Monday, 21 September 2009

ब्रूस अल्माइटी और गॉड



तुम्हारे लिए ईश्वर क्या है?
कॉफी के कोको पावडर वाले झाग को चम्मच से सिप करती लड़की से विश्वविद्यालय के कैंटीन में बैठे लड़के ने पूछा।
इस एकाएक पूछ गए प्रश्न ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया। थोड़ी देर सोचने के बाद लड़की ने कहा। --ही इज लाइक पेरेंट टू मी....।
मतलब....?
मतलब जिससे मैं शिकायत कर सकूँ....डिमांड और जिद्द कर सकूँ..... रूठ सकूँ और अपने अभाव बता सकूँ, उन्हे दूर करने की गुजारिश कर सकूँ और अपने दुखड़े कह सकूँ।
बस...?
हाँ।
कॉफी पी चुकने के बाद अपने कप को टेबल पर रखते हुए लड़के ने बहुत सहानुभूति से कहा तुम्हारा ईश्वर तो बहुत बेचारा है। लड़की ने बहुत आहत होकर उसे देखा..... बेचारा क्यों?
बेचारा इसलिए कि तुम और तुम्हारे जैसे अनगिनत लोग उसके साथ वैसा ही कुछ करते होंगे, लेकिन वह बेचारा अपनी पीड़ा किससे कहता होगा?
वह ईश्वर है उसे कोई दुख नहीं होता है।- लड़की ने कप रखकर कुर्सी से उठते हुए कहा।
क्या वह मानवेत्तर है?- लड़के ने उसी गंभीरता से उससे प्रश्न किया।
हाँ वह देवता है।
तो क्या तुम यह कहना चाहती हो कि देवताओं को कोई दुख नहीं होता। दुख वहाँ नहीं होता मैडम, जहाँ कोई मानवीय भावना और संवेदना नहीं होती, और यदि ऐसा होता है तो वह न मानव होता है और न ही देवता.... वह तो.....।-- उसने अपनी बात अधूरी ही रहने दी। फिर कहना शुरू किया कि --- तुम्हारे इंद्र का सिंहासन विश्वामित्र की तपस्या से डगमगाने लगा तो उसने मेनका को विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए भेजा था। यदि हम ये माने तुम्हारे कथित ईश्वर देवता की श्रेणी के हैं तब भी उनके पास सुख-दुख, गर्व-अहंकार, असुरक्षा और तमाम मानवीय कमजोरी और भावनाएँ होंगी, तो फिर वह दुख से कैसे बच सकता है?
फागुन की शाम दोनों सूर्य के डूबने की दिशा की ओर ही बढ़ रहे थे। लड़की गुम हो गई थी डूबते सूरज की निष्कलुष मासूमियत और उदारता में.....। ये लड़की का सबसे पसंदीदा समय है। अपने सूरज से विदा होते दिन की उदासी के स्वागत के लिए वह अपने कमरे की सारी खिडकियों और दरवाजों को खोल देती है, जिससे धीरे-धीरे उदास साँवलापन उसके कमरे में आश्रय पा सके। फिर धीरे-धीरे घना होता अंधेरा..... उसे अच्छा लगता है, क्योंकि उसमें कुछ भी और नहीं होता......बस खुद के होने का अशरीरी अहसास होता है। न दुनिया और न अहसास-ए-दुनिया.....। रोशनी में भटकाव होता है.... अंधेरे में एकाग्रता। वह किसी से भी इन बातों को नहीं कहती क्योंकि उसे डर है कि तमसो मा ज्योतिर्गमय की संस्कृति में अंधेरे के प्रति इस तरह का दर्शन कहीं उसे उपहास का पात्र न बना दे....।
15 साल बाद
एक 'सी' सिटी में वह लड़की अपने घर के सामने ढेर सारे शॉपिंग बैग संभाले कार से उतरी। उस लड़के ने जो कि अब उसका पति है उससे कहा कि बाकी बचे हुए बैग्स मैं ले आऊँगा, तुम जाओ....। अपने घर के ड्राईँग रूम में सारे शॉपिंग बैग्स फैला कर वह लड़की देख रही है। अचानक वह उदास हो गई... क्यों..... उसे लगा कि इतने सारे बैग्स के बीच वह कुछ छोड़ आई है, कुछ उससे छूट गया है, फिसल गया है..... उसे खुद पर अचरज हुआ.... जीवन में जिस चीज को उसने अभाव माना था, वो सब मिट गए हैं, वह वो सब कुछ कर सकती है, जो वह शुरू से करना चाहती थी.... फिर भी सब कुछ वैसा नहीं है जिसकी उसने कभी कल्पना की थी.... फिर....! वो सब कुछ मृग तृष्णा थी....? लगा कि ईश्वर ने देर से ही सही उसकी सारी इच्छाएँ पूरी की, फिर कहाँ क्या रिक्त रह गया.... अब वह और क्या चाहती है? तभी वह लड़का भी अंदर आ गया और उसने फैले बैग्स के साथ कुछ और बैग्स रख दिए। उस लड़की की तरफ प्यार से देखते हुए पूछा....खुश....! उसने अपनी आँखों में आए आँसूओं को छुपाते हुए हाँ में सिर हिला दिया.... समझीं कि लड़के ने नहीं देखे, लेकिन उसने देख लिए थे, क्या हुआ.... उसने हँसते हुए लड़की के सामने अपनी बाँहें फैला दी.....और लड़की उसके सीने में अपना सिर गड़ाकर सिसकियाँ भर कर रोने लगी.....। वह कार्तिक की शाम थी.... दीपावली अब करीब थी और लड़की ने मन भर शॉपिंग की थी। लड़की समझ नहीं पाई कि वह क्यों रोई.... लड़का शायद जानता था कि वह क्यों रोई...?
टीवी पर ब्रूस अल्माइटी फिल्म आ रही थी। ब्रूस एक टीवी रिपोर्टर है और लगातार अपनी असफलता से दुखी है, उसे नौकरी से निकाल जा चुका है और वह निराश है, तभी उसके पेजर पर एक मैसेज आता है कि उसे यदि नौकरी की जरूरत है तो वह इस पते पर मिले....। वह उस जगह पहुँचता है, एक बड़ी सी बिल्डिंग में जहाँ कोई नहीं और कुछ भी नहीं होता है, वहाँ एक सज्जन सफाई करते हुए मिलते हैं। थोड़ी देर बाद... वे उसे बताते हैं कि वे गॉड है ब्रूस को विश्वास नहीं होता, वे उसे कुछ चमत्कार दिखाते हैं, फिर उसे विश्वास होता है।
गॉड उसे अपनी शक्तियाँ देते हैं और कहते हैं कि इनके उपयोग दूसरों की भलाई के लिए ही करना है। शक्तियाँ मिलते ही ब्रूस के सपनों को पंख लग जाते हैं और वह तमाम ऊलजुलूल हरकतें करने लगता है, लेकिन शक्तियाँ मिलते ही एकाएक उसे बहुत सारी आवाजें भी सुनाई देने लगती है। जब वह फिर से गॉड से मिलता है तो वह उन आवाजों का जिक्र करता है। गॉड बताते हैं कि वे सारी रिक्वेस्ट की आवाजें है। और यह पूरी दुनिया से नहीं बल्कि सिर्फ बफेलो स्टेट के ही लोग है। ब्रूस एक सिस्टम बनाता है, जिसके तहत उसे कम्प्यूटर पर सारी रिक्वेस्ट मिलती है। रिक्वेस्ट इतनी ज्यादा होती है कि ब्रूस के पास पढ़ने का धैर्य भी नहीं होता है, इसलिए वह सभी को यस कर देता है।
लड़की को पहली बार 15 साल पहले लड़के द्वारा कही गई बात का मतलब समझ में आता है। ईश्वर बहुत बेचारा है, क्योंकि उसके उपर कोई नहीं है, वह अपनी परेशानी किसी से शेयर नहीं कर सकता है। उसे एकाएक ईश्वर से सहानुभूति होने लगी....। लड़का पूरी तन्मयता से फिल्म देख रहा है और लड़की उसे देखते हुए सोच रही है कि क्या उसे याद है कि कभी उसने मुझसे कहा था कि तुम्हारा ईश्वर बेचारा है।

Tuesday, 15 September 2009

हिंदी दिवसः कसीदा और मर्सिया

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" href="http://www.chitthajagat.in/?claim=l9j35zexakju&ping=http://amitaneerav.blogspot.com/">चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" alt="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagatping.png" border=0>



हिंदी दिवस की बरसी मना ली, (यूँ बरसी का शाब्दिक अर्थ बरस से जुड़ता है, लेकिन हमारी परंपरा में इसक शब्द का उपयोग शुभ के लिए नहीं किया जाता है... और यहाँ इसका प्रयोग उसी प्रतीकात्मकता के साथ हुआ है।), कुछ ने हिंदी की प्रसार और लगातार उसकी अच्छी स्थिति को लेकर कसीदे पढ़े तो कुछ ने बदहाली के लिए मर्सिया पढ़ा.... कहीं सप्ताह तो कहीं पखवाड़े का आयोजन किया जा रहा है..... किसी ने दिन मना कर ही अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली। इस पूरे समय में हिंदी को लेकर अखबारों में लेख और टीवी पर चर्चाएँ सुनी गई....किसी के अनुसार बाजारीकरण ने हिंदी के प्रसार-प्रचार में बड़ी भूमिका निभाई है तो कोई हिंदी के हिंग्लिश होने से खफ़ा है। कुल मिलाकर हर साल जो होता है, इस बार भी वही हुआ... फिर भी हिंदी की राष्ट्रभाषा के तौर पर क्या हैसियत है, इस पर सवाल उठाया जाना जरूरी है क्योंकि सवाल होंगे तो ही तो जवाब होंगे।

एक तरफ हिंदी को बाजार ने हाथोंहाथ लिया है.... इसलिए नहीं कि बाजार को इसकी वैज्ञानिकता से प्यार है या फिर हमारी राष्ट्रभाषा होने से आस्था थी, यह बाजार की मजबूरी है... उसे अपना माल ग्राहकों की भाषा में ही बेचना पड़ेगा, यह कोई हमारी भाषा से मुरव्व़त का मामला नहीं है।

हाँ मनोरंजन के माध्यमों में हिंदी की पकड़ ने जरूरी थोड़ी बहुत आशा जगाई है, लेकिन असल मामला है रोजगार पाने का.... जो भाषा रोजगार दिलाने में सक्षम है, बस वही जीवित रह पाएगी...इसमें हिंदी अंग्रेजी से बहुत पीछे नजर आती है, हिंदी की जरूरत है, लेकिन एक वैकल्पिक भाषा के तौर पर.... अंग्रेजी की जानकारी जरूरी है। अनुभव कहते हैं कि आप कुछ नहीं जानते और सिर्फ अंग्रेजी जानते हैं तो आपके सामने अवसरों का भंडार है, लेकिन यदि आप बहुत कुछ जानते हो और अंग्रेजी नहीं जानते हो तो आपका कुछ भी जानना बेकार है। हिंदी भाषी क्षेत्र में हिंदी के दैनिक अखबार में काम करते हुए भी लगभग हर दिन अंग्रेजी से भिड़ंत होती है, ट्रेनिंग के दौरान हर दिन हिंदी से अंग्रेजी और अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद की मशक्कत यह साबित करती है कि मात्र हिंदी के ज्ञान से ही जीवन की नैया पार नहीं लगाई जा सकती है। इसलिए जरूरत इस बात है कि अब शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी ही कर दिया जाए.... क्योंकि अब मामला सम्प्रेषण से आगे जाकर जीवन-शैली, रहन-सहन और उससे भी उपर समाज की समता और विषमता तक पहुँच गया है, तभी तो मजदूर भी अपने बच्चे को हिंदी में नहीं पढ़ाना चाहता है, क्योंकि वह यह जानता है कि मात्र हिंदी पढ़कर वह बेहतर जिंदगी नहीं जी पाएगा। इसलिए अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा कम-अस-कम इस विषमता को कुछ तो कम किया जा सकेगा और फिर इसमें ही प्रतिभा का आकलन भी हो पाएगा, फिलहाल तो वो प्रतिभाशाली है जो अंग्रेजी बोल पाता है.... आप यकीन करें या ना करें.....!


Sunday, 13 September 2009

खबरों की चिता पर रोटी सेंकते समाचार माध्यम



सूचना क्रांति के इस दौर में समाचार माध्यम संकट से गुजर रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट दोनों के सामने ही अस्तित्व बचाने का संकट खड़ा हुआ है। यह संकट पाठक या दर्शक को उतना नहीं दिखता जितना इस उद्योग के कर्ताओं के समक्ष खुलता है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में यह टीआरपी की शक्ल में और प्रिंट में सर्क्यूलेशन की शक्ल में विद्यमान है। और इस संकट ने इसकी गुणात्मकता को बढ़ाने की बजाय कम कर दिया है। आर्थिक उदारवाद का सिद्धांत तो यह कहता है कि प्रतिस्पर्धा से गुणवत्ता बढ़ती है, लेकिन समाचार माध्यमों में इसका ठीक उलटा हो रहा है और उस पर तुर्रा ये कि कहा ये जा रहा है कि पाठक और दर्शक आजकल यही पसंद करते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक में 24 घंटे नई खबरें देने का और प्रिंट में ताजी खबरें देने के संकट के बीच प्रिंट में दोहरी मुश्किल है, एक अपनों के ही बीच में प्रतिद्वंद्विता और दूसरा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से प्रतिस्पर्धा... दोनों ही स्तर पर खुद को स्थापित करना और फिर बनाए रखना एक दुश्कर टास्क बनता जा रहा है। पाठक फिलहाल तो बस न्यूज और व्यूवज का फर्क ही समझता है और यदि आम पाठक की बात करें तो वह तो बेचारा अखबारों की मैनुपिलेटेड दुनिया को ही सच समझता है। इन दिनों चूँकि अखबार ताजा खबरें दे पाने की चुनौतियों से लड़ रहे हैं, ऐसे में न्यूज और व्यूवज के बीच एक और चीज पनपी है जिसे स्टोरी कहते हैं..... अब पाठकों की समझ में यह नहीं आता कि ये स्टोरी क्या बला है, लेकिन हाँ पत्रकार जानता है कि ये स्टोरी क्या कमाल की चीज है। ये स्टोरी एक पत्रकार को फर्श से उठाकर अर्श तक पहुँचा देती है। ये खबर के एंगेल को बदलती है और फिर इसमें उससे जुड़े विशेषज्ञों से कुछ सनसनीखेज जानकारी ली जाती है और तैयार हो जाती है स्टोरी...। न इसके कुछ आगे सोचने की जरूरत है और न ही पीछे.... दरअसल दिनों-दिन समाचार माध्यमों की दुनिया भयावह होती जा रही है, इसमें कोई सोच, कोई जिम्मेदारी, कोई दूरदृष्टि नजर नहीं आती.... गलाकाट स्पर्धा के दौर में यदि नजर आती हो तो मात्र किसी भी तरह से आगे निकलने की हड़बड़ी..... व्यक्तिगत भी और संस्थागत भी.....और इसके लिए आसान और शॉर्टकट है सनसनी फैलाना...... स्वाइन फ्लू के ही मामले को ले लिजिए...., जितने लोग इस बीमारी से अब तक मरे उससे ज्यादा लोग एक दिन में सड़क दुर्घटना में मर जाते हैं....फिर अभी अखबारों और टीवी चैनलों के लिए यह एक ऐसा मुद्दा था, जिसे कई दिनों तक भुनाया गया। फिर अखबारों के लिए इतना ही काफी नहीं था इसमें बर्ड फ्लू और भी न जाने कौन-कौन से फ्लू का तड़का लगाया और तैयार हो गई एक सनसनाती अखबारी रैसिपी....इसके लिए पत्रकार को ज्यादा कुछ नहीं करना पड़ता.... किसी डॉक्टर से इस सिलसिले का एक बयान दो और छाप दो... अखबार में इसके लिए उसे क्रेडिट भी मिलेगा... ना तो वह पत्रकार यह सोचेगा कि इसका इम्पैक्ट क्या होगा और न ही इसके इम्पैक्ट पर चयन प्रक्रिया में विचार किया जाएगा। इसका परिणाम... बीमारी से दहशत.....क्योंकि आज भी दूरदराज का पाठक इस दुनिया से दूर है और वह इसकी सच्चाई पर विश्वास करेगा। स्वाइन फ्लू से पहले मुम्बई हमलों के दौरान भी टीवी चैनलों ने जिस तरह का कवरेज दिखाया था, उसने हमारे इलक्ट्रॉनिक मीडिया की जिम्मेदारी और भूमिका पर सवाल उठाए थे...। सवाल यह है कि इस माध्यम में आए अधकचरी समझ और गैर-गंभीर लोग इसे कितना समृद्ध कर पाएँगें। फिर इस क्षेत्र में आने वाले नौजवानों से बात करें तो समझ में आएगा कि क्यों जर्नलिज्म का स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है। सारे नए लोग इस क्षेत्र में इसलिए आना चाहते हैं, क्योंकि यहाँ पॉवर है....कॉटेक्टस हैं... ग्लैमर है.... बस.... न इससे ज्यादा की उनको जरूरत है और ही कुछ इससे ज्यादा सोचना है। तो अब इस सबमें खबरें कहाँ है? यहाँ खबरों की चिता है और उसपर सिंकती मीडिया की रोटियाँ है। खबरों से तथ्यपरकता तो न जाने कहाँ चली गई और इसमें आ गया एंगेल..... अभी तक ये बीमारी सिर्फ इतिहास लेखन तक ही सीमित थी अब इसने समाचार माध्यम को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है। कभी-कभी तो समझ में नहीं आता कि इस माध्यम में काम करने वाले नए लोग ऑब्जेक्टिवीटी और सब्जेक्टिवीटी में फर्क भी समझते हैं या नहीं?

Monday, 7 September 2009

मैंने जो संग तराशा वो खुदा हो बैठा



इन दिनों अखबार में और ई-पेपर में दोनों ही जगह राशिफल देखा जा रहा है...... अस्थिर मानसिक स्थिति में अमूमन यही होता है... इन दिनों भी... यह पता होने के बाद भी कि कभी भी ये सच नहीं हुई..... कम-अस-कम शुभ होने की सूचना तो बिल्कुल भी नहीं.... फिर भी देखी जा रही है..... क्यों? हम खुद से उपर किसी को चाहते हैं .... कि अपनी असफलता, दुख, कमी या अभाव का ठीकरा उसके सिर फोड़ सके.... उसे भाग्य कह लें, ईश्वर कह लें या फिर बहुत वैज्ञानिक होकर परिस्थिति......।
एक बार फिर से भगवतीचरण वर्मा की चित्रलेखा सामने है और लगभग तीसरी दफा पढ़ रही हूँ.... हर बार कोई नया अर्थ मिलता है.... इस बार फिर से.... इसी में कहा गया है कि जिस ईश्वर की हम पूजा करते हैं, उसे हमीं ने बनाया है। इसी तरह की बात कामू की किताब रिबेल में पढ़ी थी---The conception of GOD is the only thing for which man can not be forgiven. दरअसल ईश्वर की हमें जरूरत है, इसलिए वह है.... एक बार पहले भी शायद मैंने लिखा था कि जब तक एक भी सवाल जिंदा है ईश्वर का होना जिंदा है....।
इस तरह से हम 'उसके' होने को कम नहीं कर रहे हैं, महत्व को बढ़ा रहे हैं। इसे प्रतीकात्मक तौर पर हम प्रतिमा के निर्माण और फिर उसके विसर्जन से भी समझ सकते हैं। गणपति की प्रतिमा या फिर दुर्गा प्रतिमा का मिट्टी से निर्माण, स्थापना, प्रतिष्ठा और फिर विसर्जन के पीछे वही सच काम करता है जिसे कामू ने शेख सादी के हवाले से कोट किया है, लेकिन क्या इतना ही...? हमें अपनी असफलता के लिए ही नहीं अपनी खुशी के लिए भी ईश्वर के विचार की जरूरत है। क्योंकि उस विचार की धूरी के आसपास ही सब कुछ घूमता है..... आनंद भी....। तभी तो मार्क्स ने धर्म को अफीम कहा है... जिसके नशे में हैव्स नॉट अपनी सारी दुख तकलीफों को भूल जाता है.... कभी देखें गणपति के जुलूस या नीचली बस्ती में हो रहे नवरात्र उत्सव को.....उन झूमकर नाचते गाते लोगों के शरीर अभावों की चुगली करेंगे लेकिन चेहरों से टपकता उल्लास उस सबको झूठ साबित कर देगा....तो भौतिक चीजें झूठ है और आनंद ही सबसे बड़ा सच है.... एक बार फिर से ब्रह्म सत्य और जगत मिथ्या....? ये शंकर के दर्शन का अति साधारणीकरण हो सकता है, लेकिन हम स्थूल दुनिया के बाशिंदे तो दर्शन को ऐसे ही समझ सकते हैं.... नहीं ये मजाक नहीं है। दरअसल हर कीमत और हर हाल में परमानंद ही सच है... फिर वो प्रार्थना से मिले या फिर शराब से....लेकिन फिर पाप-पुण्य.... अरे भई यही तो चित्रलेखा भी नहीं समझ पाई.... ना श्वेतांक, न विशालदेव और न ही महाप्रभु रत्नांबर तो फिर हम-तुम किस.....?

Tuesday, 1 September 2009

जीना इसी का नाम है



फिर से एक मुश्किल दौर... हरदम भागना.... हर पल को पकड़ कर निचोड़ लेने की बेकार और असफल-सी कोशिश... पता नहीं किस बात की जल्दी... कभी-कभी ये किसी मानसिक समस्या का लक्ष्ण लगता है। हर क्षण को अर्थपूर्ण बनाने के चक्कर में लगातार खुद से दूर...। किसी काम को करने से क्या मिलेगा जैसा प्रश्न हमेशा उठता है (नहीं ये मिलना भौतिक नहीं है, इसलिए ज्यादा घबराने की वजह भी नजर नहीं आती)। कुछ भी हल्का-फुल्का नहीं चाहिए... गहरा विचार, गंभीर लेखन, डूबोने वाला संगीत, गहरी नींद....गहरी अनुभूतियों से पगे पल(जबकि अनुभूतियों तक पहुँचने के लिए धीरज की जरूरत होती है। इस तरह की दौड़ तो झड़ी लगी बारिश की तरह है जो होती तो बहुत तेज है, लेकिन जब पानी ठहरता ही नहीं है तो फिर उतरेगा कैसे? गहरे उतरने के लिए तो उसका रिसना जरूरी है, और इसके लिए बादलों का धीमे-धीमे झरना.... फिर...?) हर पल कुछ ना कुछ करना..... सुनना, सोचना, लिखना, पढ़ना, काम करना, नौकरी करना, सोना....लेकिन इन सबमें हम कहाँ है? हम सबकुछ में खो रहे हैं। घड़ी की सुई पकड़े धीरे-धीरे सरक रहे हैं और समय को हाथ से छूटते देख रहे हैं....महसूस नहीं कर पा रहे है, कभी रूककर समय के सरकने और खुद के बहने को महसूस करने की फुर्सत नहीं पाते या ऐसा करना ही नहीं चाहते, क्योंकि कहीं पढ़ा था कि --- इनर हमेशा इन्टॉलरेबल होता है.....। तो क्या खुद से भागकर कुछ पाया जा सकता है? हाँ बहुत कुछ.... बल्कि यूँ कहे कि खुद से भाग कर ही पाया जा सकता है, जो चाहो....यदि याददाश्त ठीक है तो युंग ने कहा था कि दुनिया का सारा सृजन खुद से भागने की प्रक्रिया है, या फिर शायद ये मेरा ही ईजाद किया सूत्र है, लेकिन ये हमेशा सही लगता है। फिर खुद के पास रहने की इस तड़प का क्या मतलब है? क्या ये पलायन है या फिर तमाम अर्थहीनता की तीखी चेतना.... स्थूल और सुक्ष्म दुनिया में बारी-बारी से डूबने-तैरने का दौर.... भौतिकता और आध्यात्मिकता की साझी भूख.... अंदर और बाहर को भरने और जानने के बीच संतुलन को साधने का प्रयास...जिंदा रहने और जीने के बीच की खूबसूरत संगत.....! शायद जीना इसी का नाम है।
---------------------------------------------------------------------------------------------
इसी छीजते जाते जीवन में किसी गहरी अनुभूति के पल में फिर से सूत्र के मोती हाथ आए हैं।
# एक ही समय में कई सच होते हैं, जो एक-दूसरे के विपरीत होते हैं।
# रोना भी सृजन करना ही है।
# सौन्दर्य हमेशा दुर्गम होता है।
# जीवन के हर क्षेत्र में चढ़ाव मुश्किल और ढ़लान आसान होती है।

Tuesday, 25 August 2009

अब करें मंदी का इंतजार...




आसमान बेईमान हो चुका है। पूरे देश से दिल दहलाने वाली खबरें आ रही है। धरती रूखी-सूखी और पपड़ाने लगी है। कहा जा रहा है कि यह इस सदी का सबसे बड़ा सूखा है। मौसम विभाग हमेशा की तरह ही असमंजस में रहा और उसने उसी की रचना की। पहले कहा मानसून समय से पहले है और अच्छा है.. फिर बंगाल की खाड़ी से आए तूफान ने बादलों की दिशा बदल दी तब कहा कि देर से है, लेकिन दुरूस्त है। फिर कहा कि औसत से सात फीसद कम होगी बारिश...फिर कहा कि 17 और अब जो आँकड़े आ रहे हैं, वे हमें साल भर के लिए दहशत में डालने के लिए काफी हैं। औसत से 37 फीसद कम बारिश से खरीफ की 50 प्रतिशत फसल को नुकसान....लेकिन इसी दरम्यान अमेरिकी मौसम विभाग ने कह दिया था कि ला-नीनो इस साल सक्रिय है और उसका असर एशिया में होगा और भारत में इस बार मानसून दगा दे सकता है, लेकिन हर बार की तरह ही इस बार भी हमने मानसून पर भरोसा किया (हम कुछ और कर भी नहीं सकते हैं) और वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था। इस बीच
पैमाने में छूटने जैसा पानी भी बरसा...और हमारे पास उससे खुश होने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं बचा।
दरअसल अब समय आया है, मंदी से निबटने के चुस्त उपाय करने का। फिलहाल हमारे सामने मंदी का जो भी भूत खड़ा है वह आयातित व्यवस्था की डमी है। 59 सालों से योजनाओं के माध्यम से विकास करने की कोशिश करते देश में आज भी उद्योगों का अस्तित्व अर्थव्यवस्था को वैसे प्रभावित नहीं करता, जितना मानसून...क्योंकि चाहे कृषि पर निर्भरता का आँकड़ा 75 से खिसक कर 60 प्रतिशत पर आ गया है, फिर भी देश की 60 प्रतिशत जनता की क्रयशक्ति देश की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करती है। जितना अर्थशास्त्र पढ़ा है, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था का मूलाधार कुल माँग है। और माँग के मूल में है क्रय शक्ति....। यदि देश की 60 प्रतिशत जनता के पास क्रयशक्ति नहीं है तो फिर माँग कहाँ से बनेगी? और यदि माँग ही नहीं बनेगी तो फिर उत्पादन का क्या होगा?
भारत के आर्थिक इतिहास को उठा कर देख लें..... जब कभी मानसून अच्छा होता है, खरीफ के बाद दीपावली की रौनक देखने के काबिल होती है। बाजार रोशन होते हैं और किसानों के घरों में सामानों की भरमार होती है। तो अब जबकि खऱीफ की फसल निकालने जैसा ही पानी नहीं गिरा हो तो फिर अगले पूरे साल के लिए बाजारों में मंदी का ही आलम रहेगा। चाहे जर्मनी और फ्रांस से मंदी के उबरने जैसी उत्साहजनक खबरें आ रही हो....लेकिन हमारे देश में मंदी का चक्र अब शुरू होगा....क्योंकि हमारे किसान यदि खुश नहीं है तो फिर पूरा देश कैसे खुश हो सकता है? अभी तो हम अर्थव्यवस्था की ही बात कर रहे हैं, खाद्यान्न संकट पर तो सोचना शुरू ही नहीं किया है, मंदी ने इस विश्वव्यापी प्रश्न को फिलहाल तो हाशिए पर पटक दिया, लेकिन जल्दी ही हमें इस पर भी विचार करना होगा, ये मामला अर्थव्यवस्था का नहीं.... हमारी भूख का है... नहीं!

Sunday, 16 August 2009

'वह अर्थशास्त्री'


लाई हयात आए, ले चली कज़ा चले
अपनी ख़ुशी से आए न अपनी ख़ुशी चले
सुबह की गाढ़ी नींद में उलझा हुआ था ये शेर नींद खुली तो टप से गिरकर दिन पर बिखर गया। फिर खुली सवालों की पोटली, उसमें से निकला सवाल.... है और होना चाहिए, पाने और होने.....ख़्वाहिशों और हकीकतों, चाहने और पाने के बीच की खाई इतनी चौड़ी क्यों है? क्यों है ये असंगति.... ये एब्सर्ड(कामू के शब्दों में)? क्या है जो हमें तमाम प्रयासों के बाद भी उससे दूर रखता है जिसकी हमें उस समय में सबसे ज्यादा जरूरत होती है? हमारे पास हर चीज के लिए शब्द हैं, इसके लिए भी है.....परिस्थिति....समय का फेर..., योग्यता, प्रतिभा और अवसर की कमी...सारी स्थूलता, वो जो दिखाई देता है। फिर भी सवालों की आग बुझ नहीं पाती है। बहुत सुविधा से भाग्य या प्रारब्ध जैसे शब्दों से कन्नी काट लेते हैं, क्योंकि हमें विज्ञान ने सिखाया है कि जो दिखता है, बस वही सच है, शेष कुछ है ही नहीं, झूठ भी नहीं, क्योंकि झूठ होने के लिए भी तो कुछ होने की जरूरत होती है। हम सूक्ष्मता को देखते नहीं है, देखना नहीं चाहते हैं, क्योंकि वह समय के अनुकूल नहीं है। हम क्षणवादी हो रहे हैं, 'आज' सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, वही सच है, कल भ्रम है, बीता हुआ भी और आने वाला भी। इसीलिए भावनाओं और विचारों के अस्तित्व पर हम विचार नहीं करते हैं। हम डरते हैं, पीड़ा से.... असफलता से.... तकलीफ से....प्रकारांतर से ख़ुशी से भी...।
फिर भी कुछ तो है, कोई तो है जो सीमित संसाधनों से असंख्य लोगों की अनगिनत इच्छाओं का सामंजस्य करता है। वह पूरी दुनिया के लिए अर्थशास्त्री की भूमिका का निर्वहन कर रहा है। कह सकते हैं कि अभी इस गुत्थी को हम सुलझा नहीं पाए हैं, इसलिए 'उसका' अस्तित्व है। अक्सर यह विचार आता है कि 'उसका' होना सवालों से शुरू हुआ था और वह तब तक होगा जब तक हमारे पास एक भी सवाल है....इसके आगे कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।


Sunday, 2 August 2009

सच क्यों हो रूसवा...?



छुट्टी का दिन एक बेहतर अनुभव के साथ उगा यूँ दीगर परेशानियों की किरकिरी तो साथ ही रहती है, लेकिन जैसा कि दर्द की शुरूआत में वह शरीर के किसी कोने में आराम से आश्रय पा लेता है, इसी तरह परेशानी की शुरूआत पहले तो बस जगह ही घेरती है फिर.... फिर का कह नहीं सकते हैं। तो बिना घड़ी की सुईयों को देखें बस प्रवाह का हिस्सा हुए... लेकिन ज्यादा देर तक ये सब नहीं चल पाया। आखिरकार घर में हर जगह टँगे उस अनुशासन का क्या किया जाए जो कमोबेश हमारी बॉयोलॉजी का भी हिस्सा हो चुका है... तो सुई का सिरा भी हाथ में आ गया फिर भी मंथर हवा सा दिन उड़ रहा था।
अचानक बहस का रिपीट टेलीकॉस्ट देखकर रिमोट पर अगला-अगला स्विच दबाती उँगली रुक गई.... बहस चल रही थी टीवी रियलिटी शो सच का सामना पर....। कोई पक्ष में तो कोई विपक्ष में अपने भोथरे और धारदार तर्क फेंक रहा था। किसी की ढाल भारतीय संस्कृति थी तो किसी की ढाल सच....। अब कोई इनसे पूछे कि सच क्या है? और कोई ये भी पूछ ले कि आखिर ये संस्कृति किस चिड़िया का नाम है थोड़ी फुर्सत हो तो लगे हाथ ये भी बता दें। खैर साहब... इसी बीच राजेश ने बताया कि उनेक कॉलेज के प्यून ने उन्हें बताया कि कैंटीन में बच्चे सच का सामना खेल खेलने लगे हैं। टीवी ने एक नया खिलौना जो दिया है बच्चों को भी और बड़ों को भी (तभी तो संसद का कीमती समय और ऊर्जा इस नामालूम से प्रोग्राम के पीछे खर्च की जा रही है।) ठीक भी है जब आप सारे देश के सामने सच का ढिंढोरा पीट रहे हो तो फिर बच्चे अपने सर्कल में सच क्यों नहीं बोल सकते? आखिरकार एक बुरी तरह से बदनाम माध्यम ने देश में सच बोलने की लहर तो पैदा की, लेकिन मजा तब है जब वह व्यक्तिगत सच की बजाय सार्वजनिक सच को सार्वजनिक करे, क्योंकि व्यक्तिगत सच समाज में सिर्फ सनसनी पैदा करते हैं, ये एक तरह से किसी के बेडरूम में घुसने की चेष्टा है, एक नितांत घटिया किस्म का मनोरंजन... अब जो इसके पक्षधर है, वे कहते हैं कि हम सच बोलकर हल्के हो गए.... तो यह भी बताएँ कि आखिर आपकों अपनों से जुड़े सच को कहने के लिए किसी मंच की जरूरत क्यों पड़ती है? क्या आप यूँ ही उन्हें अपने सच नहीं बता सकते? और आपके नितांत व्यक्तिगत सच से किसी का क्या फायदा या नुकसान होना है? तो फिर इस सारे अनुष्ठान के पीछे कहीं पैसा और राखी सावंत(हाँ राखी के स्वयंवर पर भी चर्चा की जा सकती है, लेकिन एक वक्त में एक ही मामले को फोकस करने का खुद से किया वादा अभी निभा हुआ है) नुमा पब्लिसिटी की वासना तो नहीं है? क्या ये भी आप पोलिग्राफी टेस्ट में कबूल कर रहे हैं....? गुजारिश है कि इस पर भी गौर फरमाए।
जहाँ तक संस्कृति का सवाल है तो इसी संस्कृति में ब्रह्मा भी है और कृष्ण भी अहिल्या का प्रकरण भी है और रावण का भी... तो संस्कृति का तो ऐसा कोई कार्यक्रम क्या बिगाड़ेगा? हाँ इससे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पास समय को भरने के लिए खासा मसाला जुट जाता है। और जो अपना समय और ऊर्जा इस कार्यक्रम को देखने और इस पर बहस करने में बिताते है, वे बेचारे ठगे जाते हैं.... हाँ लिखने वाले और पढ़ने वाले भी दोनों.....अब इसके लिए आप मुझे माफ करेंगे।

Friday, 24 July 2009

हम एक जादू में रहते हैं

हालाँकि सारे अनुमान ये कह रहे थे कि हमारे शहर में सूर्य ग्रहण बादल और बारिश की वजह से नहीं दिखाई देगा.....लेकिन मात्र क्षीण सी संभावना का सिरा पकड़ कर सुबह 6 बजे का अलार्म लगाया था....वह बजा भी, लेकिन जैसा कि अंदेशा था घने बादलों के बीच सूरज तो बहुत दूर... उसकी किरणें तक दिखाई नहीं दे रही थी....थोड़ी ही देर में सुबह को फिर अँधेरे ने अपनी आगोश में ले लिया और हमने कल्पना की 1996 के उस सूर्य ग्रहण की जो पूरा था और उस शहर से देखा था, जो उसके दिखने की पट्टी पर स्थित था....। आसमान के विराट हल्के नीले कैनवास पर दो गोल-गोल से पत्थर बहुत धीरे-धीरे एक दूसरे की ओर बढ़ रहे थे और फिर..... आँखों को सायास झपकने से रोका..... गोल लेकिन छोटा पत्थर बड़े और चमकीले पत्थर पर छा गया...... बस उस छोटे से पत्थर की ओट से बड़े पत्थर का जो हिस्सा नजर आया...... वह अदभुत.... अलौकिक और जादुई था....और स्टिल हो गया हमेशा के लिए। हम उसे चाहे जो नाम दे दें.... डायमंड रिंग चाहे तो वह भी....। यूँ ये सूर्य ग्रहण बरसों बरस में आता है.... शायद इसे लेकर उत्सुकता और उत्साह ज्यादा होता है, लेकिन कभी सारी दुनियादारी को एक सिरे पटककर सोचे तो पाएँगें कि हम एक अलौकिक जादू भरी दुनिया में रहते हैं और हर लम्हा उस जादू को जीते हैं, भोगते है..... फिर भी कभी हमारा ध्यान उस तरफ नहीं जाता..... माँ की तरह हम उसे भी टेकिंग फार ग्रांटेड ही लेते हैं.... जी हाँ प्रकृति का जादू.... सुबह का दोपहर...शाम और रात में बदलना.....बीज का पौधा और फिर पेड़ बनना....कली... फूल और फल आना..... नदियों का बहना.... समंदर का हरहराना.....बादलों का आना छाना और बरसना..... गरजना.... बिजली का तड़पना...और हाँ इंद्रधनुष तनना.... फूलों का खिलना.... चिड़ियों का चहचहाना....क्या है जिसे हम जादू के अतिरिक्त कुछ और कह सकते हैं? ऐसे में सवाल उठता है कि इसी जादूभरी दुनिया में छल-कपट, झूठ, हिंसा, अनाचार, अत्याचार, गरीबी और बेबसी सब कहाँ से आ गई?
-----------------------------------------------------------------------------------------
बहुत साल पहले यूँ ही एक बहस हुई थी... प्रकृति को लेकर....क्या प्रकृति कारण और परिणाम का श्रृंखला है? या फिर यह एक यांत्रिक व्यवस्था है... जिसमें घटना और दुर्घटना फीडेड है हम तब अचंभित होते हैं, जब वह हमारे सामने आती है, इसके पीछे कोई तार्किकता नहीं है....ये बस होती है और जब हो जाती है तब हम इसके पीछे के कारणों की पड़ताल करते है, गोयाकि लकीर पीटते हैं.... बहुत देर तक या यूँ कहूँ कि बहुत दिनों तक चली तो बहुत अतिश्योक्ति नहीं होगी... सब अपनी-अपनी मान्यताओं पर अड़े रहे, लेकिन निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे.... फिर भी एक बात पर सब सहमत थे कि प्रकृति एक जादू है... और हम इस जादू में रहते हैं। हम इसे जादू और नशा दोनों ही कह सकते हैं।
और अंत में सावन..... हम मौसम दर मौसम मौसमों का इंतजार करते हैं, खासकर वसंत और बारिश का और बारिश में भी खासकर सावन का...क्योंकि यह खालिस नशा है.... शब्दों से परे है इसका होना और इसका अभिव्यक्त होना...। यहाँ हिंदी फिल्म का एक गीत याद आ रहा है
शराबी-शराबी ये सावन का मौसम
खुदा की कसम खुबसूरत ना होता
अगर इसमें रंगे मोहब्बत ना होता
यकीन ना करें तो मोहब्बत करें और फिर सावन को जिएँ... यकीन आ जाएगा।

Tuesday, 21 July 2009

लम्हा-दर-लम्हा जीने का मौसम




नींद की चाशनी को आसमान से बरसती बूँदों ने धो दिया... आ खड़े हुए सावन के मंडवे तले। अदरक घुली, भाप उड़ाती गर्म चाय और पार्श्व में बज रही ठुमरी--घिर-घिर आई बदरिया कारी... नहीं यह ना तो किसी कहानी का हिस्सा है और न ही किसी विजुअल का....ये जीने के मौसम का दस्तावेज है। रात के अँधेरेपन में सुबह की सफेदी घुलने लगी थी, लेकिन प्रपोशन थोड़ा गड़बड़ा गया और सुबह उजली होने की बजाय थोड़ी साँवली ही रह गई। फिर तो यह साँवली-सी सुबह घर में मेहमान बन कर आ गई... जिस कोने में भी देखो मौजूद मिली। आसमान से ओस की बूँदों सा सावन बरस रहा है, इस मौसम में छुट्टी लेने का मकसद तो कुछ पढ़ना, कुछ लिखना और कुछ सुनना था, लेकिन छिटपुट कहानी पढ़ने और लिखने के लिए माहौल बनाने के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं पाया।
हाल ही में कहीं पढ़ा था कि या तो आप अच्छा लिख लें या फिर अच्छे से जी लें। अच्छे से जी कर अच्छा लिख भी लें ऐसा संभव नहीं होता है, इस पर बहुत लंबी बहस हुई तो एक सवाल और खड़ा हो गया कि क्या ज्यादा जरूरी है? अच्छा लिखना या फिर अच्छे से जीना.... सवाल थो़ड़ा पेचीदा है, क्योंकि यदि कोई दोनों ही करना चाहे तो....? यदि आपके पास इस सवाल का जवाब है या फिर दूसरी पहेली का हल है तो फिर मुझे दोनों की ही बहुत जरूरत है। फिलहाल तो सावन है, बूँद-दर-बूँद भर रहा जीवन का प्याला है और नहीं है तो कुछ भी नहीं छूटने का मलाल.... तो बस कभी-कभी मौसम का इंतजार जीवन को हरा-भरा करने के लिए भी किया जाता है।
शेष शुभ

Tuesday, 14 July 2009

सावन आनंदमय हो


बड़े दिनों बाद पूरी और बहुप्रतिक्षित छुट्टी.....परेशानी के उग आए छालों को साफ करने के बाद के जख्म.....। मौसम की मिठाई और मन की खटाई मिलकर गुजराती स्वाद रचती सुबह आई थी। रात की रिमझिम का हैंगओवर सुबह तक बना हुआ था। ताजा नहाई हुई सुबह का साँवला चेहरा आकर्षित कर रहा था। मिट्टी की नमी से दुर तक मन की जमीं भी नम हुई जा रही थी.... मन को साधने और मौसम के साथ कदमताल करने की कोशिशें चल रही थी.... चाहत तो थी कि मूड का उखड़ापन कुछ कम हो जाए.... सावन का रूप रंग गहरे उतर जाए....। बरसात में फूल आई दीवार सा मन हो रहा था, इसलिए ऐलान कर दिया था कि आज कोई ऐसी बात ना हो जिससे मन की दीवार की पपड़ियाँ निकलने लगे तो सारे जतन उसी दिशा में हो रहे थे.....।
समय तेजी से भाग रहा था और हम उसका सिरा पकड़े उसके चारों कोनों को तानने की कोशिश कर रहे थे...चाहा तो था कि उसे तंबू की तरह तान लें और मनमौजी हो जाए....लेकिन एक कोने को थामे तो दूसरा सिकु़ड़ रहा था...आखिर कोशिश ही छोड़ दी। चैन किसी भी सूरत नहीं था।
चचा ग़ालिब हर जगह आ खड़े हो जाते हैं यहाँ भी आ गए।-- अब तो घबरा के ये कहते है कि मर जाएँगें, मर के भी चैन ना आया तो किधर जाएँगें।
लेकिन सावन आया है.... सुबह का साँवलापन ढ़ेर सारे रंगों से सजकर चुपके से आता है..... काली घटाएँ जब बरस कर रीत जाती है तो यूँ लगता है कि सुनहरी सुबह फिर आ गई हो...प्रकृति के श्रृंगार का उत्सव है। आँगन में चंपा और गुलाब सुबह से महकने लगते है तो गुलमोहर भी अभी थका नहीं है। सागौन के बड़े-बड़े पत्ते हरिया रहे हैं। रात में चमेली और जूही गमकने लगती है। बोगनबेलिया तो खैर सदाबहार है ही। कितने रंग सुबह से शाम तक आते और झिलमिलाते हैं। मन की सारी धूसरता सावन की रिमझिम में धुल कर बह निकली....। बहुत कुछ बहता aऔर उमड़ता है मन में लेकिन क्या करें समय का इलेस्टिक सिकुड़ता ही जा रहा है, फिर भी जो दिखता है वह मन में उतरता तो है ही। तो सावन की उदार हरियाली सबको सुंदर करें, मन मयूर हो और हरदम सावन मनें, इसी कामना के साथ सावन आनंदमय हो।

Tuesday, 7 July 2009

नैनीताल पर शब्द-चित्र

मेरी कवितानुमा तुकबंदी को सराहने के लिए शुक्रिया.....इसे मैं हौसला अफजाई ही मान रही हूँ बिल्कुल ऐसे जैसे पहले-पहल स्कूल में सीखी कविता को सुनाते बच्चे का हौसला बढ़ाते घर आए मेहमान हो और उस पर तुर्रा यह है कि आपने एक कविता सुनी....सुनकर ताली बजाई तो सुनिए एक और कविता....। इस बार दो साल पहले सुबह-सुबह जब काठगोदाम से नैनी झील के किनारे पहुँचे तो जो कुछ देखा उसने खुद-ब-खुद शब्द चुन लिए और....जो बना वह सामने है....यहाँ जिक्र चिनारों को है, लेकिन चित्र नैनी झील का है...इसके लिए पाठक क्षमा करेंगे।
नैनीताल
कतारों में चिनार
या फिर
चिनारों की कतार
नैनी झील के उस पार
चीड़ों के पहाड़ में से
झाँकती है
जीवन की चाँदनी
आसमान के आँचल पर
धूप-बादल के खेल
अलमस्त होकर आते
बरसते और बिखरते बादल
हम मैदानियों के
लिए प्रकृति का
अनुपम चित्र बनाते..
क्या ये कविता है?

फिर सेः कविता लिख पाने का कोई मुगालता नहीं है, ये बस कभी यूँ ही भावना की उमड़न का नतीजा है।

Thursday, 2 July 2009

कविता सा कुछ कहने की हिमाकत

यूँ ये मेरा माध्यम नहीं है...ना छंद की समझ है और ना ही मात्राओं की....। पुरानी डायरी के किसी पन्ने में एकाध निराश से क्षण की तरह कभी कोई कविता मिल सकती है, इससे ज्यादा इस दिशा में मैंने कभी कोई हिमाकत नहीं की। और आज भी इसे कविता कहने की हिमाकत नहीं कर सकती, यह मात्र तुकबंदी है जो रात के अचेतन पहर में कड़ी दर कड़ी जुड़ती गई।
रात के बिल्कुल बीचोंबीच जब बारिश की बड़ी-बड़ी और लगातार गिरती बूँदों की आवाज से नींद खुली तो दिमाग का सारा कूड़ा सतह पर आ जमा हुआ....बहुत देर तक जोर से आँखें मींचे बारिश के होने को नकारते रहे, उस संगीत की तरफ से कान भी बंद कर रखे....जो शायद दुनिया की पहली कंपोजिशन में से एक रहा होगा और आज भी उतनी ही ताजातरीन, दिलकश और शुद्ध है जितना पहले था....लेकिन शायद इसे ही प्रेम कहते हैं कि ज्यादा देर उसकी पुकार को अनसुना नहीं कर सके और बाहर निकल ही आए...। आसमान जैसे फट पड़ने को आतुर था..... लाल-धूसर बादलों का जमावड़ा...गहरे अँधेरे में बूँदों का गिरना तो नहीं दिख रहा था, लेकिन फुहारें सहला रही थी....नींद चाले चढ़ चुकी थी और उस कूड़े में से कुछ काम की चीजें निकलने लगी थी। कुछ विचार और कुछ भावनाएँ उभर आई थी....। पता नहीं कहाँ से ये तुकबंदी निकल पड़ी।
बेटियाँ
ना जाने कहाँ से आ जाती हैं ये
कुछ ना हो फिर भी खिलखिलाती हैं बेटियाँ
ना प्यार की गर्मी और ना चाहत की शीतलता
फिर भी जीती जाती हैं बेटियाँ
अभावों और दबावों के बीच भी
दिन के दोगुने वेग से बढ़ती जाती है बेटियाँ
भीड़ भरे मेले में हाथ छूट जाए
फिर भी किसी तरह घर पहुँच जाती हैं बेटियाँ
खुद को जलाकर भी
घरों को रोशन करती जाती हैं बेटियाँ
सीमाओं के आरपार खुद को फैलाकर
पुल बन जाती हैं बेटियाँ
शायद इसकी सजा पाते हुए
कोख में ही मारी जाती हैं बेटियाँ.....।

Tuesday, 23 June 2009

तुम वहाँ तक आ तो जाओ हम जहाँ तक आ गए

दोस्तों,
पिछली पोस्ट पर आई टिप्पणियों के लिए धन्यवाद....। दरअसल इन सवालों को सही संदर्भों में समझा नहीं गया। आशा-निराशा जैसे नितांत भौतिक दुनिया के भावों से इन प्रश्नों का दूर से भी वास्ता नहीं है। हम कर्म करने के लिए अभिशप्त हैं....इसे किसी भी रूप में कहें प्रकारांतर से मतलब इनका वही होगा, लेकिन यह अभिशाप भौतिक या कह लें स्थूल दुनिया का तथ्य है...यहाँ के सच भी बड़े उलझाने वाले और सापेक्ष होते हैं। दरअसल ये एक समानांतर दुनिया है। कभी इसकी आँधी से हम बेचैन हो जाते है तो कभी हम ही इसके आकर्षण में बँधे हुए वहाँ पहुँच जाते है। उस दुनिया के सारे प्रश्न हमारी दुनिया में घुसपैठिए हैं। जरा सी दरार दिखी कि घुस आए...। अंदर आने के बाद ये अंतर में ऐसी भट्टी सुलगाते हैं कि उसकी तपन सही नहीं जाती है, लेकिन जो सह लेता है, वह भटकाव के सच को जान लेता है और कुंदन होकर निकलता है...उसे आध्यात्मिक दुनिया में स्थिरता.... संतत्व की प्राप्ति होती है.... वह किनारे बैठ कर निरंतर दौड़ने वालों की निरर्थक कवायद को निर्विकार भाव से देखता रहता है। वह सारी दौड़ और प्रतिस्पर्धा से बाहर आ जाता है... और सदा शांति की स्थिति में रहता है....लेकिन यह रास्ता बीहड़ है और इसमें मन को साधना पड़ता है। मन जो हवा की तरह चंचल है, जिसे साधना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है उसे साधने से कम यहाँ कुछ नहीं चल सकता है। हम तो भटकते-भटकते यहाँ पहुँचे हैं और जल्द ही यहाँ से घबराकर निकल भी जाएँगें.... लेकिन फिर आएँगें क्योंकि ये हमारी दुनिया के अब्सर्ड और इसका अर्थहीन होना हमें फिर यहाँ ले आता है। इसलिए ये आशा-निराशा से आगे के प्रश्न हैं। दोस्तों जिनका वास्ता इन प्रश्नों से नहीं है वे इस आग से दूर रहें....( ये अलग बात है कि दूर रहना ना रहना आपके बस की बात नहीं होती है) ये विषबीज है जो किसी-किसी में ही होता है और यदि होता है तो जरा सी अनुकूलता पाते ही विकसित भी होने लगता है.....। लेकिन वे सौभाग्यशाली है जिनमें यह विषबीज नहीं है। उनके लिए ये प्रश्न... ये सारी कवायद बेकार है वे ही इसे भौतिक दुनिया के कसौटी पर कसते हैं....उनके लिए एक शेर है (फिलहाल शायर का नाम नहीं याद आ रहा है)
खुद तुम्हें चाक-ए-गरेबाँ का शऊर आ जाएगा
तुम वहाँ तक आ तो जाओ हम जहाँ तक आ गए


शेष शुभ...

Friday, 19 June 2009

बैठो! कहीं जाना नहीं है

मन और मौसम दोनों की ही गिरह उलझी पड़ी है। दोनों की ही तरफ से कोई राहत नहीं....मन मौसम की तरह ही तप्त हो रहा है और मौसम है कि अपनी गाँठ खोलने के लिए ही तैयार नहीं है। ठहरना चाहना समय की रफ्तार में बहने लगा है...। हम पहले समय के साथ कदम मिलाने की और फिर उसे पकड़ने की एक बेकार सी कोशिश में लगे हुए हैं। कहाँ जाना है..क्या पाना है और क्यों पाना है जैसे सवाल कभी-कभी ही सिर उठाते हैं.... फिर डूब जाते है जद्दोजहद में....। कभी घड़ी-दो-घड़ी खुद के साथ बैठे तब सवाल आकर इर्द-गिर्द डेरा डाल देते हैं.....लेकिन उसके लिए भी इतनी राहत नहीं है घड़ी को थामने की बेतुकी सी कोशिश में ही दिन पर दिन गुजर जाते हैं। कभी-कभी ही खुद के पास आकर बैठ पाते हैं। एक अंतहीन और अर्थहीन दौड़.... उसका हिस्सा.... कभी खुद तो कभी मजबूरन....सार्त्र के शब्दों में हम पैदा होने के लिए अभिशप्त है..उसी तरह हम दौड़ का हिस्सा होने के लिए भी अभिशप्त हैं.....उन पर सुखद आश्चर्य होता है, जो जीवन को नशे की तरह खींचते चले जाते हैं...जीवन भर दौड़ते रहते हैं और कभी थकते नहीं कभी रूकते नहीं और कभी खुद से पूछते भी नहीं कि क्यों दौड़ रहे हैं, क्या पा लेंगे... पा कर क्या होगा? यही वे लोग है जो दुनिया को बदलते है...विकास करते हैं और समाज को बेहतर बनाते हैं....यहाँ तो बड़ी से बड़ी सफलता का नशा भी दो दिन में उतर जाता है और फिर खुलने लगती है अर्थहीनता की पोटली....ये दौड़ क्यों है...कहाँ जाना है....क्यों जाना है और पहुँच कर क्या मिलेगा?....अंतहीन सवाल और कोई जवाब नहीं..। उनसे ईर्ष्या होती है.. जो इस दौड़ से अलग होकर किनारे बैठे हैं दौड़ने वालों निर्विकार भाव से देख रहे है गोया कह रहे हो कि रूक जाओ कोई कहीं नहीं पहुँचेगा.... बेकार है यूँ दौड़ना। ओशो का कहा अक्सर मजबूर करता है रूकने और बैठ जाने के लिए कि--- बैठो! कहीं जाना नहीं है। जो चला वो भटक गया, जो बैठा वह पहुँच गया।
ये उसने कहा है जिसने दुनिया देखी है.....जो भटकने के बाद ही इस सत्य तक पहुँचा है...हम भी शायद पहले भटकेंगे और फिर कहीं बैठ जाएँगें....तब तक तो भटकने के लिए अभिशप्त हैं।

Sunday, 14 June 2009

चश्माए महताब से रात के आने का इंतजार

.सोचा तो था कि इस बार कुछ गंभीर राजनीतिक विषय ही रहेगा। चिंतन भी उसी पर चल रहा था और अध्ययन तो और भी ज्यादा गंभीर विषय पर चल रहा है....लेकिन इस बीच मानसून में विलंब की खबर ने बेचैन कर दिया। अब ना तो खेती से कोई लेना-देना है और ना ही जल संकट के पीड़ित हैं....फिर भी इस तरह की बेचैनी का कारण क्या है, ये अभी तक पकड़ में नहीं आया है। बस ये है और पता नहीं कब से?
आषाढ़ दिन दर दिन बढ़ रहा है और आसमान की पेशानी एकदम साफ है....। मौसम विभाग हर दिन अपनी घोषणा बदल रहा है और ज्योतिषी इन दिनों पता नहीं कहाँ जा छुपे हैं। अभी दो दिन पहले बादलों का झुरमुट यूँ ही तफरीह करता दिखा जरूर था....लेकिन रूकने और बरसने का उसका कोई मूड नजर नहीं आ रहा था। जेठ इतना घना हो गया कि उसकी छाया में आषाढ़ पनप ही नहीं पा रहा है.....गर्मी से ज्यादा उमस से बेचैनी है....पढ़ा-सुना है कि जब गर्मी बेचैन करने लगे और सारी उम्मीदें मुरझा जाए तो बस समझें कि बारिश करीब है.....बिल्कुल वैसे ही जैसे जब रात का सबसे अंधियारा पल हो तो समझें कि बस सुबह करीब है...। यहाँ फैज याद आते हैं
गुम हुई जाती है अफ्सुर्दा सुलगती हुई शाम
धुल के निकलेगी अभी चश्माए महताब से रात
------------------------------------------------------------------------------------------------------
इस बीच पाखी में छपी कहानी के लिए आ रहे फोन और एसएमएस से मैं अभिभूत हूँ... अखबार में कई बार लिखा छपा लेकिन जिस तरह का रिस्पांस इस कहानी के लिए मिला उसे व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं है...। शुक्रवार रात जब घर पहुँची... तो एक पत्र मेरे नाम आया था.... यह बीकानेर के 70 वर्षिय सज्जन का था। कहानी के संदर्भ में उनकी प्रतिक्रिया से भीगने का क्रम जारी है। चाहे अखबार के पाठक ज्यादा हो, लेकिन जैसी प्रतिक्रिया किसी पत्रिका में प्रकाशित होने पर मिलती है, वैसी और कहीं से नहीं.....। खैर फिलहाल तो चश्माए महताब से रात के आने (आषाढ़ के भीगने...में भीगने) का इंतजार है।

Saturday, 6 June 2009

बेटा ! तूने ये सब कहाँ से सीखा?

यूँ इसका पता तो तीन महीने पहले से ही हो गया था लेकिन उस शाम जब दफ्तर में घड़ी की टिकटिक के साथ हम कदमताल कर रहे थे और उसकी सुई को थामे रखने की एक बेकार सी कोशिश कर रहे थे....तभी मोबाइल फोन की रूनझुन ने किसी का मैसेज आने का संदेशा दिया...हरदम कंपनी के ही मैसेज देखने और उन्हें तुरंत डिलीट करने के चक्कर में हमने तुरंत ही फोन लपका और रीड मैसेज के ऑप्शन को आदतन यस कर दिया......मैसेज था....कहानी पढ़ी पसंद आई...कांग्रेट्स...जौकी.....। काम वहीं रूक गया मैसेज फिर से पढ़ा.....फिर-फिर पढ़ा.....। खुद को संयत किया....और लग गए काम पर।
एक और शनिवार की बेकार सी छुट्टी..... मम्मी के घर....अननोन नंबर के कॉल के लिए जसराज जी की सरगम बजी....राँग नंबर कहने की गरज से उठाया तो फोन मुरैना का था....संदेश था कि आपकी कहानी मौत की हमें बहुत पसंद आई और आज हमने इसका पाठ किया....वातावरण निर्माण गजब का था आपको बधाई.....मन में और....व अच्छा काम करने का उत्साह जागा....। तो संदेश तो बस इतना ही है कि जून के पाखी के अंक में मेरी पहली कहानी प्रकाशित हुई और इस पर सबसे अच्छा कमेंट मेरी 70 साला ताई मेरी मानस माँ ने दिया....तीन पन्ने की कहानी को कुछ समझते और कुछ ना समझते हुए भी पुरे धैर्य से पढ़ा फिर बहुत प्यार से सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा-- बेटा ! तूने ये सब कहाँ से सीखा?
खुद के भटकाव को दिशा मिलने की खुशी मात्र है जिसे मैं आप सबसे बाँटना चाह रही हूँ.....रूटिन से विचार और विचार से सृजन की ओर बढ़े पहले कदम के लिए दुआओं की आस के साथ.....।

Thursday, 4 June 2009

मीडिया की भाषा: औदात्य बनाम डगाल

तेज, तीखी गर्मी और झुलसाने.....जलाने वाली गर्मी के बाद भी नम, नाजुक और खुबसूरत फूल जो अहसास जगाते है वह है प्रकृति की उदारता....उसकी उदात्तता का.....बस अपने पेज पर उस फोटो का शीर्षक दे दिया प्रकृति का औदात्य....अगले दिन जब दफ्तर पहुँच कर अपना अखबार देखा तो शीर्षक बदल दिया गया था.....जैसा हमेशा अच्छे शीर्षकों के साथ होता आया है.....साथ ही शाम को शो-कॉज नोटिस की तरह कहा गया कि औदात्य शब्द को पाँच शब्दकोषों में देखा.... कहीं भी वह शब्द नजर नहीं आया आपके पास कहीं हो तो कृपया दिखाएँ.....। लगा पूरा पढ़ा-लिखा दाँव पर लग गया.....यूँ भाषा के मामले में ज्यादा रूढ़ हूँ। कोशिश रहती है कि जहाँ तक हो सके अंग्रेजी के शब्दों से परहेज करूँ....खासतौर पर जब मामला खबरों का हो.....इसलिए यह तय था कि औदात्य कहीं पढ़ा हुआ शब्द है....खैर आखिरकार वह शब्द अपने विस्तृत अर्थ के साथ मिल गया।
उसी दिन एक हार्ड न्यूज में एक शब्द का प्रयोग हुआ डगाल....इससे कुछ दिन पहले हमारे माली ने जो यूपी का है और नितांत खड़ी भाषा बोलता है यह पूछ कर शर्मिंदा कर दिया था कि भाभीजी आपके अखबार में किस तरह की भाषा लिखी जाती है ट्रक के टल्ले से एक की मौत....? ये टल्ले का क्या मतलब होता है? सो उस दिन हम उससे बचते रहे....अब पता नहीं उसने वह खबर पढ़ी नहीं या फिर यह मान लिया हो कि इस अखबार में तो इसी तरह की भाषा इस्तेमाल होती है.... हम शर्मिंदगी से बच गए। इस मामले में जब वरिष्ठों से चर्चा की तो जवाब मिला कि बड़े-बड़े संपादक अपने संपादकीय में बोली के शब्दों का उपयोग करते हैं। सवाल तो उठा कि क्या न्यूज और व्यूवज अलग-अलग नहीं है? खैर आजकल ज्यादा बहस करना बंद कर दिया है इसलिए चुप हो गए.....लेकिन चुप हो जाने से यदि सवाल उठना ही बंद हो जाते तो दुनिया वहीं की वहीं रहती आगे नहीं बढ़ पाती...।
सवाल तो उठा कि आखिर मीडिया की भाषा कैसी हो?
इस देश में जबकि हर 10 किमी पर बोली बदल जाती हो..... वहाँ तो यह सवाल उठना बहुत जरूरी और लाजिमी है। नहीं उठे तो हो आश्चर्य......। फिर जब बोली बदलती है तो तय है कि भाषा में भी देशज शब्दों का प्रवेश होगा। तो फिर किसी ऐसी भाषा की जरूरत और बढ़ जाती है जिसका सम्प्रेषण असीम हो..... क्योंकि बोली की सम्प्रेषणीयता तो ससीम होती है....( अब बवाल तो ससीम शब्द पर भी उठ सकता है, क्योंकि ये बहुत प्रचलित नहीं है, लेकिन यह अखबार नहीं है, इसलिए कोई डर नहीं है)। यह सही है कि चूँकि अखबार का विस्तार साहित्य से ज्यादा है तो इसकी भाषा सरल और आम बोलचाल में प्रयुक्त होने वाली ही हो....लेकिन इसके साथ क्या इसका स्वरूप मानक भाषा का नहीं होना चाहिए?
अब डगाल और टल्ला टाइप शब्द मप्र के मालवा के पठार क्षेत्र की बोली के शब्द है जो इस भौगोलिक भाग के आसपास के हिस्सों की बोली से प्रभावित है....लेकिन इसकी ग्राह्यता मालवी बोली के दो ही क्षेत्रों तक सीमित है....शेष जगहों के लिए अनजान....। तो फिर क्या अखबार और टीवी की भाषा मानक हिंदी नहीं होनी चाहिए?
कहने को तो और भी बहुत कुछ है, लेकिन हम तो समय के प्रति ससीम हैं।

Saturday, 30 May 2009

बिखरे-बिसरे लम्हों के सूत्र

कच्चे-पक्के से मूड के बीच आई अनचाही छुट्टी.... तेज गर्मी के दौर में बस मानसून का इंतजार चल रहा है। आसपास जब भी फुर्सत भरी नजरें फेंको तो प्रकृति उत्सव की तैयारी करती नजर आती है। आँगन का नीम कुरावन के दुसरे दौर की हवाओं में झूम रहा है। दो दिन पहले बित्ते भर का फुटबॉल लिली का खूँटा आज तनकर आँखें दिखाने लगा..... अशोक पर तरह-तरह के परिंदे आने जाने लगे हैं....इंतजार तो यहाँ भी है उस उल्लास का जो प्रकृति के औदार्य और औदात्य के उत्सव से महकेगा.... लेकिन फिलहाल तो रोहिणी की तपन अंदर भी है बाहर भी....। एक अनाकार, अ-लक्ष्य और अनाम-सी बेचैनी..... एक छटपटाहट..... कुछ नहीं कर पाने और कुछ नहीं 'हो' पाने की.... यूँ ये होना बाहरी नहीं है.... लेकिन... शायद इस बेचैनी का सार ही इससे उबरने की कोशिश में निहित है। सो समय का उपयोग अपने बाहर के बिखराव को समेटने में क्यों नहीं किया जाए? बस यही सोचकर सतह पर दिखने वाली अस्त-व्यस्तता को समेटने की कोशिश करने लगी... क्योंकि गहरे में जाकर समेटना यानी कई दिनों की कवायद को न्योतना.... इसी में मेरे हाथ उस दौर की डायरी लगी..... जब सारे आदर्श आकर्षित करते थे.... उनमें कई सारे सूत्र मिले कई तो नितांत व्यक्तिगत और बहुत सारे व्यवहारिक.....कुछ बहुत भावुक और कुछ खालिस बुद्धिजन्य......। बस यूँ ही उन्हें संभालने के उद्देश्य से यहाँ दर्ज कर रही हूँ।
कमियाँ ही जिंदा रखती है, पूरापन मार देता है, एक आसान और सुखद मौत

यदि भलाई करना आपकी मजबूरी है तो ही आप भले आदमी हैं

संस्कारों और विचारों के द्वंद्व से जो कुछ निकलता है वही आधुनिकता है

पैदल चलने से आत्मविश्वास बढ़ता है

किसी से खुशी बाँटने से हम उसे करीब महसूस करते हैं, और दुख हम उसी से बाँटते हैं जो हमारे करीब होता है

और ये सूत्र हाल ही का है
सफलता से इतिहास उपजता है और संघर्ष से साहित्य
आपके अनुभव इससे मिलते-जुलते नहीं है?