिर एक दिन सोचा कि क्यों न रातरानी को लगा ही लिया जाए, अब उसे लगाया तो है, लेकिन उसे फूलने में वक्त है... पर, ये खुशबू...! उफ्.. तो लब्बोलुआब ये है कि रातरानी हमारे आसपास नहीं है ये तथ्य है, लेकिन उसकी खुशबू सत्य... तो क्यों न उस खुशबूदार सत्य से रिश्ता रखें... रातरानी के तथ्य का फायदा क्या है? शायद अब सत्य-तथ्य की गुत्थी समझ आए...!
Friday, 21 October 2011
नींद आ जाए अगर आज तो हम भी सो लें...

पता नहीं वो सपना था या विचार... रात के ऐन बीचोंबीच एक तीखी बेचैनी में मैंने अपने शरीर पर पड़ा कंबल फेंका औऱ उठ बैठी। चेहरे पर हाथ घुमाया तो बालों की तरफ से कनपटी पर आती पसीने की चिपचिपाहट हथेली में उतर आई। सिर उठाकर पंखे की तरफ देखा, फुल स्पीड में चलते पंखे ने अपनी बेचारगी जाहिर कर दी...। सिरहाने से पानी का गिलास उठा लिया, एक ही साँस में उसे पूरा गले में उँडेल लिया... लेकिन कुछ अनजान-सा अटका हुआ है, जो किसी भी सूरत में नीचे नहीं जा रहा है। सुबह-शाम-दिन-रात एक अपरिचित बेचैनी है, बड़ी घुटन। सबकुछ अपनी सहज गति से चल रहा है, लेकिन कहीं-कुछ चुभता है, गड़ता है और परेशान कर रहा है। थोड़ी कोशिश की तो नींद आ ही गई ... हमें भी नींद आ जाएगी हम भी सो ही जाएँगें, अभी कुछ बेकरारी है, सितारों तुम तो सो जाओ...। सुबह फिर उसी बेचैनी में नींद खुली थी, उनींदी आँखों से घड़ी को देखा तो सात बजने में बस कुछ ही देर थी... पंखे की हवा ठंडी लग रही थी, लेकिन सोचा बस बिजली गुल होने ही वाली है... दिमाग के गणित से निजात कहाँ...?
चॉपिंग बोर्ड पर हाथ प्याज काट रहे हैं, लेकिन दिमाग का मेनैजमेंट जारी है। सब्जी छोंकने के दौरान ही दाल पक जाएगी और उसी गैस पर फिर चावल रख दूँगी। सब्जी बनते ही दाल छौंक दूँगी... दस बजे तक सारा काम हो ही जाएगा। फिर दो-चार पन्ने तो किताब के पढ़ ही पाऊँगी, आज नो इंटरनेट... बेकार समय बर्बाद होता है। कड़ाही में मसाला भून रहा है, लेकिन दिमाग में अलग ही तरह की खिचड़ी पक रही है। आज भी पुल से नहीं जाना हो पाएगा... अखबार में ही तो पढ़ा है कि यहाँ किसी पोलिटिकल पार्टी की आमसभा है, तो जाम की स्थिति बनेगी...। रिंग रोड से जाना ही सूट करता है। हालाँकि इस रोड पर बहुत गड्ढे हैं, लेकिन कम से कम जाम... अदिति कहती है कि तुम्हें मेडिटेशन करना चाहिए... लेकिन दिल और दिमाग दोनों को साध पाना क्या आसान है, खासकर तब जब दोनों की गति हवा की तरह हो... वो कहती है कि किसी को इतना हक नहीं देना चाहिए कि वो आपको दुख पहुँचा सके... उफ्! भूल गई... कहीं पानी ओवरफ्लो तो नहीं हो रहा है। दौड़कर देखा, बच गए। आखिरकार हम नहीं सोचेंगे तो कौन सोचेगा पानी, बिजली, ईंधन औऱ पर्यावरण पर...। लेकिन क्या इतने अनुशासन के बाद जीवन में रस बचा रहेगा। तो क्या अनुशासन को उतार फेंके जीवन से...? फिर से सवाल...।अदिति का कहना सच है, जो भी दिल के करीब आता है, जख्म बनके सदा... तो क्या करें...? दिल के दरवाजे बंद कर के रखें! ... कितने दिनों से एक ही किताब पढ़ रही हूँ, आखिर इतनी स्लो कैसे हो सकती हूँ... मसाला तेल छोड़ने लगा है, लेकिन प्रवाह सतत जारी है, मशीन का बजर बज गया। घड़ी ने साढे़ दस बजा दिए। ना तो इंटरनेट हो पाया और न ही किताब के पन्ने पलटे गए। सोचा था आज साड़ी, लेकिन अब समय नहीं है, सूट... पिंक... नहीं यार आज मौसम अच्छा है, कोई तीखा रंग। सिल्क... पागल हो क्या? मौसम कितना खराब है, दिन भर घुटन होती रहेगी... फिर... कोई सूदिंग-सा कपड़ा... कॉटन...। दिमाग ने सारी ऊर्जा सोख ली... अभी तो दिन बाकी है।
यार दो ही भाषा आती है, कितना अच्छा होता पाँच-सात भाषाएँ जानती... तो कितना पढ़ पाती, जान पाती, समझती और महसूस कर पाती...। उफ्...! अदिति कहती है कि - कितनी भूख है यार तेरी... बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले...। कहीं तो लगाम लगानी ही पड़ेगी ना...! कोई न कोई नुक्ता तू ढूँढ ही लाती है दुखी होने के लिए... छोड़ इस सबको... जीवन को उसकी संपूर्णता में देख...। काश कि वो मुझे वैसे दिख पाता...। – ओ...ओ... अभी बाइक से टकराती... ये दिमाग पता नहीं कहाँ-कहाँ दौड़ता फिरता है। उफ्... आज फिर किताब घर पर ही रखी रह गई। ले आती तो एकाध पन्ना पढ़ने का तो जुगाड़ भिड़ा ही लेती...। कब तक फिक्शन ही पढ़ती रहूँगी, कभी कुछ ऐसा पढूँगी जो नॉन-फिक्शन हो...। अरे... अभी तो पढ़ी थी वो डायरी...। हाँ, वो है तो नॉन फिक्शन...।
खिड़की से आती स्ट्रीट लाइट ने एक बार फिर ध्यान खींचा और मैंने पर्दा खींचकर उस रोशनी को बाहर ढकेल दिया। आँखों के सामने अँधेरा घिर आया... अंदर-बाहर बस अँधेरा ही अँधेरा... कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। कई-कई रातों से नींद के बीच कुछ-न-कुछ बुनता हुआ-सा महसूस होता है, लगता है जैसे नींद भी कई-कई जालों में फँसी हुई है। लगता है कि कोई ऐसा इंजेक्शन मिल जाए, जिसे सिर में लगाएँ और रात-दो-रात गहरी नींद में उतर जाएँ...। कुछ अजीब से परिवर्तन हैं – संगीत सुहाता नहीं, डुबाता नहीं... सतह पर ही कहीं छोड़ जाता है, प्यासा-सूखा और बेचैन... किताबें साथी हो ही नहीं पा रही है, वो छिटकी-रूठी हुई-सी लगती है। कुछ भी डूबने का वायस नहीं बन रहा है... ना संगीत, ना किताबें और न ही रंग... क्यों आती है, ऐसी बेचैनी, क्यों होता है सब कुछ इतना नीरस और ऊबभरा... ? ऐसी ही बेचैनी में उठकर अपने स्टूडियो में आ खड़ी होती हूँ। जिस कैनवस पर मैं काम कर रही हूँ, उसके रंग देखकर ताज्जुब हुआ... कैसे पेस्टल शेड्स दाखिल हो गए हैं, जीवन में...! हल्के-धूसर रंगों को देखकर हमेशा ही कोफ्त होती रही है, लेकिन मेरे अनजाने ही वे रंग मेरे कैनवस पर फैल रहे हैं... उफ् ये क्या हो रहा है? क्यों हो रहा है, क्या है जो बस धुँआ-धुँआ सा लगता है, कुछ भी हाथ नहीं आ रहा है।
दिल को शोलों से करती है सैराब, जिंदगी आग भी है पानी भी... आज तो बस शोलें ही शोलें हैं... तपन है तीखी। अदिति कहती है कि तुम्हें बदलाव की जरूरत है... बदलाव कैसा...? कहती है एक ब्रेक ले लो... ब्रेक... किससे... खुद से, यार यही तो नहीं हो पाता है। खुद को ही कभी अलग कर पाऊँ तो फिर समस्या ही क्या है...? कितनी दिशाओं में दौड़ रही हूँ, खींचती ही चली जाऊँगी और अपने लिए कुछ बचूँगी ही नहीं....। कहीं कोई मंजिल नजर नहीं आ रही है... दौड़ना और बस दौड़ना... क्या यही रह गया है जीवन... ? कहीं किसी बिंदू पर आकर निगाह नहीं टिकती है, अजीब बेचैनी है... स्वभाव में, विचार में, जीवन में तो फिर निगाहों में कैसे नहीं होगी? पढ़ने के दौरान कई सारे पैरे पढ़ने के बाद भी मतलब समझ नहीं आता... लगता है कि एकसाथ कई काम करने हैं और फिर तुरंत लगता है कि क्या करना है और क्यों करना है?
रफी गा रहे हैं – तल्खी-ए-मय में जरा तल्खी-ए-दिल भी घोले/ और कुछ देर यहाँ बैठ ले, पी ले, रो ले...। चीख कर रोने की नौबत आने लगी थी... मुँह को हथेली से दबाया और खुद को चीखने की आजादी दे डाली... एक घुटी हुई सी चीख निकली और फिर देर तक सिसकियाँ... गज़ल चल ही रही थी – आह ये दिल की कसक हाय से आँखों की जलन/ नींद आ जाए अगर आज तो हम भी सो ले... गहरी... मौत की तरह की अँधेरी नींद की तलब लगी थी... शायद मैं भी सो गई थी...
Tuesday, 4 October 2011
...क्या फिर कारखानों में उत्पादित होगी बेटियाँ...!

कागज के उस छोटे-से टुकड़े ने जैसे पूरे घर में तूफान ला दिया था। टेबल पर पड़े उस कागज को सभी ऐसी नजर से देख रहे थे जैसे वो कोई बम है और उसके फटते ही सब कुछ खत्म हो जाएगा। लक्ष्मी देवी का चेहरा तो जैसे दहक रहा था, राधिका को ये समझ नहीं आ रहा था कि उसे क्यों लग रहा है कि उससे कोई भारी अपराध हुआ है, लक्ष्मी देवी, सुरेश जी और अमोल सभी जैसे उससे नाराज है और वो खुद भी…, लेकिन बहुत सोचने के बाद भी वो खुद समझ नहीं पा रही है कि आखिर उसका अपराध क्या है?
लक्ष्मी देवी दहाड़ी थी – हमें ये नहीं चाहिए। तू कल ही डॉ. उपाध्याय से मिल और इससे छुटकारे का कोई उपाय कर।
लेकिन माँ…- राधिका के गले में शब्द ही जैसे फँस गए हो। अमोल ने भी बहुत कातर दृष्टि से राधिका की तरफ देखा था। अमोल ये तय नहीं कर पा रहा था कि उसका स्टैंड क्या होना चाहिए। हालाँकि ये तय था कि अमोल लक्ष्मी देवी और सुरेश जी के निर्णय के खिलाफ किसी भी कीमत पर नहीं जा सकता, लेकिन कहीं उसके विचार में ये सवाल जरूर उठता है कि आखिर राधिका की क्या गलती है? आखिर अमोल अपनी माँ से बात करने का साहस जुटा ही लेता है – माँ… ये पहला है। अगली बार इस पर सोचें तो…!
लक्ष्मी देवी चीखीं थी – अगली बार…! अगली बार नहीं इसी बार…। हमें ये झंझट नहीं चाहिए।
राधिका ने डबडबाई आँखों से एक बार लक्ष्मीदेवी की तरफ और एक बार अमोल की तरफ देखा था। अमोल ने बेचैन होकर नजरें चुरा ली थी, जबकि लक्ष्मीदेवी के चेहरे की दृढ़ता से राधिका ने खुद को बहुत बेबस महसूस किया था।
आखिरकार सारी तैयारी हो चुकी थी। राधिका पता नहीं किस उम्मीद में किसी चमत्कार की आस में अडोल बैठी थी कि सुरेशजी की कड़कती आवाज से चौंक गईं – चलो या फिर मुहूर्त निकलवाएँ?
राधिका डर गई थी। उसने सहारे के लिए अमोल की तरफ देखा तो उसने भी नजरें चुरा लीं। राधिका को लगा कि इस पूरी दुनिया में वो नितांत अकेली है, कोई भी उसका साथ देने के लिए नहीं है, जिस इंसान का बहुत विश्वास से हाथ पकड़कर वो इस घर में आई थी, उसने भी उसे मझधार में छोड़ दिया है।
पीली-बेदम राधिका की आँखें लगातार मूँदी जा रही थी। कमरे की रोशनी से उसे बेचैनी होने लगी तो अमोल से गुजारिश कर लाइट बंद करवा दी। एनेस्थिशिया का असर था या रात की अधूरी नींद का, कमजोरी थी या फिर लंबे तनाव के बाद गहरे अपराध बोध का उसे लगने लगा था कि वो लगातार धरती के अंदर धँस रही है… गहरे, गहरे काले अतल में…। उसी नींद-नशे के बीच की सी स्थिति में राधिका को आवाज सुनाई दी… माँ… माँ… माँ…। उसकी चेतना का कोई हिस्सा सक्रिय हुआ। वो बुदबुदाई – हाँ बेटा।
सिसकी की तीखी सीत्कार…। – तूने मुझे दुनिया में आने का अधिकार तक नहीं दिया!
राधिका घिघियाने लगी… – मैंने नहीं चाहा था कि ऐसा हो…
लेकिन… हुआ तो वही ना…! – बच्ची ने तल्खी से कहा। – तू तो माँ थीं ना… सदियों से तेरी कहानी साहित्य, इतिहास और कला में दोहराई जा रही है। खुद भूखे रहकर बच्चों का पेट भरने वाली, खुद जागती रहकर बच्चों को सुलाने की सुविधा देने वाली, अपने खून को बच्चों के पसीने पर लुटा देने वाली ममतामयी, वात्सल्य से भरी हुई माँ…। तूने अपने ही बच्चे की हत्या पर कैसे सहमति दे दी…? वो भी सिर्फ इसलिए कि मैं बेटा न होकर बेटी थी!
राधिका ने फिर अपना बचाव किया – मैं तुझे खोना नहीं चाहती थी… लेकिन मेरे आसपास की दुनिया ने मुझे ऐसा करने नहीं दिया। मैं बेबस थी।
माँ सच है तू बेबस है, तू लड़ नहीं पाई, लेकिन मैंने तो सुना था कि तुम्हारे यहाँ का इतिहास, धर्म और साहित्य माँओं के बलिदानों की कहानियों से भरे हुए हैं! भरे हुए हैं उन कहानियों से जिनमें माँ ने अपने बच्चों के लिए सारी दुनिया से लड़ाई लड़ी और तू इतनी कमजोर निकली…? मुझे आने तो देती… मैं तेरे आँगन को किलकारी, मुस्कान, अपनेपन और प्यार से भर देती। मैं तेरा अकेलापन दूर करती, जब तुझे जरूरत होती मैं तेरे साथ खड़ी होती। तेरी हिम्मत, तेरी ताकत बनती, तेरा सहारा होती… लेकिन शायद दूसरों की तरह ही तूने भी मुझे इस लायक नहीं समझा…। – उस आवाज ने कहा।
मैं… मैं… मैं भी लड़ना चाहती थी, लेकिन अकेली थी, किसी ने मेरा साथ नहीं दिया। – राधिका ने साफ किया।
तुझे अपने बच्चे को बचाने के लिए साथ की जरूरत थी, सच और न्याय के लिए तू अकेले नहीं लड़ सकती थी! – वो आवाज कुछ क्षण के लिए रूकी – सही किया तूने… अच्छा किया जो मुझे मार डाला, क्योंकि जहाँ सच और न्याय के लिए लड़ाई इसलिए न लड़ी जाए कि हम अकेले हैं, जहाँ स्त्री को देवी का दर्जा दिया जाए और उसकी पूजा का ढोंग तो किया जाता हो, लेकिन उसके जीवन को नकारा जाता हो। जो समाज स्वतंत्र और आधुनिक तो हो, लेकिन स्त्री की सुरक्षा और सम्मान का दायित्व नहीं उठा सकता हो। जहाँ बेटी और बेटे में फर्क किया जाता हो वहाँ मेरे होने का फायदा भी क्या था? क्या हो जाता एक मेरे बच जाने से… यहाँ तो हर घड़ी अजन्मी बेटियाँ मरती हो, जहाँ जीव हत्या तो पाप मानी जाती हो, लेकिन भ्रूण-हत्या पर सब मौन हो… जहाँ हर घड़ी बेटियों को प्रताड़ना, शोषण और अपमान का सामना करना पड़ता हो, वहाँ एक अकेले मेरे जिंदा होने का फायदा भी क्या था? – आवाज थम गई थी, थक गई थी।
बेटा इस समाज में औरत का जीवन बहुत मुश्किल है। हर कदम पर उसे विरोध, प्रताड़ना और शोषण का सामना करना पड़ता है। तू जिन इतिहास, धर्म और साहित्य की बात कर रही है ना, वो भी स्त्री के शोषण की कहानियों, घटनाओं से रंगे पड़े हैं। जन्म से पहले मारे जाने की दास्तां तो क्या नई है। जन्म के बाद भी उसे कई-कई मुसीबतों, परेशानियों और बंधनों में अपना जीवन गुजारती है। खाने, पहनने और पढ़ने के लिए पक्षपात की जो शुरुआती होती है, वो जीवन के अंत तक जारी रहती है। – राधिका ने बचे हुए साहस को बटोरते हुए अपनी बात कही।
हाँ… हाँ शायद इसीलिए तूने मेरे जीवन के लिए संघर्ष नहीं किया? – थकी-बुझी आवाज – सही किया… जो तून मुझे पैदा होने से पहले ही मार दिया। पैदा हो भी जाती तो क्या होता? भाई के आते ही कदम-कदम पर पक्षपात सहती। पढ़ना चाहती, लेकिन पढ़ाया नहीं जाता। तू जो मेरे जीवन-मृत्यु का फैसला तक नहीं कर पाई, तू क्या मेरे भविष्य का फैसला कर पाती… पता नहीं तूने खुद अपने लिए कभी कोई फैसला किया भी है या तेरे सारे फैसले दूसरे लेकर तुझे सुना देते हैं… जैसे ये… कि तेरी कोख में पल रहे बच्चे का क्या किया जाना है? उसे जीने दिया जाना है या फिर मार दिया जाना है। जब ये निर्णय तक तुझसे नहीं हो पाया तो तू क्या मेरी जिंदगी और मेरे भविष्य का निर्णय कर पाती? जिस समाज में औरत के जन्म से लेकर मृत्यु तक का निर्णय कोई और करे, उस समाज में जन्म लेकर भी क्या हो जाता? अब सोचती हूँ तो लगता है कि ठीक ही किया माँ तूने… जो मुझे इस नर्क में आने से पहले ही मार दिया। जिस दुनिया में अपने ही घर में बहन-बेटियाँ सुरक्षित न हो, जिस दुनिया में औरतों को प्यार करने का हक तक नहीं दिया जाता हो, जिस दुनिया में स्त्रियों की कीमत ढोरों से भी कम आँकी जाती हो, जिस दुनिया में माँ को ईश्वर का दर्जा तो दिया जाता है, लेकिन उसके बीज रूप को ही कुचल दिया जाता हो। भला बताओ जब बीज को ही कुचल दिया जाए तो फिर पेड़ कहाँ से आएँगें…? आज तो दौड़ रहे हैं सीमेंट की सड़क पर चार पहियो में बैठकर जब धूप पड़ेगी, तो सिर छुपाने कहाँ जाएँगें…? तब कहाँ जाएँगें, जब बेटों के लिए बहुओं की जरूरत होंगी… भाईयों की सूनी कलाइयों को बहनों के प्यार भरे धागों की जरूरत होगी। तब पेड़ों की छाँह चाहेंगे तो कहाँ से होगी…, तब बेटियों की खेती करेंगे तब भी बेटों के लिए दुल्हनें नहीं ला पाएँगें… । इसे ही तो कहा जाएगा अपनी जड़े खोदना… विज्ञान ने इतनी तरक्की तो कर ली कि ये जान लें कि कोख में पल रहा जीव नर है या मादा… लेकिन अभी तक इतनी तरक्की नहीं की है कि बिना औरत के अपनी दुनिया, अपना वंश बढ़ा सके…। इसके लिए तो औरत की जरूरत पड़ेगी ही… अपने मकान को घर बनाने में, अपनी दुनिया को अपनी जिंदगी बनाने में औरत की ही जरूरत होगी और आपकी दुनिया का ये दुर्भाग्य है कि वो औरत किसी कारखाने में नहीं बनती है, किसी खेत में नहीं उगती है। वो तो पैदा होती है… और बढ़ती है। लेकिन नहीं… बहुत सवाल हो गए, आपकी दुनिया की गज़ालत और जहालत से मैं दूर ही भली। आपने अच्छा ही किया जो मुझे इससे दूर ही रखा… अच्छा किया जो मुझे इस नर्क में आने से पहले ही मुक्त कर दिया। अच्छा किया माँ… जो मुझे तूने जन्म होने से पहले ही मार दिया…। अच्छा किया तूने… मुझे खुद ही तेरी दुनिया में नहीं रहना। बहुत अच्छा किया…।
Sunday, 18 September 2011
चार खूँटों से बँधी जिंदगी...!

सलीका - उठते ही सोने से फैले बालों को बाँधने के क्रम में वह ड्रेसिंग टेबल की तरफ गई और कंघी उठाकर बालों में गड़ाते हुए जैसे ही उसने आईना देखा… ऊब की लहर ऊपर से नीचे और हताशा की लहर नीचे ले ऊपर की तरफ दौड़ी। हर दिन वही चेहरा... उसी तरह की नाक, वही आँखें... सब कुछ वैसा ही, वहीं... उफ्! उसे अपने दिन का मूड समझ आ गया। वो वहीं स्टूल पर धपाक से बैठ गई। उसी हताशा में उसने एक बार फिर अपने चारों ओर नजरें दौड़ाई... हर चीज उसी जगह, कई दिनों से... बल्कि कई सालों से हरेक चीज है अपनी जगह ठिकाने से... सलीके से... । एकाएक उसे लगा कि ये सलीका ही उसकी परेशानी है। मन किया... सब कुछ को हाथ से फैला कर तितर-बितर कर दे। कुछ उठाकर जमीन पर पटक दे... कुछ... कुछ ऐसा करे जो उसे बदला सा महसूस कराए... लेकिन... लेकिन ये दिमाग। करो... कर ही डालो... फिर बिसूरते हुए समेटना भी तुम ही...।
नफासत - दफ्तर जाते हुए – वही रास्ता, सालों से वही… और वहीं दुकानें, पेड़, सड़क यहाँ तक कि गड्ढे तक... पता होता है कहाँ गाड़ी धीमी करनी है और कहाँ गियर बदलना है। इतनी उकताहट कि लगता है कि कुछ दिन यूँ ही सोते रहे... शायद आसपास की दुनिया एकाएक बदली हुई-सी दिखे, लेकिन ये हो ही कैसे। कई बार उसे लगता है कि क्यों नहीं वो खुद ही अपने आप को बदल डालती? थोड़ा हेयर-स्टाइल बदल ले और थोड़े कपड़ों का स्टाइल... खुद भी काफी बदली नजर आएगी... लेकिन क्या ये बदलाव अच्छा होगा...? लीजिए सलीके के बाद दूसरी समस्या आ खड़ी हुई... नफासत...!
विश्वास - दफ्तर में वही जद्दोजहद... वही जगह, एक ही से चेहरे, वैसे ही एक्सप्रेशन्स और उसी तरह की बातें...। हर जगह सब कुछ इतना जाना पहचाना कि आँखें बंद कर यदि हाथ बढा़ओ तो जो हाथ आए वो परिचित चीज निकले...। उफ्....! यहाँ क्या वो खुद बदलाव नहीं कर सकती? कुछ नए लोगों से दोस्ती करे, कुछ नए लोगों को जानें, उनसे बातें करें... उनकी दुनिया में झाँके कुछ पात्र, कुछ कहानी, कुछ अनुभव उठा लें... लेकिन... लेकिन क्या ये इतना आसान है! एकाएक परिवर्तन से कईयों की भौहें तनेगी... फिर इसमें भी कौन दोस्ती के लायक है और कौन नहीं? किससे आपकी वेवलेंथ मैच करेगी और किससे नहीं... ये सब जानते-जानते पता नहीं किस ट्रेप में फँस जाए...। आखिर तो झटकना भी कहाँ आसान है, उसके लिए...? तो एक और समस्या या संकट... विश्वास का...!
सुविधा - शाम ढलते हुए ऑफिस से लौटना... 15 मिनट उपर हो या फिर 10 मिनट नीचे... सड़कों के हाल एक-ही से...। रोशनी का एक-सा जमावड़ा, ट्रेफिक जाम, हर दिन जैसा शोर। पटरी पार कर सड़कों को घरते ठेले, पुलिसवालों की मशक्कत-चिढ़ और खीझ...। उसी तरह की मनस्थिति... फिर से वही सब कुछ घर पहुँचकर... चाय या फिर कॉफी...। बनाना, खाना, टीवी देखना, टहलना, दिन भर का राग दोहराना...। अच्छे-बुरे पढ़ने को दोहराना। किसी अच्छे अनुभव को सुनाना-सुनना। छाया-गीत तक रेडियो के करीब पहुँच जाना। ज्यादातर उद् घोषक के बुरे चुनाव पर खीझना या फिर किसी अच्छे गाने को इत्मीनान से सुनने के चक्कर में घड़ी कि टिक-टिक को नजरअंदाज कर देना और फिर सोचना उफ् आज फिर देर...। सोते हुए जिस भी तरफ सिर करो... कमरे की हर चीज जानी पहचानी लगती है। कभी पूर्व तो कभी पश्चिम में सिर की दिशा रखी और नजरों को हर एंगल पर घुमा लिया... बदला कुछ भी नहीं... सब कुछ वैसा ही नजर आया। क्यों नहीं ऐसा कर लेती कि किसी शाम टीवी छोड़ दें... देर रात तक सड़कों पर आवारगी करते रहे या फिर गहरे गाढ़े अँधेरे को ओढ़कर किसी मीठी-सी धुन में खुद को डूबने-उतरने के लिए छोड़ दें। छाया-गीत का लालच छोड़ दे या फिर सुबह की चिंता छोड़ दे... देर रात तक अपनी फूलझड़ियों, छालों, फूलों और काँटों का हिसाब करते रहे... या फिर घड़ी को ताक पर पटककर समय को अँधेरे में से गुजर जाने दे...। नहीं होता, बहुत सोचते रहो तब भी नहीं होता... देर से सोए तो सुबह देर से उठेंगे या जल्दी उठ गए तो दिन भर काम करना मुश्किल होगा... फिर वही क्रम दोहराया जाएगा आखिर यहाँ मसला अ-सुविधा का है...।
वह सोचती है कि जिंदगी के चारों कोनों को खूँटे से बाँधने के बाद स्पेस, आजादी और चेंज की ख्वाहिश करना कितना हास्यास्पद है ना...! चाहना-चाहना-चाहना... अपने कंफर्ट ज़ोन में बैठकर सिर्फ चाहने से क्या बदलेगा? बदलने के लिए उसे तो छोड़ना ही पड़ेगा ना... तो...?
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