Wednesday, 14 October 2009

गुम हो चुकी लड़की....छठी कड़ी


गतांक से आगे....
प्लेन से उतर कर एयरपोर्ट पर आते ही रिज़वान दिखाई दे गया जोर-जोर से तख़्ती हिलाता हुआ। मैं तेजी से उसकी तरफ पहुँचा तो वह तपाक से गले लग गया। मैंने हँसते हुए कहा-- वहाँ जर्मनी में भी तुम ऐसे ही मिले थे मुझे तख़्ती हिलाते हुए, तब मैं तुम्हें और तुम मुझे नहीं जानते थे....लेकिन आज ये क्यूँ? अब तो हम दोनों एक दूसरे को जानते हैं।
उसने हँस कर कहा--- दुनिया की भीड़ में कहीं तुम मुझे अनदेखा न कर दो, इसलिए...।
रिज़वान से मैं जर्मनी में ही मिला था, वहाँ वह कंपनी का काम मुझे हैंडओवर कर हिंदुस्तान लौट रहा था, उसके ही फ्लैट में फिर अगले पाँच साल मैं रहा था। मुझे 15 दिन की छुट्टी मिली थी, फिर बैंगलूरू ज्वाइंन करना है। आज तो पहुँचा ही हूँ.... कल हेडऑफिस रिपोर्ट करूँगा, फिर घर चला जाऊँगा....। रिज़वान मुझे अपने सातवीं मंजिल स्थित फ्लैट में पहुँचाकर ऑफिस चला गया और कह गया कि सात बजे आऊँगा.... फिर पार्टी में चलेंगे।
फ्रेश होकर खाना खाया थोड़ी देर टीवी देखा फिर लगा कि नींद आ रही तो सो गया। शाम को रिज़वान ने ही उठाया, वह पाँच बजे ही आ धमका...। दोनों ने चाय पी इधर-उधर की बातें की, फिर उसने पार्टी में जाने की बात कही, मैंने उससे कहा-- तुम चले जाओ, मैं यहीं रहूँगा।
उसने इसरार किया।--- मेरी गर्लफ्रैंड की बर्थ-डे पार्टी है, चल मजा आएगा तुझे।
मैंने रहस्य से उसकी ओर देखा... पहली या....!
वह मुस्कुराया- नहीं दुसरी....
पहली का क्या हुआ....?
चली गई स्टेट्स...।
और ये क्या करती है?
शी इज स्ट्रगलर एक्ट्रेस...एकाध टीवी सीरियल में छोटा-मोटा काम मिला है।
शादी करने का इरादा है?
करना तो चाहता हूँ, लेकिन वह नहीं चाहती है।
क्यों...?
कहती है अभी मैंने किया ही क्या है? फिर डर भी लगता है, अभी तो वह स्ट्रगल कर रही है, सक्सेसफुल हो जाने के बाद क्या वह मुझ जैसे प्रोफेशनल के साथ रहना पसंद करेगी....? फिर सोचता हूँ, यदि वह हम आज शादी कर लें और उसके सक्सेस होने के बाद हम निभा नहीं पाए तो....? इसलिए फिलहाल तो कुछ भी नहीं सोच रहा हूँ.... बस लाइफ इंजाय कर रहा हूँ। चल तैयार हो, बहुत हो चुकी बातें...., अभी तो तुझे चार दिन और रूकना पड़ेगा। यह कहने के लिए मल्टीनेशनल है... काम तो सरकारी गति से ही होता है यहाँ।
पार्टी हॉल में तेज रोशनी....तेज संगीत के बीच रिज़वान ने शब्दा और कुछ और दोस्तों से मिलवाया, फिर मैंने उससे पार्टी इंजाय करने का कहकर ड्रिंक लिया और एक कोना पकड़ लिया। आते-जाते, नाचते-हँसते एक दूसरे से मिलते बतियाते लोगों को देखते हुए मेरी नजर एक लड़की पर ठहर गई... वह डांस फ्लोर पर थी.... लगा कि इसे मैं जानता हूँ। पता नहीं कैसे उसने भी मुझे देखा और आश्चर्य से मेरी ओर देखकर हाथ हिलाया और मेरे सामने आकर खड़ी हो गई।
कब आए हिटलर के देश से....?---उसी तरह के तेवर से पूछा।
हिटलर का देश...!--- मैंने हँस कर कहा।- अब तो वो लोग भी उससे पीछा छुड़ाना चाहते हैं, तुम क्यों उन बेचारों के पीछे पड़ी हो?
मैंने उसे इस बीच देखा...लड़कों की तरह कटे हुए बाल... गहरा मेकअप और काले रंग के स्ट्रेप टॉप के साथ उसी रंग का टाईट स्कर्ट और पेंसिल हील.... बहुत बदली और अपरिचित लगी वह मुझे।
इतिहास से कभी भी भागा नहीं जा सकता....वो गाना नहीं सुना... आदमी जो कहता है, आदमी जो करता है जिंदगी भर वो दुआएँ पीछा करती है....संदर्भ से समझना... खैर तुम क्या गाना-वाना समझो तुम तो औरंगज़ेब हो....।--- उसने कहा।
अरे, पहले हिटलर, फिर औरंगज़ेब....क्या इन दिनों बहुत इतिहास पढ़ रही हो....तुम तो साहित्य की स्टूडेंट थी।
दुनिया में कुछ भी साहित्य से बाहर नहीं है, खैर हम फिर से नहीं झगड़ेंगे। तुम यहाँ कब आए....?
आज ही, और तुम यहाँ क्या कर रही हो?
बस यूँ ही सीरियल लिख रही हूँ, तुम ठहरे कहाँ हो?
रिज़वान के घर... दो-एक दिन में घर जाऊँगा।
क्यों नहीं तुम कल मेरे साथ डिनर करो.... बातें करेंगे। कुछ इतिहास याद करेंगे।
बिना कुछ सोचे मैंने उसे डिनर के लिए हाँ कर दी।
क्रमशः



निवेदनः इस लंबी कहानी को शुरू किया था तो इसका रंग-रूप कुछ दूसरा था....लेकिन पहली ही कड़ी के बाद मुझे यह अहसास हो गया था कि यह कहानी मैं नहीं लिख रही हूँ......यह मुझसे लिखवाई जा रही है। पात्रों को खड़ा करते ही वे मेरी गिरफ्त से बाहर हो गए और अपने-अपने रास्ते चल पड़े। इसलिए यह वैसी नहीं बन पाई जैसी मैं इसे बनाना चाहती थी। अब चूँकि अगली कड़ी में इस कहानी का समापन होने जा रहा है, मै अपने उन पाठकों से जो इसे लगातार पढ़ रहे हैं, निवेदन करना चाहूँगी कि, अब तक की कहानी को पढ़ने में उनके मन में जो चित्र बने हैं, उस आधार पर अपने कमेंट में वे यह बताएँ कि इसका अंजाम उनकी नजर में क्या हो सकता है? इस बात के लिए निश्चिंत रहें कि इससे कहानी के अंत पर कोई फर्क नहीं पड़ने जा रहा है। इस सारी कवायद का उद्देश्य मात्र मेरा लेखक (मात्र शब्द है, यहाँ भाव नहीं है) होने को रेटिंग देना है।

गुम हो चुकी लड़की....पाँचवी कड़ी


गतांक से आगे..
दीपावली मना चुकने के बाद परीक्षा की तैयारी का दौर शुरू हो चुका था....। शामें हल्की-हल्की ठंडक लेकर आने लगी थी। दोस्त के यहाँ सुबह से शाम तक पढ़ने के बाद देर शाम घर लौट रहा था कि गली के मुहाने पर मैंने उसे बदहवास हाल में पाया। दुपट्टा और टखने की तरफ से फटी हुई सलवार, कुहनी छिल गई और कलाई से खून टपक रहा था। उसके काईनेटिक के फुट रेस्ट पर लटके पालीथिन भी रगड़ गई थी और उसमें से सामान झाँक रहा था.... मैंने घबराकर पूछा--- क्या हुआ....?
उसके आँसू ही निकल आए.... पालीथिन बैग में पैर फँस गया और गिर गई...।
और ये कलाई में से खून क्यों निकल रहा है....?---खून देखकर मैं घबरा गया था। अपने जेब से रूमाल निकाल कर कलाई को बाँधा।
पता नहीं शायद कोई काँच का सामान टूट कर चुभ गया हैं।
मैंने अपनी गाड़ी वहीं खड़ी की और उसकी गाड़ी पर उसे बैठाया और घर छोड़ा.... जब अपनी गाड़ी लेकर घर पहुँचा तो माँ वहाँ जा चुकी थी।
चाची ने उसे पानी पिलाया और दीवान पर लेटा दिया। उसकी कटी हुई कलाई की ड्रेसिंग करते हुए बड़बड़ाई।--इस लड़की के मारे तो नाक में दम है। घर में इतने कप पड़े हैं, फिर भी चाय पीने के लिए इसे गिलास चाहिए।
गिलास....!---एकसाथ माँ और मैं दोनों ने पूछा...।
हाँ और नहीं तो क्या... कहती है कि सर्दी में काँच के गिलास में चाय पीना अच्छा लगता है। --- चाची ने कहा।
लेकिन अभी दीपावली पर ही तो हम दोनों काँच के गिलास लेकर आए थे...।-- माँ ने चाची से कहा।
वो तो गर्मी में शरबत पीने के गिलास है। सर्दी में चाय पीने के लिए नहीं है। सर्दी में तो लंबे और सँकरे गिलास होने चाहिए चाय के लिए....।--- अब तक वह स्वस्थ हो चुकी थी, इसलिए मासूमियत से बोली।
मुझे हँसी आ गई...तो वह चिढ़ कर बोली.... तुम्हें को कुछ समझ में आता नहीं है। सर्दी में चाय ज्यादा गरम चाहिए और चौड़े कप में जल्दी ठंडी हो जाती है, फिर उसकी क्वांटिटी भी अच्छी चाहिए... इसलिए काँच के गिलास चाहिए चाय के लिए....तुम तो निरे बुद्धु हो....।
कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं उसे सोचने लगा हूँ....। कभी-कभी तो यूँ भी भ्रम होता है कि मैं उसे जीने ही लगा हूँ। सब कुछ करता हूँ, तब वह मेरे आसपास नहीं होती है, लेकिन जब वह दिखती है तो फिर मेरे वजूद पर ऐसे होती है, जैसे जिस्म पर कपड़े.... फबते और लिपटे हुए-से....।

क्रमशः

Monday, 12 October 2009

गुम हो चुकी लड़की....चौथी कड़ी



गतांक से आगे
दो दिन से लगातार बारिश हो रही है..... घर से बाहर निकलने की भी मोहलत नहीं मिली। इन दिनों में सर्फिंग-चेटिंग...... मेलिंग-कालिंग.....टीवी और मूवीज सब कुछ हो चुका और अब बुरी तरह से ऊब गया हूँ....। अपने कमरे की खिड़की से बाहर की ओर देख रहा था कि माँ ने बताया कि वो बीमार है।
जब मैं उसके कमरे में पहुँचा तो वह सो रही थी, उसकी टेबल पर कबीर की साखी किताब पड़ी हुई थी। मैं चुपचाप कुर्सी पर जाकर बैठ गया। वह गहरी नींद में थी। उसकी आँखों की कोरों से कानों तक सूखे हुए आँसुओं के निशान थे। बहुत धीमी आवाज में गुलाम अली की गज़ल --- सो गया चाँद, बुझ गए तारे, कौन सुनता है ग़म का अफसाना.... चल रही थी। रोते-रोते सोए बच्चे की तरह ही उसने नींद में सिसकारी भरी। यूँ लगता है कि उसके अवचेतन पर कोई गहरी चोट हो....। मैंने वह किताब उठा ली और उसे उलटने पलटने लगा। तभी चाची कमरे में आ गई....अभी उठी नहीं।
हाँ गहरी नींद में है।
उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा तो वह चौंक कर उठ गई।
बेटा देख तुझसे मिलने कौन आया है।-- चाची ने कहा और वे हमारे बीच से सरक गई।
अरे.... कब आए..... मुझे उठाया क्यों नहीं।- उसने बीमार आवाज में पूछा।
तुम तो घोड़े बेचकर सो रही थी, मैंने आवाज भी लगाई, लेकिन तुम उठी ही नहीं।-- मैंने झूठ बोला।---क्या हुआ, क्या प्यार का ओवरडोज हो गया?--मैंने चिढ़ाया।
उसके चेहरे पर बहुत बारीक मुस्कुराहट आई।-- प्यार का कभी भी ओवरडोज नहीं होता, तुम नहीं समझोगे.....।
तभी चाची फिर से कमरे में आ गईं। --बेटा तुम्हारे दूसरे डोज का समय हो गया है।
न...हीं....--उसने बच्चों की तरह ठुनकते हुए कहा।
नहीं बेटा दवा नहीं लोगी तो ठीक कैसे होओगी?
उन्होंने उसके हाथ में पानी और दवाई दे दी और चली गईं। वह बहुत देर तक दवाइयों की तरफ देखती रही। मैंने पूछा कब से बीमार हो?
कल रात को तेज बुखार आया फिर उतर गया, फिर सुबह आया अब ठीक है।
चाची ने मेरे हाथ में चाय का कप और उसे दूध का गिलास थमाया और फिर चली गईं।
अब कैसा लग रहा है?
ठीक हूँ, बल्कि हल्का लग रहा है। --उसने चेहरे पर आए पसीने को पोंछते हुए कहा।-- यू नो बीमार होकर अच्छे होना बिल्कुल वैसा है, जैसे पुनर्जन्म हो....। सब कुछ नया-नया.... अच्छा लगता है।
इस बीमारी ने उसकी आवाज की चंचलता को गुम कर दिया .... ऐसा लग रहा था, जैसे आवाज बहुत अंदर से आ रही हो, ठहरी.... गंभीर और शांत। उसका चेहरा भी एकदम धुला-पुछा और सौम्य लग रहा था। उसने खिड़की की तरफ देखा... तो, क्या करते रहे दो दिन....? बारिश हो रही है घर से बाहर तो जा ही नहीं पाए होगे?
हाँ यार... सब कुछ करके भी समय नहीं कट रहा था।
उसने चिढ़ाया, क्यों....तुम्हारा इंटरनेट और ये वो... क्या काम नहीं कर रहे हैं? खुद से भागने के तो तमाम साधन है.... कम पड़ गए क्या? कभी खुद के पास ही बैठ कर देखो... हमेशा क्या अपने से भागना।--उसने आँखें मूँद ली।
मैं उसे देख रहा था, वो एकाएक बहुत बड़ी-बड़ी सी लगी....। मैं उसे सह नहीं पाया... और कबीर की शरण में हो लिया।
सुनो, तुम मुझे रजनीगंधा के बल्ब ला दोगे...?---उसने आँखें खोलकर पूछा।
रजनीगंधा के बल्ब....! कहाँ मिलेंगे....?
किसी भी नर्सरी में या फिर बीज की दुकान में। मैं चाहती हूँ कि इस सर्दी में घर के हर कोने में रजनीगंधा महके....।
मुझे उसकी आँखों में महकते रजनीगंधा दिखने लगे थे।
क्रमशः

Sunday, 11 October 2009

गुम हो चुकी लड़की




गतांक से आगे....


उस दिन जोर-जोर से आँधी चलने लगी और बादल घुमड़ आए.... मैं दरवाजे-खिड़कियों को बंद करन के लिए बाहर आया तो वह सामने थी.....चलो थोड़ा घूमकर आते हैं....उसने प्रस्ताव दिया।
पागल हो क्या....? मौसम खराब हो रहा है...। --मैंने कहा। तभी पानी बरसने लगा।
लगता है इस बार मानसून जल्दी आ गया है।
तुम पागल हो...यह मानसून नहीं है, यह मावठे की बारिश है। कभी जेठ में मानसून आता है....!
उसे बारिश में भीगते देखा तो मैंने कहा--भीग रही हो अंदर आ जाओ...बीमार हो जाओगी...।
वह हँसी..कोई प्यार से बीमार होता है क्या?
मैंने उसे आश्चर्य से देखा-- प्यार...
हाँ वेबकूफ.... ये आसमान का प्यार है जो बरस रहा है और तुम्हारे जैसे उल्लू घर में दुबके बैठे हैं। चलो घूमकर आते हैं।--- फिर उसकी रट शुरू हो गई।
मैं उसके साथ हो लिया। रास्ते में वह गड्ढों के पानी में छपाक-छपाक कर बच्चों-सी किलकारी मारती रही। बूँदों को दोनों हथेलियों के कटोरों में इकट्ठा कर पानी को मुझ पर उछालती रही। उस वक्त मुझे लगा जैसे वो कोई छोटी बच्ची हो और मैं उसका गार्जियन.... मैं उसे ये और वो करने के लिए मना करता रहा है और वह बच्चों जैसी शैतानी कर हँसती रही.....। मुझे एकाएक अपना होना बड़ा और महत्वपूर्ण लगने लगा। मेरे मन में अज्ञेय के शेखर ने सिर उठा लिया हो जैसे।
कई दिनों से सुन रहे हैं कि इस बार मानसून जल्दी आएगा। बादल तो गहरा रहे थे....लेकिन लगा नहीं था कि इतनी जल्दी बारिश होने लगेगी। अभी रास्ते में ही था कि बारिश आ गई। वो मुझे फिर से सड़क पर भीगती मिली....। मुझे हँसी आ गई। मैं घर पहुँचा तो उसने पूछा चाय पिओगे...?
तुम बनाओगी....
हाँ बढ़िया चाय.... तेज अदरक की तुर्श स्वाद वाली चाय....एक बार पी लोगे तो लाइफ बन जाएगी।
ये कहाँ से लाई....?
बस.... एकरसता बोर करती है, बदलाव करते रहना चाहिए। आ रहे हो....!-- उसने चुटकी बजाकर जैसे ऐसे पूछा जैसे चेतावनी दे रही हो।
मैंने कहा--कपड़े बदल कर आता हूँ।
घर पहुँचा तब तक वह कपड़े बदल चुकी थी। बालों को तौलिये से पोंछते हुए बोली-- बैठो... चाय बनाती हूँ।
मैंने उसे चिढ़ाया--- अभी तक चाय बनी ही नहीं, चाय है या बीरबल की खिचड़ी?
उसने आँखें तरेरी... मैंने भी कपड़े बदले हैं, फिर बाल तुम्हारी तरह थोड़े ही है एक बार पोंछ लो तो बस सूख ही जाएँगें।
मुझे आश्चर्य हुआ हम-दोनों बचपन से साथ-साथ है फिर भी कभी मेरा ध्यान इस ओर क्यों नहीं गया कि उसके बाल खासे खूबसूरत हैं। दरअसल मैंने कभी नहीं पाया कि वह लड़की है और मैं लड़का.... शायद उसने भी कभी नहीं सोचा होगा...तभी तो वह मुझसे इतनी बेझिझक है, एकाएक मैं उसे नजरों से तौलने लगा....और फिर खुद ही अपराध बोध से भर गया। पता नहीं कितनी देर बाद उसने मेरी आँखों के सामने चुटकी बजाकर मुझे सचेत किया।
कहाँ हो....! चाय...।
चाय वाकई अच्छी बनी थी, गले में तेज अदरक का स्वाद उतर रहा था, रहा नहीं गया, तुम तो अच्छी चाय बना लेती हो, सीख रही हो..... बहू-बेटियों के गुण....।-- जानता हूँ कि वह भड़केगी और वही हुआ।
ऐ......आगे से कभी ये कहना नहीं.....।
क्रमशः

Friday, 9 October 2009

गुम हो चुकी लड़की



गतांक से आगे....

देर शाम जब मैं गर्मी से घबरा कर छत पर आया तो उसे देखकर याद आया कि मैं उसे बहुत दिनों बाद देख रहा हूँ। सफेद कुर्ते पर हल्के गुलाबी रंग का दुपट्टा पड़ा हुआ था। अपने बालों को उसने बड़ी बेतरतीबी से उपर बाँध लिया था। उसकी छत की मुँडेर पर फिलिप्स का ट्रांजिस्टर जोर-जोर से मौसम आएगा, जाएगा प्यार सदा मुस्काएगा, गा रहा था। उसकी पीठ मेरी ओर थी और हम दोनों ही आसमान से फिसलते सूरज को देख रहे थे। बहुत देर तक वह यूँ ही खड़ी रही। पता नहीं क्यों मुझे लगा कि वह थोड़ी उदास है, जबकि मैंने उसका चेहरा नहीं देखा था। झुटपुटा उतर आया था। छत पर लगे हुए बिस्तरों पर वह लेट गई और आसमान को देखने लगी..... मैंने जोर से आवाज लगाई- बिल्लो.... और मुँडेर की आड़ में बैठ गया। वह उठकर आई और बहुत थकी हुई आवाज में बोली- मुझे मालूम था तुम ही होगे, तुम क्या कर रहे हो छत पर...?
क्यों मैं छत पर नहीं आ सकता?-- मैंने पूछा।
नहीं तुम्हें तो यह मौसम सड़ा हुआ लगता है ना, तो एसी में बैठो ना.... अभी थोड़ी ना ठंडी हवा चल रही है।
मैंने उसे खुश करने के लिए कहा-- मैंने सोचा क्यों न मैं भी तुम्हारी तरह गर्मी से बातें करूँ।
लेकिन वह और भी उदास हो गई, बोली- तुमसे नहीं होगा। उसके लिए तुम्हें 'मैं' होना पड़ेगा, वो नहीं हो सकता.....एक गहरी निःशब्दता दोनों के बीच की जगह में फैल गई....... अँधेरे में मैं उसे देख नहीं पाया.....फिर वह बुदबुदाई..... होना भी मत....बहुत बुरा है 'मैं' होना।
पता नहीं थोड़े-थोड़े दिनों में वह ऐसी क्यों हो जाती है? कोई दुख जैसा दुख नहीं है उसके जीवन में फिर भी गाहे-ब-गाहे वह उदास हो जाती है। यूँ कोई उसकी उम्र भी नहीं है उदास होने की, लेकिन फिर भी। एक दिन जब वह खुश थी मैंने उससे यूँ ही पूछ लिया था--तुम थोड़े-थोड़े दिनों बाद ऐसी अजीब-सी क्यों हो जाती हो?
वह जोर से खिलखिलाई थी- मैंने कहीं सुना था कि लड़कों को उदास लड़कियाँ रहस्यमयी लगती है, इसलिए वे उन लड़कियों से पट जाते हैं.... लेकिन देखती हूँ तुम्हें तो कोई फर्क ही नहीं पड़ता।
मैं जानता था कि वह मुझे बहला रही है, फिर भी मुझे हँसी आ गई।
क्रमशः

Thursday, 8 October 2009

गुम हो चुकी लड़की


दिसंबर जा रहा था..... वो गुजरते साल का एक और छोटा-सा दिन था...... गुलमोहर के पेड़ के नीचे धूप और छाह से बुने कालीन पर वो मेरे सामने बैठी थी। उसके सिर और कंधों पर धूप के चकते उभर आए थे..... मोरपंखी कुर्ते पर हरा दुपट्टा पड़ा था......कालीन की बुनावट को मुग्ध होकर देखती उस लड़की ने एकाएक सिर उठाया और उल्लास से कहा- बसंत आने वाला है। केसरिया दिन और सतरंगी शामें.....नशीली-नशीली रातें, रून-झुन करती सुबह.... नाजुक फूल..... हरी-सुनहरी और लाल कोंपलें.....ऐसा लगता है, जैसे प्रकृति हमें लोक-गीत सुना रही है।
हल्की सी हवा से उड़कर गुलमोहर के पीले छोटे पत्ते जैसे सिर और बदन पर उतर आए थे। मैंने उसे चिढ़ाया-- और फिर आ जाएगा सड़ा हुआ मौसम.....। उसकी आँखें बुझ गई.....। मैंने फिर से जलाने की कोशिश की.... जलते दिन और बेचैन रातों वाली गर्मी..... न घूम सकते हैं, न सो सकते हैं, न ठीक से खा सकते हैं और न ही अच्छा पहन सकते हैं। बस दिन-पर-दिन जैसे-तैसे काटते रहो....।
उसने प्रतिवाद किया- मुझे पसंद है। नवेली दुल्हन की तरह धीरे-धीरे चलता सूरज..... पश्चिम की ओर मंथर होकर उतरता सूरज, लंबी होती शाम.... बर्फ को गोले....मीठे गाने..... हल्के रंग....दिन की नींद, रातों में छत पर पड़े रहकर तारों से बातें करते हुए जागना....मुझे सब पसंद है।
और उस दिन..... वो बाजार में बसंती रंग का दुपट्टा ढूँढते हुए मिली थी। बसंत पंचमी पर केसरिया और मेहरून रंग के सलवार कुर्ते पर वही खरीदा हुआ दुपट्टा डाले घऱ आई थी। उसके पूरे बदन से बसंत टपक रहा था। माँ ने उसे गले लगाया कितनी सुंदर लग रही है.... मेरी तरफ देखकर मेरी सहमति चाही मैंने भी आँखों से हामी भर दी, लेकिन उसने नहीं देखा।
अपने दोस्तों से मिलकर जब मैं घर लौटा तो वह गली के बच्चों के साथ बर्फ के गोले वाले का ठेला घेरे खड़ी थी। पलटी तो मैं अपनी गाड़ी खड़ी कर रहा था। उसने मुझे देखकर हाथ हिलाया और मुस्कुराई.....गोला मेरी तरफ कर इशारा किया--खाओगे?
मैंने इंकार में सिर हिलाया तो उसने बुरा सा मुँह बना कर ऐसे भाव दिए जैसे गोला नहीं खाया तो मेरा जीना ही बेकार है।
क्रमशः

Monday, 21 September 2009

ब्रूस अल्माइटी और गॉड



तुम्हारे लिए ईश्वर क्या है?
कॉफी के कोको पावडर वाले झाग को चम्मच से सिप करती लड़की से विश्वविद्यालय के कैंटीन में बैठे लड़के ने पूछा।
इस एकाएक पूछ गए प्रश्न ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया। थोड़ी देर सोचने के बाद लड़की ने कहा। --ही इज लाइक पेरेंट टू मी....।
मतलब....?
मतलब जिससे मैं शिकायत कर सकूँ....डिमांड और जिद्द कर सकूँ..... रूठ सकूँ और अपने अभाव बता सकूँ, उन्हे दूर करने की गुजारिश कर सकूँ और अपने दुखड़े कह सकूँ।
बस...?
हाँ।
कॉफी पी चुकने के बाद अपने कप को टेबल पर रखते हुए लड़के ने बहुत सहानुभूति से कहा तुम्हारा ईश्वर तो बहुत बेचारा है। लड़की ने बहुत आहत होकर उसे देखा..... बेचारा क्यों?
बेचारा इसलिए कि तुम और तुम्हारे जैसे अनगिनत लोग उसके साथ वैसा ही कुछ करते होंगे, लेकिन वह बेचारा अपनी पीड़ा किससे कहता होगा?
वह ईश्वर है उसे कोई दुख नहीं होता है।- लड़की ने कप रखकर कुर्सी से उठते हुए कहा।
क्या वह मानवेत्तर है?- लड़के ने उसी गंभीरता से उससे प्रश्न किया।
हाँ वह देवता है।
तो क्या तुम यह कहना चाहती हो कि देवताओं को कोई दुख नहीं होता। दुख वहाँ नहीं होता मैडम, जहाँ कोई मानवीय भावना और संवेदना नहीं होती, और यदि ऐसा होता है तो वह न मानव होता है और न ही देवता.... वह तो.....।-- उसने अपनी बात अधूरी ही रहने दी। फिर कहना शुरू किया कि --- तुम्हारे इंद्र का सिंहासन विश्वामित्र की तपस्या से डगमगाने लगा तो उसने मेनका को विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए भेजा था। यदि हम ये माने तुम्हारे कथित ईश्वर देवता की श्रेणी के हैं तब भी उनके पास सुख-दुख, गर्व-अहंकार, असुरक्षा और तमाम मानवीय कमजोरी और भावनाएँ होंगी, तो फिर वह दुख से कैसे बच सकता है?
फागुन की शाम दोनों सूर्य के डूबने की दिशा की ओर ही बढ़ रहे थे। लड़की गुम हो गई थी डूबते सूरज की निष्कलुष मासूमियत और उदारता में.....। ये लड़की का सबसे पसंदीदा समय है। अपने सूरज से विदा होते दिन की उदासी के स्वागत के लिए वह अपने कमरे की सारी खिडकियों और दरवाजों को खोल देती है, जिससे धीरे-धीरे उदास साँवलापन उसके कमरे में आश्रय पा सके। फिर धीरे-धीरे घना होता अंधेरा..... उसे अच्छा लगता है, क्योंकि उसमें कुछ भी और नहीं होता......बस खुद के होने का अशरीरी अहसास होता है। न दुनिया और न अहसास-ए-दुनिया.....। रोशनी में भटकाव होता है.... अंधेरे में एकाग्रता। वह किसी से भी इन बातों को नहीं कहती क्योंकि उसे डर है कि तमसो मा ज्योतिर्गमय की संस्कृति में अंधेरे के प्रति इस तरह का दर्शन कहीं उसे उपहास का पात्र न बना दे....।
15 साल बाद
एक 'सी' सिटी में वह लड़की अपने घर के सामने ढेर सारे शॉपिंग बैग संभाले कार से उतरी। उस लड़के ने जो कि अब उसका पति है उससे कहा कि बाकी बचे हुए बैग्स मैं ले आऊँगा, तुम जाओ....। अपने घर के ड्राईँग रूम में सारे शॉपिंग बैग्स फैला कर वह लड़की देख रही है। अचानक वह उदास हो गई... क्यों..... उसे लगा कि इतने सारे बैग्स के बीच वह कुछ छोड़ आई है, कुछ उससे छूट गया है, फिसल गया है..... उसे खुद पर अचरज हुआ.... जीवन में जिस चीज को उसने अभाव माना था, वो सब मिट गए हैं, वह वो सब कुछ कर सकती है, जो वह शुरू से करना चाहती थी.... फिर भी सब कुछ वैसा नहीं है जिसकी उसने कभी कल्पना की थी.... फिर....! वो सब कुछ मृग तृष्णा थी....? लगा कि ईश्वर ने देर से ही सही उसकी सारी इच्छाएँ पूरी की, फिर कहाँ क्या रिक्त रह गया.... अब वह और क्या चाहती है? तभी वह लड़का भी अंदर आ गया और उसने फैले बैग्स के साथ कुछ और बैग्स रख दिए। उस लड़की की तरफ प्यार से देखते हुए पूछा....खुश....! उसने अपनी आँखों में आए आँसूओं को छुपाते हुए हाँ में सिर हिला दिया.... समझीं कि लड़के ने नहीं देखे, लेकिन उसने देख लिए थे, क्या हुआ.... उसने हँसते हुए लड़की के सामने अपनी बाँहें फैला दी.....और लड़की उसके सीने में अपना सिर गड़ाकर सिसकियाँ भर कर रोने लगी.....। वह कार्तिक की शाम थी.... दीपावली अब करीब थी और लड़की ने मन भर शॉपिंग की थी। लड़की समझ नहीं पाई कि वह क्यों रोई.... लड़का शायद जानता था कि वह क्यों रोई...?
टीवी पर ब्रूस अल्माइटी फिल्म आ रही थी। ब्रूस एक टीवी रिपोर्टर है और लगातार अपनी असफलता से दुखी है, उसे नौकरी से निकाल जा चुका है और वह निराश है, तभी उसके पेजर पर एक मैसेज आता है कि उसे यदि नौकरी की जरूरत है तो वह इस पते पर मिले....। वह उस जगह पहुँचता है, एक बड़ी सी बिल्डिंग में जहाँ कोई नहीं और कुछ भी नहीं होता है, वहाँ एक सज्जन सफाई करते हुए मिलते हैं। थोड़ी देर बाद... वे उसे बताते हैं कि वे गॉड है ब्रूस को विश्वास नहीं होता, वे उसे कुछ चमत्कार दिखाते हैं, फिर उसे विश्वास होता है।
गॉड उसे अपनी शक्तियाँ देते हैं और कहते हैं कि इनके उपयोग दूसरों की भलाई के लिए ही करना है। शक्तियाँ मिलते ही ब्रूस के सपनों को पंख लग जाते हैं और वह तमाम ऊलजुलूल हरकतें करने लगता है, लेकिन शक्तियाँ मिलते ही एकाएक उसे बहुत सारी आवाजें भी सुनाई देने लगती है। जब वह फिर से गॉड से मिलता है तो वह उन आवाजों का जिक्र करता है। गॉड बताते हैं कि वे सारी रिक्वेस्ट की आवाजें है। और यह पूरी दुनिया से नहीं बल्कि सिर्फ बफेलो स्टेट के ही लोग है। ब्रूस एक सिस्टम बनाता है, जिसके तहत उसे कम्प्यूटर पर सारी रिक्वेस्ट मिलती है। रिक्वेस्ट इतनी ज्यादा होती है कि ब्रूस के पास पढ़ने का धैर्य भी नहीं होता है, इसलिए वह सभी को यस कर देता है।
लड़की को पहली बार 15 साल पहले लड़के द्वारा कही गई बात का मतलब समझ में आता है। ईश्वर बहुत बेचारा है, क्योंकि उसके उपर कोई नहीं है, वह अपनी परेशानी किसी से शेयर नहीं कर सकता है। उसे एकाएक ईश्वर से सहानुभूति होने लगी....। लड़का पूरी तन्मयता से फिल्म देख रहा है और लड़की उसे देखते हुए सोच रही है कि क्या उसे याद है कि कभी उसने मुझसे कहा था कि तुम्हारा ईश्वर बेचारा है।

Tuesday, 15 September 2009

हिंदी दिवसः कसीदा और मर्सिया

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हिंदी दिवस की बरसी मना ली, (यूँ बरसी का शाब्दिक अर्थ बरस से जुड़ता है, लेकिन हमारी परंपरा में इसक शब्द का उपयोग शुभ के लिए नहीं किया जाता है... और यहाँ इसका प्रयोग उसी प्रतीकात्मकता के साथ हुआ है।), कुछ ने हिंदी की प्रसार और लगातार उसकी अच्छी स्थिति को लेकर कसीदे पढ़े तो कुछ ने बदहाली के लिए मर्सिया पढ़ा.... कहीं सप्ताह तो कहीं पखवाड़े का आयोजन किया जा रहा है..... किसी ने दिन मना कर ही अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली। इस पूरे समय में हिंदी को लेकर अखबारों में लेख और टीवी पर चर्चाएँ सुनी गई....किसी के अनुसार बाजारीकरण ने हिंदी के प्रसार-प्रचार में बड़ी भूमिका निभाई है तो कोई हिंदी के हिंग्लिश होने से खफ़ा है। कुल मिलाकर हर साल जो होता है, इस बार भी वही हुआ... फिर भी हिंदी की राष्ट्रभाषा के तौर पर क्या हैसियत है, इस पर सवाल उठाया जाना जरूरी है क्योंकि सवाल होंगे तो ही तो जवाब होंगे।

एक तरफ हिंदी को बाजार ने हाथोंहाथ लिया है.... इसलिए नहीं कि बाजार को इसकी वैज्ञानिकता से प्यार है या फिर हमारी राष्ट्रभाषा होने से आस्था थी, यह बाजार की मजबूरी है... उसे अपना माल ग्राहकों की भाषा में ही बेचना पड़ेगा, यह कोई हमारी भाषा से मुरव्व़त का मामला नहीं है।

हाँ मनोरंजन के माध्यमों में हिंदी की पकड़ ने जरूरी थोड़ी बहुत आशा जगाई है, लेकिन असल मामला है रोजगार पाने का.... जो भाषा रोजगार दिलाने में सक्षम है, बस वही जीवित रह पाएगी...इसमें हिंदी अंग्रेजी से बहुत पीछे नजर आती है, हिंदी की जरूरत है, लेकिन एक वैकल्पिक भाषा के तौर पर.... अंग्रेजी की जानकारी जरूरी है। अनुभव कहते हैं कि आप कुछ नहीं जानते और सिर्फ अंग्रेजी जानते हैं तो आपके सामने अवसरों का भंडार है, लेकिन यदि आप बहुत कुछ जानते हो और अंग्रेजी नहीं जानते हो तो आपका कुछ भी जानना बेकार है। हिंदी भाषी क्षेत्र में हिंदी के दैनिक अखबार में काम करते हुए भी लगभग हर दिन अंग्रेजी से भिड़ंत होती है, ट्रेनिंग के दौरान हर दिन हिंदी से अंग्रेजी और अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद की मशक्कत यह साबित करती है कि मात्र हिंदी के ज्ञान से ही जीवन की नैया पार नहीं लगाई जा सकती है। इसलिए जरूरत इस बात है कि अब शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी ही कर दिया जाए.... क्योंकि अब मामला सम्प्रेषण से आगे जाकर जीवन-शैली, रहन-सहन और उससे भी उपर समाज की समता और विषमता तक पहुँच गया है, तभी तो मजदूर भी अपने बच्चे को हिंदी में नहीं पढ़ाना चाहता है, क्योंकि वह यह जानता है कि मात्र हिंदी पढ़कर वह बेहतर जिंदगी नहीं जी पाएगा। इसलिए अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा कम-अस-कम इस विषमता को कुछ तो कम किया जा सकेगा और फिर इसमें ही प्रतिभा का आकलन भी हो पाएगा, फिलहाल तो वो प्रतिभाशाली है जो अंग्रेजी बोल पाता है.... आप यकीन करें या ना करें.....!


Sunday, 13 September 2009

खबरों की चिता पर रोटी सेंकते समाचार माध्यम



सूचना क्रांति के इस दौर में समाचार माध्यम संकट से गुजर रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट दोनों के सामने ही अस्तित्व बचाने का संकट खड़ा हुआ है। यह संकट पाठक या दर्शक को उतना नहीं दिखता जितना इस उद्योग के कर्ताओं के समक्ष खुलता है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में यह टीआरपी की शक्ल में और प्रिंट में सर्क्यूलेशन की शक्ल में विद्यमान है। और इस संकट ने इसकी गुणात्मकता को बढ़ाने की बजाय कम कर दिया है। आर्थिक उदारवाद का सिद्धांत तो यह कहता है कि प्रतिस्पर्धा से गुणवत्ता बढ़ती है, लेकिन समाचार माध्यमों में इसका ठीक उलटा हो रहा है और उस पर तुर्रा ये कि कहा ये जा रहा है कि पाठक और दर्शक आजकल यही पसंद करते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक में 24 घंटे नई खबरें देने का और प्रिंट में ताजी खबरें देने के संकट के बीच प्रिंट में दोहरी मुश्किल है, एक अपनों के ही बीच में प्रतिद्वंद्विता और दूसरा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से प्रतिस्पर्धा... दोनों ही स्तर पर खुद को स्थापित करना और फिर बनाए रखना एक दुश्कर टास्क बनता जा रहा है। पाठक फिलहाल तो बस न्यूज और व्यूवज का फर्क ही समझता है और यदि आम पाठक की बात करें तो वह तो बेचारा अखबारों की मैनुपिलेटेड दुनिया को ही सच समझता है। इन दिनों चूँकि अखबार ताजा खबरें दे पाने की चुनौतियों से लड़ रहे हैं, ऐसे में न्यूज और व्यूवज के बीच एक और चीज पनपी है जिसे स्टोरी कहते हैं..... अब पाठकों की समझ में यह नहीं आता कि ये स्टोरी क्या बला है, लेकिन हाँ पत्रकार जानता है कि ये स्टोरी क्या कमाल की चीज है। ये स्टोरी एक पत्रकार को फर्श से उठाकर अर्श तक पहुँचा देती है। ये खबर के एंगेल को बदलती है और फिर इसमें उससे जुड़े विशेषज्ञों से कुछ सनसनीखेज जानकारी ली जाती है और तैयार हो जाती है स्टोरी...। न इसके कुछ आगे सोचने की जरूरत है और न ही पीछे.... दरअसल दिनों-दिन समाचार माध्यमों की दुनिया भयावह होती जा रही है, इसमें कोई सोच, कोई जिम्मेदारी, कोई दूरदृष्टि नजर नहीं आती.... गलाकाट स्पर्धा के दौर में यदि नजर आती हो तो मात्र किसी भी तरह से आगे निकलने की हड़बड़ी..... व्यक्तिगत भी और संस्थागत भी.....और इसके लिए आसान और शॉर्टकट है सनसनी फैलाना...... स्वाइन फ्लू के ही मामले को ले लिजिए...., जितने लोग इस बीमारी से अब तक मरे उससे ज्यादा लोग एक दिन में सड़क दुर्घटना में मर जाते हैं....फिर अभी अखबारों और टीवी चैनलों के लिए यह एक ऐसा मुद्दा था, जिसे कई दिनों तक भुनाया गया। फिर अखबारों के लिए इतना ही काफी नहीं था इसमें बर्ड फ्लू और भी न जाने कौन-कौन से फ्लू का तड़का लगाया और तैयार हो गई एक सनसनाती अखबारी रैसिपी....इसके लिए पत्रकार को ज्यादा कुछ नहीं करना पड़ता.... किसी डॉक्टर से इस सिलसिले का एक बयान दो और छाप दो... अखबार में इसके लिए उसे क्रेडिट भी मिलेगा... ना तो वह पत्रकार यह सोचेगा कि इसका इम्पैक्ट क्या होगा और न ही इसके इम्पैक्ट पर चयन प्रक्रिया में विचार किया जाएगा। इसका परिणाम... बीमारी से दहशत.....क्योंकि आज भी दूरदराज का पाठक इस दुनिया से दूर है और वह इसकी सच्चाई पर विश्वास करेगा। स्वाइन फ्लू से पहले मुम्बई हमलों के दौरान भी टीवी चैनलों ने जिस तरह का कवरेज दिखाया था, उसने हमारे इलक्ट्रॉनिक मीडिया की जिम्मेदारी और भूमिका पर सवाल उठाए थे...। सवाल यह है कि इस माध्यम में आए अधकचरी समझ और गैर-गंभीर लोग इसे कितना समृद्ध कर पाएँगें। फिर इस क्षेत्र में आने वाले नौजवानों से बात करें तो समझ में आएगा कि क्यों जर्नलिज्म का स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है। सारे नए लोग इस क्षेत्र में इसलिए आना चाहते हैं, क्योंकि यहाँ पॉवर है....कॉटेक्टस हैं... ग्लैमर है.... बस.... न इससे ज्यादा की उनको जरूरत है और ही कुछ इससे ज्यादा सोचना है। तो अब इस सबमें खबरें कहाँ है? यहाँ खबरों की चिता है और उसपर सिंकती मीडिया की रोटियाँ है। खबरों से तथ्यपरकता तो न जाने कहाँ चली गई और इसमें आ गया एंगेल..... अभी तक ये बीमारी सिर्फ इतिहास लेखन तक ही सीमित थी अब इसने समाचार माध्यम को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है। कभी-कभी तो समझ में नहीं आता कि इस माध्यम में काम करने वाले नए लोग ऑब्जेक्टिवीटी और सब्जेक्टिवीटी में फर्क भी समझते हैं या नहीं?

Monday, 7 September 2009

मैंने जो संग तराशा वो खुदा हो बैठा



इन दिनों अखबार में और ई-पेपर में दोनों ही जगह राशिफल देखा जा रहा है...... अस्थिर मानसिक स्थिति में अमूमन यही होता है... इन दिनों भी... यह पता होने के बाद भी कि कभी भी ये सच नहीं हुई..... कम-अस-कम शुभ होने की सूचना तो बिल्कुल भी नहीं.... फिर भी देखी जा रही है..... क्यों? हम खुद से उपर किसी को चाहते हैं .... कि अपनी असफलता, दुख, कमी या अभाव का ठीकरा उसके सिर फोड़ सके.... उसे भाग्य कह लें, ईश्वर कह लें या फिर बहुत वैज्ञानिक होकर परिस्थिति......।
एक बार फिर से भगवतीचरण वर्मा की चित्रलेखा सामने है और लगभग तीसरी दफा पढ़ रही हूँ.... हर बार कोई नया अर्थ मिलता है.... इस बार फिर से.... इसी में कहा गया है कि जिस ईश्वर की हम पूजा करते हैं, उसे हमीं ने बनाया है। इसी तरह की बात कामू की किताब रिबेल में पढ़ी थी---The conception of GOD is the only thing for which man can not be forgiven. दरअसल ईश्वर की हमें जरूरत है, इसलिए वह है.... एक बार पहले भी शायद मैंने लिखा था कि जब तक एक भी सवाल जिंदा है ईश्वर का होना जिंदा है....।
इस तरह से हम 'उसके' होने को कम नहीं कर रहे हैं, महत्व को बढ़ा रहे हैं। इसे प्रतीकात्मक तौर पर हम प्रतिमा के निर्माण और फिर उसके विसर्जन से भी समझ सकते हैं। गणपति की प्रतिमा या फिर दुर्गा प्रतिमा का मिट्टी से निर्माण, स्थापना, प्रतिष्ठा और फिर विसर्जन के पीछे वही सच काम करता है जिसे कामू ने शेख सादी के हवाले से कोट किया है, लेकिन क्या इतना ही...? हमें अपनी असफलता के लिए ही नहीं अपनी खुशी के लिए भी ईश्वर के विचार की जरूरत है। क्योंकि उस विचार की धूरी के आसपास ही सब कुछ घूमता है..... आनंद भी....। तभी तो मार्क्स ने धर्म को अफीम कहा है... जिसके नशे में हैव्स नॉट अपनी सारी दुख तकलीफों को भूल जाता है.... कभी देखें गणपति के जुलूस या नीचली बस्ती में हो रहे नवरात्र उत्सव को.....उन झूमकर नाचते गाते लोगों के शरीर अभावों की चुगली करेंगे लेकिन चेहरों से टपकता उल्लास उस सबको झूठ साबित कर देगा....तो भौतिक चीजें झूठ है और आनंद ही सबसे बड़ा सच है.... एक बार फिर से ब्रह्म सत्य और जगत मिथ्या....? ये शंकर के दर्शन का अति साधारणीकरण हो सकता है, लेकिन हम स्थूल दुनिया के बाशिंदे तो दर्शन को ऐसे ही समझ सकते हैं.... नहीं ये मजाक नहीं है। दरअसल हर कीमत और हर हाल में परमानंद ही सच है... फिर वो प्रार्थना से मिले या फिर शराब से....लेकिन फिर पाप-पुण्य.... अरे भई यही तो चित्रलेखा भी नहीं समझ पाई.... ना श्वेतांक, न विशालदेव और न ही महाप्रभु रत्नांबर तो फिर हम-तुम किस.....?

Tuesday, 1 September 2009

जीना इसी का नाम है



फिर से एक मुश्किल दौर... हरदम भागना.... हर पल को पकड़ कर निचोड़ लेने की बेकार और असफल-सी कोशिश... पता नहीं किस बात की जल्दी... कभी-कभी ये किसी मानसिक समस्या का लक्ष्ण लगता है। हर क्षण को अर्थपूर्ण बनाने के चक्कर में लगातार खुद से दूर...। किसी काम को करने से क्या मिलेगा जैसा प्रश्न हमेशा उठता है (नहीं ये मिलना भौतिक नहीं है, इसलिए ज्यादा घबराने की वजह भी नजर नहीं आती)। कुछ भी हल्का-फुल्का नहीं चाहिए... गहरा विचार, गंभीर लेखन, डूबोने वाला संगीत, गहरी नींद....गहरी अनुभूतियों से पगे पल(जबकि अनुभूतियों तक पहुँचने के लिए धीरज की जरूरत होती है। इस तरह की दौड़ तो झड़ी लगी बारिश की तरह है जो होती तो बहुत तेज है, लेकिन जब पानी ठहरता ही नहीं है तो फिर उतरेगा कैसे? गहरे उतरने के लिए तो उसका रिसना जरूरी है, और इसके लिए बादलों का धीमे-धीमे झरना.... फिर...?) हर पल कुछ ना कुछ करना..... सुनना, सोचना, लिखना, पढ़ना, काम करना, नौकरी करना, सोना....लेकिन इन सबमें हम कहाँ है? हम सबकुछ में खो रहे हैं। घड़ी की सुई पकड़े धीरे-धीरे सरक रहे हैं और समय को हाथ से छूटते देख रहे हैं....महसूस नहीं कर पा रहे है, कभी रूककर समय के सरकने और खुद के बहने को महसूस करने की फुर्सत नहीं पाते या ऐसा करना ही नहीं चाहते, क्योंकि कहीं पढ़ा था कि --- इनर हमेशा इन्टॉलरेबल होता है.....। तो क्या खुद से भागकर कुछ पाया जा सकता है? हाँ बहुत कुछ.... बल्कि यूँ कहे कि खुद से भाग कर ही पाया जा सकता है, जो चाहो....यदि याददाश्त ठीक है तो युंग ने कहा था कि दुनिया का सारा सृजन खुद से भागने की प्रक्रिया है, या फिर शायद ये मेरा ही ईजाद किया सूत्र है, लेकिन ये हमेशा सही लगता है। फिर खुद के पास रहने की इस तड़प का क्या मतलब है? क्या ये पलायन है या फिर तमाम अर्थहीनता की तीखी चेतना.... स्थूल और सुक्ष्म दुनिया में बारी-बारी से डूबने-तैरने का दौर.... भौतिकता और आध्यात्मिकता की साझी भूख.... अंदर और बाहर को भरने और जानने के बीच संतुलन को साधने का प्रयास...जिंदा रहने और जीने के बीच की खूबसूरत संगत.....! शायद जीना इसी का नाम है।
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इसी छीजते जाते जीवन में किसी गहरी अनुभूति के पल में फिर से सूत्र के मोती हाथ आए हैं।
# एक ही समय में कई सच होते हैं, जो एक-दूसरे के विपरीत होते हैं।
# रोना भी सृजन करना ही है।
# सौन्दर्य हमेशा दुर्गम होता है।
# जीवन के हर क्षेत्र में चढ़ाव मुश्किल और ढ़लान आसान होती है।

Tuesday, 25 August 2009

अब करें मंदी का इंतजार...




आसमान बेईमान हो चुका है। पूरे देश से दिल दहलाने वाली खबरें आ रही है। धरती रूखी-सूखी और पपड़ाने लगी है। कहा जा रहा है कि यह इस सदी का सबसे बड़ा सूखा है। मौसम विभाग हमेशा की तरह ही असमंजस में रहा और उसने उसी की रचना की। पहले कहा मानसून समय से पहले है और अच्छा है.. फिर बंगाल की खाड़ी से आए तूफान ने बादलों की दिशा बदल दी तब कहा कि देर से है, लेकिन दुरूस्त है। फिर कहा कि औसत से सात फीसद कम होगी बारिश...फिर कहा कि 17 और अब जो आँकड़े आ रहे हैं, वे हमें साल भर के लिए दहशत में डालने के लिए काफी हैं। औसत से 37 फीसद कम बारिश से खरीफ की 50 प्रतिशत फसल को नुकसान....लेकिन इसी दरम्यान अमेरिकी मौसम विभाग ने कह दिया था कि ला-नीनो इस साल सक्रिय है और उसका असर एशिया में होगा और भारत में इस बार मानसून दगा दे सकता है, लेकिन हर बार की तरह ही इस बार भी हमने मानसून पर भरोसा किया (हम कुछ और कर भी नहीं सकते हैं) और वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था। इस बीच
पैमाने में छूटने जैसा पानी भी बरसा...और हमारे पास उससे खुश होने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं बचा।
दरअसल अब समय आया है, मंदी से निबटने के चुस्त उपाय करने का। फिलहाल हमारे सामने मंदी का जो भी भूत खड़ा है वह आयातित व्यवस्था की डमी है। 59 सालों से योजनाओं के माध्यम से विकास करने की कोशिश करते देश में आज भी उद्योगों का अस्तित्व अर्थव्यवस्था को वैसे प्रभावित नहीं करता, जितना मानसून...क्योंकि चाहे कृषि पर निर्भरता का आँकड़ा 75 से खिसक कर 60 प्रतिशत पर आ गया है, फिर भी देश की 60 प्रतिशत जनता की क्रयशक्ति देश की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करती है। जितना अर्थशास्त्र पढ़ा है, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था का मूलाधार कुल माँग है। और माँग के मूल में है क्रय शक्ति....। यदि देश की 60 प्रतिशत जनता के पास क्रयशक्ति नहीं है तो फिर माँग कहाँ से बनेगी? और यदि माँग ही नहीं बनेगी तो फिर उत्पादन का क्या होगा?
भारत के आर्थिक इतिहास को उठा कर देख लें..... जब कभी मानसून अच्छा होता है, खरीफ के बाद दीपावली की रौनक देखने के काबिल होती है। बाजार रोशन होते हैं और किसानों के घरों में सामानों की भरमार होती है। तो अब जबकि खऱीफ की फसल निकालने जैसा ही पानी नहीं गिरा हो तो फिर अगले पूरे साल के लिए बाजारों में मंदी का ही आलम रहेगा। चाहे जर्मनी और फ्रांस से मंदी के उबरने जैसी उत्साहजनक खबरें आ रही हो....लेकिन हमारे देश में मंदी का चक्र अब शुरू होगा....क्योंकि हमारे किसान यदि खुश नहीं है तो फिर पूरा देश कैसे खुश हो सकता है? अभी तो हम अर्थव्यवस्था की ही बात कर रहे हैं, खाद्यान्न संकट पर तो सोचना शुरू ही नहीं किया है, मंदी ने इस विश्वव्यापी प्रश्न को फिलहाल तो हाशिए पर पटक दिया, लेकिन जल्दी ही हमें इस पर भी विचार करना होगा, ये मामला अर्थव्यवस्था का नहीं.... हमारी भूख का है... नहीं!

Sunday, 16 August 2009

'वह अर्थशास्त्री'


लाई हयात आए, ले चली कज़ा चले
अपनी ख़ुशी से आए न अपनी ख़ुशी चले
सुबह की गाढ़ी नींद में उलझा हुआ था ये शेर नींद खुली तो टप से गिरकर दिन पर बिखर गया। फिर खुली सवालों की पोटली, उसमें से निकला सवाल.... है और होना चाहिए, पाने और होने.....ख़्वाहिशों और हकीकतों, चाहने और पाने के बीच की खाई इतनी चौड़ी क्यों है? क्यों है ये असंगति.... ये एब्सर्ड(कामू के शब्दों में)? क्या है जो हमें तमाम प्रयासों के बाद भी उससे दूर रखता है जिसकी हमें उस समय में सबसे ज्यादा जरूरत होती है? हमारे पास हर चीज के लिए शब्द हैं, इसके लिए भी है.....परिस्थिति....समय का फेर..., योग्यता, प्रतिभा और अवसर की कमी...सारी स्थूलता, वो जो दिखाई देता है। फिर भी सवालों की आग बुझ नहीं पाती है। बहुत सुविधा से भाग्य या प्रारब्ध जैसे शब्दों से कन्नी काट लेते हैं, क्योंकि हमें विज्ञान ने सिखाया है कि जो दिखता है, बस वही सच है, शेष कुछ है ही नहीं, झूठ भी नहीं, क्योंकि झूठ होने के लिए भी तो कुछ होने की जरूरत होती है। हम सूक्ष्मता को देखते नहीं है, देखना नहीं चाहते हैं, क्योंकि वह समय के अनुकूल नहीं है। हम क्षणवादी हो रहे हैं, 'आज' सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, वही सच है, कल भ्रम है, बीता हुआ भी और आने वाला भी। इसीलिए भावनाओं और विचारों के अस्तित्व पर हम विचार नहीं करते हैं। हम डरते हैं, पीड़ा से.... असफलता से.... तकलीफ से....प्रकारांतर से ख़ुशी से भी...।
फिर भी कुछ तो है, कोई तो है जो सीमित संसाधनों से असंख्य लोगों की अनगिनत इच्छाओं का सामंजस्य करता है। वह पूरी दुनिया के लिए अर्थशास्त्री की भूमिका का निर्वहन कर रहा है। कह सकते हैं कि अभी इस गुत्थी को हम सुलझा नहीं पाए हैं, इसलिए 'उसका' अस्तित्व है। अक्सर यह विचार आता है कि 'उसका' होना सवालों से शुरू हुआ था और वह तब तक होगा जब तक हमारे पास एक भी सवाल है....इसके आगे कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।


Sunday, 2 August 2009

सच क्यों हो रूसवा...?



छुट्टी का दिन एक बेहतर अनुभव के साथ उगा यूँ दीगर परेशानियों की किरकिरी तो साथ ही रहती है, लेकिन जैसा कि दर्द की शुरूआत में वह शरीर के किसी कोने में आराम से आश्रय पा लेता है, इसी तरह परेशानी की शुरूआत पहले तो बस जगह ही घेरती है फिर.... फिर का कह नहीं सकते हैं। तो बिना घड़ी की सुईयों को देखें बस प्रवाह का हिस्सा हुए... लेकिन ज्यादा देर तक ये सब नहीं चल पाया। आखिरकार घर में हर जगह टँगे उस अनुशासन का क्या किया जाए जो कमोबेश हमारी बॉयोलॉजी का भी हिस्सा हो चुका है... तो सुई का सिरा भी हाथ में आ गया फिर भी मंथर हवा सा दिन उड़ रहा था।
अचानक बहस का रिपीट टेलीकॉस्ट देखकर रिमोट पर अगला-अगला स्विच दबाती उँगली रुक गई.... बहस चल रही थी टीवी रियलिटी शो सच का सामना पर....। कोई पक्ष में तो कोई विपक्ष में अपने भोथरे और धारदार तर्क फेंक रहा था। किसी की ढाल भारतीय संस्कृति थी तो किसी की ढाल सच....। अब कोई इनसे पूछे कि सच क्या है? और कोई ये भी पूछ ले कि आखिर ये संस्कृति किस चिड़िया का नाम है थोड़ी फुर्सत हो तो लगे हाथ ये भी बता दें। खैर साहब... इसी बीच राजेश ने बताया कि उनेक कॉलेज के प्यून ने उन्हें बताया कि कैंटीन में बच्चे सच का सामना खेल खेलने लगे हैं। टीवी ने एक नया खिलौना जो दिया है बच्चों को भी और बड़ों को भी (तभी तो संसद का कीमती समय और ऊर्जा इस नामालूम से प्रोग्राम के पीछे खर्च की जा रही है।) ठीक भी है जब आप सारे देश के सामने सच का ढिंढोरा पीट रहे हो तो फिर बच्चे अपने सर्कल में सच क्यों नहीं बोल सकते? आखिरकार एक बुरी तरह से बदनाम माध्यम ने देश में सच बोलने की लहर तो पैदा की, लेकिन मजा तब है जब वह व्यक्तिगत सच की बजाय सार्वजनिक सच को सार्वजनिक करे, क्योंकि व्यक्तिगत सच समाज में सिर्फ सनसनी पैदा करते हैं, ये एक तरह से किसी के बेडरूम में घुसने की चेष्टा है, एक नितांत घटिया किस्म का मनोरंजन... अब जो इसके पक्षधर है, वे कहते हैं कि हम सच बोलकर हल्के हो गए.... तो यह भी बताएँ कि आखिर आपकों अपनों से जुड़े सच को कहने के लिए किसी मंच की जरूरत क्यों पड़ती है? क्या आप यूँ ही उन्हें अपने सच नहीं बता सकते? और आपके नितांत व्यक्तिगत सच से किसी का क्या फायदा या नुकसान होना है? तो फिर इस सारे अनुष्ठान के पीछे कहीं पैसा और राखी सावंत(हाँ राखी के स्वयंवर पर भी चर्चा की जा सकती है, लेकिन एक वक्त में एक ही मामले को फोकस करने का खुद से किया वादा अभी निभा हुआ है) नुमा पब्लिसिटी की वासना तो नहीं है? क्या ये भी आप पोलिग्राफी टेस्ट में कबूल कर रहे हैं....? गुजारिश है कि इस पर भी गौर फरमाए।
जहाँ तक संस्कृति का सवाल है तो इसी संस्कृति में ब्रह्मा भी है और कृष्ण भी अहिल्या का प्रकरण भी है और रावण का भी... तो संस्कृति का तो ऐसा कोई कार्यक्रम क्या बिगाड़ेगा? हाँ इससे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पास समय को भरने के लिए खासा मसाला जुट जाता है। और जो अपना समय और ऊर्जा इस कार्यक्रम को देखने और इस पर बहस करने में बिताते है, वे बेचारे ठगे जाते हैं.... हाँ लिखने वाले और पढ़ने वाले भी दोनों.....अब इसके लिए आप मुझे माफ करेंगे।

Friday, 24 July 2009

हम एक जादू में रहते हैं

हालाँकि सारे अनुमान ये कह रहे थे कि हमारे शहर में सूर्य ग्रहण बादल और बारिश की वजह से नहीं दिखाई देगा.....लेकिन मात्र क्षीण सी संभावना का सिरा पकड़ कर सुबह 6 बजे का अलार्म लगाया था....वह बजा भी, लेकिन जैसा कि अंदेशा था घने बादलों के बीच सूरज तो बहुत दूर... उसकी किरणें तक दिखाई नहीं दे रही थी....थोड़ी ही देर में सुबह को फिर अँधेरे ने अपनी आगोश में ले लिया और हमने कल्पना की 1996 के उस सूर्य ग्रहण की जो पूरा था और उस शहर से देखा था, जो उसके दिखने की पट्टी पर स्थित था....। आसमान के विराट हल्के नीले कैनवास पर दो गोल-गोल से पत्थर बहुत धीरे-धीरे एक दूसरे की ओर बढ़ रहे थे और फिर..... आँखों को सायास झपकने से रोका..... गोल लेकिन छोटा पत्थर बड़े और चमकीले पत्थर पर छा गया...... बस उस छोटे से पत्थर की ओट से बड़े पत्थर का जो हिस्सा नजर आया...... वह अदभुत.... अलौकिक और जादुई था....और स्टिल हो गया हमेशा के लिए। हम उसे चाहे जो नाम दे दें.... डायमंड रिंग चाहे तो वह भी....। यूँ ये सूर्य ग्रहण बरसों बरस में आता है.... शायद इसे लेकर उत्सुकता और उत्साह ज्यादा होता है, लेकिन कभी सारी दुनियादारी को एक सिरे पटककर सोचे तो पाएँगें कि हम एक अलौकिक जादू भरी दुनिया में रहते हैं और हर लम्हा उस जादू को जीते हैं, भोगते है..... फिर भी कभी हमारा ध्यान उस तरफ नहीं जाता..... माँ की तरह हम उसे भी टेकिंग फार ग्रांटेड ही लेते हैं.... जी हाँ प्रकृति का जादू.... सुबह का दोपहर...शाम और रात में बदलना.....बीज का पौधा और फिर पेड़ बनना....कली... फूल और फल आना..... नदियों का बहना.... समंदर का हरहराना.....बादलों का आना छाना और बरसना..... गरजना.... बिजली का तड़पना...और हाँ इंद्रधनुष तनना.... फूलों का खिलना.... चिड़ियों का चहचहाना....क्या है जिसे हम जादू के अतिरिक्त कुछ और कह सकते हैं? ऐसे में सवाल उठता है कि इसी जादूभरी दुनिया में छल-कपट, झूठ, हिंसा, अनाचार, अत्याचार, गरीबी और बेबसी सब कहाँ से आ गई?
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बहुत साल पहले यूँ ही एक बहस हुई थी... प्रकृति को लेकर....क्या प्रकृति कारण और परिणाम का श्रृंखला है? या फिर यह एक यांत्रिक व्यवस्था है... जिसमें घटना और दुर्घटना फीडेड है हम तब अचंभित होते हैं, जब वह हमारे सामने आती है, इसके पीछे कोई तार्किकता नहीं है....ये बस होती है और जब हो जाती है तब हम इसके पीछे के कारणों की पड़ताल करते है, गोयाकि लकीर पीटते हैं.... बहुत देर तक या यूँ कहूँ कि बहुत दिनों तक चली तो बहुत अतिश्योक्ति नहीं होगी... सब अपनी-अपनी मान्यताओं पर अड़े रहे, लेकिन निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे.... फिर भी एक बात पर सब सहमत थे कि प्रकृति एक जादू है... और हम इस जादू में रहते हैं। हम इसे जादू और नशा दोनों ही कह सकते हैं।
और अंत में सावन..... हम मौसम दर मौसम मौसमों का इंतजार करते हैं, खासकर वसंत और बारिश का और बारिश में भी खासकर सावन का...क्योंकि यह खालिस नशा है.... शब्दों से परे है इसका होना और इसका अभिव्यक्त होना...। यहाँ हिंदी फिल्म का एक गीत याद आ रहा है
शराबी-शराबी ये सावन का मौसम
खुदा की कसम खुबसूरत ना होता
अगर इसमें रंगे मोहब्बत ना होता
यकीन ना करें तो मोहब्बत करें और फिर सावन को जिएँ... यकीन आ जाएगा।

Tuesday, 21 July 2009

लम्हा-दर-लम्हा जीने का मौसम




नींद की चाशनी को आसमान से बरसती बूँदों ने धो दिया... आ खड़े हुए सावन के मंडवे तले। अदरक घुली, भाप उड़ाती गर्म चाय और पार्श्व में बज रही ठुमरी--घिर-घिर आई बदरिया कारी... नहीं यह ना तो किसी कहानी का हिस्सा है और न ही किसी विजुअल का....ये जीने के मौसम का दस्तावेज है। रात के अँधेरेपन में सुबह की सफेदी घुलने लगी थी, लेकिन प्रपोशन थोड़ा गड़बड़ा गया और सुबह उजली होने की बजाय थोड़ी साँवली ही रह गई। फिर तो यह साँवली-सी सुबह घर में मेहमान बन कर आ गई... जिस कोने में भी देखो मौजूद मिली। आसमान से ओस की बूँदों सा सावन बरस रहा है, इस मौसम में छुट्टी लेने का मकसद तो कुछ पढ़ना, कुछ लिखना और कुछ सुनना था, लेकिन छिटपुट कहानी पढ़ने और लिखने के लिए माहौल बनाने के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं पाया।
हाल ही में कहीं पढ़ा था कि या तो आप अच्छा लिख लें या फिर अच्छे से जी लें। अच्छे से जी कर अच्छा लिख भी लें ऐसा संभव नहीं होता है, इस पर बहुत लंबी बहस हुई तो एक सवाल और खड़ा हो गया कि क्या ज्यादा जरूरी है? अच्छा लिखना या फिर अच्छे से जीना.... सवाल थो़ड़ा पेचीदा है, क्योंकि यदि कोई दोनों ही करना चाहे तो....? यदि आपके पास इस सवाल का जवाब है या फिर दूसरी पहेली का हल है तो फिर मुझे दोनों की ही बहुत जरूरत है। फिलहाल तो सावन है, बूँद-दर-बूँद भर रहा जीवन का प्याला है और नहीं है तो कुछ भी नहीं छूटने का मलाल.... तो बस कभी-कभी मौसम का इंतजार जीवन को हरा-भरा करने के लिए भी किया जाता है।
शेष शुभ

Tuesday, 14 July 2009

सावन आनंदमय हो


बड़े दिनों बाद पूरी और बहुप्रतिक्षित छुट्टी.....परेशानी के उग आए छालों को साफ करने के बाद के जख्म.....। मौसम की मिठाई और मन की खटाई मिलकर गुजराती स्वाद रचती सुबह आई थी। रात की रिमझिम का हैंगओवर सुबह तक बना हुआ था। ताजा नहाई हुई सुबह का साँवला चेहरा आकर्षित कर रहा था। मिट्टी की नमी से दुर तक मन की जमीं भी नम हुई जा रही थी.... मन को साधने और मौसम के साथ कदमताल करने की कोशिशें चल रही थी.... चाहत तो थी कि मूड का उखड़ापन कुछ कम हो जाए.... सावन का रूप रंग गहरे उतर जाए....। बरसात में फूल आई दीवार सा मन हो रहा था, इसलिए ऐलान कर दिया था कि आज कोई ऐसी बात ना हो जिससे मन की दीवार की पपड़ियाँ निकलने लगे तो सारे जतन उसी दिशा में हो रहे थे.....।
समय तेजी से भाग रहा था और हम उसका सिरा पकड़े उसके चारों कोनों को तानने की कोशिश कर रहे थे...चाहा तो था कि उसे तंबू की तरह तान लें और मनमौजी हो जाए....लेकिन एक कोने को थामे तो दूसरा सिकु़ड़ रहा था...आखिर कोशिश ही छोड़ दी। चैन किसी भी सूरत नहीं था।
चचा ग़ालिब हर जगह आ खड़े हो जाते हैं यहाँ भी आ गए।-- अब तो घबरा के ये कहते है कि मर जाएँगें, मर के भी चैन ना आया तो किधर जाएँगें।
लेकिन सावन आया है.... सुबह का साँवलापन ढ़ेर सारे रंगों से सजकर चुपके से आता है..... काली घटाएँ जब बरस कर रीत जाती है तो यूँ लगता है कि सुनहरी सुबह फिर आ गई हो...प्रकृति के श्रृंगार का उत्सव है। आँगन में चंपा और गुलाब सुबह से महकने लगते है तो गुलमोहर भी अभी थका नहीं है। सागौन के बड़े-बड़े पत्ते हरिया रहे हैं। रात में चमेली और जूही गमकने लगती है। बोगनबेलिया तो खैर सदाबहार है ही। कितने रंग सुबह से शाम तक आते और झिलमिलाते हैं। मन की सारी धूसरता सावन की रिमझिम में धुल कर बह निकली....। बहुत कुछ बहता aऔर उमड़ता है मन में लेकिन क्या करें समय का इलेस्टिक सिकुड़ता ही जा रहा है, फिर भी जो दिखता है वह मन में उतरता तो है ही। तो सावन की उदार हरियाली सबको सुंदर करें, मन मयूर हो और हरदम सावन मनें, इसी कामना के साथ सावन आनंदमय हो।

Tuesday, 7 July 2009

नैनीताल पर शब्द-चित्र

मेरी कवितानुमा तुकबंदी को सराहने के लिए शुक्रिया.....इसे मैं हौसला अफजाई ही मान रही हूँ बिल्कुल ऐसे जैसे पहले-पहल स्कूल में सीखी कविता को सुनाते बच्चे का हौसला बढ़ाते घर आए मेहमान हो और उस पर तुर्रा यह है कि आपने एक कविता सुनी....सुनकर ताली बजाई तो सुनिए एक और कविता....। इस बार दो साल पहले सुबह-सुबह जब काठगोदाम से नैनी झील के किनारे पहुँचे तो जो कुछ देखा उसने खुद-ब-खुद शब्द चुन लिए और....जो बना वह सामने है....यहाँ जिक्र चिनारों को है, लेकिन चित्र नैनी झील का है...इसके लिए पाठक क्षमा करेंगे।
नैनीताल
कतारों में चिनार
या फिर
चिनारों की कतार
नैनी झील के उस पार
चीड़ों के पहाड़ में से
झाँकती है
जीवन की चाँदनी
आसमान के आँचल पर
धूप-बादल के खेल
अलमस्त होकर आते
बरसते और बिखरते बादल
हम मैदानियों के
लिए प्रकृति का
अनुपम चित्र बनाते..
क्या ये कविता है?

फिर सेः कविता लिख पाने का कोई मुगालता नहीं है, ये बस कभी यूँ ही भावना की उमड़न का नतीजा है।

Thursday, 2 July 2009

कविता सा कुछ कहने की हिमाकत

यूँ ये मेरा माध्यम नहीं है...ना छंद की समझ है और ना ही मात्राओं की....। पुरानी डायरी के किसी पन्ने में एकाध निराश से क्षण की तरह कभी कोई कविता मिल सकती है, इससे ज्यादा इस दिशा में मैंने कभी कोई हिमाकत नहीं की। और आज भी इसे कविता कहने की हिमाकत नहीं कर सकती, यह मात्र तुकबंदी है जो रात के अचेतन पहर में कड़ी दर कड़ी जुड़ती गई।
रात के बिल्कुल बीचोंबीच जब बारिश की बड़ी-बड़ी और लगातार गिरती बूँदों की आवाज से नींद खुली तो दिमाग का सारा कूड़ा सतह पर आ जमा हुआ....बहुत देर तक जोर से आँखें मींचे बारिश के होने को नकारते रहे, उस संगीत की तरफ से कान भी बंद कर रखे....जो शायद दुनिया की पहली कंपोजिशन में से एक रहा होगा और आज भी उतनी ही ताजातरीन, दिलकश और शुद्ध है जितना पहले था....लेकिन शायद इसे ही प्रेम कहते हैं कि ज्यादा देर उसकी पुकार को अनसुना नहीं कर सके और बाहर निकल ही आए...। आसमान जैसे फट पड़ने को आतुर था..... लाल-धूसर बादलों का जमावड़ा...गहरे अँधेरे में बूँदों का गिरना तो नहीं दिख रहा था, लेकिन फुहारें सहला रही थी....नींद चाले चढ़ चुकी थी और उस कूड़े में से कुछ काम की चीजें निकलने लगी थी। कुछ विचार और कुछ भावनाएँ उभर आई थी....। पता नहीं कहाँ से ये तुकबंदी निकल पड़ी।
बेटियाँ
ना जाने कहाँ से आ जाती हैं ये
कुछ ना हो फिर भी खिलखिलाती हैं बेटियाँ
ना प्यार की गर्मी और ना चाहत की शीतलता
फिर भी जीती जाती हैं बेटियाँ
अभावों और दबावों के बीच भी
दिन के दोगुने वेग से बढ़ती जाती है बेटियाँ
भीड़ भरे मेले में हाथ छूट जाए
फिर भी किसी तरह घर पहुँच जाती हैं बेटियाँ
खुद को जलाकर भी
घरों को रोशन करती जाती हैं बेटियाँ
सीमाओं के आरपार खुद को फैलाकर
पुल बन जाती हैं बेटियाँ
शायद इसकी सजा पाते हुए
कोख में ही मारी जाती हैं बेटियाँ.....।

Tuesday, 23 June 2009

तुम वहाँ तक आ तो जाओ हम जहाँ तक आ गए

दोस्तों,
पिछली पोस्ट पर आई टिप्पणियों के लिए धन्यवाद....। दरअसल इन सवालों को सही संदर्भों में समझा नहीं गया। आशा-निराशा जैसे नितांत भौतिक दुनिया के भावों से इन प्रश्नों का दूर से भी वास्ता नहीं है। हम कर्म करने के लिए अभिशप्त हैं....इसे किसी भी रूप में कहें प्रकारांतर से मतलब इनका वही होगा, लेकिन यह अभिशाप भौतिक या कह लें स्थूल दुनिया का तथ्य है...यहाँ के सच भी बड़े उलझाने वाले और सापेक्ष होते हैं। दरअसल ये एक समानांतर दुनिया है। कभी इसकी आँधी से हम बेचैन हो जाते है तो कभी हम ही इसके आकर्षण में बँधे हुए वहाँ पहुँच जाते है। उस दुनिया के सारे प्रश्न हमारी दुनिया में घुसपैठिए हैं। जरा सी दरार दिखी कि घुस आए...। अंदर आने के बाद ये अंतर में ऐसी भट्टी सुलगाते हैं कि उसकी तपन सही नहीं जाती है, लेकिन जो सह लेता है, वह भटकाव के सच को जान लेता है और कुंदन होकर निकलता है...उसे आध्यात्मिक दुनिया में स्थिरता.... संतत्व की प्राप्ति होती है.... वह किनारे बैठ कर निरंतर दौड़ने वालों की निरर्थक कवायद को निर्विकार भाव से देखता रहता है। वह सारी दौड़ और प्रतिस्पर्धा से बाहर आ जाता है... और सदा शांति की स्थिति में रहता है....लेकिन यह रास्ता बीहड़ है और इसमें मन को साधना पड़ता है। मन जो हवा की तरह चंचल है, जिसे साधना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है उसे साधने से कम यहाँ कुछ नहीं चल सकता है। हम तो भटकते-भटकते यहाँ पहुँचे हैं और जल्द ही यहाँ से घबराकर निकल भी जाएँगें.... लेकिन फिर आएँगें क्योंकि ये हमारी दुनिया के अब्सर्ड और इसका अर्थहीन होना हमें फिर यहाँ ले आता है। इसलिए ये आशा-निराशा से आगे के प्रश्न हैं। दोस्तों जिनका वास्ता इन प्रश्नों से नहीं है वे इस आग से दूर रहें....( ये अलग बात है कि दूर रहना ना रहना आपके बस की बात नहीं होती है) ये विषबीज है जो किसी-किसी में ही होता है और यदि होता है तो जरा सी अनुकूलता पाते ही विकसित भी होने लगता है.....। लेकिन वे सौभाग्यशाली है जिनमें यह विषबीज नहीं है। उनके लिए ये प्रश्न... ये सारी कवायद बेकार है वे ही इसे भौतिक दुनिया के कसौटी पर कसते हैं....उनके लिए एक शेर है (फिलहाल शायर का नाम नहीं याद आ रहा है)
खुद तुम्हें चाक-ए-गरेबाँ का शऊर आ जाएगा
तुम वहाँ तक आ तो जाओ हम जहाँ तक आ गए


शेष शुभ...

Friday, 19 June 2009

बैठो! कहीं जाना नहीं है

मन और मौसम दोनों की ही गिरह उलझी पड़ी है। दोनों की ही तरफ से कोई राहत नहीं....मन मौसम की तरह ही तप्त हो रहा है और मौसम है कि अपनी गाँठ खोलने के लिए ही तैयार नहीं है। ठहरना चाहना समय की रफ्तार में बहने लगा है...। हम पहले समय के साथ कदम मिलाने की और फिर उसे पकड़ने की एक बेकार सी कोशिश में लगे हुए हैं। कहाँ जाना है..क्या पाना है और क्यों पाना है जैसे सवाल कभी-कभी ही सिर उठाते हैं.... फिर डूब जाते है जद्दोजहद में....। कभी घड़ी-दो-घड़ी खुद के साथ बैठे तब सवाल आकर इर्द-गिर्द डेरा डाल देते हैं.....लेकिन उसके लिए भी इतनी राहत नहीं है घड़ी को थामने की बेतुकी सी कोशिश में ही दिन पर दिन गुजर जाते हैं। कभी-कभी ही खुद के पास आकर बैठ पाते हैं। एक अंतहीन और अर्थहीन दौड़.... उसका हिस्सा.... कभी खुद तो कभी मजबूरन....सार्त्र के शब्दों में हम पैदा होने के लिए अभिशप्त है..उसी तरह हम दौड़ का हिस्सा होने के लिए भी अभिशप्त हैं.....उन पर सुखद आश्चर्य होता है, जो जीवन को नशे की तरह खींचते चले जाते हैं...जीवन भर दौड़ते रहते हैं और कभी थकते नहीं कभी रूकते नहीं और कभी खुद से पूछते भी नहीं कि क्यों दौड़ रहे हैं, क्या पा लेंगे... पा कर क्या होगा? यही वे लोग है जो दुनिया को बदलते है...विकास करते हैं और समाज को बेहतर बनाते हैं....यहाँ तो बड़ी से बड़ी सफलता का नशा भी दो दिन में उतर जाता है और फिर खुलने लगती है अर्थहीनता की पोटली....ये दौड़ क्यों है...कहाँ जाना है....क्यों जाना है और पहुँच कर क्या मिलेगा?....अंतहीन सवाल और कोई जवाब नहीं..। उनसे ईर्ष्या होती है.. जो इस दौड़ से अलग होकर किनारे बैठे हैं दौड़ने वालों निर्विकार भाव से देख रहे है गोया कह रहे हो कि रूक जाओ कोई कहीं नहीं पहुँचेगा.... बेकार है यूँ दौड़ना। ओशो का कहा अक्सर मजबूर करता है रूकने और बैठ जाने के लिए कि--- बैठो! कहीं जाना नहीं है। जो चला वो भटक गया, जो बैठा वह पहुँच गया।
ये उसने कहा है जिसने दुनिया देखी है.....जो भटकने के बाद ही इस सत्य तक पहुँचा है...हम भी शायद पहले भटकेंगे और फिर कहीं बैठ जाएँगें....तब तक तो भटकने के लिए अभिशप्त हैं।

Sunday, 14 June 2009

चश्माए महताब से रात के आने का इंतजार

.सोचा तो था कि इस बार कुछ गंभीर राजनीतिक विषय ही रहेगा। चिंतन भी उसी पर चल रहा था और अध्ययन तो और भी ज्यादा गंभीर विषय पर चल रहा है....लेकिन इस बीच मानसून में विलंब की खबर ने बेचैन कर दिया। अब ना तो खेती से कोई लेना-देना है और ना ही जल संकट के पीड़ित हैं....फिर भी इस तरह की बेचैनी का कारण क्या है, ये अभी तक पकड़ में नहीं आया है। बस ये है और पता नहीं कब से?
आषाढ़ दिन दर दिन बढ़ रहा है और आसमान की पेशानी एकदम साफ है....। मौसम विभाग हर दिन अपनी घोषणा बदल रहा है और ज्योतिषी इन दिनों पता नहीं कहाँ जा छुपे हैं। अभी दो दिन पहले बादलों का झुरमुट यूँ ही तफरीह करता दिखा जरूर था....लेकिन रूकने और बरसने का उसका कोई मूड नजर नहीं आ रहा था। जेठ इतना घना हो गया कि उसकी छाया में आषाढ़ पनप ही नहीं पा रहा है.....गर्मी से ज्यादा उमस से बेचैनी है....पढ़ा-सुना है कि जब गर्मी बेचैन करने लगे और सारी उम्मीदें मुरझा जाए तो बस समझें कि बारिश करीब है.....बिल्कुल वैसे ही जैसे जब रात का सबसे अंधियारा पल हो तो समझें कि बस सुबह करीब है...। यहाँ फैज याद आते हैं
गुम हुई जाती है अफ्सुर्दा सुलगती हुई शाम
धुल के निकलेगी अभी चश्माए महताब से रात
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इस बीच पाखी में छपी कहानी के लिए आ रहे फोन और एसएमएस से मैं अभिभूत हूँ... अखबार में कई बार लिखा छपा लेकिन जिस तरह का रिस्पांस इस कहानी के लिए मिला उसे व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं है...। शुक्रवार रात जब घर पहुँची... तो एक पत्र मेरे नाम आया था.... यह बीकानेर के 70 वर्षिय सज्जन का था। कहानी के संदर्भ में उनकी प्रतिक्रिया से भीगने का क्रम जारी है। चाहे अखबार के पाठक ज्यादा हो, लेकिन जैसी प्रतिक्रिया किसी पत्रिका में प्रकाशित होने पर मिलती है, वैसी और कहीं से नहीं.....। खैर फिलहाल तो चश्माए महताब से रात के आने (आषाढ़ के भीगने...में भीगने) का इंतजार है।

Saturday, 6 June 2009

बेटा ! तूने ये सब कहाँ से सीखा?

यूँ इसका पता तो तीन महीने पहले से ही हो गया था लेकिन उस शाम जब दफ्तर में घड़ी की टिकटिक के साथ हम कदमताल कर रहे थे और उसकी सुई को थामे रखने की एक बेकार सी कोशिश कर रहे थे....तभी मोबाइल फोन की रूनझुन ने किसी का मैसेज आने का संदेशा दिया...हरदम कंपनी के ही मैसेज देखने और उन्हें तुरंत डिलीट करने के चक्कर में हमने तुरंत ही फोन लपका और रीड मैसेज के ऑप्शन को आदतन यस कर दिया......मैसेज था....कहानी पढ़ी पसंद आई...कांग्रेट्स...जौकी.....। काम वहीं रूक गया मैसेज फिर से पढ़ा.....फिर-फिर पढ़ा.....। खुद को संयत किया....और लग गए काम पर।
एक और शनिवार की बेकार सी छुट्टी..... मम्मी के घर....अननोन नंबर के कॉल के लिए जसराज जी की सरगम बजी....राँग नंबर कहने की गरज से उठाया तो फोन मुरैना का था....संदेश था कि आपकी कहानी मौत की हमें बहुत पसंद आई और आज हमने इसका पाठ किया....वातावरण निर्माण गजब का था आपको बधाई.....मन में और....व अच्छा काम करने का उत्साह जागा....। तो संदेश तो बस इतना ही है कि जून के पाखी के अंक में मेरी पहली कहानी प्रकाशित हुई और इस पर सबसे अच्छा कमेंट मेरी 70 साला ताई मेरी मानस माँ ने दिया....तीन पन्ने की कहानी को कुछ समझते और कुछ ना समझते हुए भी पुरे धैर्य से पढ़ा फिर बहुत प्यार से सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा-- बेटा ! तूने ये सब कहाँ से सीखा?
खुद के भटकाव को दिशा मिलने की खुशी मात्र है जिसे मैं आप सबसे बाँटना चाह रही हूँ.....रूटिन से विचार और विचार से सृजन की ओर बढ़े पहले कदम के लिए दुआओं की आस के साथ.....।

Thursday, 4 June 2009

मीडिया की भाषा: औदात्य बनाम डगाल

तेज, तीखी गर्मी और झुलसाने.....जलाने वाली गर्मी के बाद भी नम, नाजुक और खुबसूरत फूल जो अहसास जगाते है वह है प्रकृति की उदारता....उसकी उदात्तता का.....बस अपने पेज पर उस फोटो का शीर्षक दे दिया प्रकृति का औदात्य....अगले दिन जब दफ्तर पहुँच कर अपना अखबार देखा तो शीर्षक बदल दिया गया था.....जैसा हमेशा अच्छे शीर्षकों के साथ होता आया है.....साथ ही शाम को शो-कॉज नोटिस की तरह कहा गया कि औदात्य शब्द को पाँच शब्दकोषों में देखा.... कहीं भी वह शब्द नजर नहीं आया आपके पास कहीं हो तो कृपया दिखाएँ.....। लगा पूरा पढ़ा-लिखा दाँव पर लग गया.....यूँ भाषा के मामले में ज्यादा रूढ़ हूँ। कोशिश रहती है कि जहाँ तक हो सके अंग्रेजी के शब्दों से परहेज करूँ....खासतौर पर जब मामला खबरों का हो.....इसलिए यह तय था कि औदात्य कहीं पढ़ा हुआ शब्द है....खैर आखिरकार वह शब्द अपने विस्तृत अर्थ के साथ मिल गया।
उसी दिन एक हार्ड न्यूज में एक शब्द का प्रयोग हुआ डगाल....इससे कुछ दिन पहले हमारे माली ने जो यूपी का है और नितांत खड़ी भाषा बोलता है यह पूछ कर शर्मिंदा कर दिया था कि भाभीजी आपके अखबार में किस तरह की भाषा लिखी जाती है ट्रक के टल्ले से एक की मौत....? ये टल्ले का क्या मतलब होता है? सो उस दिन हम उससे बचते रहे....अब पता नहीं उसने वह खबर पढ़ी नहीं या फिर यह मान लिया हो कि इस अखबार में तो इसी तरह की भाषा इस्तेमाल होती है.... हम शर्मिंदगी से बच गए। इस मामले में जब वरिष्ठों से चर्चा की तो जवाब मिला कि बड़े-बड़े संपादक अपने संपादकीय में बोली के शब्दों का उपयोग करते हैं। सवाल तो उठा कि क्या न्यूज और व्यूवज अलग-अलग नहीं है? खैर आजकल ज्यादा बहस करना बंद कर दिया है इसलिए चुप हो गए.....लेकिन चुप हो जाने से यदि सवाल उठना ही बंद हो जाते तो दुनिया वहीं की वहीं रहती आगे नहीं बढ़ पाती...।
सवाल तो उठा कि आखिर मीडिया की भाषा कैसी हो?
इस देश में जबकि हर 10 किमी पर बोली बदल जाती हो..... वहाँ तो यह सवाल उठना बहुत जरूरी और लाजिमी है। नहीं उठे तो हो आश्चर्य......। फिर जब बोली बदलती है तो तय है कि भाषा में भी देशज शब्दों का प्रवेश होगा। तो फिर किसी ऐसी भाषा की जरूरत और बढ़ जाती है जिसका सम्प्रेषण असीम हो..... क्योंकि बोली की सम्प्रेषणीयता तो ससीम होती है....( अब बवाल तो ससीम शब्द पर भी उठ सकता है, क्योंकि ये बहुत प्रचलित नहीं है, लेकिन यह अखबार नहीं है, इसलिए कोई डर नहीं है)। यह सही है कि चूँकि अखबार का विस्तार साहित्य से ज्यादा है तो इसकी भाषा सरल और आम बोलचाल में प्रयुक्त होने वाली ही हो....लेकिन इसके साथ क्या इसका स्वरूप मानक भाषा का नहीं होना चाहिए?
अब डगाल और टल्ला टाइप शब्द मप्र के मालवा के पठार क्षेत्र की बोली के शब्द है जो इस भौगोलिक भाग के आसपास के हिस्सों की बोली से प्रभावित है....लेकिन इसकी ग्राह्यता मालवी बोली के दो ही क्षेत्रों तक सीमित है....शेष जगहों के लिए अनजान....। तो फिर क्या अखबार और टीवी की भाषा मानक हिंदी नहीं होनी चाहिए?
कहने को तो और भी बहुत कुछ है, लेकिन हम तो समय के प्रति ससीम हैं।

Saturday, 30 May 2009

बिखरे-बिसरे लम्हों के सूत्र

कच्चे-पक्के से मूड के बीच आई अनचाही छुट्टी.... तेज गर्मी के दौर में बस मानसून का इंतजार चल रहा है। आसपास जब भी फुर्सत भरी नजरें फेंको तो प्रकृति उत्सव की तैयारी करती नजर आती है। आँगन का नीम कुरावन के दुसरे दौर की हवाओं में झूम रहा है। दो दिन पहले बित्ते भर का फुटबॉल लिली का खूँटा आज तनकर आँखें दिखाने लगा..... अशोक पर तरह-तरह के परिंदे आने जाने लगे हैं....इंतजार तो यहाँ भी है उस उल्लास का जो प्रकृति के औदार्य और औदात्य के उत्सव से महकेगा.... लेकिन फिलहाल तो रोहिणी की तपन अंदर भी है बाहर भी....। एक अनाकार, अ-लक्ष्य और अनाम-सी बेचैनी..... एक छटपटाहट..... कुछ नहीं कर पाने और कुछ नहीं 'हो' पाने की.... यूँ ये होना बाहरी नहीं है.... लेकिन... शायद इस बेचैनी का सार ही इससे उबरने की कोशिश में निहित है। सो समय का उपयोग अपने बाहर के बिखराव को समेटने में क्यों नहीं किया जाए? बस यही सोचकर सतह पर दिखने वाली अस्त-व्यस्तता को समेटने की कोशिश करने लगी... क्योंकि गहरे में जाकर समेटना यानी कई दिनों की कवायद को न्योतना.... इसी में मेरे हाथ उस दौर की डायरी लगी..... जब सारे आदर्श आकर्षित करते थे.... उनमें कई सारे सूत्र मिले कई तो नितांत व्यक्तिगत और बहुत सारे व्यवहारिक.....कुछ बहुत भावुक और कुछ खालिस बुद्धिजन्य......। बस यूँ ही उन्हें संभालने के उद्देश्य से यहाँ दर्ज कर रही हूँ।
कमियाँ ही जिंदा रखती है, पूरापन मार देता है, एक आसान और सुखद मौत

यदि भलाई करना आपकी मजबूरी है तो ही आप भले आदमी हैं

संस्कारों और विचारों के द्वंद्व से जो कुछ निकलता है वही आधुनिकता है

पैदल चलने से आत्मविश्वास बढ़ता है

किसी से खुशी बाँटने से हम उसे करीब महसूस करते हैं, और दुख हम उसी से बाँटते हैं जो हमारे करीब होता है

और ये सूत्र हाल ही का है
सफलता से इतिहास उपजता है और संघर्ष से साहित्य
आपके अनुभव इससे मिलते-जुलते नहीं है?

Thursday, 28 May 2009

अखबार क्यों पढ़े?

पिछले तीन महीनों में तीन-चार अखबार शुरू हुए और बंद कर दिए गए। आखिरकार यह निष्कर्ष निकाला गया कि आजकल हिंदी अखबारों में पढ़ने के लिए कुछ आता ही नहीं है.....एक वक्त था जब अखबार ब्रश करने जैसे अपरिहार्य हुआ करते थे....और विशिष्ट अखबार टूथपेस्ट का पसंदीदा ब्रांड हुआ करता था, जो बदलाव के लिए भी नहीं बदला जाता था, हाथ में आया तो सबसे aपूरा देखेंगे, फिर तय करेंगे कि फुर्सत मिलते ही आज क्या-क्या पढ़ना है....लेकिन अब तो अखबार सर्दी के दिनों का नहाना हो गया....पानी नहीं है नहाना नहीं हो सकता तो डियो-परफ्यूम से काम चल जाएगा....वो भी दिन भर....नहाना अगले दिन तक के लिए मुल्तवी......(पढ़ना तो खैर कई-कई दिन तक के लिए हो सकता है)....लेकिन नहाना तो अगले दिन पड़ेगा ही। हर दिन हर अखबार में एक-सी खबरें, एक-सा कंटेंट, एक जैसी उबाऊ भाषा और वैसा ही नीरस फॉर्मेट...कई बार तो शीर्षक भी एक से....यूँ लगता है जैसे अखबारों में काम करने वाले एक ही ढर्रे पर सोचते हैं....कुछ दिन पहले टीवी पत्रकार राजदीप सरदेसाई का इंटरव्यू पढ़ा जिसमें उन्होंने कहा था कि- 'उन्हें लगता है कि जो कहीं कुछ नहीं कर पाता है वह पत्रकारिता करने लगता है।' खुद भी उनमें से ही हूँ (ज्यादा समय नहीं बीता यह धारणा अध्यापन के लिए हुआ करती थी)...फिर खबरें भी वही जो पिछली शाम से रात तक टीवी पर पूरे विश्लेषण के साथ जान चुके हैं....यदि कुछ अलग होता है तो वो हैं कथित विजुअल्स, गोया अखबार नहीं चित्रकथा हो। जी हाँ यहाँ बात हिंदी अखबारों की हो रही है। अंग्रेजी अखबार तो अब भी हमारे रोल मॉडल है....यदि वे हिंदी फिल्मों के नामों और गानों के मुखड़ों का अपने शीर्षकों में उपयोग करें तो वे प्रयोग करते हैं और हिंदी अखबार करें तो वे पत्रकारिता का स्तर गिरा रहे हैं। वे शब्दों के एब्रिविएशनों का खबरों में उपयोग करते हैं और हम खुश होते है....वे शब्द कॉईन करते हैं हम उनका प्रयोग करते हैं, याद किजिए हिंदी में हमने हॉर्स-ट्रेडिंग और वाररूम (और भी ना जाने कितने शब्द है जो फिलहाल याद नहीं आ रहे हैं) जैसे कितने शब्द कॉईन किए? हम तर्क देते हैं कि जब वे हिंदी के शब्दों का उपयोग करते हैं तो फिर हम अंग्रेजी के शब्दों से परहेज क्यों करें.....? तब भी जब हमारे पास हिंदी के बेहतर शब्द हो......जिस थाली में खाएँ उसमें छेद क्यों नहीं कर सकते? अब कड़वा ही सही लेकिन है तो सच कि दैनिक अखबार खबरों के मामले में कुछ नया किसी भी सूरत में नहीं दे सकते हैं, क्योंकि टीवी इसके लिए सबसे तेज माध्यम है, तो फिर अखबारों की उपयोगिता क्या है? और उनमें भी किसी विशिष्ट अखबार की ही दरकार क्यों हो? फिर विचारों में ही क्या नया दे रहे हैं.....? हर दिन एक पन्ने में एक या दो घिसे-पिटे नामों के एक ही लीक पर चलते विचारों और शैली के एक या दो लेख और एक या दो संपादकीय.....किसी भी अखबार का संपादकीय उठा कर पढ़ लें.....डिस्कवरी चैनल के भूत-प्रेत या फिर पुर्नजन्म के घंटे भर के कार्यक्रम की तरह होते हैं......जो आखिर में आपको कोई दिशा नहीं देते.....ठीक वैसे ही हिंदी अखबारों के संपादकीय होते हैं.....शुरू से आखिर तक लीपापोती....... ठेठ जुगाली ......ओपिनियन-बिल्डिंग या दृष्टि-निर्माण जैसा कुछ नहीं मिलता.....। लेख देंखे तो कई बार लेखकों ने ऐसे विषयों पर लिखा होता है, जिनका उस विषय से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं होता है....अब इसे क्या कहें? फिर किसी लेखक का एक बार नाम हो तो उसके नाम पर ही लेख छप जाते हैं....फिर उसमें औसत जानकारी और विचार हो जिनमें कुछ भी नयापन नहीं होता है....तो कोई क्यों पढ़े? दरअसल अब अखबारों से रचनात्मकता..... प्रयोगशीलता...... मौलिकता.....वैचारिकता.....और बौद्धिकता का लोप हो गया है.....खासतौर पर हिंदी पत्रकारिता से.....। एक सर्वे के अनुसार पश्चिम में जहाँ इंटरनेट का प्रयोग होता है वहाँ अखबार बुरी हालत में हैं (खबर थोड़ी पुरानी है, लेकिन मौजूँ है), हाँ जिन देशों में अभी इंटरनेट का उपयोग इतना आम नहीं है वहाँ अखबारों का बाजार है, फिर आदत थोड़ी पुरानी है इसलिए छूटती नहीं है जालिम मुँह से लगी हुई वाला मामला भी तो है। यूँ तर्क तो यह भी दिया जाता है कि क्या करें पाठक ही ऐसा पसंद करते हैं....लेकिन तर्क देने वाले भी जानते हैं कि सच क्या है? एक समय था जब हिंदी फिल्मों के मामले में प्रबुद्ध और संवेदनशील दर्शक पूरी तरह से निराश हो चुका था.....प्रतिभाहीन टीम फूहड़ और बेहूदा फिल्में बनाती और दर्शक के टेस्ट का रोना रोती.....लेकिन समय बदला और आज युवा निर्देशक बेहतर फिल्में बना रहे हैं और उस पर तुर्रा ये कि ये फिल्में ना सिर्फ देखी जा रही है, बल्कि पसंद भी की जा रही है.... यूँ ये अच्छा-बुरा सब सापेक्षिक है.... लेकिन है तो ना....! कुछ दिन पहले एक पत्रकार को कहते सुना था कि दुनिया को थॉट्स नहीं आईडियाज चाहिए.....अब उन्हें कौन समझाए कि आईडियाज हवा में नहीं पैदा होते हैं....ये एक प्रक्रिया का परिणाम है (अब वे पत्रकार है तो गलत तो नहीं ही कह रहे होंगे)....नहीं तो अमेरिकी राजनीति में थिंक-टैंक की जगह आईडिया-टैंक होते। बिना थॉट के आईडिया पैदा करने की कुव्वत हो तो कर देखें.....। खैर तो अब इस सबमें अच्छा ये है कि हर सुबह दो अखबारों को 10-10 मिनट में निबटाते हैं और बचे हुए 70 मिनट में कुछ बेहतर पढ़ते हैं....इन कुछ दिनों में दो भारतीय भाषा के और एक विदेशी अनुवाद....एक आत्मकथा, एक वृहत उपन्यास के अतिरिक्त अनगिनत विचारोत्तेजक और शोधपरक लेख....कहानियाँ....संस्मरण और लघु उपन्यास पढ़ डाले हैं....। और यूँ भी नहीं कि सामयिकी से कटे हुए हैं। पता है कि देश के चुनावों में क्या हुआ है? श्रीलंका से लिट्टे का सफाया हो चुका है, लेकिन तमिल समस्या अभी भी बरकरार है..... पाकिस्तान में तालिबानों के खिलाफ कार्यवाही चल रही है और उस पर भारी अमेरिकी दबाव है....नेपाल में भी राजनीतिक संकट का दौर है। अमेरिका मंदी से जूझ रहा है, और ओबामा के आउटसोर्सिंग पर अपने चुनावी वादे को निभाने से बंगलूरू और पुणे पर कैसा संकट आएगा? विष्णु प्रभाकर और नईम नहीं रहे। दक्षिण अफ्रीका में आईपीएल चल रहा है। और भी बहुत कुछ.....तो फिर सवाल है कि दैनिक अखबार क्यों पढ़े?

Thursday, 14 May 2009

उलटी हो गई सब तदबीरें ...

ये महज इत्तेफाक ही है कि इस बार चुनाव से पहले ही विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने मतदान के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए प्रयास किए....और ऐन इसी चुनाव में एकाएक लगा कि मतदान प्रतिशत कम हो गया...मतदान के चार चक्र हो जाने के बाद पूरे देश से आए रूझान ये संकेत दे रहे हैं कि आम तौर पर राजनीति से आम आदमी का मोहभंग हो चुका है....बावजूद इसके कि युवा मतदाता बड़ी संख्या में जुड़ा था....इस बार न तो फिल्मी कलाकारों और चुनाव आयोग की अपील ने काम किया और न ही संगठनों के प्रयासों ने.....उल्टी हो गई सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया...मतदान प्रतिशत बढ़ने की बजाय कम ही हुआ...। इसे क्या कहेंगे....? लोकतंत्र के प्रति अरूचि या फिर राजनीति और राजनीतिक दलों के तरीकों, लटके-झटकों और उनकी विश्वसनीयता के प्रति संदेह ? अब तक के चुनावों में शायद नया जुड़ा मतदाता एकबारगी इस भुलावे का शिकार हो जाता हो....इस दौर का युवा इस भीड़ का हिस्सा होने के लिए कतई तैयार नजर नहीं आता है। यहाँ एक सवाल और उठता है और यह सवाल खतरनाक है कि क्या उदारीकरण के दौर ने युवाओं को राजनीतिक और सामाजिक सरोकारों से दूर कर दिया है? और यदि ऐसा है तो ये भारतीय राजनीति के एक और खराब दौर की शुरूआत होगी...यूँ भी ये दौर कोई ज्यादा आशा नहीं जगाता है। राजनीतिक दल इस दौर से उबरने के अस्थायी उपाय के तौर पर सितारों का सहारा ले रहे हैं। यूँ राजनीति में सितारों का उपयोग राजीव गाँधी ने एक स्पष्ट रणनीति के तहत किया था...लेकिन इस बार राजनीतिक दलों में सितारों को भुनाने की जिस तरह की होड़ रही वह अभूतपूर्व थी....पिछले कई चुनावों से लगातार नेताओं की चुनावी सभाओं और रैलियों में भी मतदाता की दिलचस्पी कम होती नजर आ रही है....ऐसे में फिल्म या फिर टीवी के सितारों के साथ ही लोक कलाकारों के कार्यक्रमों के माध्यम से भीड़ जुटाने का भी खूब उपक्रम हुआ। अब दलों को इस विषय पर भी सर्वे कराना चाहिए कि उस भीड़ में से कितने वोट में बदलते हैं और कितने उस विशिष्ट दल के वोट में? और सवाल तो यह भी उठता है कि आखिर ये सिलसिला चलेगा कब तक? यूँ नेता इस बार के कम मतदान के लिए मौसम को भी एक कारण बता रहे हैं....हम कह सकते हैं कि दिल के खुश रखने को गालिब ये खयाल अच्छा है। फिर भी सवाल अपनी जगह जिंदा है कि राजनीति में आम आदमी की उदासीनता और अरूचि के लगातार बढ़ने के पीछे क्या कारण रहे हैं? क्या अब वो समय नहीं आ गया है कि इसके पीछे छुपे कारणों का विश्लेषण किया जाए? और उन्हें दूर किया जाए नहीं तो भारतीय लोकतंत्र की दुर्दशा को रोका जाना मुश्किल हो जाएगा।

Wednesday, 29 April 2009

जब तवक्को ही उठ गई गालिब

मतदान के लिए फिल्म स्टार से लेकर स्वयं सेवी संगठन तक सभी अभियान चला रहे हैं....इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ कहा जा सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र की शुद्धता के लिए यह पर्याप्त है? 62 साला लोकतंत्र में ये दौर राजनीतिक उदासिनता का दौर है...इसमें एक आम आदमी राजनीति पर चर्चा तो करेगा...लेकिन उसकी रूचि यहीं तक रहेगी। अपने आस-पास ही कई लोग ऐसे हैं, जो यह कहते है कि वोट देने से क्या बदल जाएगा? आप उन्हें नहीं समझा सकते कि क्या बदलेगा? स्वतंत्रता के 62 साल यूँ राष्ट्र राज्य की दृष्टि से ज्यादा लंबा अरसा नहीं होता है, फिर भी इस छोटे से दौर ने हमसे हमारी राजनीतिक जागरूकता छीन ली, ऐसा क्यों हुआ क्या इस पर विचार करने का समय नहीं आ गया है?
बहुत पहले जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सार्थक चर्चाएँ हुआ करती थी, उस दौर में हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक नामवरसिंह से पूछा गया कि क्या हमारा लोकतंत्र इसलिए परिपक्व नहीं है कि हमारे यहाँ अशिक्षा ज्यादा है? तब उन्होंने कहा था कि---दरअसल हमारा लोकतंत्र तो जिंदा ही उन्हीं के दम पर है, पढ़ा-लिखा, शहरी तबका तो लोकतंत्र से कोसों दूर है....आज भी उस स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं आया है....और आए भी क्यों? इन बीते सालों में सकारात्मक बदलाव क्या आए हैं? उल्टे राजनीति का स्तर लगातार गिरता ही जा रहा है। उस पर राजनीति में अपराधियों के आ जाने से बची-खुची उम्मीद भी खत्म हो गई। हम वोट दें, लेकिन किसको? सब बुरों में से कम बुरे को? हमारी राजनीति विकल्पहीनता के दौर में पहुँच गई है....अब मताधिकार को कर्तव्य की तरह निभाना है, क्योंकि कोई उम्मीदवार ऐसा दिखाई नहीं देता, जिससे कोई भी उम्मीद हो.....बकौल गालिब-----
जब तवक्को
(उम्मीद) ही उठ गई गालिब, क्यूँ किसी का गिला करे कोई?
फिर भी राजनीति के हिमालय से गंगा निकालने के प्रयासों पर विराम ना लगे, इसलिए वोट दें.....।

Sunday, 26 April 2009

जैदी को सलाह

हमारे देश में मौलिकता का अकाल है....संविधान देखें तो उधार का थैला है....राजनीतिक व्यवस्था....अर्थव्यवस्था...शिक्षा से लेकर सिनेमा.....साहित्य....संगीत यहाँ तक कि प्रेम और घृणा की अभिव्यक्ति जैसे नितांत निजी मामले तक हमारे अपने नहीं है....ये हमारी पुरानी आदत है....खासतौर पर वैचारिक और रचनात्मक दुनिया में तो....हम इसे भेड़चाल कहते हैं। यह बीमारी अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से प्रचलित है। जैसे साहित्य में प्रभाव.....और सिनेमा, संगीत में प्रेरणा....हाँ मामला जूते फेंकने से जुड़ा हुआ है। ये हमारे वैचारिक, रचनात्मक और क्रियात्मक दिवालिएपन की पराकाष्ठा ही कही जाएगी कि हमारे पास विरोध करने तक का अपना तरीका नहीं है....हम विरोध करने के तरीके की भी नकल करते है...इराक में जैदी ने बुश पर जूता क्या फेंका.....हमारे यहाँ इसकी होड़ शुरू हो गई....यूँ हमारे देश में इसका पहला प्रयोग जरनैलसिंह ने किया था तो यह यहाँ उसका मौलिक प्रयोग है....फिर तो कारवां चल निकला....देश में हर दिन कहीं न कहीं से जूता चलने की खबर आती ही रहती है...ताजा जूता प्रधानमंत्री और पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी के नाम चले....इस मामले में प्रधानमंत्री थोड़ा पिछड़ गए....आडवाणी जी को तो पूरा जोड़ा ही मिला, लेकिन बेचारे मनमोहनसिंह को एक से ही संतोष करना पड़ रहा है। इस मामले में नवीन जिंदल की तो उड़की ही लग गई......वह तो राजनीति की युवा ब्रिगेड का नितांत लो-प्रोफाइल नाम है फिर भी साहब किस्मत देखिए कि जूता प्रतियोगिता में उनका भी नाम आ गया....खैर साहब जो भी हो हमें तो दिवालिएपन के लिए ईनाम मिलना चाहिए.....ऐसा वैसा नहीं, पहला....और पता नहीं जेल में जैदी कुछ कर रहा है या नहीं, लेकिन वहाँ उसे समय का सदुपयोग करते हुए, जूता फेंकने की कला पर एक किताब लिख देनी चाहिए और कहीं नहीं तो हिंदुस्तान में तो उसकी खूब बिक्री होगी....और हाँ अमेरिका में कोई इसका पेटेंट कराने की सोचे इससे पहले ही जैदी को पहली फुर्सत में जूता फेंकू कला का पेटेंट करा लेना चाहिए, बुश पर जूता फेंकने के बाद नौकरी से तो उसे निश्चित ही निकाल दिया होगा....तो इस पेटेंट से उसे खूब आमदनी होगी ...कम से कम हमारे देश से तो निश्चित ही....अब तक तो उसे खासा नुकसान भी हो चुका है.....खैर अब भी जाग जाए तो सवेरा दूर नहीं है.....आमीन....

Friday, 17 April 2009

उम्मीद की रोशनी

भारतीय राजनीति बहुत बुरे दौर में प्रवेश कर चुकी है। यहाँ बुरे दौर से गुजर रही है का उपयोग नहीं किया गया है, क्योंकि गुजरना शब्द एक उम्मीद पैदा करता है कि जल्द ही सब कुछ ठीक हो जाएगा...लेकिन इन हालात में क्या हम ये सपना भी देख सकते हैं?
लगातार खराब होते जा रहे राजनीतिक हालात में यह कहा जाना ही ज्यादा ठीक है कि भारतीय राजनीति बहुत बुरे दौर में प्रवेश कर चुकी है....। राजनीति में मूल्यों का लोप स्वतंत्रता के बाद से शुरू हुआ तो आज तक उसका नीचे जाना नहीं रूका....पता नहीं ये और कितना नीचे जाएगा.....? भारतीय राजनीति में पैसे और ताकत की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। इसके साथ ही हमारी विविधता, जिसके बारे में स्वतंत्रता के बाद के समाजशास्त्रियों ने मान लिया था कि लोकतंत्र के विकसित होते ही इसका प्रभाव कम होने लगेगा...लगातार बढ़ती ही जा रही है....राजनीति में हमारे यहाँ धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा और इसी तरह की अन्य कई तरह की विविधताएँ अब और ज्यादा मुखर हो गई है....इन सब ने हमारी व्यवस्था में दबाव और हित समूह का रूप ले लिया है। ऐसे में ये और ज्यादा ताकतवर हुए और लोकतंत्र की बुराई बनकर उभरे है और इसने लोकतंत्र की भावना को नुकसान ही पहुँचाया है...इससे धीरे-धीरे आम आदमी और पढ़ा-लिखा वर्ग राजनीति से दूरी बनाने लगा...और उस शून्य को भरने के लिए अपराधी किस्म के लोगों का जमघट होने लगा। सब तरह से नाउम्मीदी के इस दौर में मीरा सान्याल और मल्लिका साराभाई का राजनीति में प्रवेश उम्मीद की हल्की-सी रेखा के तौर पर दिखाई देने लगी है....। मल्लिका ने तो आडवाणी जैसे हाई प्रोफाईल नेता के खिलाफ चुनाव लड़ने का साहस दिखाया....जबकि हश्र वे भी जानती होंगी....फिर भी देश में राजनीति के प्रति दिखाई दे रही उदासीनता....हताशा और उपेक्षा के दौर में मीरा-मल्लिका की पहल की तारीफ की जानी चाहिए....और उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
ये विषयांतर है। हाल ही में मध्यकाल के हिंदी कवि ( ये खड़ी बोली के विकास के प्रारंभिक दौर के कवि रहे हैं) अमीर खुसरो की खुबसूरत लाईनें पढ़ी....आप भी मजा लें
खुसरो दरिया प्रेम का
सो उलटी वाकी चाल
जो उबरा सो डूब गया
जो डूबा सो पार
भाव साम्य आमंत्रित है.....याद रखना भी प्रयोजन है....।

Sunday, 12 April 2009

कलम पर भारी जैनी का जूता…..

उस प्रेस कांफ्रेंस में दैनिक जागरण के पत्रकार जरनैल सिंह ने गृहमंत्री पर जूता क्या फेंका देशभर के पत्रकार और कथित सभ्यतावादी लगे आलोचना करने....फिर टीवी चैनलों को तो एक बड़ा स्कूप मिल गया... लंबे समय से उन्हें खबरों की तलाश थी....जैनी ने तो चिदंबरम की तरफ एक ही जूता फेंका लेकिन टीवी पर तो इतने जूते पड़ते दिखाए गए कि बस....इसे पत्रकार के पेशे और उसके संयम की दुहाईयाँ भी दी जाने लगी...आखिरकार जरनैल सिंह मात्र एक पत्रकार ही तो है....इंसान नहीं...? तो उसे तो एक पैटर्न के अनुसार व्यवहार करना चाहिए ना.....! यह हंगामा उस समय नहीं हुआ जब जैदी ने बुश पर जूता फेंका था....शायद उसे दुसरे देश का मामला मान लिया गया था....लेकिन आज ये मामला हमारे देश का है।
इसे व्यवहार के तयशुदा मापदंडों के आधार पर तौलने की बजाय जैनी की मजबूरी के तौर पर देखा जाना चाहिए...एक पूरी की पूरी कौम की पीड़ा से उपजी बेबसी....और उस बेबसी का ये सात्विक विरोध....सोचिए जूते की जगह बंदूक भी हो सकती थी.....एक तरफ जहाँ जैदी का जूता एक देश की पीड़ा का प्रतीक है तो जैनी का जूता एक पूरी कौम की बेबसी का....जिन्हें एक पूरी कौम अपराधी मानती हो वे गवाहों के अभाव में निर्दोष सिद्ध हो जाए और पार्टी उन्हें टिकट भी दे दे तो फिर वह पीड़ित कौम क्या करे? जैनी के गुस्से को मजबूर गुस्से की सात्विक अभिव्यक्ति माना जाना चाहिए....औऱ फिर जो काम देश भर में हुए विरोध प्रदर्शन नहीं कर सका उसे एक जूते ने कर दिखाया.....अब हुआ ना जूता कलम से ज्यादा ताकतवर....जो काम जैनी के जूते ने किया क्या वह काम उसकी कलम कर सकी.....? हाँ इस कैटेगरी में राजबल और नवीन जिंदल मामले को नहीं लिया जा सकता है....

Thursday, 9 April 2009

क्या मंदी के माध्यम से अमेरिका देगा तीसरे विश्ययुद्ध की सौगात!

पिछले लगभग सवा साल से मंदी का भूत पुरी दुनिया की अर्थव्यस्था पर छाया हुआ है. वारेन बफे ने इसे १९३० की मंदी से भी बड़ा आर्थिक संकट बताया है. अकेले अमेरिका में जनवरी २००८ से सितम्बर तक हर माह औसतन ८४ हजार नौकरियां ख़त्म हुई. यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से वहां सबसे ज्यादा है. २० मार्च को अमेरिकी सरकार द्वारा जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में बेरोजगारी का प्रतिशत ८.१ हो गया है जो २५ सालों में सबसे ज्यादा है. फरवरी २००९ में ही ६ लाख ५१ हजार लोगों को नौकरियों से हटाया गया ओर वहां बेरोजगारों की कुल संख्या १२.५ मिलियन तक पहुँच गई है.
उधर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के आशंका व्यक्त की है कि वैश्विक बेरोजगारी का आंकडा २००७ की तुलना में ३० मिलियन हो जाएगा और यदि ये सिलसिला नहीं रुका तो यह बढ़ कर ५० मिलियन तक भी जा सकता है. सिर्फ़ अकेले अमेरिका में नवम्बर २००८ से लेकर फरवरी तक के ४ महीनों में २.५ मिलियन लोगों के नौकरियां छिन गई और ये बेरोजगारी ओद्योगिक उत्पादन के ढह जाने से हुआ है. और यह ज्यादातर देशों में हर साल १० प्रतिशत की दर से गिर रहा है.
आम आदमी इस मंदी को नौकरियों के छिन जाने और वेतन कटौती के सन्दर्भ में ही समझ पा रहा है, लेकिन इसके परिणाम और भी भयावह हो सकते है. इस सिलसिले में लन्दन से प्रकाशित पत्रिका इकोनोमिस्ट ने चेतावनी दी थी कि मंदी की वजह से बहुत सारे विकासशील देशों में सामाजिक अशांति की स्थिति बन सकती है, कुछ इससे मिलती-जुलती आशंका अमेरिकी गुप्तचर विभाग के नए प्रमुख डेनिस ब्लयेर ने भी व्यक्त की है. उन्होंने कहा है कि वैश्विक मंदी की वजह से होने वाली राजनीतिक हलचल से देश की सुरक्षा को खतरा बढ़ रहा है, उनकी चिंता आतंकवाद की है. लेकिन मार्च के अंतिम सप्ताह में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के निदेशक डोमिनिक स्ट्रास कोहेन ने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की बैठक से पहले जिनेवा में यह कह कर चौंका दिया कि-- दुनिया की आर्थिक स्थिति बहुत भयावह होती जा रही है और यदि इसे नहीं संभाला गया तो सामाजिक क्रांति और युद्ध भी भड़क सकता है. कोहेन ने कहा की इस संकट ने बहुत सारे देशों में नाटकीय रूप से बेरोजगारी बढाई है. यह सामाजिक शान्ति के साथ लोकतंत्र के लिए भी खतरा है और हो सकता है कि इसका अंत युद्ध में हो. इसी तरह जर्मनी के राष्ट्रपति और आई ऍम ऍफ़ के पूर्व प्रमुख होर्स्ट कोहलेर ने भी लगभग उसी समय स्ट्रास का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि आने वाले कुछ महीने बहुत मुश्किलों भरे होंगें. कहा जा सकता है कि ये तो बस शुरुआत है, जैसे-जैसे इस समस्या को सुलझाने के लिए प्रयास किए जा रहें है, वैसे-वैसे समस्या आर्थिक से आगे बढ़कर राजनीतिक और सामाजिक रूप लेती जा रहीं है, अमेरिका जैसे देशों की संरक्षणवादी नीतियों से फ्रांस इतना नाराज था की उसने मीटिंग से पहले जी-२० को छोड़ने तक की धमकी तक दे डाली थी. उधर मीटिंग से पहले लन्दन, फ्रांस और जर्मनी में इसके खिलाफ प्रदर्शन हुए... तरलता और संरक्षणवाद के बीच के संघर्ष ने भी स्थितियां बिगाड़ कर रख दी है..... इस बीच हंगरी के प्रधानमंत्री फेरेनक जय्रुस्कानी ने चेतावनी दी है कि आर्थिक संकट पूर्वी यूरोप को योरोपियन यूनियन से अलग कर एक लोह आवरण के रचना कर सकता है। लंदन में हुई जी-20 की बैठक के परिणाम यूँ तो बहुत उत्साहजनक बताए जा रहे हैं, लेकिन यदि हम इतिहास नहीं भूले हो तो शक बना रहता है....हमें भूलना भी नहीं चाहिए कि आईएमएफ सहित सभी तरह की अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ हमेशा से अमेरिका की पिछलग्गू रही है और आज भी इनसे ज्यादा की उम्मीद नहीं की जा सकती है.....और फिर बराक ओबामा का बाय अमेरिकन....उन कंपनियों को सब्सिडी देने की घोषणा करना जिनमें अमेरिकीयों को रोजगार दिया जाएगा....फिर अमेरिका की प्रतिष्ठित कंपनी एआईजी को भी भूला नहीं जा सकता जिसने बैल आउट के लिए मिले पैसे में से सवा आठ सौ करोड़ रु. अपने अधिकारियों को बोनस के रूप में बाँट दिए....क्या ऐसे में विकासशील देशों के पास विश्वास करने के लिए क्या कुछ बचता है....जब थोड़े से संकट में अमेरिका बचाव की मुद्रा में आ खड़ा हुआ है तो क्या उसकी नीयत पर शक किया जाना आश्चर्य पैदा करता है
एआईजी की घटना ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि दरअसल सरकारों की सारी कवायदें पूँजीपतियों को बचाने की है, उन लोगों की दुर्दशा पर ध्यान नहीं है, जिनकी नौकरियाँ जा रही है....और यदि उनके हाथों को काम दिया जाए तो शायद अर्थव्यवस्थाओं को उबारने में मदद मिले......और युद्ध तथा सामाजिक अशांति का खतरा भी कम हो।

Wednesday, 8 April 2009

नमस्ते.....

आखिरकार रोमन से देवनागरी पाने की यातना से मुक्ति मिल ही गई। यह सब कुछ संभव हुआ नवभारत टाईम्स में छपे अनुराग अन्वेषी के लेख से...। अभी इंस्क्रिप्ट की-बोर्ड पर गति आना बाकी है, फिर ब्लॉग लिखना ज्यादा नियमित हो पाएगा ऐसी खुद से उम्मीद है। एक राह पकड़ ली है मधुशाला मिल ही जाएगी। यदि आपमें से कोई भी मेरी तरह की समस्या से दो-चार हो रहा है तो मुझे मेल करें। यूँ कम्प्यूटर के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है फिर भी अन्वेषी का लेख मेल कर सकती हूँ। अन्वेषी जी जहाँ कहीं भी हो उन्हें धन्यवाद पहुँचे.....शेष शुभ

Wednesday, 25 March 2009

अनायास उसका आना....

प्यारी सूरत वालें सारे पत्थर दिल हो मुमकिन है
हम तो उस दिन राय देंगें जिस दिन धोखा खायेंगे.....
जी नहीं यह मेरा नहीं है यह तो हसरत जयपुरी का शेर है....खत्म होते दिन के सिरे का रात से गठबंधन कराती लम्बी सी गर्मी की शाम को..... अनायास ही अपने खजाने में से गुलाम अली की एक भूली बिसरी केसेट हाथ आ गई और शाम बन गई.... इस समय ना तो गुजरे दौर से शिकवा है ना आने वाले से कोई उम्मीद.....ना गुजरते को पकड़ने की चाहत हो....सफ़ेद से सांवले होते आसमान का एक टुकडा जो मेरी खिड़की पर छाया है....उसी को आंखों पर रख कर.....
वादे की शब खामोश फिजायें, दिल में खलिश वो आए ना आए
दर पे निगाहें लब पे दुआएं उफ़ री मोहब्बत हाय जवानी....
चल रही है गजल....इस समय ना कुछ पा लेने की ख्वाहिश है और ना कोई सपना है...ना कुछ पाने की खुशी है और ना कुछ छुट जाने का मलाल है....बस वक़्त के साथ बहते जाने का सुख है..... ये आनंद है....शब्द से परे....मौन...लगातार चकर-चकर करती जबान चुप है....मन हवाओं पर सवार है और वह भी इस अनायास आ पहुचें सुख का लुत्फ़ ले रहा है.... बड़े दिनों से बिसराए इस स्वाद ने आज फिर से जीने का अहसास दे दिया....वरना तो हर दिन एक मशीन सा आता और बिना अहसास के चला जाता है...शायद इसे ही हमारे आध्यात्म में आनंद कहा जाता है....जो ईश्वर का सा अनुभव कराता है....और आख़िर में मंजिलें गम से गुजरना तो है आसां है एक बार
इश्क है नाम ख़ुद अपने से गुजरने जाने का....
कुछ ऐसा ही हाल है इन दिनों.....बस

Monday, 23 March 2009

पाकिस्तान में लोकतंत्र और अमेरिका

लगभग २० दिनों से चल रही किताब 'डॉटर ऑफ़ ईस्ट' आखिर ख़त्म हुई. इस पुरे समय के दौरान जब मैं नहीं पढ़ रही होती थी तब भी बेनजीर मेरे साथ लगी रहती थी.....गहरी नींद में सपनों की तरह....अधूरी नींद में विचारों की तरह और जागते हुए चित्रों की तरह....यहाँ तक की पढ़ते हुए भी विचार और फ़िल्म चलती रहती थी....कहा जा सकता है कि बेनजीर के संघर्ष को पढ़ने के दौरान मैंने भी जिया है....दरअसल बेनजीर की आत्मकथा के बहाने ना सिर्फ़ उसके संघर्ष बल्कि पाकिस्तानी अवाम का लोकतंत्र के लिए संघर्ष की भी जानकारी मिलती है...ये महज इत्तेफाक ही है कि इन दिनों भी पाकिस्तान गहरे सियासी संकट से जूझ रहा है....और ये संकट भी उस देश की बदनसीब जनता को फिर वहीं ले जा रहा है, जहाँ से वह बड़ी मुश्किल से निकला है.....
लगभग महीने भर पहले जब अमेरिका ने 'गुड और बेड' तालिबानी का शोशा छोड़ा था तब यूँही विचार आया था कि कहीं ऐसा तो नही कि पाकिस्तान की सियासत का रिमोट क्षेत्र में अमेरिकी हितों से संचालित होता है....?
बस ये विचार यूँ ही आया था...लेकिन अपनी आत्मकथा में बेनजीर लगातार इसकी तस्दीक करती रहीं....शोध की भाषा में कह लें कि फिलहाल ये विचार एक 'हाइपोथीसिस' बन गया है। नहीं तो क्या कारण है कि ६२ साल की आजादी के बाद भी पाकिस्तान में कुल ४ ही निर्वाचित प्रधानमंत्री हुए...शेष समय फौजी तानाशाही रही...आखिर इस क्षेत्र में अमेरिकी रूचि क्या मात्र रूसी प्रभाव को रोकना ही है.... या पाकिस्तान में रहते हुए भारत और चीन पर लगाम लगाने की रणनीति भी है....?बड़ी अजीब बात है की अमेरिका ने जिया और मुशर्रफ़ दोनों को ही खूब शह दी....इस पुरे समय में कभी भी लोकतंत्र और मानवाधिकारों पर अमेरिका ने चिंता नहीं जताई...चाहे औपचारिक तौर पर शीत युद्ध समाप्त हो चुका है....फिर भी हाल के दिनों में रूसी पुनरुत्थान ने यूरेशिया सहित अमेरिका को चुनौती देना शुरू कर दिया है....बल्कि पश्चिम के विशेषज्ञों ने तो लगभग साल भर पहले से आशंका व्यक्त करनी शुरू कर दी थी कि दुनिया में दुसरे शीत युद्ध की आहट सुनाई देने लगी है.....शायद बीते साल के मध्य में दुनिया में मंदी के भुत ने इस आशंका को वक्ती तौर पर ढँक दिया है...नहीं तो जार्जिया संकट....मध्य एशिया में नाटो की घुसपैठ और पूर्वी यौरोपे में अमेरिका के डिफेन्स सिस्टम लगाने का रूसी विरोध और रूसी चुनावों के प्रति पश्चिमी नजरिया और उस पर रूसी प्रतिक्रिया किसी से छुपी नहीं है....यहाँ अमेरिकी मंदी के तथ्य को उसके रक्षा उद्योग के प्रकाश में भुलाया नहीं जा सकता है....हो सकता है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अमेरिकी हथियारों की खपत कर वह अपनी अर्थव्यवस्था को बूस्ट करने का षडयन्त्र कर रहा हो?

Friday, 20 March 2009

लक्ष्य....जूनून......और जीवट

अपनी बीमारी की छुट्टियों के दौरान, चैत्र के लगभग बीचोबीच जवान होती शाम को मौसम अचानक खुशनुमा हो गया. आसमान पर बादलों की हलकी पर्त चढ़ आयी और हवा चलने लगी. ऐसे में खिड़की से झांकते, झूमते नीम, गुडहल और पतझड़ को सह रहे सागौन को देखते हुए अपने शिथिल हो चले मन का में आनंद ले रही हूँ. बीमारी में शरीर के पस्त होते ही दिमाग के तंतु भी शिथिल हो जाते है, और हम सारे बंधनों से आजाद हो जाते है....ऐसा सिर्फ़ बीमारी में ही होता है कि रात और दिन आते और जाते है....घड़ी की सुई भी घुमती है फिर भी हम इससे आजाद होते है.... सुई और पृथ्वी दोनों को घुमने देते है, क्योंकि हम फिलहाल इनकी तरह घुमने के लिए अभिशप्त नहीं है. 'तुम नहीं गम नहीं शराब नहीं, ऐसी तन्हाई का जवाब नहीं, बार बारहे इसे पड़ा किजे दिल से बेहतर कोई किताब नहीं'.... यूँ ऐसा कम ही होता है...तो इस हाल में दिमाग का सारा कूड़ा साफ़ हो चुका है और जमीं तैयार पड़ी है बस देर है तो कुछ बोने की....... तो फिलहाल जब बुखार उतरता है से लेकर उसके फिर से आने तक हाथ में बेनजीर भुट्टो की आत्मकथा 'डाटर ऑफ़ ईस्ट' पढ़ रही हूँ. आख़िर शाम के अन्तिम सिरे पर आसमान से बूंदे बरसी और खिड़की से हवा पर सवार होकर सौंधी सी खुशबु कमरे में आ धमकी....हवा का चलना बदस्तूर जारी है. बल्कि उसकी गति तेज और तेजतर हो रही है.... इससे पोर्च में लगा विंड चिम तेजी से झनझना रहा है.
उधर बेनजीर अपनी सात साल की अमानवीय....त्रासद..... एकाकी....हताशाभरी और लगभग तोड़ देने वाली जेल की सजा से आजाद होकर अपना इलाज कराने के लिए लन्दन पहुँच गई..... अब तक पढ़े २३५ पन्नों के बाद एक सवाल जो मेरे सामने खड़ा है कि----- वो क्या वजह हैं, जिसने अपने पिता की हत्या, मां और ख़ुद की यंत्रणा दायक सजा के लंबे अरसे के बाद भी बेनजीर को पाकिस्तान के फौजी शासक जनरल जिया से समझौता ना करने के लिए प्रेरित करता रहा? अपनी सात सालों की सजा में ज्यादातर अकेले जेल में और वह भी सी ग्रेड कैदी की तरह बिताने के बाद भी बेनजीर ख़ुद को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखने का समझौता नहीं करती हैं. क्या वह मात्र सत्ता पाने की लालसा है? या फिर एक जूनून है.....एक लक्ष्य पाने का....पाकिस्तान में लोकतंत्र लाने का...? फिलहाल लगातार पढ़ रहीं हूँ और विचार कर रही हूँ.....कहा जा सकता है कि लक्ष्य पाने की प्यास जूनून पैदा करती है और जूनून वह ताकत पैदा करता है, जिसे जीवट कहते है....और यह सकारात्मक भी होता है और नकारात्मक भी....पाठक मुझे माफ़ करेगें लेकिन आतंकवादी भी इसी जूनून की पैदावार है, बस इनकी दिशा विपरीत है....हालाँकि ये 'बस' नहीं है....इस पर फिर कभी......

Sunday, 8 March 2009

होली की शुभकामनाएं

टेसू के सिरे दहकने लगे है....आम भी बौराया हुआ है....कड़वे नीम के फूलों की नशीली सी खुशबु हवा के झोकों को साथ आँगन में शाम से आ धमकती है.... वसंत का यौवन शबाब पर है....दिन थोड़ा नकचडा हो आया है.... सुबह तो पलाश की तरह सिंदूरी हो चली है....शाम 'हम दिल दे चुके सनम' फ़िल्म की नंदिनी के दुपट्टे की तरह लम्बी...... हो चली है, जिसके सुदूर सिरे पर सुलगती से रात उतरती है.....रात का आँचल सिकुड़ गया है....दिन लंबा होकर हरिया गया है.....छत की मुंडेर पर पड़े रंग वासंती बयार में उड़ कर फैल जाना चाहते है....आसमान के साथ ही प्रकृति भी रंगों से खेल रही है....तो फिर हम क्यों नहीं....? टेसू, आम और नीम के ही साथ....बोगनबेलिया.....गुडहल और गुलटर्रा पर भी फागुन चढा है.....देखो तो कैसे-कैसे रंग निकल आए है.....आँगन में तो फागुन अपने जोडीदार वसंत के साथ धमाल मचाये है। यूँही तो होली नहीं मनाई जाती है....जब मन में तरंग उठती है.....जब सारे बंधन तोड़ कर मन का करने का मौसम आता है...जब प्रकृति अपने सबसे मादक रूप में दिखाई देती है....जब सब जगह रंग ही रंग होते है, जब मन भी रंगों से सराबोर होता है तो फिर तन ही क्यों छुट जाए? तो तन, मन और मौसम से ताल मिलाएं और फाग की थाप पर आनंद की तान सुनाये.....प्रेम...खुशी और सदभावना के रंगों से होली खेले और मनाये.....सभी को होली के मुबारकबाद......

Friday, 27 February 2009

ताकि प्यास रहें बरक़रार

हमारी परम्परा में नाद ब्रह्म है और जब उसके साथ दर्शन हो तो बनता है वह अलौकिक होगा....उसकी अनुभूति शब्दों से परे होगी....गूंगे के गुड की तरह....यहाँ हम एक फिल्मी क़व्वाली की चर्चा कर रहें हैं....सुर-ताल के साथ शब्दों की संगत से जो बेहतर बनता है. वह सब बरसात की रात की क़व्वाली 'ना तो कारवां की तलाश है, ना तो हमसफ़र की तलाश है' में मिल जाएगा.... इसे आत्मस्थ होकर सुनने से जो अहसास होता है वह भी अलौकिक.....शायद स्वर्गिक या शायद....शब्द नहीं है....चुक गए है...इसे दर्शन में संप्रेषण की समस्या कहते है...पश्चिम में खासकर कार्ल जेस्पेर्स अनुभूतिगत आदान-प्रदान को मानव होने की खास जरुरत मानते है, लेकिन इसकी सीमाओं से हम इंकार नहीं कर सकते है...फिर जिस तीव्रता, स्तर और मात्रा में मुझे कोई अहसास हुआ है, उसका मापदंड क्या है? अहसास तो व्यक्ति-दर-व्यक्ति अलग होता जाता है, खैर फिलहाल दर्शन नहीं संगीत और अध्यात्मिक अनुभूति की बात हो रही है. मन्ना डे के आलाप के साथ शुरू हुई इस क़व्वाली में सिर्फ़ आराधक और आराध्य ही है, या दुनियावी और श्रृंगारिक दृष्टि से आशिक और माशूक....लेकिन जैसे-जैसे यह आगे बढती है आशिक और माशूक कहीं गुम हो जाते है, फिर जो बचता है वह सिर्फ़ और ब्रह्म और पिंड होता है…संसारिकता कहीं गुम हो जाती है और रूहानियत का जन्म होता है, रेडियो के ज़माने में 'ना तो कारवां की तलाश है' और 'ये इश्क इश्क है इश्क इश्क' दो अलग-अलग कम्पोजीशन के तौर पर सुनी और पहचानी थी...क्योंकि इसकी लम्बाई औसत गानों से ज्यादा है और इस माध्यम की अपनी सीमाएं....तो ना तो कारवां की तलाश है ना तो हमसफ़र की तलाश है.....फिर मंजिल तो साफ़ है, एकांतिकता की दरकार है....मेरे शौके खाना ख़राब को तेरी रहगुजर की तलाश है....रास्ते की तलाश है और वो भी अकले.....अकले होने का कोई गम नहीं, बल्कि चाहत है....वो तो सिर्फ़ प्रेम में ही सम्भव है, आखिर कबीर ने भी तो है की प्रेम गली अति साकरी या में दो ना समाही, जब में था तब हरि नाही, अब हरि है मैं नाहीं...जिस रास्ते से मैं भी नहीं गुजर सकता, उसमे कोई और कैसे साथ चल सकता है?फिर आशा का मद्धम आलाप से प्रवेश करना...मेरे नामुराद जूनून का है इलाज कोई तो मौत है....किसी भी तरह के इस दुःख से निजात की ख्वाहिश...तेरा इश्क है मेरी आरजू, तेरा इश्क है मेरी आबरू....तेरा इश्क में कैसे छोड़ दूँ मेरी उम्र भर की तलाश है....यहाँ तक तो पकी उम्र में ही पहुँचा जा सकता है, क्योंकि इस जूनून तक....दिल इश्क, जिस्म इश्क और जान इश्क है, ईमान की जो पूछो तो ईमान इश्क है.... तो फिर बचा क्या?यहाँ तक तो सब कुछ चलता है, लेकिन जैसे ही क़व्वाली का दूसरा हिस्सा 'ये इश्क इश्क है इश्क इश्क है' शुरू होता है सुफीत्व का आविर्भाव होता है और हम एक सर्वथा नई भावभूमि पर आ खड़े होते है....यहाँ कुछ भी नहीं होता 'नथिंगनेस' भी नहीं क्योंकि इसका अस्तित्व भी 'थिंग' होने के बाद की अवस्था है....यहाँ अतीत के बाद का वर्तमान है...यहाँ न काल है न काल का अहसास......सिर्फ़ नाद है....और है ब्रह्म की अनुभूति ...जमाना नहीं और अहसासे जमाना तक नहीं, यहाँ तो शमन होने लगता है कबीर वाले 'मैं' का, जो धीरे-धीरे गल रहा है...पिघल रहा है.....सहर तक सबका है अंजाम जल कर खाक हो जाना.... एक और सच मृत्यु...चाहे कोई भी हो इससे निजात नहीं है. क़व्वाली में इश्क के फलसफे के गिरह खुलने लगती है....इश्क आजाद है.....हिंदू ना मुसलमान है इश्क....आप की धर्म है और आप ही ईमान है इश्क है....एक चेतावनी.....बहुत कठिन है डगर पनघट की.....उसका जवाब.....जब-जब कृष्ण की बंसी बाजी निकली राधा सज के जान अजान कम ध्यान भुला के लोक लाज को तज के...... एक सी ताल पर जूनून रगों नें दौड़ने लगता है....सप्तक तक जाता सुर..... कहता है कि ये कायनात इश्क है और जान इश्क है....अंत में इश्क की इन्तहा....खाक को बुत और बुत को देवता करता है इश्क इन्तहा ये है कि बन्दे को खुदा करता है इश्क....फिर कबीर तू तू करती तू भई मुझमे रहीं ना मैं.....यूँ फ़िल्म में ये रोशन की कम्पोजीशन है लेकिन असल में ये उनके गुरु भाई फ़तेह अली खान की रचना है....अंत तक आते आते भावनाओं कम अतिरेक और आंसू....आख़िर दुःख और खुशी के अतिरेक के साथ भावनाओं के अतिरेक की अभिव्यक्ति भी तो ये ही करते है....आनंद के समंदर में पुरी तरह डूबे हुए....शब्द खत्म हुए....हाँ एक प्यास बनायें रखें ......घूंट घूंट पिए.....क्योंकि तृप्ति से ज्यादा आनंददायक है प्यास....जय हो के ज़माने में सुने इश्क की महिमा और बताएं......

Saturday, 7 February 2009

फिर सवालों का जंगल है..




दिमाग के घर में दीवार नहीं है.... इसलिए विचारों का पंछी कभी भी बेधड़क आता और जाता रहता है....मायूसी की बात ये है कि समय और सब्र के वो दरख्त ठुठ हो गए है जिन पर कभी अहसासों के पछियों के घोंसले हुआ करते थे....फिर भी कभी-कभी ये पंछी अपने माजी से रूबरू होने के लिए उदासी की गठरी उठाये चले आते हैं.....आज दोपहर भी वह आकर उसी ठूंठ पर अपनी उदासी की गठरी लिए आ बैठा.....सूरज तप रहा था और वह जोगी की तरह ऑंखें मूंदे तप की मुद्रा में बैठा रहा.... धूप ने उसे स्याह कर दिया था....इस स्याही ने उसकी गठरी बहुत भारी कर दी और वह उसे वहीं छोड़ कर उड़ गया....मतलब उसके अवसाद की गठरी मेरे दिमाग के घर में अब पड़ी हुई है.... वह अपना अवसाद मेरे लिए छोड़ गया है....ये अवसाद छूत की बीमारी है और इसका संक्रमण मुझे भी हो गया....किसी शायर ने क्या खूब लिखा है कि---- ना मिला कर उदास लोगों से/ हुस्न तेरा बिखर ना जाए कहीं.....तो अब ये अवसाद फिलहाल मेरा मेहमान है....यूँ ये बिन बुलाया मेहमान ही रहता है.... अक्सर किसी न किसी बहाने से आ ही जाता है ... इन दिनों फिर से अजीब से सवालों ने आ घेरा है....अपनी गठरी छोड़ कर पंछी तो उड़ गया लेकिन उसमें से अवसाद की केंचुल हमारे हाथ रह गई..... अवसाद दौड़ का हिस्सा होने की.... दौड़ते हुए कण-कण क्षरण होते देखने का....इस अनजानी, अनचाही और अपरिचित दौड़ में कई पड़ाव और मंजिलें है.... और हर पड़ाव पर पहुँच कर यूँ लगता है कि कहीं पीछे कुछ रह गया है.... हर मंजिल पर पहुँच कर एक रिक्तता हमारा इंतजार करती है...भोतिक उपलब्धि कहीं न कहीं हमें खोखला कर देती है ...महत्वाकांक्षा अपनी तरफ़ आकर्षित करती है तो जीवन की प्रयोजनहीनता का विचार अपनी और बकौल ग़ालिब --- ईमां मुझे रोके है तो खीचें है मुझे कुफ्र, काबा मेरे पीछे है कलिसा मेरे आगे.......

Thursday, 5 February 2009

सीने में जलन आँखों में तूफान सा क्यों है?

ना जाने क्या लावे सा बहता है....? एक बेचेनी.....एक छटपटाहट..... सुबह शाम एक उलझन .....लगातार एक जलन.... जीवन के रूटीन हो जाने के बाद की एकरसता ......सपनों को भोग लेने के बाद की नीरसता.... यदि सपनें टूटते है तो कम-से-कम उसकी किरचें तो होती है...लेकिन सपने पुरे होने के बाद....होता है खालीपन.....जीवन में क्या सच है....कमी या पूरापन....फिर पूरापन क्या है? आज जो पुरा लग रहा है क्या वो कल भी इतना ही पुरा लगेगा....या कल फिर से नई दौड़ होगी..? कभी-कभी यूँ लगता है कि जीवन में एक दर्द .....एक कमी...एक अभाव जरुरी है....कोई आकर्षण तो हो.... खुशी के बाद जो एक रीतापन होता है वह कमी के बाद नहीं होता है.... तकलीफ तो हमेशा कुछ होने का अहसास कराती है... खुशी की तरह नहीं कि आती है और रूटीन बन कर रह जाती है...दर्द से निजात के लिए लगातार के प्रयास होते है.... उससे निकलने के लिए तरह-तरह के उपाय.... हर दिन कि नवीनता....एक नया दिन ख़ुद से लड़ने...घायल होने और हार जाने के बाद फिर से खड़ा होने की ताकत जुटाने का न टूटने वाला क्रम.....सह कर सीखने और जीवन को सम्रद्ध करने और करते रहने का जूनून....तेज प्यास..... और तृप्ति के खवाब....लगातार चलती जद्दोजहद.....तभी तो अज्ञेय ने लिखा है कि दुःख माँजता है... और यकीनन वह माँजता है.... चमका कर सोना कर देता है.... और खुशी उथला कर देती है.... शायद इसीलिए कहा गया है कि दुःख के अहसास के बिना आई खुशी आदमी को दीमक की तरह खोखला कर देता है... सोचें कि उस राजा की तरह जिसे पैसों की इतनी हवस थी कि उसने इसके लिए तप किया.... और फिर उसे वरदान मिला कि वह जिस चीज पर हाथ रख देगा वह सोना हो जायेगी.....हमारे भी साथ हो जाए कि हम जो चाहे वह मिल जाए तो...... वक्ती तौर पर तो उपलब्धि होगी.... खुशी का अहसास होगा लेकिन.... फिर....? जीवन से सारे आकर्षण....सारी जद्दोजहद....प्रयास...उमंग... उत्साह सब कुछ काफूर हो जाएगा। जीवन में एक ही रंग होगा... एक ही सा अहसास और अपनी भाषा में कहें तो बोरियत होगी और होगी ऊब..... शायद तभी तो धर्मवीर भारती और शिवाजी सावंत जैसे विद्वानों ने अपूर्णता को जीवन की जरुरत माना है। तो संघर्ष है तो गति है....जीवन है....प्रवाह.....सृजन....रस....और अन्त में दुनिया है..... फिर...अधूरेपन को पुरे मन से सलाम....जीवन को रसमय और आकर्षक बनने के लिए....है या नहीं? आप बताएं